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Friday, 21 December 2018

ज़ीरो: शाहरुख़ के करिश्मे और कद के सामने छोटी पड़ती फिल्म! [2/5]


ये साल हिंदी सिनेमा के महानायकों को औंधे मुंह गिरते हुए देखने का है. ख़ास तौर पर खानों (सलमान, आमिर, शाहरुख़) की तिकड़ी दर्शकों की कसौटी पर कतई खरी नहीं उतर रही. सलमान ‘रेस 3’ में अपने आपको बड़ी बेहयाई और दंभ से बार-बार दोहराने का खामियाज़ा भुगत चुके हैं. मनोरंजन के नाम पर भव्यता की चमकीली पन्नी में लपेट कर कुछ भी सस्ता और सड़ा-गला परोसने के लिए, ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान’ में आमिर नकारे जा चुके हैं; और अब अनोखी लेकिन बेतुकी और अजीब सी ‘ज़ीरो’ में शाहरुख़ अपने करिश्मे के बूते एक ऐसी फिल्म चलाने की कोशिश करते नज़र आ रहे हैं, जो जितनी जादुई और मनोरंजक है, उतनी ही थका देने वाली भी. हालाँकि बाकी दोनों मिसालों की बनिस्पत, ‘ज़ीरो कम से कम अपनी कमजोरियों और कमियों का ठीकरा अपने मुख्य नायक की क़ाबलियत पर तो नहीं ही फोड़ सकती! शाहरुख़ अपने पूरे शबाब पर हैं, और गनीमत है कि परदे पर उनका बौनापन सिर्फ उनके किरदार के कद तक ही सीमित रहता है, अभिनय पर तनिक भी हावी नहीं होता.

परदे पर छोटे शहरों के रोमांस में आनंद एल राय बड़ा नाम बन चुके हैं. ‘ज़ीरो की शुरुआत भी छोटे से शहर मेरठ से होती है, जहां शाहरुख़ जैसे बड़े नाम को कहानी में ‘फिट करने के लिए छोटा (बौना) बनने की शर्त से गुज़ारा जाता है. खेल बराबरी का होना चाहिए. बऊआ सिंह (खान) हिंदी में ‘अड़तीस’ और इंग्लिश में ‘थर्टी नाइन का हो चुका है, पर शादी की कोई सूरत नहीं बन रही. कद में छोटा बऊआ सपने में बड़ा बन जाता है. छोटे शहर का है, तो अमेरिका से लौटी, शराब-सिगरेट पीने वाली लड़की को शादी के बारे में सोचते देख झल्ला जाता है. ‘तू कहाँ से पड़ गयी इन चक्करों में?’. छोटे शहर का है, मर्द है तो जिद भी कि लड़की को बऊआ सिंह में इंटरेस्ट दिखाना ही होगा. बऊआ चंट है. मतलबी भी, और कोयल भी. खुद का घोंसला बनाने से चिढ़ मचती है. चाहे लड़की उसने खुद चुनी हो, अपने बराबरी की. व्हीलचेयर पर चिपकी, सेलेब्रल पल्सी से लड़ती, नासा की वैज्ञानिक (अनुष्का शर्मा).

फिल्म के लेखक हिमांशु शर्मा छोटे शहरों के चाल-चलन, ताव-तेवर और लय-लहज़ा का काफी कुछ भले ही पहले की फ़िल्मों में परोस चुके हों, ‘ज़ीरो में कहीं से भी उसके जायकों में कमी या बासीपन नहीं आने देते. उनके चुटीले संवादों में और बऊआ सिंह के बेशरम किरदार में आपकी दिलचस्पी अब भी बनी रहती है. दिक्कत पेश आती है, जब कहानी को बड़ी करने के लिए आनंद एल राय और हिमांशु बिना वजह तरकीबें लड़ाने लगते हैं. पतंगें उड़ाती ‘तनु वेड्स मनु की छत ‘ज़ीरो तक आते आते पैसों की बारिश कराने वाले छज्जे बन जाते हैं. रिक्शे पर घर लौटती तनु हो, या चौराहे पर पिटता कुंदन; गलियाँ-रस्ते अब ताज़ा-ताज़ा रंगे-पुते सेट बन गये हैं. भरोसेमंद किरदारों की भीड़ से अलग, कहानी में फ़िल्मी जगत के सितारों का बेरोक-टोक आना-जाना बढ़ गया है. एक सुपरस्टार (सलमान), दो कोरियोग्राफर (गणेश आचार्य, रेमो डिसूज़ा) और स्क्रीन पर करिश्माई मौजूदगी दर्ज कराने वाले दो काबिल अभिनेताओं (अभय देओल, आर माधवन) के साथ-साथ आधा दर्ज़न भर सिने-सुंदरियां (काजोल, रानी, दीपिका, जूही, श्रीदेवी, करिश्मा), मानो बऊआ के छोटे से कद में बखूबी घुसे शाहरुख़ अभी निकल कर ‘लक्स’ के बाथटब में छलांग मार देंगे.  

‘ज़ीरो अपनी कहानी में कुछेक अनोखे मोड़, अधूरेपन का जश्न मनाते किरदारों और उनकी सपनीली दुनिया के ज़रिये कई बार एक प्यारी सी, फंतासी रोमांस वाली ‘डिज्नी फिल्म होने का जोरदार आभास कराती है; खास कर अपने अंत की ओर बढ़ते हुए. इतना ही नहीं, हर वक़्त मनोरंजक होने की शर्त पूरी करने की ललक में फिल्म का पहला हिस्सा राजकुमार हिरानी की फिल्मों की भी याद ख़ूब दिला जाता है, लेकिन ये सारी उम्मीदें धीरे धीरे धुंआ होती जाती हैं. अभिनय में, अनुष्का की मेहनत साफ़ दिखती है. सेलेब्रल पल्सी और व्हीलचेयर के साथ भी, उनके चेहरे के भाव कितनी ही बार बरबस आपके चेहरे पर मुस्कान खींच देते हैं. ब्रेकअप के बाद बेपरवाह फिल्मस्टार की छोटी सी ही भूमिका में कटरीना कैफ़ अपनी सबसे रोमांचित कर देने वाली छाप छोड़ जाती हैं. तिग्मांशु धूलिया जमते हैं, और ज्यादा दिखाई देने की चाह पैदा करते हैं.

