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Friday, 1 March 2019

सोनचिड़िया : मुक्ति के प्यासे, बीहड़ के पंछी! (3.5/5)


बीहड़ के बाग़ियों की सारी लड़ाईयां सरकारी फौज़ और जातियों में बंटे अलग-अलग गैंगों तक ही सीमित नहीं है. कुछ मुठभेड़ अंदरूनी भी हैं. खुद से खुद की लड़ाई. जिन बाग़ियों की बन्दूक दूसरी बार सवाल पूछने पर गोलियों से जवाब देना पसंद करती है, अब बार-बार खुद ही सवाल पूछने लगी है. ‘बाग़ी का धर्म क्या है?’. जवाब भी सबके अपने अपने हैं, कुछ अभी भी तलाश रहे हैं. आम तौर पर हिंदी फिल्मों में चम्बल के डाकू या तो खूंखार लुटेरे होते हैं, या सामाजिक अन्याय और सरकारी दमन से पीड़ित कमज़ोर नायकों के विरोध का प्रखर स्वर बनने की एक प्रयोगशाला. ‘बैंडिट क्वीन और ‘पान सिंह तोमर इसी खांचे-सांचे की फिल्में होते हुए भी उत्कृष्ट अपवाद हैं. अभिषेक चौबे की ‘सोनचिड़िया थोड़ी और गहरे उतरती है. ज़मीनी किरदारों के ज़ेहन तक पैठ बनाने वाली, बदले-छलावे, न्याय-अन्याय, सही-गलत, जाति-पांति और आदमी-औरत के भेदों के साथ-साथ मोक्ष, मुक्ति और पछतावे का पीछा करती फिल्म. 1972 में आई प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘समाधि’ के पहले हिस्से जैसा कुछ.

मान सिंह (मनोज बाजपेई) के कंधे झुकने लगे हैं. बढ़ती उम्र की वजह से नहीं, कंधे पर हर वक़्त टंगी दोनाली की वजह से नहीं, बल्कि कुछ है जो अतीत से बार बार बाहर निकल कर दबोच लेता है. गैंग के एक दूसरे नौजवान सदस्य लाखन सिंह (सुशांत सिंह राजपूत) को भी उस 5 साल की लड़की की चीख आज भी डराती रहती है, जो मान सिंह और लाखन के कुकर्मों की इकलौती चश्मदीद रही थी. दोनों अब मोक्ष और मुक्ति की तलाश में हैं, और दारोगा गुर्जर (आशुतोष राणा) इन्हें मौत तक पहुंचाने के फ़िराक में. गैंग धीरे-धीरे ख़तम हो रहा है. रेडियो पर इंदिरा गांधी के आपातकाल की घोषणा हो चुकी है. साथियों में ‘सरेंडर’ की भी सुगबुगाहट चल रही है. एक बाग़ी की चिंता है कि सरेंडर के बाद जेल में ‘मटन’ मिलेगा या नहीं? ऐसे में, इंदुमती तोमर (भूमि पेडणेकर) और आ टकराती है अपनी ‘सोनचिरैय्या को साथ लिए. साथी बाग़ी वकील सिंह (रनवीर शौरी) की मर्ज़ी के खिलाफ, लाखन के लिए यही सोनचिरैय्या (यौनशोषण की शिकार एक बच्ची) उसके अतीत के दाग को पश्चाताप की आग में तपाने का जरिया दिखने लगती है.

