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Friday, 22 September 2017

न्यूटन: लोकतंत्र का तमाशा! सिनेमा का जश्न! [4.5/5]

चुनावों के वक़्त टीवी चैनलों और अखबारों में, नाखूनों पे लगी स्याही दिखाते जोशीले चेहरों की तस्वीरें कितने फ़क्र से भारत में लोकतंत्र की बहाली, चुनावों की कामयाबी और जनता के प्रतिनिधित्व का सामूहिक जश्न बयाँ करतीं हैं. ऐसा ही एक दृश्य अमित मासुरकर की 'न्यूटन' में भी है, मगर जब तक फिल्म में ये दृश्य आता है, आँखों के आगे से सारे परदे गिर चुके होते हैं, आसमान से झूठ के बादल छंट चुके होते हैं और अब उन्हीं चेहरों से भारत में लोकतंत्र की खोखली इमारत का सच टुकुर-टुकुर झाँक रहा होता है. ठीक वैसे ही, जैसे किसी बच्चे को खिलौना दिखाकर उसके हाथ में सिर्फ खाली पैकेट थमा दिया गया हो. 'न्यूटन' बिना शक आज के राजनीतिक माहौल और सरकारी तंत्र की खामियों पर एक सही, सीधी और सटीक टिप्पणी है.  

सोते हुओं को जगाने के लिए, 'न्यूटन' छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्र दंडकारण्य को अपनी प्रयोगशाला बनाती है. स्थानीय प्रत्याशी की हत्या के बाद क्षेत्र में दुबारा चुनाव कराये जा रहे हैं, सेना की देखरेख में. नौजवान चुनाव अधिकारी (राजकुमार राव) अपने नाम की तरह ही अजीब है, अजब है, अकडू है. अपना नाम न्यूटन उसने खुद ही रखा था, नूतन कुमार से बदल कर. 'आई वांट टू मेक अ डिफरेंस' वाली फैक्ट्री से निकला है, घोर ईमानदारी का पुतला है. सिर्फ 76 मतदाताओं वाले पोलिंग बूथ पे चुनाव कराना कौन सी बड़ी बात है, मगर आर्मी अफसर आत्मा सिंह (पंकज त्रिपाठी) का डरना-डराना भी जायज़ है. ये वो इलाका है, जहां के बारे में टीवी स्टूडियोज में बैठे सूट-बूट वाले न्यूज़ एंकर्स को ज्यादा पता है, और उनकी चीख-चिल्लाहट में हमने भी काफी कुछ सुन (ही) रखा है. "अपने ही लोग हैं, अपने ही लोगों के खिलाफ हैं", "देशद्रोही हैं स्साले, देश बांटने की मांग करते हैं", "चींटी की चटनी खाते हैं, बताओ!", वगैरह, वगैरह. 

खैर, 'न्यूटन' किसी भी तरह और तरीके से नक्सल की समस्या पर पक्ष-विपक्ष का पाला चुनकर बैठ जाने की कोशिश नहीं करती, बल्कि फिल्म के समझदार और ईमानदार नजरिये की वजह से आप जरूर अपने आप को इस दुविधा में अक्सर लड़खड़ाते हुए पाते हैं. लोकल बूथ लेवल ऑफिसर मलको (अंजलि पाटिल) जब भी बातों-बातों में वहाँ के लोगों की बात सामने रखती है, आपके नजरिये को एक ठेस, एक धक्का जरूर लगता है. आत्मा सिंह जब बन्दूक न्यूटन के हाथ में थमा कर कहता है, 'ये देश का भार है, और हमारे कंधे पर है'; या फिर जब विदेशी रिपोर्टर पूछती है, 'चुनाव सुचारू रूप से चलाने के लिए आपको क्या चाहिए?" और उसका जवाब होता है, "मोर वेपन (और हथियार)!"; वो आपको खलनायक नहीं लगता, बल्कि आपको उसकी हालत और उसके हालात पर दया ज्यादा आती है. वो भी उसी सिस्टम का मारा है, और महंगा जैतून का तेल खरीदते वक़्त उसके माथे पर भी शिकन आती है.  

फिल्म के एक दृश्य में गाँवों से लोग मतदान के लिए जुटाए जा रहे हैं, और बराबर के दृश्य में एक महिला काटने-पकाने के लिए मुर्गियां पकड़ रही है. 'न्यूटन' इस तरह के संकेतों और ब्लैक ह्यूमर की दूसरी ढेर सारी मिसालों के जरिये आपका मनोरंजन भी खूब करती है, और आपको सोचने पे मजबूर भी. आत्मा सिंह नाश्ता करते हुए कहता है, "बड़ी इंटेंरोगेशन के बाद मुर्गियों ने अंडे दिये हैं". न्यूटन के पूछने पर कि क्या वो भी निराशावादी है?, मलको टन्न से बोल पड़ती है, "मैं आदिवासी हूँ'. खंडहर पड़े प्राइमरी स्कूल में बने बूथ में सब अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठे-बैठे लोगों के आने का इंतज़ार कर रहे हैं, माहौल शांत है, पर धीरे-धीरे आपको सरकारी तंत्र और खोखले दावों की चरमराहट सुनाई देनी शुरू हो जाती है.

