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Wednesday, 25 January 2017

काबिल: ना‘काबिल’-ऐ-बरदाश्त! [2/5]

संजय गुप्ता की ‘काबिल’ देखते वक़्त अक्सर मिथुन चक्रवर्ती और उनकी कुछ बहुत बेहतरीन फिल्मों की याद बरबस आ जाती है. लगता है, जैसे अभी भी मिथुन दा का ज़माना पूरी तरह गया नहीं. ‘आदमी’, ‘जनता की अदालत’, ‘फूल और अंगार’ जैसी फिल्मों को परदे पर धूम मचाते देखते हुए अभी गिन-चुन के सिर्फ 24-25 साल ही तो गुजरे हैं. भ्रष्ट राजनेताओं और उनके तलवे चाटते पुलिस महकमे से तमाम जुल्म-ओ-सितम का बदला लेने के लिए जब मिथुन दा कमर कस के खड़े होते थे, अचानक जैसे बलात्कार की शिकार उनकी बहन अपनी बहन लगने लगती थी, और अर्जुन, गुलशन ग्रोवर, हरीश पटेल जैसे गुंडे अपने ही जानी दुश्मन. सिनेमा की ताक़त ही यही होती है. पर सवाल सिर्फ इतना है कि अगर उन तमाम फिल्मों को घोर लोकप्रियता के बावजूद आज हम ‘बी-ग्रेड सिनेमा’ की श्रेणी में रखते हैं, तो ‘काबिल’ को भी इस काबिल क्यूँ नहीं समझा जाना चाहिए? या फिर शायद हमें इसके लिये 24-25 साल और इंतज़ार करना होगा.

संजय गुप्ता कोरियाई फिल्मों के मुरीद रहे हैं. गाहे-बगाहे कभी चुरा कर, तो कभी 56 इंची सीने के साथ रीमेक अधिकार खरीद कर उन्हीं फिल्मों को हिंदी में ज्यों का त्यों परोसते रहे हैं. ऐसे में विजय कुमार मिश्रा की तथाकथित ‘ओरिजिनल’ स्क्रिप्ट पर फिल्म बनाने का उनका फैसला ऐतिहासिक माना जाना चाहिए. रोहन भटनागर (हृतिक रोशन) देख नहीं सकता, पर वो सुन सकता है, सूंघ सकता है, स्टूडियो में बिना देखे कार्टून शोज़ की परफेक्ट डबिंग कर सकता है. सुप्रिया (यामी गौतम) भी देख नहीं सकती, पर लिपस्टिक और ऑयलाइनर इस्तेमाल करने में कभी कोई गलती नहीं करती. दोनों एक-दूसरे से बात करते हुए बगल में रखे गमले को एकटक, बिना पलक झपकाए, चौड़ी खुली आँखें से देखते रहते हैं, ताकि आपको उनका ‘न देख पाना’ हमेशा याद रहे. दोनों की हंसती-खेलती जिंदगी में भूचाल तब आता है, जब एक लोकल गुंडा (रोहित रॉय) अपने बाहुबली नेता भाई (रोनित रॉय) की शह पर सुप्रिया का बलात्कार कर देता है. भ्रष्ट सिस्टम के सामने बेबस, लाचार रोहन के पास अपनी बीवी पर हुए अत्याचार का बदला लेने के लिए अब सिर्फ एक ही रास्ता है, कानून अपने हाथ में ले लेना.

बलात्कार जैसा घिनौना और ज्वलंत मुद्दा हो या ‘नेत्रहीनों’ के प्रति सही रवैया रखने-दिखाने की कवायद, ‘काबिल’ निहायत ही उदासीनता का परिचय देती है. फिल्म अपनी ओर से तनिक भी कोशिश नहीं करती कि आप इन दोनों मुद्दों से जुड़ने का साहस दिखाएं. सब कुछ बस आपकी अपनी संवेदनशीलता पर टिका रहता है. कहाँ तो आपको इन दोनों किरदारों के लिए ज़ज्बाती होने की सुविधा मिलनी चाहिए थी, पर होता उल्टा है. ऐसा लगता है जैसे संजय गुप्ता की सारी कवायद सिर्फ इस एक बात में लगी रहती है कि ‘नेत्रहीन’ भी फ़िल्मी नायक-नायिकाओं की तरह हर वक़्त सजे-धजे हो सकते हैं. फिल्म अपने पहले हिस्से में अगर आपको किरदारों से जोड़ने में चूक जाती है, तो भी आपको इंटरवल के बाद ये उम्मीद रहती है कि फिल्म अब रोमांचक होने के साथ-साथ थोड़ी समझदार होने की भी हिम्मत दिखायेगी, पर धीरे-धीरे आपको हृतिक में मिथुन की छवि दिखने लगती है, तो ये रही-सही उम्मीद भी टूटती जाती है.