...लेकिन ‘ज़ीरो शाहरुख़ से अलग करके नहीं देखी जा सकती. बऊआ सिंह बनकर शाहरुख़ ना सिर्फ सुपरस्टार होने की उस अकड़ को तोड़ फेंकते हैं, जिसे हटाने की उम्मीद उनसे हाल-फिलहाल की जाने लगी थी; बल्कि ऐसा करते हुए वो अपने उस गुजरे हुए जादुई दौर को भी वापस जी लेते हैं, जहां उनका करिश्मा उनके किरदार की सच्चाइयों से पैदा होता था. बऊआ सिंह के सूरत और सीरत का हुलिया काफी हद तक ‘राजू बन गया जेंटलमैन’, ‘कभी हाँ कभी ना’ और ‘यस बॉस जैसी फिल्मों में उनके किरदारों से मेल खाता दिखता है. ‘जियरा चकनाचूर गाने में सलमान के चारो ओर जोश में नाचते बऊआ सिंह को देखना बरबस आपको शाहरुख़ की लगन, एनर्जी और सिनेमा को लेकर उनकी गंभीरता का मुरीद बना देगा. बऊआ सिंह को एक और मौका मिलना ही चाहिए.

आखिर में; ‘ज़ीरो फिल्म के तौर पर शाहरुख़ के करिश्मे और उनके मजेदार किरदार के कद के आगे बहुत छोटी पड़ जाती है. हालाँकि आनंद एल राय शाहरुख़ के कन्धों पर चढ़कर एक नया आसमान नापने की कोशिश पूरी करते हैं, पर तकरीबन पौने तीन घंटे की फिल्म में ज्यादातर वक़्त हवाबाजी में ही खर्च कर देते हैं. अगर सिर्फ फिल्म का पहला हिस्सा देखने की बात हो, तो मैं दो बार और देख सकता हूँ, पर शायद दूसरे हिस्से में फिल्म के बुरी तरह लड़खड़ाने का दर्द मुझे तब भी थिएटर से दूर ही रखेगा! [2/5]  

Thursday, 8 November 2018

ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान: सिनेमा के ठगों से बचिए! [1.5/5]


1968 में एक फिल्म बनी थी, ‘राजा और रंक’. राजा-महाराजाओं की कहानी थी. नायक (संजीव कुमार) कालकोठरी में बंद है. उसे छुड़ाने की गरज़ से आई नायिका (कुमकुम) ‘मेरा नाम है चमेली गीत गाते-गाते पहरेदारों और सिपाहियों को शराब पिला-पिला कर धुत्त कर देती है. नायक गिरफ़्त से बच निकलता है. ठीक 50 साल बाद, ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान में नायक आमिर खान भी ऐसी ही कुछ जुगत लगा रहे हैं, अमिताभ बच्चन के किरदार को अंग्रेजों के चंगुल से छुड़ाने में. बस्स, शराब की जगह इस बार नशीले लड्डुओं ने ले ली है. ‘मेरा नाम है चमेली गीत मैं आज भी बड़े, छोटे हर परदे पर देख सकता हूँ. उस गाने के साथ मेरा बचपन और बीते दौर की महक दोनों खिंचे चले आते हैं. ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान के साथ इस तरह की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है. न कानों को प्रिय लगने वाला संगीत, ना ही पुराने दौर से जुड़े होने का भरम. इसलिए इसे देखते वक़्त, अक्सर मुझे मनोज कुमार की ‘क्रांति के गानों की तलब लगने लगती है. आख़िरकार, जब सब कुछ पुराना सा, नकली और बासी ही है, तो बीते हुए कल में झांककर पहले से मौजूद मनोरंजन खोज लेने में हर्ज़ ही क्या है? हाँ, लेकिन तब फिल्म इंडस्ट्री का सबसे बड़ा स्टूडियो (यशराज फिल्म्स) होने का अहम् ज़रूर दांव पर लग जाएगा.

1795 के आसपास का वक़्त है. ज़रूर भारत उस वक़्त ‘सोने की चिड़िया’ ही रहा होगा. कम से कम, फिल्म के भारी-भरकम सेट्स देख के तो यही लगता है. खैर, खुदाबक्श जहाज़ी (अमिताभ बच्चन) आज़ाद का नाम धरकर अंग्रेज़ों से लोहा ले रहा है. साथ है ज़फीरा (फ़ातिमा सना शेख़), जो पिता की हत्या के बाद अंग्रेजों से रियासत वापस लेने की लड़ाई लड़ रही है. अंग्रेज़ अफसर क्लाइव (लॉयड ओवेन) का मोहरा है, फिरंगी मल्लाह (आमिर खान). अव्वल दर्ज़े का धोखेबाज़, जो गिरगिट से भी तेज़ अपना रंग बदलता है और पैसों के लिए कभी भी अपना पाला बदल सकता है. एक फिरंगी मल्लाह के किरदार को थोड़ी रियायत दे दें; तो फिल्म का कोई भी दृश्य या किरदार ऐसा नहीं है, जो आपको पूरी तरह प्रभावित करता हो या चौंकाने में कामयाब होता हो. कहना गलत नहीं होगा कि फिल्म के लेखक-निर्देशक विजय कृष्ण आचार्य फ़ॉर्मूले में बंधी एक बेहद औसत दर्जे की कहानी चुनते हैं, जिसका हर मोड़ आपका जाना-पहचाना है. ऊपर से, समझदारी से ज्यादा सहूलियत के साथ एक दृश्य से दूसरे दृश्य में जाने का आलसीपन. आज़ादी की लड़ाई से कहीं ज्यादा, फिल्म ज़फीरा के बदले की कहानी बन के रह जाती है.