‘सोनचिड़िया में अभिषेक चौबे चम्बल को दिखाने के लिए जिस चश्मे का इस्तेमाल करते हैं, वो बेहद जाना-पहचाना है. शेखर कपूर वाला. हालाँकि अपने कथानक में वो जिस तरह डार्कनेस ले आते हैं, और रूखे-रूखे व्यंगों का प्रयोग करते हैं, वो उनका अपना ही ट्रेडमार्क है. फिल्म की शुरुआत आपको अंत का आभास कराती है. एक ऐसी शुरुआत जहां सब कुछ ख़तम हो रहा है. मानसिंह का गैंग अपना अच्छा खासा नाम कमा चुका है. खौफ़ के लिए उसे सिर्फ लाउडस्पीकर पर मुनादी ही करनी पड़ती है, गोलियों की बौछार नहीं. शादी लूटने पहुंचे डाकू दुल्हन को 101 रूपये का शगुन दे रहे हैं. नए हथियारों की जरूरत तो है, पर गैंग के पास पैसे ही नहीं हैं. गोली लगती है, तो मानसिंह हँसता है, “सरकार की गोली से कबहूँ कोऊ मरे है? अरे इनके तो वादन से मर जात है लोग.’. दारोगा गुर्जर जाति का है, और उसके नीचे काम करने वाले चाचा-भतीजा ठाकुर जाति के. चाचा (हरीश खन्ना) की समझ पुख्ता है. वर्दी से बड़ी है चमड़ी. चमड़ी पे कोई स्टार नहीं लगे होते, जैसी जिसको मिल गयी, मिल गयी. एक दृश्य में एक महिला बाग़ी का दर्द सामने निकल रहा है. ‘ठाकुर, बाभन मर्दों में होते हैं, औरतों की जात अलग ही होती है’. झूठ नहीं है, तभी तो 12-14 साल का बेटा बंदूक टाँगे माँ को खोज कर मारने के लिए डकैतों के बीच घूम रहा है. खुद में बाप से ज्यादा मर्दानगी महसूस करता है.

‘सोनचिड़िया एक डकैतों की फिल्म लगने के तौर पर आम दर्शकों में जितनी भी उम्मीदें जगाती है, सब पर तो खरी नहीं उतरती. मसलन, फिल्म का एक्शन मसालेदार होने का बिलकुल दावा नहीं करता, हालाँकि सच्चाई से दूर भी नहीं जाता. हट्टे-कट्टे 6 फुटिया पहलवान को दबोचने में 3-3 डाकू हांफने लगते हैं. फिल्म की रफ़्तार धीमी लगती है. गीत-संगीत भी किरदारों के मूड से ज्यादा बीहड़ की बड़ाई में रचे-बसे हैं. इतने सब के बावजूद, सिनेमा की नज़र से फिल्म किसी मास्टरक्लास से कम नहीं. स्क्रीनप्ले में अभिषेक की बारीकियां, खालिस बुन्देलखंडी बोली के संवाद, बेहतरीन कैमरावर्क और कलाकारों का शानदार अभिनय; ‘सोनचिड़िया डकैतों की फिल्म होने से कहीं ज्यादा कुछ है. मनोज बाजपेई कमाल हैं. ढलती उम्र को जिस तरह मनोज अपने किरदार में ढाल कर पेश करते हैं, आप उन्हें खलनायक से अलग, इंसानी तौर पर देखने से नहीं रोक पाते. सुशांत बिलकुल घुलमिल जाते हैं. उनकी पहली फिल्म होती तो शायद आप उन्हें ‘एनएसडी के लौंडों’ से अलग नहीं समझते! रनवीर शौरी फिर एक बार जता जाते हैं कि बॉलीवुड उन्हें कितना कमतर आंकता है? आशुतोष राणा अपने पुराने अवतार में हैं. उनकी कन्चई आँखें अब भी अपनी कुटिलता से आपके अन्दर सिहरन पैदा करने में कामयाब रहती हैं, इतने सालों बाद भी. भूमि गिनती के दृश्यों में ही आगे आती हैं, और उनमें सटीक हैं.  

आखिर में, ‘सोनचिड़िया चम्बल की घाटियों और रेतीली पहाड़ियों में आम से दिखने वाले डकैतों का एक नया सच है, जहां सब अपनी अपनी मुक्ति का मार्ग ढूंढ रहे हैं. जाति, धर्म, समाज और सरकार से लड़ते-लड़ते एक बड़े अंत की तलाश में भटकते कुछ ऐसे बाग़ी, जिनकी जिंदगियों के मायने और मकसद एक बड़ा मतलब लिए हुए हैं. [3.5/5]      

Friday, 2 June 2017

अ डेथ इन द गंज: रोचक, रोमांचक! इंसानी फ़ितरतों का ‘गंज’! [4/5]