हृतिक रोशन किरदारों में ढल जाने के लिए जाने जाते हैं, और हालाँकि फिल्म में बस वही हैं जो अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में अव्वल रहते हैं (रोनित रॉय ऐसे दूसरे एकलौते कलाकार हैं), पर फिर भी एक साधारण एक्शन हीरो से ज्यादा कुछ कर गुजरने से बचते फिरते हैं. एक अच्छी कहानी होने के बावजूद, अत्यंत सामान्य स्क्रीनप्ले के साथ उनसे इससे ज्यादा की उम्मीद करनी भी नहीं चाहिए. मराठी कार्पोरेटर की भूमिका में रोनित न सिर्फ भयावह लगे हैं, बल्कि एकदम सधे हुए भी. बोल-चाल हो या हाव-भाव, वो अपने किरदार से तनिक भी अलग-थलग नहीं पड़ते. यामी गौतम खूबसूरत लगने के अलावा कुछ और नहीं करतीं. रोहित रॉय ठीक-ठाक हैं, तो नरेन्द्र झा और गिरीश कुलकर्णी प्रभावी.

अंत में, ‘काबिल’ हृतिक के काबिल कन्धों पर टिके होने बावजूद एक इतनी आम फिल्म है, जो न ही आपको इमोशनली जोड़े रखने में कामयाब होती है, न ही इतनी स्मार्ट कि आप अपनी सीट से अंत तक चिपके रहें. मिथुन दा साइकिल की आड़ में छुपकर दुश्मनों की गोलीबारी से बचते रहें? चलता है, पर दुश्मन की थाह पाने के लिए हृतिक पूरे फ्लोर पर चिप्स और पॉपकोर्न बिखेर कर अँधेरे में दुश्मन का इंतज़ार करें? नहीं चलता, बॉस! आप तो कोरियाई ‘रीमेक’ ही बनाओ...ओरिजिनल के नाम पर हमें बस और मत बनाओ! [2/5]          

रईस: सत्तर का सिनेमा+नब्बे का शाहरुख़= मसालेदार मनोरंजन [3/5]

1975 में; सलीम-जावेद की ‘दीवार’ जनवरी महीने के ठीक इसी हफ्ते सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई थी. 42 साल बाद, राहुल ढोलकिया की ‘रईस’ अगर इतिहास दोहरा नहीं रही, तो कम से कम ‘दीवार’ के साथ हिंदी फिल्मों में नायक के बदलते हाव-भाव और ताव को एक बार फिर उसी जोश-ओ-जूनून से परदे पर जिंदा करने की कोशिश तो पूरी शिद्दत से करती ही है. फिल्म का टाइटल-डिजाईन हो, कहानी के जाने-पहचाने उतार-चढ़ाव हों, नायक के तौर-तरीके, सिस्टम के साथ उसकी उठा-पटक या फिर फिल्म के निर्माण में फरहान अख्तर (जावेद साब के बेटे) की बेहद ख़ास भूमिका; ‘रईस’ में कुछ भी इत्तेफ़ाक नहीं लगता. ‘रईस’ हिंदी फ़िल्म इतिहास के सबसे बाग़ी और जोशीले ’70 के दशक का जश्न कुछ इस ज़ोर-शोर से मनाती है, लगता है जैसे सिनेमा का मौजूदा पर्दा भी 70mm की तरह ही फैलने-खुलने लगा है.

दीवार’ अगर मुंबई अंडरवर्ल्ड के सबसे नामी तस्कर हाजी मस्तान की जिंदगी से अपनी कहानी चुनती है, तो ‘रईस’ गुजरात के अवैध शराब माफिया अब्दुल लतीफ़ के किस्सों के आस-पास ही अपनी जमीन तलाशती है. हालाँकि दोनों ही फिल्में विवादों से बचने के लिए ‘काल्पनिक’ होने की सुविधा का भरपूर लाभ उठाती हैं. गुजरात में शराब पर पाबन्दी है, और ‘पाबन्दी ही बग़ावत की शुरुआत होती है’. कोई धंधा छोटा नहीं होता और धंधे से बड़ा कोई धर्म नहीं. इसी फलसफे पर चलते-चलते, रईस हुसैन (शाहरुख़ खान) शराब की तस्करी के धंधे में आज सबसे बड़ा नाम है. कानून अब तक तो उसकी जेब में ही था, पर जब से ये कड़क और ईमानदार अफसर मजमूदार (नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी) आया है, माहौल में गर्मी थोड़ी बढ़ गयी है. मजमूदार रईस की गर्दन तक पहुँचने का कोई भी मौका छोड़ना नहीं चाहता, पर रईस हर बार अपने ‘बनिए के दिमाग और मियाँ भाई की डेरिंग’ के इस्तेमाल से बचता-बचाता आ रहा है. चूहे-बिल्ली की इस दौड़ में यूँ तो किसी की भी चाल, कोई भी दांव इतना रोमांचक नहीं होता कि आप जोश-ओ-ख़रोश में सीट से ही उछल पड़ें, पर दोनों किरदारों की कभी ढीली न पड़ने वाली अकड़, लाजवाब एक्शन और वजनदार संवादों के जरिये हर बार आपको लुभाती रहती है.