इतने सब उथल-पुथल और खामियों के बावज़ूद, 'न्यूटन' एक आशावादी फिल्म बने रहने का दम-ख़म दिखाने में सफल रहती है. न्यूटन की ईमानदारी, उसकी साफगोई, बदलाव के लिए उसकी ललक कहीं न कहीं आपको उसकी तरफ खींच कर ले जाती है. ऐसे न्यूटन अक्सर सरकारी दफ्तरों में किसी अनजाने टेबल के पीछे दफ़न भले ही हो जाते हों, उनकी कोशिशों का दायरा भले ही बहुत छोटा रह जाता है, पर समाज में बदलाव की जो थोड़ी बहुत रौशनी बाकी है, उन्हीं से है. ठीक 9 बजे ऑफिस आ जाने वालों पर हँसते तो हम सभी हैं, पर शायद ऐसे न्यूटन भी उन्हीं में से एक होते हैं. फिल्म में ट्रेनर की भूमिका में संजय मिश्रा फरमाते हैं, "ईमानदार होके आप कोई एहसान नहीं कर रहे, ऐसा आपसे एक्सपेक्टेड है'. कम से कम फिल्म इस कसौटी पर सौ फीसदी सही साबित होती है.

राजकुमार राव और पंकज त्रिपाठी की बेहतरीन अदाकारी, रघुवीर यादव, अंजलि पाटिल और संजय मिश्रा के सटीक अभिनय और मयंक तिवारी के मजेदार संवादों से लबालब भरी 'न्यूटन' साल की सबसे अच्छी फिल्म तो है ही, अपने विषय-वस्तु की वजह से बेहद जरूरी भी, और 'उड़ान', 'आँखों-देखी', 'मसान' जैसी नए भारत के नए सिनेमा की श्रेणी और शैली की मेरी पसंदीदा, चुनिन्दा फिल्मों में से एक. [4.5/5]       

Friday, 8 September 2017

समीर: उम्मीदों से खेलती एक नासमझ फिल्म! [2/5]

'कर्मा इज़ अ बिच'. याद है, मोहम्मद जीशान अय्यूब जाने कितनी बड़ी-बड़ी फिल्मों में छोटे-छोटे किरदार निभाने के बावजूद कैसे तारीफों का सारा टोकरा खुद भर ले जाते रहे हैं? उन्हें बड़े स्टार्स की हाय आखिर लग ही गयी. दक्षिण छारा की 'समीर' में मुख्य भूमिका निभाते हुए भी जीशान फिल्म में बहुत असहज और असहाय नज़र आते हैं, और ठीक उनकी पिछली फिल्मों की तरह ही, दर्शकों को इस फिल्म में भी सहायक और छोटे (इस मामले में उम्र में भी) कलाकार ही ज्यादा धीर-गंभीर और ईमानदार लगते हैं. हालाँकि यह 'कर्मा इज़ अ बिच' वाला बचकाना नजरिया मैंने सिर्फ मज़े और मज़ाक के लिए यहाँ इस्तेमाल किया है, पर यकीन जानिये फिल्म भी एक मंझे हुए कलाकार के तौर पर जीशान की ज़हानत और मेहनत का ऐसा ही मज़ाक बनाती है. एक ऐसी ज़रूरी फिल्म, जो मुद्दों पर बात करने की हिम्मत तो रखती है, जो सोते हुओं को जगाने और चौंकाने का दम भी दिखाती है, पर अक्सर किरदारों और कहानी की ईमानदारी के साथ खिलवाड़ कर बैठती है. 

एटीएस के हाथों एक बेगुनाह लगा है, उसी को मोहरा बनाकर एटीएस के लोग एक खतरनाक आतंकवादी तक पहुंचना चाहते हैं. चीफ बेगुनाह को धमका रहा है, 'मिशन पूरा करने में हम साम, दाम, दंड सब इस्तेमाल करेंगे', पिटता हुआ बेगुनाह जैसे भाषा-विज्ञान में पीएचडी करके लौटा हो, छिटक पड़ता है, "...और भेद?". स्क्रिप्ट में ऐसे सस्ते मज़ाकिया पंच ख़ास मौकों पर ही प्रयोग में लाये जाते हैं. एक तो जब पूरी की पूरी फिल्म या किरदार भी इतना ही ठेठ हो, या फिर जब फिल्म रोमांच और रहस्यों में उलझी-उलझी हो, और आप इन मज़ाकिया संवादों के सहारे दर्शकों को आगे आने वाले झटकों से पूरी तरह हैरान-परेशान होते देखना चाहते हों. फिल्म बेशक दूसरे तरीके के मनोरंजन की खोज में है. 