सन् 1979 का मैकक्लुस्कीगंज बस यूँ ही ‘अ डेथ इन द गंज’ का हिस्सा नहीं है. रांची से सटे इस छोटे से पहाड़ी इलाके का एक अपना रोचक किरदार है, जो फिल्म में वक़्त-बेवक्त खुलता रहता है. साहब लोगों का क़स्बा है ये. एंग्लो-इंडियन साहब लोग, जो जितनी दिलचस्पी से संथाली लोकगीतों पर नाच लेते हैं, उतनी ही तबियत से नए साल का जश्न मनाते हुए स्कॉट्स भाषा के गीत ‘ऑल्ड लैंग साईन’ को भी एक सुर में दोहराते हैं. जंगलों से घिरे, ठण्ड के सफ़ेद धुएं ओढ़े बड़े से एक बंगले में, ऐसे ही एक परिवार के साथ वक़्त बिताने का मौका देती है ‘अ डेथ इन द गंज’! पूरे एक हफ्ते के फ़िल्मी वक़्त में ऐसे किरदारों के साथ, जिनकी नीयत, जिनकी तबियत और जिनकी सीरत में आप अपने आप को ही कट-कट कर बंटते हुए देखते हैं. किसी के साथ ज़्यादा, किसी के साथ थोड़ा कम.

नीली अम्बेसडर में नंदू (गुलशन देवैया) अपनी बीवी बोनी (तिलोत्तमा शोम) और बच्ची तानी (आर्या शर्मा) के साथ कलकत्ता से मैकक्लुस्कीगंज अपने घर जा रहा है. साथ में, बोनी की सहेली मिमी (कल्कि कोचलिन) और मौसेरा भाई शुटू (विक्रांत मैसी) भी हैं. माँ (तनूजा) घर की बेतरतीबी को कोस रही हैं, तो बाप (ओम पुरी) रम के पैग बना-बना पेश कर रहा है. जल्द ही, महफ़िल जमने लगती है. लंगोटिए दोस्त विक्रम (रणवीर शौरी) और ब्रायन (जिम सरभ) भी आ पहुंचे हैं. एक-दो दिन में ही सबके चेहरे से धूल हटने लगती है, और अन्दर की कालिख़ गहराने लगती है. इंसानी फितरतें खुल कर सामने आने लगती हैं. किसी एक कमज़ोर पर झुण्ड में दाना-पानी लेकर चढ़ जाने का खेल किसने नहीं खेला होगा? रात को सोने से पहले भूतों का जिक्र, दोपहर में अपने-अपने कमरों में घंटे-दो घंटे के लिए पसर जाने का सुख, एक शाम सबके लिए खाना बनाने का पूरा तामझाम; और इस बीच घर पे काम करने वाली औरत का अपने मरद से पूछना, “कब जइहें ई लोग? इतना काम करे के पड़त है”!

माहौल से नरमी सूखने लगी है. बाप देर रात को उठकर कमरे तक आता है, कुछ खोज रहा है, जाने क्या? बेटा शतरंज की बाज़ी लगाए बैठा है, पूछता है, “आपको कुछ चाहिए?”  “नहीं, भाई! तुम खेलो न”. बेटा अब भी अड़ा है, “सुबह खोज लीजियेगा”, बाप झुंझला के बोल पड़ता है, “बाप मैं हूँ या तुम?” अगले दृश्य में बाप फिर कुछ खोजते हुए बड़बड़ा रहा है, “इस घर में कुछ भी रख दो, मिलता ही नहीं”. कुछ और भी दफ़न है इस घर में, हँसते चेहरों के पीछे. कुछ छुपे हुए सच, कुछ दबी हुई चाहतें, हसरतें, घुटन, कुढ़न, बहुत कुछ. डर यही है कि जब खुलेगा तो अपनी चपेट में किसको लील लेगा? आप और हम सिर्फ अंदाजा लगा सकते हैं, ठीक ठीक कह नहीं सकते.