रईस’ का रेट्रो लुक फिल्म की साधारण कहानी पर किसी भी पल भारी पड़ता है. जमीन से उठकर अंडरवर्ल्ड सरगना बनने का सफ़र, और फिर गरीबों का मसीहा बनकर राजनीति में उतरने का दांव; फिल्म की कहानी में ऐसे उतार-चढ़ाव कम ही हैं, जो आपने देखे-सुने न हों. इतना ही नहीं, ठहरी हुई शुरुआत और सुलझे हुए अंत के दरमियान, फिल्म कुछ इस रफ़्तार से भागने लगती है कि आपके लिए ‘क्या छोड़ें-क्या पकड़ें’ वाली दुविधा पैदा हो जाती है. फिल्म ’70 के दशक में जाने के उतावलेपन में गुजरे ज़माने की खामियों को भी उसी बेसब्री से अपना लेती है, जितनी शिद्दत से उस दौर की काबिल-ऐ-तारीफ़ अच्छाइयां. नायिका (माहिरा खान) को बड़ी समझदारी और सहूलियत से कहानी में किसी खूबसूरत ‘प्रॉप’ की तरह लाया और ले जाया जाता है. गाने के दौरान ही शादियाँ हो जाती हैं, गाने के दौरान ही बच्चे भी और गानों की आड़ में ही दुश्मनों का सफाया!

‘स्टारडम’ के पीछे दुम हिलाती फिल्मों से हम कितने पक और थक गए हैं, इसकी सबसे ताज़ा मिसाल है ‘रईस’. भले ही औसत दर्जे की कहानी के साथ ही सही, पर परदे पर शाहरुख़ की शानदार शख्सियत को एक जानदार किरदार के तौर पर पेश करने की पहल भर से ही ‘रईस’ अपने नंबर बखूबी बटोर लेती है. पहले ‘फैन’, फिर ‘डियर जिंदगी’ और अब ‘रईस’; शाहरुख़ किसी नौसिखिये की तरह परदे पर अपनी एक बनी-बनाई ‘इमेज’ को तोड़ कर नये सांचे में ढलने की खूब कोशिश कर रहे हैं. ये आज के लिए भी अच्छा है और आने वाले कल के लिए भी. नवाज़ुद्दीन बेख़ौफ़ हवा की तरह हैं, बहते हैं तो देखते भी नहीं कि आगे कौन है, क्या है? परदे पर वो हीरो की तरह स्लो-मोशन में भले ही एंट्री न लेते हों, मार-धाड़ भी न के बराबर ही करते हैं, फिर भी तालियाँ उनके हिस्से में जैसे पहले से ही लिख-लिखा के आई हों. मोहम्मद जीशान अय्यूब पूरी मुस्तैदी से फिल्म के सबसे ठन्डे फ्रेम को भी अपनी अदाकारी से गर्म रखते हैं, चाहे फिर उनके पास देने को ‘रिएक्शन’ के चंद ‘एक्सप्रेशंस’ ही क्यूँ न हों.

आखिर में, राहुल ढोलकिया भले ही तमाम राजनीतिक सन्दर्भों (मुंबई ब्लास्ट, हिन्दू-मुस्लिम दंगे, गोधरा-कांड) को इशारों-इशारों में पिरो कर फिल्म को एक माकूल जमीन देने की कोशिश करते हों, ‘रईस’ रहती तो एक मसाला फिल्म ही है, जिसके लिये मनोरंजन का बहुत कुछ दारोमदार सत्तर के दशक के सिनेमा और नब्बे के दशक के शाहरुख़ पर टिका दिखाई देता है. अब इससे खतरनाक मेल और क्या होगा? [3/5] 

Friday, 18 November 2016

फ़ोर्स 2: बुरा भला है. नायक से खलनायक अच्छा! [2/5]