बंगलौर और हैदराबाद में बम धमाकों के बाद, यासीन अब अहमदाबाद में सीरियल ब्लास्ट करने वाला है. एटीएस चीफ देसाई (सुब्रत दत्ता) यासीन के साथ पढ़ने वाले स्टूडेंट समीर (जीशान) का इस्तेमाल कर, उसके ज़रिये यासीन तक पहुँचने की पूरी कोशिश में है. इस काम में रिपोर्टर आलिया (अंजलि पाटिल) भी देसाई के साथ है. अब भोले-भाले समीर को देसाई के हाथों की कठपुतली बना कर उस जंगल में छोड़ दिया गया है, जहां उसके सर पर तलवार चौबीसों घंटे लटकी है और कुछ भी एकदम से निश्चित नहीं है. झूठ का पहाड़ बढ़ता जा रहा है, और लोगों की जान का ख़तरा भी.

दक्षिण छारा अपनी फिल्म 'समीर' के जरिये दर्शकों को आतंकवाद के उस चेहरे से रूबरू कराने की कोशिश करते हैं, जो सिस्टम और राजनीति का घोर प्रपंच है, कुछ और नहीं. आम मासूम लोग बार-बार उन्हीं प्रपंचों का शिकार बनते रहते हैं और उन्हें इसका कोई अंदाजा भी नहीं होता. जहां तक फिल्म के कथानक और उसके ट्रीटमेंट की बात है, बनावट में 'समीर' काफी हद तक राजकुमार गुप्ता की बेहतरीन फिल्म 'आमिर' जैसी लगती है. दोनों में ही थ्रिलर का पुट बहुत ख़ूबसूरती से पिरोया गया है, मगर 'आमिर' में जहां आप मुख्य किरदार के लिए अपने माथे पर शिकन और पसीने की बूँदें महसूस करते हैं, 'समीर' यह अनुभव देने में नाकाम रहती है. जीशान का किरदार मनोरंजक ज्यादा लगता है, हालातों का शिकार कम. 

फिल्म के सबसे मज़बूत पक्ष में उभर कर आते हैं कुछ छोटे किरदार, जैसे एक तुतलाता-हकलाता बच्चा राकेट (मास्टर शुभम बजरंगी) जो गांधीजी को 'दादाजी' कह कर बुलाता है और मोहल्ले में नुक्कड़ नाटक चलाने वाले मंटो (आलोक गागडेकर) के साथ मिलकर बड़ी-बड़ी बातें बेहद मासूमियत से बयाँ कर गुजरता है. देसाई के किरदार में सुब्रत दत्ता अच्छे लगते हैं, पर उनकी अदाकारी में एकरसता भी बड़ी जल्दी आ जाती है. बोल-चाल में उनका बंगाली लहजा भी कई मौकों पर परेशान करता है. अंजली पाटिल को हम बेहतर भूमिकाओं में देख चुके हैं, इस किरदार के साथ उनकी अदाकारी में किसी तरह का कोई इजाफा नज़र नहीं आता. 

आखिर में; 'समीर' एक अलग, रोचक और रोमांचक फिल्म होने की उम्मीदें तो बहुत जगाती है, पर अपने बचकाने रवैये से उन्हें बहुत जल्द नाउम्मीदी में बदल कर रख देती है. काश, थोड़ी सी संजीदगी और समझदारी 'शाहिद' और 'आमिर' से उधार में ही सही नसीब हो गयी होती!! [2/5]                               

Friday, 7 October 2016

मिर्ज्या: खूबसूरत, पर बेजान! [2/5]

रंग दे बसंती’ में कहानी को परदे पर कहने की कला में राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने कुछ काफी सफल प्रयोग किये थे. अलग-अलग वक़्त के दो धागों के सिरे बारी-बारी से कभी छूटते-कभी गुंथते नज़र आये थे. दो कहानियां, जिनकी सूरतें भले ही एक-दूसरे से ख़ासी मुख्तलिफ़ हों, सीरत बिलकुल एक जैसी. अंजाम की भनक होते भी दिल और दिमाग के साथ ऐसी उथल-पुथल, ऐसी उठा-पटक कि अंत तक क्या मजाल आप किसी एक तय नतीज़े पर टिक कर रह पाने का पूरा पूरा लुत्फ़ ले पाएं. ‘मिर्ज्या’ मेहरा के उसी प्रयोग की अगली कड़ी है. वक़्त यहाँ भी थम कर नहीं रहता. पाले बदलता रहता है. छलांग मार कर इधर से उधर पहुँच जाता है, शटलकॉक की तरह. नयापन बस इतना है कि इस बार पाले दो नहीं, तीन हैं, और अक्सर आप इसी पेशोपेश में उलझे रहते हैं कि किस छलांग के साथ आप किस पाले में और क्यूँ आ गिरे हैं?  