विजय कृष्ण आचार्य बड़े कैनवस की फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं. यकीनी तौर पर, फिल्म के सेट्स और कैमरा शॉट्स हर बार बड़े से और बड़े होते जाते हैं, और कहानी हर बार इस भव्यता के नीचे कहीं दब कर दम तोड़ देती है. ताज्जुब तब होता है, जब आमिर जैसे समझदार भी जान-बूझ कर बड़ी आसानी से इस साज़िश का हिस्सा और शिकार बन जाते हैं. फिल्म का 10 से 15 फ़ीसदी हिस्सा सिर्फ बैकग्राउंड म्यूजिक के सहारे (वो भी वेस्टर्न स्टाइल का संगीत) किरदारों को बड़ा करके दिखाने में खर्च हो जाता है. स्लो-मोशन कैमरा हो या लो-एंगल शॉट्स; फिल्म कहानी में ड्रामा भले ही न पेश कर पाती हो, दृश्यों में ठूंस-ठूंस कर ड्रामा भरती जरूर नज़र आती है. यशराज फिल्म्स में एक वक़्त तक (यश चोपड़ा साब के ज़माने में) कहानी के लिए एक तयशुदा डिपार्टमेंट होता था. उनके जाने के साथ ही शायद अब ये चलन भी जाता रहा, वरना ‘शान की तरह शाकाल के अड्डे पर खुलेआम नाचते हुए भी भेष बदले होने का भरम पालने वाला दौर आज के परदे पर क्यूँ कर शामिल होता?

अभिनय में सबसे निराश करते हैं अमिताभ बच्चन. भारी-भरकम गेट-अप के बीच अक्सर या तो उन्हें बोलने की छूट नहीं मिलती, या फिर हमसे उनको सुनना छूट जाता है. परदे पर शानदार लगने-दिखने के अलावा उनके किरदार में कोई धार नज़र नहीं आती, वरना एक वक्त था और वो फिल्में जब उनकी संवाद अदायगी ही काफी थी रोमांचित करने को. फ़ातिमा के हिस्से कुछ अच्छे एक्शन दृश्य ज़रूर आये हैं, पर अभिनय में उनकी काबलियत अभी भी ‘दंगल के भरोसे ही है. कटरीना कैफ महज़ गिनती के कुछ दृश्यों और दो अदद गानों तक सीमित हैं. फिल्म में निर्देशन की कमजोरी इस बात से भी आंकी जा सकती है कि मोहम्मद जीशान अय्यूब जैसे सह-कलाकार भी हंसोड़ ज्यादा लगते हैं, अभिनेता कम. बच-बचा कर, आमिर ही हैं जो थोड़ी बहुत राहत देते हैं. उनकी आँखों में धूर्तता और चाल-चलन में छल पूरी तरह समाया हुआ दिखता है, और एकरस होते हुए भी कई बार मजेदार लगता है. फिर भी ये कहना कि फिल्म आमिर के लिए ही देखी जा सकती है, ज्यादती हो जायेगी.

आखिर में; ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान उन बेरहम ठगों के बारे में कम है, जो आज़ादी से पहले के भारत में पाए जाते थे, बल्कि उन बेशरम ठगों के बारे में ज्यादा है, जो आज के दौर में सिनेमा और मनोरंजन के नाम पर दर्शकों की समझ और पसंद को, कुछ भी ऊल-जलूल, थकाऊ और वाहियात परोस कर ठग रहे हैं. आमिर खान और अमिताभ बच्चन जैसे बड़े-बड़े नामों को आगे करके भीड़ खींचने वाले इन दिमाग़ी दिवालियों से जितनी दूर रहेंगे, आपकी और हिंदी सिनेमा की सेहत के लिए बेहतर होगा! [1.5/5]              

Friday, 8 September 2017

समीर: उम्मीदों से खेलती एक नासमझ फिल्म! [2/5]

'कर्मा इज़ अ बिच'. याद है, मोहम्मद जीशान अय्यूब जाने कितनी बड़ी-बड़ी फिल्मों में छोटे-छोटे किरदार निभाने के बावजूद कैसे तारीफों का सारा टोकरा खुद भर ले जाते रहे हैं? उन्हें बड़े स्टार्स की हाय आखिर लग ही गयी. दक्षिण छारा की 'समीर' में मुख्य भूमिका निभाते हुए भी जीशान फिल्म में बहुत असहज और असहाय नज़र आते हैं, और ठीक उनकी पिछली फिल्मों की तरह ही, दर्शकों को इस फिल्म में भी सहायक और छोटे (इस मामले में उम्र में भी) कलाकार ही ज्यादा धीर-गंभीर और ईमानदार लगते हैं. हालाँकि यह 'कर्मा इज़ अ बिच' वाला बचकाना नजरिया मैंने सिर्फ मज़े और मज़ाक के लिए यहाँ इस्तेमाल किया है, पर यकीन जानिये फिल्म भी एक मंझे हुए कलाकार के तौर पर जीशान की ज़हानत और मेहनत का ऐसा ही मज़ाक बनाती है. एक ऐसी ज़रूरी फिल्म, जो मुद्दों पर बात करने की हिम्मत तो रखती है, जो सोते हुओं को जगाने और चौंकाने का दम भी दिखाती है, पर अक्सर किरदारों और कहानी की ईमानदारी के साथ खिलवाड़ कर बैठती है. 