अपने तमाम समकालीन फिल्मों की तरह ही, ‘फ़ोर्स 2’ भी सीक्वल होने का कोई भी धर्म निभाने में दिलचस्पी नहीं दिखाती; सिवाय गिनती के दो-चार दृश्यों में जहां एसीपी यशवर्धन (जॉन अब्राहम) अपनी स्वर्गीया पत्नी माया (जेनेलिया देशमुख, मेहमान भूमिका में) से यादों में रू-ब-रू होते हैं. वरना तो इस फिल्म को आप ‘रॉकी हैण्डसम 2’ या ‘ढिशूम 2’ ही क्यूँ न कह लें, किसी की क्या मजाल, जो अंतर बता भी सके. हाँ, दो बातें अहम् हैं, जो इस फिल्म की बड़ी खासियत कही जा सकती हैं. एक तो ये ‘आजकल’ की फिल्म है. मामले की गंभीरता को समझाने के लिए ‘ये देश की सुरक्षा का मामला है’ जैसे जुमले यहाँ दिल खोल कर बोले जाते हैं. पाकिस्तान को डायलाग बोल-बोल कर तबाह कर देना, बॉलीवुड के लिए अब जैसे पुराना हो चला है. चीन है अब हमारा अगला निशाना. हीरो पहले भी अंडरकवर मिशन पर जाता था, विदेशी धरती पर खलनायकों का कीमा बना के लौट आता था, पर इस बार उसके इरादे और लोहा हो गए हैं. उसकी बुलंद आवाज़ में जैसे कोई और भी दहाड़ रहा है, “देश बदल रहा है, सर! अब हम घर में घुस के मारते हैं!”

दूसरी खासियत है, फिल्म का दकियानूसी विवादों से बचे रहने की लगातार कोशिश. यहाँ देश से गद्दारी करने वाला कोई ‘अब्दुल’ या ‘सलीम’ नहीं है, बल्कि शिव शर्मा (ताहिर राज भसीन) है, जिसकी वजहें भले ही निजी और ज़ज्बाती हों, गुनाह तनिक भी हलके नहीं हैं. उसके तेवरों में भी धार और चमक आजकल वाली ही है, “देशभक्त और देशद्रोही की बहस तो आप मुझसे कीजियेगा ही मत, हार जायेंगे!”. पर इन सब के और अपनी सांसें रोक देने वाली तेज़ रफ़्तार के बावजूद, अभिनय देव की ‘फ़ोर्स 2’ एक आम एक्शन फिल्म है, जहां लॉजिक और इमोशन्स दोनों ही स्टाइल की भेंट चढ़ जाते हैं. ‘फ़ोर्स’ सुपरहिट तमिल फिल्म ‘काखा काखा’ की रीमेक थी, इसलिए साउथ इंडियन फिल्मों का सबसे कामयाब और स्पेशल ‘इमोशनल’ एंगल फिल्म में भरपूर मात्रा में था. ‘फ़ोर्स 2’ सिर्फ और सिर्फ आपकी आँखों तक पहुँचता है, न दिल तक, न दिमाग तक!

हंगरी में भारत के रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) एजेंट्स को कोई एक-एक करके मार रहा है. इन्वेस्टीगेशन मिशन पर जा रहे हैं दो लोग. मुंबई क्राइम ब्रान्च के एसीपी यशवर्धन (जॉन अब्राहम), जिनका जासूस दोस्त पहले ही शहीद हो गया है और क्यूंकि रॉ चीफ के अनुसार, ‘पहला क्लू यश को ही मिला था”. दूसरी हैं रॉ की सबसे काबिल ऑफिसर कमलजीत कौर उर्फ़ के.के. (सोनाक्षी सिन्हा). के.के. गोली नहीं चला सकतीं. उसके पीछे उनके अपनी वजहें हैं. और मुझे नहीं पता, ये राज़ उनके डिपार्टमेंट में किस किस को पता था? और फिर वो दूसरी क्या खूबियाँ थीं उनमें, जिसकी वजह से उन्हें इस मिशन के लिए चुना गया? स्मार्ट होंगी शायद, पर जब एक जगह फिल्म के खलनायक शिव (ताहिर राज़ भसीन) उन्हें टिप देते हैं, रॉ का एक और एजेंट अगले आधे घंटे में मारा जाने वाला है और सिर्फ वो ही उसे बचा सकती हैं; के.के. का दिमाग सिग्नल भेजता है, “इसका मतलब वो एजेंट कहीं आस-पास ही है” इसके तुरंत बाद आपका दिमाग के.के. से आपका ध्यान हटा कर फिल्म के निर्देशक की ओर ले जाता है, जो अगले बीस मिनट तक लम्बे-लम्बे शूटआउट्स के साथ, दिन से रात होने के बाद भी ‘जल्दी करो, सिर्फ 10 मिनट और बचे हैं’ की घुट्टी दर्शकों को बड़ी बेशर्मी से पिलाते रहते हैं.

