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Friday, 14 September 2018

मनमर्ज़ियाँ: प्यार का लेटेस्ट वाला वर्जन! [3.5/5]


ये दौर है फेसबुक, व्हाट्स एप्प, टिंडर, ट्वीटर का, और इन जैसे तमाम एप्प्स को धड़ल्ले से इस्तेमाल करने वाली नई पीढ़ी का, जो अपने आप को लगातार बदलते रहने, अपडेट रखने में कतई कोताही नहीं बरतती. फिर प्यार क्यूँ अपने पुराने ढर्रे पर ही घिसटता रहे? फिर बॉलीवुड की प्रेम-कहानियों को भी क्यूँ कर ठोक-पीट उनके पुराने दड़बे में ही कैद रखा जाये? तो, अब प्यार का नया संस्करण बाज़ार में आ गया है. प्यार 2.0 यानी ‘फ़्यार’- सिमरनें अब राज से ‘शादी से पहले वो नहीं’ का वादा नहीं लेतीं, राज ‘हिन्दुस्तानी लड़की की इज्ज़त क्या होती है जानने का दम नहीं भरता. जबरदस्ती शादी के लिए माँ-बाप, परिवार की दुहाई देने पर लड़की भावुक होकर चुपचाप मेहंदी की डिज़ाइन पसंद करने नहीं बैठ जाती. मंडप तक जाने का फैसला अब सिर्फ उसका है, चाहे ऐसा करते उसकी अपने साथ ही, अपने अन्दर ही कितनी ज़ज्बाती लड़ाई क्यूँ न चल रही हो? समाज का रवैया भले नहीं बदल रहा हो, किरदार चुपके चुपके ही सही, बदल रहे हैं. उनकी कहानियाँ बदल रही हैं. और ‘मनमर्ज़ियाँ’ के साथ अनुराग कश्यप भी. ‘काले’ सैयां के इश्क़ का रंग अब ‘ग्रे’ हो गया है. बदलाव के नाम पर इतना बहुत है, अब पूरा सफ़ेद होने की उम्मीद मत लगा बैठियेगा. ज्यादा हो जायेगा.

‘मनमर्ज़ियाँ अपने आप में बहुत ढीठ लफ्ज़ है. गलत-सही सोचने और समझ आने से बहुत पहले मन जो कहे, कर जाना. रूमी (तापसी पन्नू) का किरदार इस लफ्ज़ के बिलकुल पास बैठता है. एकदम घेर के. ठीक सट के. ‘एक बार बोल दिया तो पीछे नहीं हटती के ग़रूर में अपने सच्चे प्यार विक्की (विक्की कौशल) को अल्टीमेटम दे आई है. ‘कल अगर घर पे हाथ मांगने नहीं आया, तो अगले दिन घर वाले जहां कहेंगे, शादी कर लूंगी. तैश में सोचती भी नहीं, पर ऐसा नहीं कि समझती भी नहीं. विक्की जिम्मेदारियों के नाम पर टें बोल जाता है. बनना तो ‘यो यो हनी सिंह है, पर अभी तक दूसरों के गानों का ही रीमिक्स बजाता रहता है. रूमी के कहने पर साथ भाग तो आया है, पर कोई ठोस प्लान नहीं. पहले भी कर चुका है, रूमी एबॉर्शन के बाद रिक्शे पर बैठ कर अकेले घर गयी थी. रॉबी (अभिषेक बच्चन) को कोई जल्दी नहीं. हनीमून के वक़्त भी, शादी के बाद भी. ‘रामजी टाइप का आदमी है. न कुछ पूछता है, न ही रूमी पर मर्दाना हक़ जताने की कोई तलब है उसको. तेज़ आवाज में बोलने को भी, उसको चार पैग लगते हैं. बैंकर है, तो जानता है कि इस इन्वेस्टमेंट में रीटर्न की कोई गारंटी नहीं.

‘मनमर्ज़ियाँ’ फिल्म की लेखिका कनिका ढिल्लों के अपने अनुभवों का साझा है, इसलिए गिनती के दो-चार दृश्यों को छोड़ कर, फिल्म की घटनाओं से जुड़ाव में किसी तरह की कोई फांस आड़े नहीं आती. रूमी का अक्खड़पन, विक्की का लापरवाह रवैया और रॉबी के किरदार में सुन्न कर देने वाला ठहराव; मनमर्ज़ियाँ’ अपने बनावट में ‘वो सात दिन, ‘धड़कन’, ‘हम दिल दे चुके सनम’ और ‘तनु वेड्स मनु जैसी तकरीबन आधी दर्जन हिंदी फिल्मों की याद जरूर दिला सकता है, पर फिल्म देखने के बाद आप जो नहीं भूलते, उनमें इन किरदारों को लिखने में कनिका की गहरी समझ शामिल है.  दृश्यों में नाटकीयता कलम से कहीं ज्यादा, किरदारों के अपने मिजाज़ से निकलती और बनती है. अमित त्रिवेदी का संगीत और शैलीजी के गीत फिल्म पर हमेशा और हर वक़्त छाये रहते हैं. कश्यप की दाद देनी होगी, जिस बाकमाल तरीके से म्यूजिक को वो अपने दृश्यों में, और दृश्यों को अपने म्यूजिक में पिरोते हैं.