एटीएस के हाथों एक बेगुनाह लगा है, उसी को मोहरा बनाकर एटीएस के लोग एक खतरनाक आतंकवादी तक पहुंचना चाहते हैं. चीफ बेगुनाह को धमका रहा है, 'मिशन पूरा करने में हम साम, दाम, दंड सब इस्तेमाल करेंगे', पिटता हुआ बेगुनाह जैसे भाषा-विज्ञान में पीएचडी करके लौटा हो, छिटक पड़ता है, "...और भेद?". स्क्रिप्ट में ऐसे सस्ते मज़ाकिया पंच ख़ास मौकों पर ही प्रयोग में लाये जाते हैं. एक तो जब पूरी की पूरी फिल्म या किरदार भी इतना ही ठेठ हो, या फिर जब फिल्म रोमांच और रहस्यों में उलझी-उलझी हो, और आप इन मज़ाकिया संवादों के सहारे दर्शकों को आगे आने वाले झटकों से पूरी तरह हैरान-परेशान होते देखना चाहते हों. फिल्म बेशक दूसरे तरीके के मनोरंजन की खोज में है. 

बंगलौर और हैदराबाद में बम धमाकों के बाद, यासीन अब अहमदाबाद में सीरियल ब्लास्ट करने वाला है. एटीएस चीफ देसाई (सुब्रत दत्ता) यासीन के साथ पढ़ने वाले स्टूडेंट समीर (जीशान) का इस्तेमाल कर, उसके ज़रिये यासीन तक पहुँचने की पूरी कोशिश में है. इस काम में रिपोर्टर आलिया (अंजलि पाटिल) भी देसाई के साथ है. अब भोले-भाले समीर को देसाई के हाथों की कठपुतली बना कर उस जंगल में छोड़ दिया गया है, जहां उसके सर पर तलवार चौबीसों घंटे लटकी है और कुछ भी एकदम से निश्चित नहीं है. झूठ का पहाड़ बढ़ता जा रहा है, और लोगों की जान का ख़तरा भी.

दक्षिण छारा अपनी फिल्म 'समीर' के जरिये दर्शकों को आतंकवाद के उस चेहरे से रूबरू कराने की कोशिश करते हैं, जो सिस्टम और राजनीति का घोर प्रपंच है, कुछ और नहीं. आम मासूम लोग बार-बार उन्हीं प्रपंचों का शिकार बनते रहते हैं और उन्हें इसका कोई अंदाजा भी नहीं होता. जहां तक फिल्म के कथानक और उसके ट्रीटमेंट की बात है, बनावट में 'समीर' काफी हद तक राजकुमार गुप्ता की बेहतरीन फिल्म 'आमिर' जैसी लगती है. दोनों में ही थ्रिलर का पुट बहुत ख़ूबसूरती से पिरोया गया है, मगर 'आमिर' में जहां आप मुख्य किरदार के लिए अपने माथे पर शिकन और पसीने की बूँदें महसूस करते हैं, 'समीर' यह अनुभव देने में नाकाम रहती है. जीशान का किरदार मनोरंजक ज्यादा लगता है, हालातों का शिकार कम. 

फिल्म के सबसे मज़बूत पक्ष में उभर कर आते हैं कुछ छोटे किरदार, जैसे एक तुतलाता-हकलाता बच्चा राकेट (मास्टर शुभम बजरंगी) जो गांधीजी को 'दादाजी' कह कर बुलाता है और मोहल्ले में नुक्कड़ नाटक चलाने वाले मंटो (आलोक गागडेकर) के साथ मिलकर बड़ी-बड़ी बातें बेहद मासूमियत से बयाँ कर गुजरता है. देसाई के किरदार में सुब्रत दत्ता अच्छे लगते हैं, पर उनकी अदाकारी में एकरसता भी बड़ी जल्दी आ जाती है. बोल-चाल में उनका बंगाली लहजा भी कई मौकों पर परेशान करता है. अंजली पाटिल को हम बेहतर भूमिकाओं में देख चुके हैं, इस किरदार के साथ उनकी अदाकारी में किसी तरह का कोई इजाफा नज़र नहीं आता. 

आखिर में; 'समीर' एक अलग, रोचक और रोमांचक फिल्म होने की उम्मीदें तो बहुत जगाती है, पर अपने बचकाने रवैये से उन्हें बहुत जल्द नाउम्मीदी में बदल कर रख देती है. काश, थोड़ी सी संजीदगी और समझदारी 'शाहिद' और 'आमिर' से उधार में ही सही नसीब हो गयी होती!! [2/5]                               

Friday, 23 June 2017

ट्यूबलाइट: यकीनन...ख़राब फिल्म-खराब एक्टिंग! [1.5/5]

'ट्यूबलाइट' के होने की वजह मेरे हिसाब से 'बजरंगी भाईजान' की कामयाबी में ही तलाशी गयी होगी. चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने कबीर खान के हाथ अब एक ऐसा अमोघ फार्मूला लग गया था, जिसमें बॉक्स-ऑफिस पर सिक्कों की खनक पैदा करने की हैसियत तो थी ही, आलोचकों और समीक्षकों का मुंह बंद कराने की ताकत और जुड़ गयी. एक सीधी-सादी दिल छू लेने वाली कहानी, थोड़ा सा 'बॉर्डर-प्रेम' का पॉलिटिकल तड़का, चुटकी भर 'बीइंग ह्यूमन' का वैश्विक सन्देश और साफ़ दिल रखने की तख्ती हाथों में लेकर घूमते एक बेपरवाह 'भाईजान'. 'ट्यूबलाइट' बड़े अच्छे तरीके और आसानी से इसी ढर्रे, इसी तैयार सांचे में फिट हो जाती है, पर जब आग में तप कर बाहर आती है तो नतीज़ा कुछ और ही होता है. मिट्टी ही सही नहीं हो, तो ईटें भी कमज़ोर ही निकलती हैं. 

