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Friday, 4 May 2018

ओमार्ता (A): राजकुमार राव के अभिनय में एक और तमगा! [3.5/5]


सिनेमाई खलनायकों में अक्सर हमें मानवीय संवेदनाएं ढूँढने की आदत है. उनके अतीत में सेंध लगाकर जानने की कोशिश कि आखिर वो जैसे हैं, वैसे क्यूँ हैं? समाज या फिर सिस्टम से चोट खाए, बदले की आग में सब कुछ जला देने की सनक लिए ऐसे ढेर सारे एंटी-हीरोज को हमने सालों तक सर बिठाया है. और फिर आते हैं कुछ वो क्रूर, निर्दयी लेकिन रंग-बिरंगे, अजीब-ओ-गरीब खलनायक (मोगैम्बो, सर जूडा, शाकाल) जिनका पागलपन एकदम समझ से परे है. दुनिया पर कब्ज़ा करने की सनक में अंधे, अलग ही किस्म के हंसोड़ विलेन. हंसल मेहता की ओमार्ता का नायक भी खलनायक ही है, असल जिंदगी का है, पर इन दोनों किस्मों के खलनायकों से बिलकुल अलग. उसका अड्डा किसी काली पहाड़ी के पीछे की गुफा नहीं है. उसका पहनावा किसी सर्कस के रिंगमास्टर की याद नहीं दिलाता. किसी ने उसके माँ-बाप की हत्या बचपन में उसकी आँखों के सामने नहीं की थी. उसकी जमीन भी किसी साहूकार के हाथों बंधक नहीं पड़ी. पर फिर भी उसकी सनक, उसका पागलपन, उसका शैतानी दिमाग आपकी हड्डियों तक को कंपा देने में कहीं से भी कम नहीं पड़ता.

पुरानी दिल्ली के एक छोटे से मकान में 4 विदेशियों को बंधक रखा गया है. पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश आतंकवादी अहमद उमर सईद शेख़ (राजकुमार राव) का शायद पहला ही मिशन है ये. उमर पकड़ा जाता है. बोस्निया में उसके अपने भाइयों पर हो रहे ज़ुल्म के चलते उसने अपने लिए ज़ेहाद का रास्ता चुना है. उसे छुडाने के लिए कंधहार में इंडियन एयरलाइन्स का जहाज़ तक अगवा कर लिया गया है. ये उमर ही है, जिसके तार आगे चलकर अमेरिका में 9/11 अटैक और वॉल स्ट्रीट जर्नल के पत्रकार डेनियल पर्ल की निर्मम हत्या से जुड़े. मुंबई में 26/11 हमले के वक़्त, इसी शैतानी दिमाग ने भारत और पाकिस्तान को अलग-अलग फ़ोन करके युद्ध की स्थिति तक ला खड़ा किया था. धार्मिक उन्माद किस तरह पढ़े-लिखे जहीन दिमाग नौजवानों को हैवानियत की हद तक ला फेंकता है, ओमार्ता इसका बेहद करीबी और एकदम सटीक तस्वीर पेश करती है. वो भी असलियत के एकदम आसपास रहते हुए.

किसी खोजी रिपोर्ट या काबिल डाक्यूमेंट्री ड्रामा की तर्ज़ पर बनी ओमार्ता एक डार्क क्राइम थ्रिलर है, जहां निर्देशक हंसल मेहता आपके रोंगटे खड़े करने के लिए अख़बारों की असल सुर्ख़ियों, समाचारों के फुटेज और रूह कंपा देने वाली भयावह तस्वीरों का बेझिझक और बेख़ौफ़ इस्तेमाल करते हैं. ये तब और भी जरूरी लगने लगता है, जब हंसल उमर सईद शेख़ के आतंकवादी बनने की तरफ बढ़ने की आग को किसी और इमोशनल ईंधन से भड़काने की कोई होशियारी नहीं दिखाते, और तब भी जब उसके वहशियाना शख्सीयत को उधेड़ कर सामने रख देना चाहते हैं. अनुज राकेश धवन की बाकमाल सिनेमेटोग्राफी के साथ, हंसल फिल्म के दृश्यों को पूरी तरह आप पर ज़ाहिर होने देने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाते. यहाँ तक कि फिल्म के सबसे नाटकीय दृश्य (डेनियल पर्ल की हत्या) में भी आपको सब कुछ होते हुए साफ़-साफ़ नहीं दिखता, कैमरा उमर के चेहरे तक ही सीमित रहता है, पर घृणा, डर और दर्द से आपका दिल बैठा देने में नाकाम नहीं होता. इससे भयावह कुछ हिंदी सिनेमा में कम ही देखा है मैंने.