फ़ोर्स 2’ उन तमाम फिल्मों की अगली कड़ी है, जिनमें सिनेमेटोग्राफी और एक्शन को कहानी से ज्यादा तवज्जो मिलती है. ऐसे फिल्मों में अभिनय की बारीकियां ढूँढने की गलती न मैं करता हूँ, न ही आपको करनी चाहिए. फिर भी. जॉन अब्राहम जिस्मानी दर्द को परदे पर परोसने में ज्यादा मेहनत दिखाते हैं, चाहे वो चलती कार को हाथों से उठाने का स्टंट हो या मार-पीट के दौरान बदन में घुसी कील को निकालने की जद्दोजेहद. सोनाक्षी रॉ एजेंट दिखने में सारा वक़्त और सारी मेहनत बर्बाद कर देती हैं. काश, उनके किरदार को थोड़ी सूझबूझ भी, खैरात में ही सही, फिल्म के लेखकों ने दे दी होती. ये वो काबिल ऑफिसर है, जो ‘मिशन कौन लीड करेगा?’’ जैसे सवालों में ही खुश रहती है. ‘फ़ोर्स 2’ टाइटल को अगर जायज़ ठहराना हो तो, ‘2’ इशारा करेगा जॉन और सोनाक्षी की जोड़ी को, और पूरा का पूरा फ़ोर्स जायेगा ताहिर के नाम. ताहिर अपनी खलनायकी में हर वो रंग परोसते हैं, जो मजेदार भी है, रोमांचक भी है और थोड़ा ही सही पर इमोशनल भी. आम तौर पर ये सारा कुछ हीरो के जिम्मे होता है. इस बार नहीं.

अंत में, ‘फ़ोर्स 2’ इतनी तेज़ रफ़्तार से आपकी आँखों के सामने चलता रहता है, कि ज्यादातर वक़्त आपको सोचने का वक़्त भी नहीं मिलता. अब यही खासियत भी है, और यही नाकामी भी. जितनी तेज़ी से चीजें चलती रहती हैं, उतनी ही तेज़ी से चली भी जाती हैं. आखिर बुरा वक़्त जितनी जल्दी गुज़र जाए, अच्छा ही होता है! [2/5]    

Friday, 12 August 2016

मोहेंजो दारो: कहो ना ‘बोर’ है! [2/5]

इतिहास के पन्नों में झांकना अपने आप में मनोरंजन से कम नहीं है. हज़ारों कहानियां, और हर कहानी में विस्मयाधिबोधक घटनाओं की भरमार; बशर्ते आपमें तथ्यों को नज़रअंदाज़ करने और घटनाओं की सत्यता पर प्रश्नवाचक चिन्ह न लगाने की सहनशीलता भारी मात्रा में हो. और फिर आशुतोष गोवारिकर की ‘मोहेंजो दारो’ तो बस एक आम सी बॉलीवुड फिल्म है जिसका वास्तविक इतिहास से उतना ही लेना देना है, जितना आपका और हमारे जैसे कम-पढ़ाकू जानकारों का, जिनको बात-बात में गूगल-देव की सेवाएं लेने में रत्ती भर भी झिझक नहीं होती. अगर आपने स्कूल की इतिहास की किताब में सिन्धु घाटी सभ्यता के बारे में वो एक 6-8 पन्नों वाला चैप्टर भी ध्यान से पढ़ा होगा, तो आपको अंदाजा हो जायेगा कि ‘मोहेंजो दारो’’ के साथ, गोवारिकर आपको 2016 से 2016 ईसापूर्व में ले तो गए हैं, पर बॉलीवुड के घिसी-पिटी और बेरस कहानी कहने के फार्मूले को यहीं छोड़ना भूल गए.

नगर बुरे लोगों के चंगुल में है. कभी खुशहाली बसती थी यहाँ, मोहेंजो दारो में, अब झूठ, छल और ठगी का व्यापार होता है. आम लोगों पर मनमाने करों का बोझ लादा जा रहा है. ऐसे में, एक बाहरी साहसी नवयुवक सरमन [ह्रितिक रोशन] नगर में आता है. उसे लगता है उसका कोई पुराना रिश्ता है इस नगर से. यहीं उसे अपनी संगिनी भी मिलती है, चानी [पूजा हेगड़े], जिसे पाने की कोशिश उसे नगर के प्रधान महम [कबीर बेदी] और उसके बेटे मूंजा [अरुणोदय सिंह] के सामने ला खड़ी करती है. सरमन अब जन-जन की आवाज़ बन चुका है. पर अभी और भी कुछ राज हैं, जो उसके सामने खुलने बाकी हैं. उसका इस नगर से क्या वास्ता है? उसका अपना अतीत और नगर का भविष्य दोनों एक ही धागे के दो छोर हैं, पर उलझे हुए. फिल्म का अंत सब सवालों का हल लेकर आता है, पर अहम् सवाल ये है कि इस औसत दर्जे की कहानी को मोहेंजो दारो के ऐतिहासिक चमक-दमक का चोला पहनाने की जरूरत क्या थी?