कुमाऊँ के एक छोटे से गाँव में गांधीजी कहकर गये, "यकीन से कुछ भी हासिल किया जा सकता है". ट्यूबलाइट की तरह, देर से दिमाग की बत्ती जलने वाले लक्ष्मण (सलमान खान) की सुई इस 'यकीन' पर आके कुछ ऐसे अटक गयी कि सालों बाद 1962 के भारत-चीन युद्ध में लापता भाई (सोहेल खान) की वापसी के लिए भी, लक्ष्मण उसी 'यकीन' की तरफ टकटकी लगाये देख रहा है. कबीर खान कहानी की इस ठीक-ठाक नींव को मज़बूत करने में थकाऊ धीमी गति और पकाऊ भाषणों से इतना वक़्त खपाते हैं कि फिल्म का वो ज़रूरी पैग़ाम देने में देर हो जाती है, जहां चीनी मूल के भारतीय माँ-बेटे लीलिंग और गुओ (ज़ू ज़ू और माटिन रे तंगु) को गांववाले चीनी समझकर नस्ली भेदभाव दिखाने लगते हैं. लक्ष्मण खुद गुओ को 'गू' कहकर बुलाता है, और एक दृश्य में तो गुओ को 'भारत माता की जय' बोल कर हिन्दुस्तानी होने का सबूत देने को भी कहता है. आज के दौर में, जब सेना के जुझारूपन और हर किसी के 'देशभक्त' होने, न होने की पिपिहरी पूरे देश में जोरों से बज रही है, कबीर खान भारतीय सेना के एक अधिकारी (यशपाल शर्मा) से युद्ध-विरोधी बातें कहलवाने की हिम्मत तो जरूर दिखाते हैं, लेकिन सब कुछ बेदम, बनावटी और बेअसर!

फिल्म में बहुत कुछ बेढंगा और वाहियात है, जो आपको लगातार परेशान करता रहता है. कुमाऊँ का यह गाँव फिल्मी सेट लगने-दिखने की हद से बाहर जा ही नहीं पाता. फिल्मों में 80 के दशक के गाँव और वही 25-50 चेहरे, जो हर जगह भीड़ का हिस्सा बनकर चौराहे पर डटे रहते थे, बेबस याद आ जाते हैं. कैलेंडर पर '62 भले ही चल रहा हो, गाँववालों की बातचीत के लहजे में 'चाइना', 'ज़िप', 'गैप' और तमाम अंग्रेज़ी के शब्द बड़ी बेशर्मी से कानों में सुनाई देते रहते हैं. फिर आती हैं मशहूर चीनी अभिनेत्री ज़ू ज़ू. मुझे कोई वजह समझ नहीं आती कि उनकी जगह कोई दूसरी (नार्थ-ईस्ट की) भारतीय अभिनेत्री क्यूँ नहीं हो सकती थी? जैसे उनके बेटे की भूमिका में माटिन रे तंगु अरुणाचल प्रदेश से ही हैं. 'मैरी कॉम' में प्रियंका चोपड़ा की कास्टिंग जैसी ही कुछ भयानक गलती है ये. 

...पर फिल्म में एक पॉइंट पर आकर आपको ये सारी शिकायतें बहुत छोटी लगने लगती हैं, जब आप फिल्म के मुख्य कलाकार सलमान खान को एक के बाद एक हर दृश्य में अभिनय के नाम पर कुछ भी आढ़े-टेढ़े चेहरे बनाते हुए देखते हैं. कबीर उनके किरदार को परदे पर रोते हुए पेश करने में ज्यादा मेहनत दिखाते हैं, पर हमें रोना आता है तो सिर्फ सलमान की अभिनय में नाकाम कोशिशों से. फिल्म में सलमान अपने यकीन से पहाड़ भी हिला देते हैं, ऐसा ही कोई यकीन उन्हें अपने अभिनय में भी दिखाना चाहिए. कभी-कभी ही सही. मोहम्मद जीशान अय्यूब जैसे मंजे कलाकार के लिए फिल्म में बहुत कुछ करने को नहीं है, पर एक दृश्य में जब वो सलमान के किरदार को थप्पड़ जड़ रहे होते हैं, लगता है सलमान को जैसे सज़ा मिल रही हो, अच्छी एक्टिंग न करने की, उससे जो शायद फ़िल्म में सबसे अच्छी कर रहा हो. सोहेल खान बड़ी समझदारी से फिल्म में आते-जाते रहते हैं, तो उनसे न तो ज्यादा उम्मीदें बनती हैं, न ही शिकायतें. शाहरुख एक दृश्य में आते तो हैं, पर उनसे भी किसी करिश्मे की कोई आस नहीं जगती.    

आखिर में; 'ट्यूबलाइट' में कबीर खान अपने 'बजरंगी भाईजान' वाले फ़ॉर्मूले को बॉक्स-ऑफिस पर दोबारा भुनाने की कोशिश करते हैं, पर ठीक वैसे ही औंधे मुंह गिरते हैं, जैसे 'एक था टाइगर' के बाद 'फैंटम'. रही बात यकीन की, तो मुझे यकीन है कि भाई एक दिन एक्टिंग करनी सीख ही जायेंगे, तब तक के लिए भेजते रहिये 'ईदी'...और बिजली में कटौती, रौशनी में बढौती के लिए अपनाईये एलईडी! [1.5/5]        

Wednesday, 25 January 2017

रईस: सत्तर का सिनेमा+नब्बे का शाहरुख़= मसालेदार मनोरंजन [3/5]