‘मनमर्ज़ियाँ’ शर्तिया तौर पर अपने तीन ख़ास कलाकारों में पूरी की पूरी बंट जाती है. तापसी का रूमी होना ‘मनमर्ज़ियाँ’ के लिए किसी तोहफे से कम नहीं. परदे पर उसका छिटकना, बिगड़ना, गुस्से में तपना, भड़कना और टूटना; रूमी के अन्दर से तापसी एक पल को बाहर नहीं आती. विक्की को उसकी गैर-जिम्मेदाराना रवैये के लिए कोसते और डांटते हुए परदे पर जिस तरह वो फटती हैं, आवाक् कर देती हैं. फिल्म के आखिरी पलों में कैमरे की तरफ दौड़ते हुए उनके चेहरे की मुस्कुराती चमक में जैसे एक पल को पूरी फिल्म उनकी हो के रह जाती है. विक्की फिल्म दर फिल्म चौंका रहे हैं. ‘संजू के शराबी दृश्य के बाद, इस फिल्म में भी उनके हिस्से एक ऐसा ही दृश्य आया है. इस बार सिर्फ उनका चेहरा नहीं बोल रहा, पूरे का पूरा बॉडी लैंग्वेज प्रभावित करता है. गानों के डांस-स्टेप्स और लिप-सिंक में उनकी वो क़ाबलियत खुल कर सामने आती है, जो उन्हें अच्छे एक्टर से ‘स्टार मैटेरियल’ बनने की तरफ बढ़ने में मदद करेगी. विक्की में कॉमिक की संभावनायें भी और प्रबल हो रही हैं.

अभिषेक बच्चन दो साल बाद परदे पर हैं. एक ऐसे किरदार में, जिसे आप कतई मजेदार नहीं कह पायेंगे. जिसके साथ होते हुए शायद आप खिलखिलाएं नहीं, झूमें-गायें नहीं, पर ऐसा नहीं करते हुए भी परदे पर उसकी मौजूदगी बहुत ठोस है. उसकी शख्सीयत में इतनी परतें हैं, कि खोलते-खोलते फिल्म कम पड़ जाती है. उसकी नेकनीयती, उसकी संजीदगी कहीं भी उसे लाचार नहीं बनाती, बल्कि हर वक़्त पहाड़ की तरह अडिग और बर्फ की तरह ठंडा रखती है, और शायद यहीं, इसी पल में अभिषेक अपने सबसे मुश्किल किरदार में सबसे आसानी से ढल रहे होते हैं, पिघल रहे होते हैं.

आखिर में; ‘मनमर्ज़ियाँ’ लव और अरेंज्ड मैरिज के बीच हिचकोले खाती इस नई ‘ज़िम्मेदार, समझदार और तैयार’ पीढ़ी की उनकी अपनी एक ‘मेच्योर’ लव-स्टोरी है, जहाँ किरदार सपनों में जीने से कहीं ज्यादा, अपने आप को जानते-पहचानते हैं. अपनी खामियों का जश्न मनाते हैं. अपनी चाहतों के लिए लड़ते-भिड़ते हैं, और ‘डिस्कशन’ को अच्छा मानते हैं. प्यार का लेटेस्ट वाला वर्जन है, आप भी अपडेट कीजिये. [3.5/5]  

Friday, 12 February 2016

FITOOR: Oh, you (Hopeless) beauty! [2.5/5]

Apart from the jingoistic emotions and vigorous political projection attached to it, India has advanced another reason to not lose its possession over Kashmir. Bollywood loves to shake down this heavenly geographical part & pride of India to its maximum, sometimes by planting a great Shakespearean saga of love, power and betrayal under the grime of its atrocious past [Read: Vishal Bhardwaj’s HAIDER] or sometimes just by using its picturesque postcard locations as a canvas to paint someone’s cinematic dream. Abhishek Kapoor’s FITOOR fits the bill for the latter. Along with his man behind the lenses Anay Goswami, Abhishek stuns you with magnetic visuals capturing icy lakes, snow-clad wooden foot-over bridges, crimson-red mansions and some equally wooden-evenly frosty faces in and around too, in identical respect.