‘अ डेथ इन द गंज’ कोंकना सेन शर्मा के पिता मुकुल शर्मा की कहानी पर आधारित है, जिसे परदे पर पसारते वक़्त, कोंकना महान फ़िल्मकार सत्यजित रे की ‘अरण्येर दिन रात्रि’ से ख़ासा प्रभावित और प्रेरित दिखाई देती हैं, पर शुरू-शुरू के झिझक के बाद आपके लिए जानना मुश्किल नहीं रह जाता कि यह समानता सिर्फ कहानी कहने की कला, बनावट और सजावट तक ही सीमित है, उसके बाद कोंकना जब अपनी छाप छोड़ती हैं, तो उनकी दखलंदाजी पूरी तरह उनकी अपनी होती है. चाहे वो 1979 के वक़्त को दीवाल पर घड़ी की तरह टांकने की हो, या फिर किरदारों के पसंद-नापसंद को माहौल से जोड़े रखने की. कोंकना जिस तरह दृश्यों की परिकल्पना तैयार करती हैं, सिनेमा की एक नयी, बुलंद आवाज़ बन कर उभरती हैं. नए साल के जश्न के बीच, बंगले के एक अँधेरे हिस्से में नौकर दम्पति सूखे चावल निगल रहा है. उन्हीं के साथ साहब लोगों का कुत्ता भी.

अभिनय की नज़र से फिल्म का हर कलाकार अपने चरम पर बैठा आपको अपनी तरफ खींचता है. रणवीर शौरी अगर अपनी अकड़ और तेवर से करिश्माई लगते हैं, तो गुलशन की ईमानदारी उनके झुंझलाहट वाले दृश्यों में साफ़ नज़र आती है. तिलोत्तमा बेहतरीन हैं. तनूजा जी को वापस परदे पर देखना अच्छा लगता है. एक दृश्य में कोंकना उन्हें खर्राटे लेते हुए दिखाती हैं. ये एक दृश्य दोनों के बारे में बहुत कुछ कह जाता है. कल्कि अपनी बेबाकी में अव्वल हैं, पर फिल्म में सबसे ख़ास, सबसे आगे अगर कोई मशाल लिए खड़ा दिखता है, तो वो हैं विक्रांत मैसी! विक्रांत चेहरे पर अलग-अलग भाव एक के बाद एक यूँ और इतनी सफाई से बदलते हैं, जैसे कोई टेलीविज़न पर चैनल बदल रहा हो. दर्शकों से जुड़ाव कायम करने में विक्रांत कुछ इस हद तक सफल रहते हैं कि जब वो परदे पर नहीं भी होते, या कहीं पीछे चुपचाप खड़े भी, तो भी उनके लिए आपकी फ़िक्र जैसे की तैसे ही रहती है. कोई शक ही नहीं, ये साल की सबसे ख़ास और चुनिन्दा परफॉरमेंसेस में से एक है. एक ऐसी परत-दर-परत अदाकारी, जिसे पूरी तरह जानने-समझने के लिए बार-बार देखा और सराहा जाना चाहिए.

आखिर में, ‘अ डेथ इन द गंज’ उन चंद रोमांचक बॉलीवुड फिल्मों में से है, जो आपके अन्दर सिहरन पैदा करने के लिए कोई झूठा खेल नहीं रचतीं, बल्कि आपको उस माहौल में हाथ पकड़ कर खींच ले जाती हैं, जहां आप हर वक़्त अपने दिल-ओ-दिमाग़ के साथ ‘जो हुआ, वो कैसे हुआ’, ‘जो हुआ, वो किसके साथ हुआ’ और ‘जो हुआ, वो कब होगा’ की लड़ाई लड़ते रहते हैं. ‘अ डेथ इन द गंज’ इस साल की ‘मसान’ है, उतनी ही ईमानदार, उतनी ही संजीदा, उतनी ही रोचक! [4/5]     

Friday, 14 August 2015

गौर हरी दास्तान- द फ्रीडम फ़ाइल: अच्छे-बुरे से परे, एक बेहद जरूरी फिल्म! [3/5]

कुछ कहानियों का कहा जाना ज्यादा जरूरी है, भले ही उनमें नाटकीयता की कमी साफ़ झलकती हो या फिर जिनमें जटिलता बिलकुल ही न के बराबर हो. अनंत नारायण महादेवन की ‘गौर हरी दास्तान’ ऐसी ही चुनिन्दा फिल्मों में से एक है जो अच्छे-बुरे से परे, एक बेहद जरूरी फिल्म है.  