1975 में; सलीम-जावेद की ‘दीवार’ जनवरी महीने के ठीक इसी हफ्ते सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई थी. 42 साल बाद, राहुल ढोलकिया की ‘रईस’ अगर इतिहास दोहरा नहीं रही, तो कम से कम ‘दीवार’ के साथ हिंदी फिल्मों में नायक के बदलते हाव-भाव और ताव को एक बार फिर उसी जोश-ओ-जूनून से परदे पर जिंदा करने की कोशिश तो पूरी शिद्दत से करती ही है. फिल्म का टाइटल-डिजाईन हो, कहानी के जाने-पहचाने उतार-चढ़ाव हों, नायक के तौर-तरीके, सिस्टम के साथ उसकी उठा-पटक या फिर फिल्म के निर्माण में फरहान अख्तर (जावेद साब के बेटे) की बेहद ख़ास भूमिका; ‘रईस’ में कुछ भी इत्तेफ़ाक नहीं लगता. ‘रईस’ हिंदी फ़िल्म इतिहास के सबसे बाग़ी और जोशीले ’70 के दशक का जश्न कुछ इस ज़ोर-शोर से मनाती है, लगता है जैसे सिनेमा का मौजूदा पर्दा भी 70mm की तरह ही फैलने-खुलने लगा है.

दीवार’ अगर मुंबई अंडरवर्ल्ड के सबसे नामी तस्कर हाजी मस्तान की जिंदगी से अपनी कहानी चुनती है, तो ‘रईस’ गुजरात के अवैध शराब माफिया अब्दुल लतीफ़ के किस्सों के आस-पास ही अपनी जमीन तलाशती है. हालाँकि दोनों ही फिल्में विवादों से बचने के लिए ‘काल्पनिक’ होने की सुविधा का भरपूर लाभ उठाती हैं. गुजरात में शराब पर पाबन्दी है, और ‘पाबन्दी ही बग़ावत की शुरुआत होती है’. कोई धंधा छोटा नहीं होता और धंधे से बड़ा कोई धर्म नहीं. इसी फलसफे पर चलते-चलते, रईस हुसैन (शाहरुख़ खान) शराब की तस्करी के धंधे में आज सबसे बड़ा नाम है. कानून अब तक तो उसकी जेब में ही था, पर जब से ये कड़क और ईमानदार अफसर मजमूदार (नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी) आया है, माहौल में गर्मी थोड़ी बढ़ गयी है. मजमूदार रईस की गर्दन तक पहुँचने का कोई भी मौका छोड़ना नहीं चाहता, पर रईस हर बार अपने ‘बनिए के दिमाग और मियाँ भाई की डेरिंग’ के इस्तेमाल से बचता-बचाता आ रहा है. चूहे-बिल्ली की इस दौड़ में यूँ तो किसी की भी चाल, कोई भी दांव इतना रोमांचक नहीं होता कि आप जोश-ओ-ख़रोश में सीट से ही उछल पड़ें, पर दोनों किरदारों की कभी ढीली न पड़ने वाली अकड़, लाजवाब एक्शन और वजनदार संवादों के जरिये हर बार आपको लुभाती रहती है.

रईस’ का रेट्रो लुक फिल्म की साधारण कहानी पर किसी भी पल भारी पड़ता है. जमीन से उठकर अंडरवर्ल्ड सरगना बनने का सफ़र, और फिर गरीबों का मसीहा बनकर राजनीति में उतरने का दांव; फिल्म की कहानी में ऐसे उतार-चढ़ाव कम ही हैं, जो आपने देखे-सुने न हों. इतना ही नहीं, ठहरी हुई शुरुआत और सुलझे हुए अंत के दरमियान, फिल्म कुछ इस रफ़्तार से भागने लगती है कि आपके लिए ‘क्या छोड़ें-क्या पकड़ें’ वाली दुविधा पैदा हो जाती है. फिल्म ’70 के दशक में जाने के उतावलेपन में गुजरे ज़माने की खामियों को भी उसी बेसब्री से अपना लेती है, जितनी शिद्दत से उस दौर की काबिल-ऐ-तारीफ़ अच्छाइयां. नायिका (माहिरा खान) को बड़ी समझदारी और सहूलियत से कहानी में किसी खूबसूरत ‘प्रॉप’ की तरह लाया और ले जाया जाता है. गाने के दौरान ही शादियाँ हो जाती हैं, गाने के दौरान ही बच्चे भी और गानों की आड़ में ही दुश्मनों का सफाया!

‘स्टारडम’ के पीछे दुम हिलाती फिल्मों से हम कितने पक और थक गए हैं, इसकी सबसे ताज़ा मिसाल है ‘रईस’. भले ही औसत दर्जे की कहानी के साथ ही सही, पर परदे पर शाहरुख़ की शानदार शख्सियत को एक जानदार किरदार के तौर पर पेश करने की पहल भर से ही ‘रईस’ अपने नंबर बखूबी बटोर लेती है. पहले ‘फैन’, फिर ‘डियर जिंदगी’ और अब ‘रईस’; शाहरुख़ किसी नौसिखिये की तरह परदे पर अपनी एक बनी-बनाई ‘इमेज’ को तोड़ कर नये सांचे में ढलने की खूब कोशिश कर रहे हैं. ये आज के लिए भी अच्छा है और आने वाले कल के लिए भी. नवाज़ुद्दीन बेख़ौफ़ हवा की तरह हैं, बहते हैं तो देखते भी नहीं कि आगे कौन है, क्या है? परदे पर वो हीरो की तरह स्लो-मोशन में भले ही एंट्री न लेते हों, मार-धाड़ भी न के बराबर ही करते हैं, फिर भी तालियाँ उनके हिस्से में जैसे पहले से ही लिख-लिखा के आई हों. मोहम्मद जीशान अय्यूब पूरी मुस्तैदी से फिल्म के सबसे ठन्डे फ्रेम को भी अपनी अदाकारी से गर्म रखते हैं, चाहे फिर उनके पास देने को ‘रिएक्शन’ के चंद ‘एक्सप्रेशंस’ ही क्यूँ न हों.