ओमार्ता राजकुमार राव के कद्दावर अभिनय में एक और तमगा है. जिस ख़ामोशी और ठहराव से वो उमर के किरदार में दाखिल होते हैं, और फिर वक़्त-बेवक्त उसके गुस्से, उसकी सनक और उसकी नफरत को बराबर मात्रा में नाप-जोख के परदे पर निकालते हैं, देखने लायक है. चेहरे पर कोई पछतावा नहीं, दिल में कोई मलाल नहीं, और वो हलकी सी शैतानी मुस्कराहट (रावण का अट्टहास नहीं); राजकुमार राव का यह किरदार हालिया खलनायकों की लिस्ट में बड़ी आसानी से, बहुत वक़्त तक याद रखा जाने लायक है. अगर याद हो, शाहिद में हंसल ने जेल के दृश्य में शाहिद आज़मी (राजकुमार राव) की मुलाक़ात कुछेक दृश्यों में उमर सईद शेख़ (तब, प्रबल पंजाबी) से कराई थी. अपने भाइयों पर हो रहे जुल्म से लड़ने के लिए दोनों अलग-अलग रास्ते चुनते हैं. इसे महज़ एक रोचक तत्थ्य मानने से हटकर देखें, तो हंसल इस तरह इस्लामिक आतंकवाद और धार्मिक भेदभाव के सन्दर्भ में अपना घेरा पूरा कर लेते हैं.  
             
हम अल्लाह के बन्दे हैं’, अल्लाह हमारे साथ है’, जैसे घिसे-पिटे संवादों से भरे दो-चार मौलानाओं की दकियानूसी और फ़िल्मी बर्गालाहट भरे दृश्यों को नज़रंदाज़ कर दें, तो किसी आतंकवादी की एकलौती बायोपिक होने के साथ-साथ ओमार्ता एक जरूरी और बेहद मुश्किल फिल्म है, देखने के लिए भी और बनाने के तौर पर भी. फिल्म किसी तरह का कोई सन्देश देने की या फिर एक मुकम्मल अंत देने की जिद से बचती है, इसलिए और भी सच्ची लगती है. [3.5/5]

Friday, 15 September 2017

सिमरन: ए-ग्रेड कंगना, बी-ग्रेड क्राइम-कॉमेडी! [2/5]

आज़ाद ख़याल लड़कियां, जिन्हें अपनी ख़ामियों पर मातम मनाना तनिक रास नहीं आता, बल्कि उन्हीं कमजोरियों, उन्हीं गलतियों को बड़े ताव से लाल गाढ़े रंग की लिपस्टिक के साथ चेहरे पर तमगों की तरह जड़ लेती हैं; बॉलीवुड में कम ही पायी जाती हैं. कंगना फिल्म-दर-फिल्म परदे पर ऐसे कुछ बेहद ख़ास बेबाक और तेज़-तर्रार किरदारों को जिंदा करती आई हैं. 'क्वीन' की रानी जहां एक पल अपने बॉयफ्रेंड से शादी न तोड़ने के लिये मिन्नतें करती नज़र आती है, अगले ही पल अकेले हनीमून पर जाने का माद्दा भी खूब दिखाती है. तनु अपने पति से पीछा छुड़ाने के लिए उसे पागलखाने तक छोड़ आती है, और फिर वो उसकी कभी ख़त्म न होने वाली उलझन जो बार-बार उसे और दर्शकों को शादी के मंडप पहुँचने तक उलझाए रखती है. 'सिमरन' में भी कंगना का किरदार इतना ही ख़ामियों से भरा हुआ, उलझा और ढीठ है, पर अफ़सोस फिल्म का बेढंगापन, इस किरदार और इस किरदार के तौर पर कंगना के अभिनय को पूरी तरह सही साबित नहीं कर पाता. 'सिमरन' आपका मनोरंजन किसी बी-ग्रेड क्राइम-कॉमेडी से ज्यादा नहीं कर पाती, अगर कंगना फिल्म में नहीं होती.

