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Friday, 1 March 2019

सोनचिड़िया : मुक्ति के प्यासे, बीहड़ के पंछी! (3.5/5)


बीहड़ के बाग़ियों की सारी लड़ाईयां सरकारी फौज़ और जातियों में बंटे अलग-अलग गैंगों तक ही सीमित नहीं है. कुछ मुठभेड़ अंदरूनी भी हैं. खुद से खुद की लड़ाई. जिन बाग़ियों की बन्दूक दूसरी बार सवाल पूछने पर गोलियों से जवाब देना पसंद करती है, अब बार-बार खुद ही सवाल पूछने लगी है. ‘बाग़ी का धर्म क्या है?’. जवाब भी सबके अपने अपने हैं, कुछ अभी भी तलाश रहे हैं. आम तौर पर हिंदी फिल्मों में चम्बल के डाकू या तो खूंखार लुटेरे होते हैं, या सामाजिक अन्याय और सरकारी दमन से पीड़ित कमज़ोर नायकों के विरोध का प्रखर स्वर बनने की एक प्रयोगशाला. ‘बैंडिट क्वीन’ और ‘पान सिंह तोमर’ इसी खांचे-सांचे की फिल्में होते हुए भी उत्कृष्ट अपवाद हैं. अभिषेक चौबे की ‘सोनचिड़िया’ थोड़ी और गहरे उतरती है. ज़मीनी किरदारों के ज़ेहन तक पैठ बनाने वाली, बदले-छलावे, न्याय-अन्याय, सही-गलत, जाति-पांति और आदमी-औरत के भेदों के साथ-साथ मोक्ष, मुक्ति और पछतावे का पीछा करती फिल्म. 1972 में आई प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘समाधि’ के पहले हिस्से जैसा कुछ.

मान सिंह (मनोज बाजपेई) के कंधे झुकने लगे हैं. बढ़ती उम्र की वजह से नहीं, कंधे पर हर वक़्त टंगी दोनाली की वजह से नहीं, बल्कि कुछ है जो अतीत से बार बार बाहर निकल कर दबोच लेता है. गैंग के एक दूसरे नौजवान सदस्य लाखन सिंह (सुशांत सिंह राजपूत) को भी उस 5 साल की लड़की की चीख आज भी डराती रहती है, जो मान सिंह और लाखन के कुकर्मों की इकलौती चश्मदीद रही थी. दोनों अब मोक्ष और मुक्ति की तलाश में हैं, और दारोगा गुर्जर (आशुतोष राणा) इन्हें मौत तक पहुंचाने के फ़िराक में. गैंग धीरे-धीरे ख़तम हो रहा है. रेडियो पर इंदिरा गांधी के आपातकाल की घोषणा हो चुकी है. साथियों में ‘सरेंडर’ की भी सुगबुगाहट चल रही है. एक बाग़ी की चिंता है कि सरेंडर के बाद जेल में ‘मटन’ मिलेगा या नहीं? ऐसे में, इंदुमती तोमर (भूमि पेडणेकर) और आ टकराती है अपनी ‘सोनचिरैय्या’ को साथ लिए. साथी बाग़ी वकील सिंह (रनवीर शौरी) की मर्ज़ी के खिलाफ, लाखन के लिए यही सोनचिरैय्या (यौनशोषण की शिकार एक बच्ची) उसके अतीत के दाग को पश्चाताप की आग में तपाने का जरिया दिखने लगती है.

‘सोनचिड़िया’ में अभिषेक चौबे चम्बल को दिखाने के लिए जिस चश्मे का इस्तेमाल करते हैं, वो बेहद जाना-पहचाना है. शेखर कपूर वाला. हालाँकि अपने कथानक में वो जिस तरह डार्कनेस ले आते हैं, और रूखे-रूखे व्यंगों का प्रयोग करते हैं, वो उनका अपना ही ट्रेडमार्क है. फिल्म की शुरुआत आपको अंत का आभास कराती है. एक ऐसी शुरुआत जहां सब कुछ ख़तम हो रहा है. मानसिंह का गैंग अपना अच्छा खासा नाम कमा चुका है. खौफ़ के लिए उसे सिर्फ लाउडस्पीकर पर मुनादी ही करनी पड़ती है, गोलियों की बौछार नहीं. शादी लूटने पहुंचे डाकू दुल्हन को 101 रूपये का शगुन दे रहे हैं. नए हथियारों की जरूरत तो है, पर गैंग के पास पैसे ही नहीं हैं. गोली लगती है, तो मानसिंह हँसता है, “सरकार की गोली से कबहूँ कोऊ मरे है? अरे इनके तो वादन से मर जात है लोग.’. दारोगा गुर्जर जाति का है, और उसके नीचे काम करने वाले चाचा-भतीजा ठाकुर जाति के. चाचा (हरीश खन्ना) की समझ पुख्ता है. वर्दी से बड़ी है चमड़ी. चमड़ी पे कोई स्टार नहीं लगे होते, जैसी जिसको मिल गयी, मिल गयी. एक दृश्य में एक महिला बाग़ी का दर्द सामने निकल रहा है. ‘ठाकुर, बाभन मर्दों में होते हैं, औरतों की जात अलग ही होती है’. झूठ नहीं है, तभी तो 12-14 साल का बेटा बंदूक टाँगे माँ को खोज कर मारने के लिए डकैतों के बीच घूम रहा है. खुद में बाप से ज्यादा मर्दानगी महसूस करता है.