पीरियड फिल्मों में ‘मोहेंजो दारो’ गोवारिकर की सबसे कमज़ोर फिल्म है. ऐसा नहीं है कि आशुतोष आपको सिंघु घाटी के नज़दीक ले जाने में कोई चूक करते हैं, पर इस बार न तो उनके पास ‘लगान’ जैसा ड्रामा है, न ही ‘जोधा-अकबर’ जैसा शानदार स्केल. फिल्म अपने रोचक, पर बनावटी और कुछ ज्यादा ही अलबेले कॉस्टयूम डिज़ाइन से आपका ध्यान कहानी की गंभीरता (?) से भटकाती रहती है. फिल्म में इस्तेमाल हुए विजुअल ग्राफ़िक्स का औसत स्तर भी फिल्म का एक बहुत बड़ा कमज़ोर पक्ष है. ‘सपने’ को ‘सपीने’, ‘सवाल’ को ‘सुवाल’ जैसे उच्चारण के साथ, आशुतोष उस वक़्त की बोलचाल की भाषा के लिए जिस तरह का प्रयोग करते हैं, वो हास्य उत्पन्न करने के लिए तो सटीक लगता है, पर वास्तविकता से उसको जोड़ने में भरोसेमंद साबित नहीं होता. आर रहमान का संगीत ही है, जो एक पल के लिए भी अपने आपको शक के घेरे में खड़ा नहीं होने देता. उनके संगीत में एक तरह का कबायली ‘टच’ है, जो आपको बांधे भी रखता है, और उनसे और उम्मीद करने की छूट भी देता ही.

अभिनय में, नितीश भारद्वाज [बी आर चोपड़ा की ‘महाभारत’ के कृष्ण] एक बिलकुल नए रूप में आपको बहुत अरसे बाद परदे पर देखने को मिलते हैं. ताज्जुब होता है, भारतीय सिनेमा उनसे इतने दिन तक दूर कैसे रह पाया? उन जैसे ही अभिनय-प्रतिभा के कुछ और धनी नरेन्द्र झा और मनीष चौधरी भी फिल्म में दिखाई तो पड़ते हैं, पर महज़ खानापूर्ति के लिए बनी भूमिकाओं में. अरुणोदय सिंह अपनी कद-काठी के साथ अच्छा प्रभाव डालते हैं, अच्छे लगते हैं. कबीर बेदी इस तरह की भूमिकाओं में हमेशा सहज रहे हैं, हालाँकि उनसे बहुत कुछ की उम्मीद करना भूल ही जाईये. पूजा हेगड़े बहुत अलग सी दिखती हैं. उनकी अगली फिल्मों का चयन काफी हद तक उनकी पहचान बनाने में अहम साबित होगा. ह्रितिक पूरी फिल्म अपने कन्धों पर ढोते नज़र आते हैं, पर इस मुकाम पर इस तरह की औसत फिल्मों में उनका होना उनकी सारी मेहनत, कवायद और शख्सियत के लिए शायद एक उल्टा खेल साबित हो.

आखिर में; ‘मोहेंजो दारो’ ऐतिहासिक स्थलों के उस टूर की तरह है, जहां लोकेशन्स अपनी एक अलग कहानी बयां करने की कोशिश कर रहे हैं, पर आपका टूर गाइड रटे-रटाये तरीके से, अपनी सहूलियत के हिसाब से, आपको अपनी गढ़ी हुई एक अलग ही कहानी बताये जा रहा है, जो न तो सच है, न ही रोचक...और कभी-कभी तो बहुत बोर!! [2/5]       

Friday, 5 February 2016

GHAYAL ONCE AGAIN: Where Pain replaces the Punch! [1.5/5]

Nothing hurts more than a second-rate sequel to a classic. I am not being unreasonable here with mediocre script, sloppy direction and forgettable performances; they come and go like seasons in Bollywood but how you can be so careless and recreational while even trying to replicate the magic of one of the most powerful ‘anti-system’ revenge dramas on Indian screens. If I would love to remember Rajkumar Santoshi’s GHAYAL for its sheer intensity in the hovering emotions that could turn a common man into a roaring, raging, rebellious bull, GHAYAL ONCE AGAIN for me is just a poor example of outdated, formulated and shamefully flawed filmmaking.