दूधिया बर्फ़ से पटे पड़े पहाड़ियों के बीच, आसमान में उड़ते मिट्टी के परिंदों को तीरों से मटियामेट करते मिर्ज़ा [हर्षवर्धन कपूर] को साहिबां [सैयामी खेर] से इश्क़ है, साहिबां को भी है, पर दरमियान  जो दुनिया की लम्बी-चौड़ी-मज़बूत आसमान छूती दीवार है, वो कहानियों में दफ़न इस सदी से कहीं दूर अगली सदी में भी ज्यूँ की त्यूं वैसी ही मुस्तैदी से तैनात है. मुनीश और सुचित्रा की किस्मत भी मिर्ज़ा और साहिबां की कहानी वाली ही स्याही से लिखी गयी है. इसमें जुदाई है, आह है, तड़प है, न मिल के भी मिल जाने का सुकून है, और मिल के भी न मिल पाने का मलाल भी. किस्मत के मारे आशिक़ों को ‘सब’ न मिल पाने की ये कहानी पहले भी अनगिनत बार परदे पर दोहराई जा चुकी है, और कहीं न कहीं फिल्म के ‘मिर्ज़ा-साहिबां’ वाले हिस्से में ये आसानी से पच भी जाता है, पर नए ज़माने में इसे वैसे का वैसे निगलना टेढ़ी खीर लगने लगता है.        

मिर्ज़ा-साहिबां’ की सदियों पुरानी लोककथा को आज के नए ज़माने में ‘रंग दे बसंती’ की ही तर्ज़ पर पिरोने में, मेहरा कहानी को कबीलाई लोक-संगीत और लोक-नृत्यों के सहारे जो एक तीसरा नया आयाम देते हैं, वो देखने-सुनने में बहुत ही रंगीन और निहायत रूमानी लगता है. परदे पर दृश्य पानी में रंग घुलते हुए देखने जैसा अनुभव देते हैं. हरेक फ़्रेम में ख़ूबसूरती इठला-इठला के बहती है, थोड़ी धीमी होके ठिठकती है, और फिर अपने पहले वाली लय में आके आगे निकल जाती है. इतने सब के बावजूद ‘मिर्ज्या’ आपको निराश ही ज्यादा करती है. वजहें एक से ज्यादा हैं. गुलज़ार साब की शे’र-ओ-शायरी जो गानों में अपने पूरे शबाब पर दिखाई देती है, फिल्म के स्क्रीनप्ले में किरदारों के बीच जरूरी गर्माहट पैदा करने में हर बार चूक जाती है. बातचीत के लहजों के लिए नए कलाकारों को दोष दिया जा सकता है, पर संवादों में ‘चाशनी’ की कमी के लिए अब किसे कहें? ‘मिर्ज्या’ को देखना उस मूर्ति या उस पेंटिंग को देखने जैसा ही है, जिसे देखकर आप तारीफ में कह उठें, “काश, इसके अन्दर जान भी होती!”. ऐसा कहकर जाने-अनजाने आप उसके मुकम्मल न होने की दुहाई भी अपने आप ही दे बैठते हैं.

हर्षवर्धन कपूर बॉलीवुड के खांचे में फिट होने वाले अभिनेता नहीं दिखते. हालाँकि उनके हिस्से ठहराव वाले दृश्य ही ज्यादा आये हैं, जहां उनकी ख़ामोशी, उदासी, बेबसी ज्यादातर खाली आँखों से ही बयान करने की मांग पूरी करती हैं. सैयामी उम्मीदें कायम रखती हैं. आर्ट मलिक अपनी अलग किस्म की संवाद-अदायगी से, अनुज चौधरी अपनी कद-काठी से और अंजली पाटिल अपनी संजीदगी से प्रभावित करते हैं.

कहानी कहने की अलग शैली, अपने अलग तौर-तरीकों से ‘मिर्ज्या’ परदे पर फिल्म से हटके एक ‘थिएटर प्रोडक्शन’ ज्यादा लगती है, जहां साज-सज्जा में रंगीनीयत और चमक धुआंधार है, कहानी में नाच-गानों की भरमार है, पर जहां कुछ भी जिंदा नहीं है, न तो कहानी, न ही किरदार. इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले बोर्ड या आपके कंप्यूटर स्क्रीन पर विजुअल ग्राफ़िक्स से गढ़े गए एनिमेटेड वॉलपेपर नहीं होते? जिनपे तैरती रंग-बिरंगी मछलियों को आप चाह के भी छू नहीं सकते, महसूस नहीं कर सकते? ठीक वैसा ही. [2/5]