आखिर में, राहुल ढोलकिया भले ही तमाम राजनीतिक सन्दर्भों (मुंबई ब्लास्ट, हिन्दू-मुस्लिम दंगे, गोधरा-कांड) को इशारों-इशारों में पिरो कर फिल्म को एक माकूल जमीन देने की कोशिश करते हों, ‘रईस’ रहती तो एक मसाला फिल्म ही है, जिसके लिये मनोरंजन का बहुत कुछ दारोमदार सत्तर के दशक के सिनेमा और नब्बे के दशक के शाहरुख़ पर टिका दिखाई देता है. अब इससे खतरनाक मेल और क्या होगा? [3/5] 

Friday, 21 August 2015

ALL IS WELL: All is rubbish. A total waste! [1/5]

Good news for all the complainants who don’t waste a chance to criticize Bollywood for being irrational, illogical and unreasonable! Here comes a film that does bother to give you enough reasons to explain what’s coming next and why it is there in the film! Even then the film in question ends up being a strong contender of ‘the silliest film of the year’ trophy, I don’t really wonder why. Picture this; an NRI [Abhishek Bachchan] stops at a roadside dhaba on Chandigarh-Solan highway to feed his family a good meal after a much hurried and hassled drive. The man at the counter is charging him some 5 thousand rupees for 4 people’s meal which is not even served or consumed yet. The poor guy doesn’t carry cash. To save him from the embarrassment, the local dancer [She was the reason for the hiked price] offers him a dance with her in exchange. What comes next is the item number by Sonakshi Sinha heavily supported by the Jr Bachchan. C’mon, even a Rakhi Sawant won’t do it for the said amount!

The problem with Umesh Shukla’s ALL IS WELL is its lazy ambition to become another Priyadarshan movie where cartoonish characters will do anything [banging head on the wall, rolling over one and other, slapping each other] to make you laugh and just laugh in every scene; the plot could anytime allow actors to participate in a nonsensical chase and then, end it all in a wedding-mandup where glycerin [the most-overrated chemical to make you look serious actor] will have a separate counter at the food-court. Though the story is not at all bad for a family entertainer, the emotions get silenced by the screeching dialogues and awful performances.

Bhajanlal Bhalla [Rishi Kapoor] runs a bakery that has hardly any incoming income to run the family. In fact, it is more of a bone of contention between him and his wife [Supriya Pathak Kapoor]. The son Inder [Abhishek Bachchan] fed up of the regular domestic verbal clash has moved abroad to make it big in his singing career. He’s back after some 10 years and the catch is the money he could get to finance his first album by selling the bakery. Sounds simple? Wait, we’ll make it as twisted as any Priyadarshan movie. Add a local slapstick gangster [Mohammad Zeeshan Ayyub] & cops will come by design, a secret box of good fortune to run after and a powerful lady with her army [Seema Pahwa with complementary Bugs Bunny teeth] will definitely be coming into scene and lastly, our heroine who’s all set to give her Shaadi a miss ‘cause she loves someone else. Enough to complicate!

For an Alzheimer patient, a doctor suggests, “Inko jitna khush rakh sakte ho, rakho!’ Isn’t it a ‘prescription for all’ statement? The female protagonist [Asin] believes in the signs from the universe so much that you would pick up an orange over an apple from the fruit basket and she might tell you she had saved it for her would-be-husband and now, you have to marry her. ALL IS WELL is full of such irritating, intimidating [to make you leave the theatre] and disgusting elements but what hurts you the most is watching talent like Supriya Pathak Kapoor being wasted utterly. Smriti Irani was cast in the same role earlier. I am not sure at what circumstances Supriyaji accepted the role but it is never to match her caliber. All the stars in the rating given to the film in this review must go to her as the compensatory allowance. Mohammad Zeeshan Ayyub is the only one who looks constantly trying to make it work. Rests all are either average or forgettable.

Overall, Umesh Shukla of OMG-OH! MY GOD fame fails miserably to impress. He was probably too confident to see the film’s flaws. With no offence or any disrespect to Alzheimer patients, I think sometimes you need a serious illness to forget something bad happened to you in life. ALL IS WELL takes you in that unfortunate mental zone. Save yourself, if you can! [1/5]  

Friday, 22 May 2015

TANU WEDS MANU RETURNS: Just for Laughs…and the ‘QUEEN’! [3.5/5]

A hushed & muted father in 40 years of marriage [K K Raina] is comforting his son [Madhavan] who’s on the edge of making the hardest decision to get out of his dysfunctional marriage; and you can clearly eavesdrop on the mother complaining hysterically about this late night discussion. Towards the end of the conversation, the agitated father gets up, picks up a floor-wiper and breaks the only lit tube light in the house. The marriages anywhere on earth can bring the same effect on any one who claims to be sane. But then, there is always a way to escape the complications. Paying no attention and enjoying your regular spell of drinking could be one, as suggested by the father in the film but divorce is just not so done. How can we not have Tanu and Manu in same frame if the film has already pictured them as a couple? We dare not.

Despite managing a wonderful plot for a sequel, TANU WEDS MANU RETURNS prefers to join the successful league of highly entertaining bollywood films that might go for a clumsy climax and a fake happy-ending just for the sake of audience’s approval. The best part is you have a pool of talents and the powerhouse herself at your side, Kangana Ranaut if you want to play straight; so definitely no one is gonna raise his eyebrows over this preferred choice of not going bold but staying regular.