Ajay Mehra [Sunny Deol] has served his 16 years’ sentence for killing Balwant Rai [Amrish Puri] and now runs Satykaam- a news agency that dares to stand up against injustice of all kinds. Satykaam is more of an organized anti-crime movement with a technically sound work-base buried under ground and hundreds of activated members flaunting their ‘I am a Satykaam’ badges and stickers. Ajay is seen fighting with his reminiscences from the troubled past [in a set of weirdly conceived and poorly executed graphic visuals] until his friend-cum-admirer Joe D’Souza [Om Puri from the original cast] gets murdered. The war is inevitable between a powerful businessman [Narendra Jha] on one side and the man himself with Dhai kilo ka haath and four youngsters [They have captured the crime accidentally] on the other. And the whole city will stand still to watch the grand show.

Sunny Deol gets a deserving applaud for setting his story in a present day. The timeline of the events looks credible. Ajay Mehra has aged, but not in his anger management. The corrupt syndicate between the business world, politics and media is hinted well. One such easygoing news channel has office walls painted with famous Bollywood dialogues. I have no idea who’s on the receiving end. But that’s the only thing positive about the film. Once he decides to build a gripping story around all this, he gradually loses his sense of authenticity to the conveniently bad filmmaking.

Some films are a visual treat; GHAYAL ONCE AGAIN is a visual [graphics] disaster. Imagine Sunny Deol banging his head on the wall with exactly 5 visual windows playing old footage of GHAYAL around his head! The pain is so transmittable, I tell you. The editing jerks could be an additional chapter in any film school syllabus. At one, Sunny is trapped in a traffic jam only to appear in the very next scene controlling a hijacked helicopter. Don’t leave the theatre if it offences your intellect; wait until he rams into a skyscraper abode of the villain. Now, you can.

One of the very few watchable moments has Narendra Jha playing the influential businessman and a father in a catch-22 situation. He is no typical villain who loves to share every move with his family. He hides his drink when his little daughter shows up. He gets worried as a parent when his drug-addicted son commits murder. He is no Amrish Puri to Gulshan Grover or Dan Dhanoa. Jha proves his fitness for the part but the writing is so one-dimensional, you only have sympathies for him. Sunny Deol directs himself and makes sure he sets the screen on fire especially with the action sequences. Watching him entering into a frame running towards camera in slow-motion is the only part I can relate to the Sunny Deol of GHAYAL. For the rest, he doesn’t bring anything electrifying or amply satisfying. In fact, the scenes showing his emotional outbursts are amusingly testing.

Overall, GHAYAL ONCE AGAIN lacks the punch. The same punch that GHAYAL still manages to knock its viewers out even after 26 years in a row. The man had his own share of stardom with the film. The film deserved a better tribute from the man. [1.5/5]

Friday, 12 June 2015

HAMARI ADHURI KAHANI: A sob-sob dated story! [1.5/5]

Despite being screamed at, threatened and controlled by her egoist, rough and aggressive husband, an Indian wife can’t gather enough guts to throw away her ‘Mangalsutra’. As the matter of fact, she tries to shut her ears melodramatically with both the hands when is suggested for the same from an old lady happened to be her own mother-in-law. And when the unwanted husband makes an unexpected visit in last 5 years, she doesn’t mind giving him a warm welcome with all the comforts he can wish for. And, if overwhelmed by someone’s goodwill for her miserable life, she can easily entitle him ‘God’. And, she cries all the time. Well, this is not an overview on the condition of women in prehistoric India. This is Mohit Suri’s regressively depressing and awfully hopeless film HAMARI ADHURI KAHANI written by one of the most ‘ahead of his times’ filmmakers in India, Mr Mahesh Bhatt.

Vasudha [Vidya Balan] is a single mother working as a florist in an established hotel and waiting for her gone husband Hari [Rajkumar Rao] - a prime suspect in a terrorist-act. Impressed by her dedication at work, her new boss Aarav [Emran Hashmi] offers her a better job opportunity but soon, falls in love with the lady. He loves to help the needy. And he has a very convincing justification too, for his compassion; as if no man on this earth can show empathy towards any woman around without having a proper, emotional and dramatic back-story. Aarav’s mother too has been a single-parent for the most of her life.

Hari returns. Incidentally, he is innocent and is framed. The Indian wife has turned now in a ‘Savitri’ mode to save her husband’s life. Meanwhile, the crying has been accelerated in fourth gear. The lover has to sacrifice all to play the kind-hearted matchmaker between two poor souls. Poor not because of their misfortune but the bad regressive writing! I bet, pick any old Hindi film of 60’s titled on its main female lead and it will have more liberal, sympathetic and progressive plot than this. If the plot doesn’t engage you at all, dialogues also don’t do any better. Everyone seems to be in the race to mouth lines soaked in grave philosophy about life, marriage, man-woman relationship and what not. It’s exactly like listening to Bhatt Saab’s dreadful life-lessons at any social-forum. Melodrama is another abysmal addition that creates an unbearable situation equivalent to any Balaji TV soaps. The background score actually travels the same crescendo once when Hari gets violent over Vasudha’s love confession.  