Official adaptation of Charles Dickens’ GREAT EXPECTATIONS, FITOOR is a tale of two star-crossed childhood lovers. They look nothing more than puppets in evil hands of fate dancing on someone else’s tune. Impoverished Noor [Aditya Roy Kapoor] finds a manipulative curator in Begum Hazrat [Tabu] and a susceptibly shifting lover in her daughter Firdaus [Katrina Kaif]. Their ways go apart to meet again but destined to demand more from their lives. The obsession fueled by the love and longing is ready to self-destruct all the dreams and hopes one is always lived for.

FITOOR is very much like the actors playing parts in it. It looks as ravishing, radiant and exquisite as Katrina Kaif on any given day. You can look breathlessly at both until they try to communicate with you. Ms Kaif’s weird diction and pronunciation force you to look out for a ‘never there’ remote control that could either fast-forward the scene or just mute her to make you switch to the ‘beauty-admiration’ mode again. Film also starts behaving like Ms Kaif, at times. It speaks, and a lot but expressions do get lost while being translated on screen. Guess what? Ms Kaif goes to London in this film too. Why? To get her admired accent. How many more times Bollywood will bless her with that added explanatory mention for her accent??

It is also on the likes of Aditya Roy Kapoor. He makes his presence felt on screen but does it at such a lifeless pace and with such a static force that you can never call it ‘a moving experience’. A self-destructive youth caught in the ill-fated love; haven’t we seen him before in such pitiable state? But the one where the film never ceases to hold the power to impress and ignite emotions on many levels is the performance of Tabu. This role earlier had the never-aging, ever-young Rekha in it but Tabu owns it now. From the sharp and shrewd lonesome soul to the hysterically remorseful aging beauty, she looked never so exposed. In other, the casting does have some surprising names from Lara Dutta and Aditi Rao Hyderi to ghazal singer Talat Aziz, mostly in favor of the film.

FITOOR doesn’t often satisfy you as a great drama or a gorgeous love-story but with the controlled direction, some amazing musical renditions by Amit Trivedi and a totally outstanding cinematography, it remains one of those unfortunate cinematic efforts that doesn’t get a full support from its lead pair and dies in a tough fight to survive its killing pace. [2.5/5] 

Friday, 7 March 2014

QUEEN: Kangana arrives…and how!...in this deliciously delightful film of the season! [4/5]

When everyone else is busy discussing the issue on news panels as 2014 supposedly being the year of Women Empowerment, Producer-turned-director Vikas Bahl has done his bit full-heartedly, loud and clear with his second and the most delightful film of the year, crowned already in its name. ‘QUEEN’ powerfully belongs to the genre called ‘slice of life’ movies where every ounce of emotions, every piece in the settings and each shade of events is authentic, appropriate, raw & relatable. And then, there is Kangana Ranaut- the gifted conductor without any baton who single-handedly orchestrates all of it to create a magnificently charming film. Make a nice cozy room for this in your hearts. It’s not going to leave any soon.

Rani [Kangana as a surprising revelation] is a typical ‘Rajauri’ girl of West Delhi who’s all excited to loose her ‘virginity ka vrat’ since it’s just a couple of days more for her to get married with his prince charming Vijay [Rajkumar Rao in a comparatively smaller but significant role]. While good things are in wait for its turn, bad knocks the door first. She’s been dumped for not being modern enough to match the status of the London-retuned eligible groom. Rani is shattered but doesn’t want to miss her last chance to taste freedom as the pre-planned honeymoon package in Paris is still on. And then, begins a fascinating yet simple journey starting with a maze of ambiguity, resistance, conflicts and winding up in the unfastened ends of independence, liberty and freedom to live happily ever after.

Sounding similar to ENGLISH-VINGLISH, ‘QUEEN’ is not more than a distant relative who never actually has met with the other. Rani here is more spirited and progressively more opened up soul than anyone you have seen on screen. Her first reactions to anything inventive towards her are immediate, simple and carefree. Her tricky tactics to deal with any unseen, enforced situation might have its own logic behind but are totally entertaining to have you in splits. So, she can be apprehensively charmed by people doing ‘lip-to-lip’ kisses. She can also recount the state of women in India where they aren’t allowed to even burp in public and that too without making it a loud protest. Well-written!!

QUEEN belongs to Kangana. She owns it as much as any legendary actresses do to their lifetime roles. She succeeds to make your heart somber in pain but does an outstanding job to bring tons of smiles on your face. Every actor needs a character he could slip into to make it alive. For Kangana, this is it.  Rajkumar Rao makes his presence felt. Lisa Haydon is good as Rani’s confidante in Paris. Actors as her friends-cum-roomies are perfectly cast.

Director’s sweet remembrance audio-visual to film’s late cinematographer Bobby Singh, Amit Trivedi’s uplifting songs & background score, delicious dialogues co-written by Kangana herself and a total breezy-fresh and funny tone to the film are added features that don’t allow you to miss it at any cost. Include it in your to-do list for this weekend, soon after finishing this review. Others can wait! QUEEN shouldn’t!! [4/5]