तलाक़शुदा प्रफुल्ल पटेल (कंगना रनौत) अटलांटा, अमेरिका के एक होटल में 'हाउसकीपिंग' का काम करती है. पैसे जोड़ रही है ताकि अपना खुद का घर खरीद सके. बाप घर पर बिजली का बिल लेकर इंतज़ार कर रहा है, कि बेटी आये तो बिल भरे. प्रफुल्ल भी जहां एक तरफ एक-एक डॉलर खर्च करने में मरी जाती है, अचानक एक घटनाक्रम में, जुए में पहले-पहल दो हज़ार डॉलर जीतने और फिर एक ही झटके में अपनी सारी बचत गंवाने के बाद, अब 50 हज़ार डॉलर का क़र्ज़ लेकर घूम रही है. बुरे लोग उसके पीछे हैं, और क़र्ज़ उतारने के लिए प्रफुल्ल अब अमेरिका के छोटे-छोटे बैंक लूट रही है. 

'सिमरन' भारतीय मूल की एक लड़की संदीप कौर की असली कहानी पर आधारित है, जो अमेरिका में 'बॉम्बशेल बैंडिट' के नाम से कुख्यात थी, और अब भी जेल में सज़ा काट रही है. परदे पर ये पूरी कहानी दर्शकों के मज़े के लिए कॉमेडी के तौर पर पेश की जाती है. हालाँकि प्रफुल्ल का किरदार वक़्त-बेवक्त आपके साथ भावनात्मक लगाव पैदा करने की बेहद कोशिश करता है, पर फिल्म की सीधी-सपाट कहानी और खराब स्क्रीनप्ले ऐसा कम ही होने दे पाता है. प्रफुल्ल नहीं चाहती कि उसकी जिंदगी में किसी का भी दखल हो, उसके माँ-बाप का भी नहीं, पर वो बार-बार अपने इर्द-गिर्द दूसरों के बारे में राय बनाने की कोई कसर नहीं छोड़ती. मुसीबतें उसके सर महज़ किसी हादसे की तरह नहीं पड़तीं, बल्कि साफ़-साफ़ उसकी अपनी बेवकूफ़ियों और गलतियों का नतीजा लगती हैं. जुए में हारने के बाद 'तुम सब स्साले चोर हो' की दहाड़े सुनकर आपको 'क्वीन' की 'मेरा तो इतना लाइफ खराब हो गया' भले याद आ जाता हो, पर आपका दिल प्रफुल्ल के लिए तनिक भी पसीजता नहीं. 

फिल्म जिन हिस्सों में प्रफुल्ल के अपने पिता के साथ संबंधों पर रौशनी डालती है, देखने लायक हैं. पैसे की जरूरत है तो पिता पर लाड बरसा रही है, वरना दोनों एक-दूसरे को जम के कोसते रहते हैं. समीर (सोहम शाह) का सुलझा, समझदार और संजीदा किरदार फिल्म को जैसे हर बार एक संतुलन देकर जाता है, वरना तो प्रफुल्ल की 'आजादियों' का तमाशा देखते-देखते आप जल्द ही ऊब जाते. अच्छे संवादों की कमी नहीं है फिल्म में, फिर भी हंसाने की कोशिश में फिल्म हर बार नाकाम साबित होती है. प्रफुल्ल का बैंक लूटने और लुटते वक़्त लोगों की प्रतिक्रिया हर बार एक सी ही होती है. इतनी वाहियात बैंक-डकैती हिंदी फिल्म में भी बहुत कम देखने को मिलती है. अंत तक आते-आते फिल्म किरदार से भटककर फ़िल्मी होने के सारे धर्म एक साथ निभा जाती है. 