Four years is a term looking too much to be in marriage for the temperamental Tanu [Kangana] and maddened Manu [Madhavan]. Their latest verbal spat has landed Manu in mental asylum and Tanu in killing loneliness. She returns to her zone, of ex-boyfriends, fewer limitations and an all flying high life with no strings attached. Manu meets a mirror image of Tanu and falls in love instantly. This new entrance [the overpowering double role of Kangana] is a Haryanvi athlete- a lot rough in her vocals but much more susceptible and sensitive within. Meanwhile, returns Pappi [Deepak Dobriyal]- the uproarious friend who never runs out of droll one-liners. Then, there is Raja Awasthy [Jimmy Shergil] adding the drama led by power, passion and attitude. Zeeshan Ayyub plays your regular mean and tricky one-sided lover who considers himself belonging to a certain ‘kandha’ type men known for offering their shoulders to broken girls to cry at.

TANU WEDS MANU RETURNS takes off from the base of its prequel and lands up in the territory of ‘RAANJHNAA’. Aanand L Rai being the powering team-lead and Himanshu Sharma the delectable writing force, it doesn’t fail as an experiment. Film guarantees uncontainable laughs especially in the first half before the ineptness in the screenplay starts bothering you soon. Be it the wedding-scene where Pappi kidnaps his ‘whats app’ female friend to marry just because she would reply on his even lamest jokes with ‘LOL’ text messages or where Swara Bhaskar sounds like she had done anything unethical in going medical way to conceive a child without telling her husband; the second half eventually becomes the rush-rush, hush-hush mission to meet the forged happy ending. When would we stop pretending that marriages are not done until the very last ‘phera’? When would we stop taking our climaxes to the ‘mundup’ at the very final moments?

Anyways, keeping my issues aside; it’s a film that establishes Kangana’s success in QUEEN wasn’t a fluke. She surfaces as a towering performer in both her roles. No matter what get up, what accent she’s into; Kangana is there to spellbind you. Her flawless performance gives you goose bump moments we rarely experience or expect from Bollywood films. Madhavan is equally competent. His charms never fade. His kind, compassionate and fragile Manu makes his own place in your hearts. The casting is superbly accomplished.

Overall, TANU WEDS MANU RETURNS is a film made for laughs! Frequent laughs! Fabulous laughs!! If only Aanand L Rai had not been so conservative about divorces, film would have been blessed with a much appreciative climax. Watch out for the ‘Queen’ whose vivacious presence alone makes every penny of yours a ‘worth it’ investment to gain super-sized entertainment! [3.5/5]

Friday, 18 October 2013

SHAHID: A strong evidential piece of cinema that enlightens! Strongly Recommended! [4.5/5]

I feel ashamed of myself for not knowing Shahid Azmi- a slain lawyer and an altruistic humane activist before Hansal Mehta came up with a strong evidential piece of cinema that does not merely solve the purpose to entertain but also dares to enlighten our unresponsive- unsympathetic minds confined into its own safe but scared place to stay put.  We probably have become either numb to whatever happens in our neighborhoods or blatantly reactive about just anything that comes in way without assessing what is right and what is not.

‘SHAHID’ is the need of the hour.  It demands and shows the guts to start a never-ending movement [if not on the roads, definitely in our heads] to bring change in the system by joining it and not wiping it out or denying its very existence.

Shahid [played by ‘Kai Po Che!’ fame Raj Kumar] could be anyone of thousands who gets trapped into the torturous custody of Indian Police known for its tactical power-driven machinery and is thrown into Jail for beholding a name that comes from a certain section of people in minority…but where the most would disappear in the galore to turn radical against country & its governing bodies, Shahid decides to stand out. While his tenure in longing to get set free, Shahid keeps his conscience alive and opts to be a helping hand for those who have nothing but an assurance of not being guilty.

SHAHID is an extraordinary effort in terms of writing and direction. Based on the real-life criminal lawyer-cum-human rights activist Shahid Azmi, film amalgamates facts and fiction beautifully. It is a biopic that is handled with sheer honesty, clarity in thoughts, rightly positioned screenplay, brilliance in execution and a very very significant memorandum to all human beings. Hansal Mehta never and never loses his grip on the subject. He keeps it as real as it is happening in a gully adjacent to my living place. Special mention to the replication of Indian courts’ undramatic-untheatrical-dreary modus operandi where there is no usual Bollywood ‘order-order’ but an actual exchange of verbal spats. Camera work by Anuj Dhawan captures the environs and the emotions equally good. Dialogues are crisp, colloquial and taut.

But what make it an exceptional biopic are the performances. Shahid’s fearless-in your face-uncomplicated character could never come so strong if Raj Kumar has not given it his flesh & blood. This man can make you laugh with his charmingly simplistic behavior [watch it when he is trying to be comfortable with his lady-love still unaware of his feelings] and also can make your heart bleed with his heartrending silence when attacked for his forgettable past. Extended applause for his bravura performance! Prabhleen Sandhu as his wife too is a gifted actor. She brings with herself an unpolished charm that hits every chord she aims to. Md. Zeeshan Ayyub here has not much like in RAANJHANAA to overwhelm you but still he keeps your expectations fulfilled. Kay Kay Menon and Tigmanshu Dhulia play their parts efficiently with a sparkling presence on screen.

After PAAN SINGH TOMAR, here comes an earnest biographical drama that I hope could change the way Indian Cinema thinks about our real life heroes. This is also a film that raises many a questions about humanity and its survival in today’s times. It also shows our judiciary system in true lights. As said in the film by the character Kay Kay Menon plays, “waqt lagta hai par ho jaata hai. It works.” Painfully correct!

On the whole, very few people dare to rise and take a stand to tell a story that might have been vanished from lives & in files if not attempted. Hansal Mehta joins the same league. Respect for giving us SHAHID- a film that will find a place close to your heart very easily but not without stirring-shaking & moving your soul. STRONGLY RECOMMENDED! [4.5/5]