आजादी के ६८ साल पूरे हो गए हैं, और इसमें तनिक संदेह नहीं कि आज हम इस आजादी का मोल आंकने में अक्सर चूक जाते हैं. फिल्म के शुरूआत में ही जब नायक [८० साल का एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी] एक सरकारी दफ्तर की धीमी लिफ्ट पे टिप्पणी करता है, “हम बहुत देर से नीचे नहीं जा रहे?”, सरकारी अफसर समझाता है, “अँधेरे में अक्सर दूरी ज्यादा लगती है”. देश की रुकी-रेंगती ढुलमुल व्यवस्था पर इससे अच्छा कटाक्ष नहीं हो सकता. वही अफसर अगले दृश्य में सहमते-झिझकते कह ही बैठता है, “कभी-कभी लगता है अंग्रेजों को वापस भेज के कहीं कोई गलती...”.

सत्य घटना पर आधारित ‘गौर हरी दास्तान’ एक ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के संघर्ष की कहानी है, जो अपने वजूद को साबित करने के लिए ३० साल से देश की लचर दफ्तरशाही से एक खामोश लड़ाई लड़ रहा है. बिना रुके, बिना थके. देश की आजादी की लड़ाई में अपनी भागेदारी साबित करने के लिए जिसे आज एक अदद सरकारी प्रमाणपत्र की दरकार है, पर सच की पहचान इतनी आसान कहाँ रही है? बचपन में ‘वानर सेना’ का सदस्य बनकर गुप्त सूचनाएं इधर-उधर पहुँचाने का काम कर चुके गौर हरी दास आज खुद एक दफ्तर से दुसरे दफ्तर चक्कर काट रहे हैं, और इज्जत करना तो छोडिये लोगों में हमदर्दी का रत्ती भर भी एहसास नहीं दिखता. क्या हो गया है हमारी संवेदनाओं को? कहाँ खर्च हो गयी हैं हमारे सामाजिक, मानवीय सरोकार की समझ?

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष है इसकी सच्चाई और भोलापन, जो न सिर्फ गौर हरी दास के चरित्र में दिखता है बल्कि फिल्म की कहानी का भी अभिन्न हिस्सा है. एक-दो दृश्यों को छोड़ दें [एक में गौर हरी दास गांधीजी से बात करते दिखाई देते हैं], तो फिल्म में बेवजह का ड्रामा ठूंसने की प्रवृत्ति से अनंत बखूबी बचते नज़र आये हैं. फिल्म का सबसे कमज़ोर पहलू भी दर्शकों के लिए शायद यही बने. फिल्म एक सधी, पर धीमी गति से आगे बढती है. बिलकुल साधारण से दिखने वाले दास की इस संघर्ष-गाथा में अटूट हौसले का रंग तो गहरा गाढ़ा है, पर इसे एक असाधारण प्रसंग बनाने में विश्वास की कमी साफ़ नज़र आती है.

मुख्य भूमिका में विनय पाठक कुछ ज्यादा ही कोशिश करते नज़र आते हैं. उनका हद से ज्यादा सीधा-सादा-सच्चा होना दिल को छूते-छूते रह जाता है. हालाँकि इस भूमिका को आत्मसात करने में पाठक कोई कसर नहीं छोड़ते. कोंकना सेन शर्मा ज्यादा देर परदे पर नहीं रहतीं, पर पूरी तरह प्रभावित करती हैं. दो टूक तीखे बोल बोलने वाले पत्रकार की भूमिका में रणवीर शौरी जमे हैं. तनिष्ठा चटर्जी एक आज़ाद ख्याल मॉडर्न पत्रकार के किरदार में अपनी दूसरी फिल्मों से अलग ही दिखती हैं. फिल्म के हर हिस्से में आपको छोटी-छोटी भूमिकाओं में ढेर सारे नामचीन कलाकार दिखेंगे, जैसे रजित कपूर, सौरभ शुक्ला, अचिंत कौर, मुरली शर्मा, मोहन कपूर और भरत दाभोलकर.

अंत में, अनंत महादेवन की ‘गौर हरी दास्तान’ आज के भारत में आजादी के मायने भूलती पीढ़ियों के लिए एक ऐसी फिल्म है जो न सिर्फ देश की चरमराती, सोई-सुन्न व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि एक ८५ साल के बूढ़े आम आदमी की अपने अस्तित्व को बचाए रखने की सतत कोशिश के साथ उम्मीद का एक सूरज भी जलता छोड़ जाती है.