आखिर में, हंसल मेहता की 'सिमरन' एक अच्छी फिल्म हो सकती थी, अगर संदीप कौर की बायोपिक के तौर पर, 'अलीगढ़' की तरह समझदारी और ईमानदारी से बनाई गयी होती; न कि महज़ मनोरंजन और बॉक्स-ऑफिस हिट की फ़िराक में कंगना रनौत के अभिनय को सजाने-संवारने और भरपूर इस्तेमाल करने की चालाकी से. फिल्म अपने एक अलग रास्ते पर लुढ़कती रहती है, और कंगना का अभिनय कहानी, किरदार और घटनाओं से अलग अपने एक अलग रास्ते पर. काश आप इनमें से किसी एक रास्ते पर चलना ही मंजूर कर पाते, मगर ये सुविधा आपको उपलब्ध नहीं है, तो झटके खाते रहिये! [2/5]

Friday, 26 February 2016

अलीगढ़ (A): अब नहीं तो कब? [3.5/5]

दो-चार-दस गिनती की फिल्में को छोड़ दें तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने समलैंगिकों और समलैंगिकता को जिस बेरुखी, जिस छिछले तरीके से परदे पर अपने मतलब (...और भौंडे मनोरंजन) के लिए इस्तेमाल किया है, उसे साफ़ और पाक करने के लिए कोई एक फिल्म काफी साबित नहीं हो सकती, ये एक शर्मनाक सच है...पर इसी के साथ एक सच और भी है, कोशिशों ने हौसलों का दामन अभी छोड़ा नहीं है. हंसल मेहता की बेहद सुलझी हुई, संजीदगी और सादगी से भरी हुई ईमानदार फिल्म ‘अलीगढ़’ ऐसी ही एक बेहतरीन कोशिश है, जो समलैंगिकता को सनसनीखेज बनाकर परोसने की बेहयाई नहीं करती बल्कि उसे ‘निजता के अधिकार’ के साथ मिलाकर एक ऐसा मुहीम छेड़ देती है जिससे बचना-मुंह मोड़ना और अनदेखा कर देना किसी भी संवेदनशील आदमी के लिए आसान नहीं रह जाता!

प्रोफेसर सिरास [परदे पर मनोज वाजपेयी] अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में मराठी पढ़ाते हैं. तलाकशुदा हैं, सो अपने छोटे से कमरे में अकेले रहते हैं. अकेलेपन के दर्द से जूझते प्रोफेसर सिरास को लता मंगेशकर का ‘आपकी नज़रों ने समझा’ सुनना और सुनते-गुनगुनाते व्हिस्की के हलके-हलके घूंट गले से उतारना अच्छा लगता है. उनकी खाली शामें अक्सर ऐसे ही गुजरती हैं, बंद कमरे में! ऐसी ही एक रात अचानक कुछ रिपोर्टर उनके घर में घुस कर उन्हें एक दूसरे आदमी के साथ अन्तरंग स्थिति में होते हुए कैमरे में कैद कर लेते हैं. उनके साथ मारपीट भी होती है पर कड़ी मुश्किलें तब शुरू होती हैं जब समाज उन्हें इस पूरे वाकये के बाद एक अलग संकीर्ण नजरिये से देखना शुरू कर देता है. यूनिवर्सिटी से उन्हें ‘नैतिकता’ की दुहाई देकर निकाल दिया जाता है. इन सबके बावजूद प्रोफेसर लगातार हालातों से समझौते करने में जुटे रहते हैं. आखिरकार, उनकी ख़ामोशी को आवाज़ देता है एक नौजवान रिपोर्टर दीपू [राजकुमार राव] और तब, प्रोफेसर सिरास अपने अधिकारों, अपने सम्मान की लड़ाई के लिए खुल कर सामने आते हैं.