HAMARI ADHURI KAHANI has three bankable actors in its kitty. Emran Hashmi being the crowd-puller tries his luck as a serious performer here. He took it in a literal sense, I fear. Still, he is not unbearable at all but Vidya is. She constantly posses as either the most unfortunate girl on earth or the most undeserving for all the good things life has to offer her. In both conditions, one thing remains same and unvarying; the crying. Rajkumar Rao is good. His portrayal of a sadistic, male-chauvinist and solipsist husband could have more shades but the length hardly allows him to open the wings. Narendra Jha (of HAIDER fame) reminds me of Irrfan Khan getting wasted in his earlier acting-sting in Bhatt camp. Actor of such caliber deserves more and better.

Overall, Mohit Suri’s HAMARI ADHURI KAHANI is meant to have intent to get you sunk in deep, dead world of an uncompleted-unfinished love saga but turns out to be a sob-sob dated story where nothing makes a connect, neither the pain nor the love. I know a couple of single-mothers who don’t need to put fake cards on her son’s birthday gifts in the name of separated fathers; they are the fathers. Appreciate them if you get a chance! [1.5/5]

Thursday, 2 October 2014

HAIDER: A Bollywood rare that tries to speak…emotionally & politically! [4/5]

1995, Kashmir. When single screen cinemas like Faraz & Sheila in Srinagar were turned into a full-fledged army camps & detention centers, we at the other side were probably unscathed enjoying those terribly silly love-stories on VHS in our drawing rooms and least bothered about that ‘integral part’ of our country. Calling it ‘integral’ itself is an irony. We normally don’t do that to other states. Are we? Vishal Bhardwaj’s HAIDER is a strong political statement retold and represented covered in the long dark shrouds of Shakespearian emotional saga. It’s depressingly sad, gloomy, violent, nerve-racking and makes you bleed emotionally.

Haider [Played by Shahid Kapoor] returns to his soil after his father goes missing in the bleak times of militancy contaminating the Jhelum waters. The disappearance soon gets linked with the unseen before closeness between his mother [Immeasurably talented Tabu] and his power-hungry uncle [Kay Kay Menon in a well-suited comfortable role]. The hunt for the missing and the haunting ache of losing all his emotional supports lands him into the fiery world of hatred, vengeance and revolt at personal front.   

Adopted from ‘Hamlet’ of William Shakespeare, HAIDER suffers from the 'Chutzpah' of Vishal Bhardwaj as a deep and sound filmmaker who ruthlessly puts you through the gloomiest atmospheric tale of Kashmir in the times of brutal political turmoil. This is the time of ambiguity when even the closest to your heart can ask you, “Whose side are you on?”. This is the time when ‘Freedom’ merely has just one connotation to it. The burnt doors, broken windows, unclaimed houses and people holding their identity cards waiting in line for getting searched; Bhardwaj sensitively paints the pain and melancholia in the air. There is a scene actually where a man in a mental shock refuses to enter his own house before being searched by anyone. Created to give you a moment to laugh but really?

In its one of the most comical sequences, Vishal Bhardwaj gives us two of Salman Khan fans who also share the name with Salman and run a VHS parlor. There are also moments and elements snitched from the original work like the slightest intimation of layered mother-son relationship. It does make you uncomfortable at first but the makers deserve a pat on back for such bold baby-step. In other, watch out for the old gravediggers stealing the moment at the climax.

And now the performances! Not many might be familiar with Narendra Jha by name but this man exceeds all expectations as a fine performer in the role of Haider’s father. You will find Kashmir in him in all senses. Tabu as an unsettling soul seeking serenity is a mesmerizing presence on screen. She makes us miss her more in films. Kay Kay Menon is comfortably in his zone. Somehow, this is a role we have seen him wearing like a skin. Shraddha Kapoor doesn’t leave any scope to complain. Irrfan Khan in a special appearance brings a good amount of joy and a flare of surprise.

And then there is Shahid Kapoor! Where in the first part he hardly shows anything unforeseen and mostly repeats himself, in the second half he completely blows you off with a brilliantly acted monologue piece and constantly reinventing his acting skills!                 

Despite all this, there is of course a muddled theatrical concluding part, bearably lengthy duration of nearly 3 hours and harshly done back and forth narrative to offer a bumpy ride and a sense of dissatisfaction but the melancholic shades in the characters and in the character of Kashmir both painted beautifully by some of the most sincere and serious performances make HAIDER an experience worth putting your time and money in. A bollywood film trying to speak is rare and should get a warm welcome! (4/5)