सच्ची घटनाओं से प्रेरित ‘अलीगढ़’ आपको बड़े धीरे-धीरे प्रोफेसर सिरास के करीब ले जाती है, जहां उनकी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से अलग एक ऐसा मासूम किरदार आपके सामने आ खड़ा होता है जो बड़ी समझदारी से प्यार को समझता है और उतनी ही सरलता से समझाता भी है. जैसे-जैसे आप प्रोफेसर को जानने लगते हैं, उनका समलैंगिक होना आपके जेहन से दूरी बनाने लगता है. उनकी कविताओं में आप प्रेम की नई परिभाषाएं तलाशने लगते हैं. उनकी आँखों का खालीपन धीरे-धीरे आपके दिल को कचोटने लगता है, और ये सब अगर मुमकिन होता है तो उसके पीछे है अपूर्व असरानी की दिल छू लेने वाली कहानी और मनोज बाजपेयी का शानदार अभिनय. मनोज का अभिनय बोलने से ज्यादा कहने में यकीन रखता है. प्रोफेसर सिरास को वो जिस संजीदगी से और नजाकत से दर्शकों तक पहुंचाते हैं, एक वक़्त आता है जब आप दोनों को [मनोज और प्रोफेसर सिरास] अलग-अलग करके देखना भूल ही जाते हैं. अदालत की उबाऊ कार्यवाई में बोर होते हुए, ‘हैंडसम’ बोलने पर शर्माते हुए, ‘आपकी नज़रों ने समझा’ गुनगुनाते वक़्त लय छोड़ते-तोड़ते हुए और संगम पर दीपू के साथ खिलते-मुस्कुराते हुए; मनोज एक ऐसी छाप छोड़ जाते हैं जो आपको बार-बार अभिनय में उनके कद की याद दिलाता रहेगा. सधे और नपे-तुले अभिनय से, राजकुमार राव अपने किरदार के साथ बड़ी मजबूती से खड़े दिखाई पड़ते हैं और फिल्म को आगे ले जाने में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ते.

इतने सब के बावजूद, ‘अलीगढ़’ में अगर (मुझे) थोड़ी बहुत शिकायत रह जाती है, तो वो है इसका ‘शाहिद’ की तरह का धारदार न होना. ‘अलीगढ़’ आपको सोचने पर मजबूर तो करती है, आपको प्रोफेसर सिरास की शख्सियत से बखूबी रूबरू भी कराती है पर पूरी तरह झकझोर देने में कहीं न कहीं कमज़ोर रह जाती है. फिल्म में दीपू सेबास्टियन का प्रेम-प्रसंग भी फिल्म में किसी तरह का कुछ ठोस, जरूरी और जायज़ इज़ाफा नहीं करता. पर इन चंद शिकायतों से परे, हंसल मेहता की ‘अलीगढ़’ एक बेहद जरूरी फिल्म है जो समलैंगिकता को कठघरे में खड़ा नहीं करती बल्कि उसे आपके ड्राइंग रूम में जगह देती है, आपकी बातचीत का हिस्सा बनती है और बेहतर समाज की तरफ एक अहम कदम बढ़ाती है. आखिर अब नहीं तो कब? जरूर देखिये! [3.5/5]

Friday, 30 May 2014

CITYLIGHTS: Tragic tale of shattered dreams…and viewer’s disappointment! [2.5/5]

Remakes are not alien to the ‘Bhatt’ camp but when this giant movie production company selected one small but beautiful British indie film ‘METRO MANILA’ to bring on the table and later on, decided to rope in Hansal Mehta & Rajkumar Rao of last year’s most confident social-biographical film SHAHID to helm the responsibility to recreate; it looked like another feather in the hat and a sure-shot winner all the way. But Bollywood never ceases to surprise; or to disappoint in this case.

CITYLIGHTS sadly remains an average thriller with some promising scenes that make your heart bleed in depression, bloom in well-captured moments of togetherness and a savior in competent shoes of Rajkumar Rao- one of the few best things about the film.

After losing his shop in local market to the loan sharks, Deepak Singh [Rajkumar Rao] with his family is forced to migrate from Rajasthan to the city of dreams Mumbai. The search for a better lifestyle and a good prospect of earning his livelihood soon throw them in the gloomy, dark and depressing world of reality. Poverty is the biggest curse one carries and one should get it off the shoulder by any means and with all the efforts; guides his colleague at work [Maanav Kaul in a terrific presence] in a security agency. Together they seek the impossible looking road to redemption.

A tragic tale of dreams getting shattered and compromises taking over the hopes, CITYLIGHTS officially borrows the plot and the screenplay for the most parts from METRO MANILA. Kudos to the makers for giving the due credit in the said department upfront, loud & clear! This is something you don’t see often from the ‘Bhatts’. Even then, though Hansal Mehta does leave his mark in adopting it according to the Indian sensibilities and emotional connectivity in a complete manner, he certainly couldn’t refrain himself from falling into a much-comforted zone filled with standard ingredients for a Bollywood film. The songs that keep coming in chunks and bits, the gratuitously put love-making scenes with ongoing smooches as if we were in another ‘Bhatt-Emran Hashmi’ association and a completely messy-clumsy climax scene are enough to ruin the possibilities of coming up with a deserving descendant of SHAHID.

On the positive side, it is only and only the performances that stand out at a respectable position. Rajkumar Rao is in top form. He successfully inherits the mannerism, dialect and the vulnerability of a small town simpleton. His presence on screen alone is very fulfilling. Patralekha as his wife shines in her début role. This plain Jane has the sparks of a confident performer. The veteran theatre icon Maanav Kaul is a pleasant addition to the cast. A flawless performance is something he would never miss to deliver. Special mention to Rashmi Singh for her contribution in the consequential lyrics that gel well with the emotions characters carry on screen.

SHAHID being the benchmark for Mehta, CITYLIGHTS fails to triumph over the expectations one would have. A less honest effort to bring out deeply depressing reality of today’s times! Glimpse can be seen but is it good enough to even compromise? I won’t, may be because I have seen the original. Disappointed! [2.5/5]

Friday, 18 October 2013

SHAHID: A strong evidential piece of cinema that enlightens! Strongly Recommended! [4.5/5]

I feel ashamed of myself for not knowing Shahid Azmi- a slain lawyer and an altruistic humane activist before Hansal Mehta came up with a strong evidential piece of cinema that does not merely solve the purpose to entertain but also dares to enlighten our unresponsive- unsympathetic minds confined into its own safe but scared place to stay put.  We probably have become either numb to whatever happens in our neighborhoods or blatantly reactive about just anything that comes in way without assessing what is right and what is not.

‘SHAHID’ is the need of the hour.  It demands and shows the guts to start a never-ending movement [if not on the roads, definitely in our heads] to bring change in the system by joining it and not wiping it out or denying its very existence.

Shahid [played by ‘Kai Po Che!’ fame Raj Kumar] could be anyone of thousands who gets trapped into the torturous custody of Indian Police known for its tactical power-driven machinery and is thrown into Jail for beholding a name that comes from a certain section of people in minority…but where the most would disappear in the galore to turn radical against country & its governing bodies, Shahid decides to stand out. While his tenure in longing to get set free, Shahid keeps his conscience alive and opts to be a helping hand for those who have nothing but an assurance of not being guilty.

SHAHID is an extraordinary effort in terms of writing and direction. Based on the real-life criminal lawyer-cum-human rights activist Shahid Azmi, film amalgamates facts and fiction beautifully. It is a biopic that is handled with sheer honesty, clarity in thoughts, rightly positioned screenplay, brilliance in execution and a very very significant memorandum to all human beings. Hansal Mehta never and never loses his grip on the subject. He keeps it as real as it is happening in a gully adjacent to my living place. Special mention to the replication of Indian courts’ undramatic-untheatrical-dreary modus operandi where there is no usual Bollywood ‘order-order’ but an actual exchange of verbal spats. Camera work by Anuj Dhawan captures the environs and the emotions equally good. Dialogues are crisp, colloquial and taut.

But what make it an exceptional biopic are the performances. Shahid’s fearless-in your face-uncomplicated character could never come so strong if Raj Kumar has not given it his flesh & blood. This man can make you laugh with his charmingly simplistic behavior [watch it when he is trying to be comfortable with his lady-love still unaware of his feelings] and also can make your heart bleed with his heartrending silence when attacked for his forgettable past. Extended applause for his bravura performance! Prabhleen Sandhu as his wife too is a gifted actor. She brings with herself an unpolished charm that hits every chord she aims to. Md. Zeeshan Ayyub here has not much like in RAANJHANAA to overwhelm you but still he keeps your expectations fulfilled. Kay Kay Menon and Tigmanshu Dhulia play their parts efficiently with a sparkling presence on screen.

After PAAN SINGH TOMAR, here comes an earnest biographical drama that I hope could change the way Indian Cinema thinks about our real life heroes. This is also a film that raises many a questions about humanity and its survival in today’s times. It also shows our judiciary system in true lights. As said in the film by the character Kay Kay Menon plays, “waqt lagta hai par ho jaata hai. It works.” Painfully correct!

On the whole, very few people dare to rise and take a stand to tell a story that might have been vanished from lives & in files if not attempted. Hansal Mehta joins the same league. Respect for giving us SHAHID- a film that will find a place close to your heart very easily but not without stirring-shaking & moving your soul. STRONGLY RECOMMENDED! [4.5/5]