‘सोनचिड़िया’ एक डकैतों की फिल्म लगने के तौर पर आम दर्शकों में जितनी भी उम्मीदें जगाती है, सब पर तो खरी नहीं उतरती. मसलन, फिल्म का एक्शन मसालेदार होने का बिलकुल दावा नहीं करता, हालाँकि सच्चाई से दूर भी नहीं जाता. हट्टे-कट्टे 6 फुटिया पहलवान को दबोचने में 3-3 डाकू हांफने लगते हैं. फिल्म की रफ़्तार धीमी लगती है. गीत-संगीत भी किरदारों के मूड से ज्यादा बीहड़ की बड़ाई में रचे-बसे हैं. इतने सब के बावजूद, सिनेमा की नज़र से फिल्म किसी मास्टरक्लास से कम नहीं. स्क्रीनप्ले में अभिषेक की बारीकियां, खालिस बुन्देलखंडी बोली के संवाद, बेहतरीन कैमरावर्क और कलाकारों का शानदार अभिनय; ‘सोनचिड़िया’ डकैतों की फिल्म होने से कहीं ज्यादा कुछ है. मनोज बाजपेई कमाल हैं. ढलती उम्र को जिस तरह मनोज अपने किरदार में ढाल कर पेश करते हैं, आप उन्हें खलनायक से अलग, इंसानी तौर पर देखने से नहीं रोक पाते. सुशांत बिलकुल घुलमिल जाते हैं. उनकी पहली फिल्म होती तो शायद आप उन्हें ‘एनएसडी के लौंडों’ से अलग नहीं समझते! रनवीर शौरी फिर एक बार जता जाते हैं कि बॉलीवुड उन्हें कितना कमतर आंकता है? आशुतोष राणा अपने पुराने अवतार में हैं. उनकी कन्चई आँखें अब भी अपनी कुटिलता से आपके अन्दर सिहरन पैदा करने में कामयाब रहती हैं, इतने सालों बाद भी. भूमि गिनती के दृश्यों में ही आगे आती हैं, और उनमें सटीक हैं.  

आखिर में, ‘सोनचिड़िया’ चम्बल की घाटियों और रेतीली पहाड़ियों में आम से दिखने वाले डकैतों का एक नया सच है, जहां सब अपनी अपनी मुक्ति का मार्ग ढूंढ रहे हैं. जाति, धर्म, समाज और सरकार से लड़ते-लड़ते एक बड़े अंत की तलाश में भटकते कुछ ऐसे बाग़ी, जिनकी जिंदगियों के मायने और मकसद एक बड़ा मतलब लिए हुए हैं. [3.5/5]      

Friday, 30 March 2018

बाग़ी 2: एक्शन तो है, पर एक्टिंग? लॉजिक? सिनेमा? [1/5]

‘बाग़ी 2’ देखना ढाई घंटे ज़िम में बिताने जितना ही तकलीफ़देह है. फायदेमंद इसलिए नहीं बोलूँगा क्यूंकि आप खुद कोई कसरत, कोई मेहनत नहीं कर रहे और बैठे-बैठे सिर्फ कुछ मुस्टंडों, कुछ बॉडी बिल्डर्स (और एक नाम भर के टाइगर) को गुर्राते, गरजते और चीखते-चिल्लाते हुए ऐसा करते देख रहे हैं. अब आप कितनी देर तक इन्हें निहार सकते हैं, आपकी अपनी बौद्धिक क्षमता, सहनशीलता और आपकी अपनी दिलचस्पी पर निर्भर करता है. और अगर आप ज़िम के साथ फिल्म की मेरी इस समानता को सही-सही समझ पायें, तो फिल्म और फिल्म के किरदारों से किस तरह की और कितनी उम्मीद करनी है, आपके लिए बेहद आसान हो सकता है. अपने मुख्य किरदार को परदे पर पेश करने के लिए फिल्म कश्मीर के हालिया ‘जीप के आगे पत्थरबाज़ को बाँध के घुमाने’ वाली घटना का ना सिर्फ सहारा लेती है, बल्कि उसे बड़ी बेशर्मी से उचित ठहराने का भी पूरा स्वांग रच देती है.

नायक नायक है और ऊपर से भारतीय फौज़ का सिपाही, इसलिए उसकी देशभक्ति बार-बार परदे पर कुछ इस तरह ज़ाहिर की जाती है, जैसे आप बीमार हों और देशभक्ति का ये इंजेक्शन ही आपको बचा सकता है. वरना कौन सवाल करे, जब एक फौज़ी पूरे के पूरे पुलिस स्टेशन को ही नाकारा घोषित कर के हवलदार से लेकर थानेदार तक सबकी मरम्मत कर रहा हो. आप को तो सिर्फ उसके चेहरे पर सेना का मुखौटा और उसकी लात से टूटते हुए टेबल से गिरते हुए तिरंगे को स्लो-मोशन में बचाना ही दिख रहा है. कानून का टूटना और संविधान का गिरना तो आप देख ही नहीं पाए. खैर, ये तो नींव रखने वाली बात है. दरअसल आपको तैयार किया जा रहा है, फिल्म के आखिरी क्षणों में सवाल न पूछ कर चुपचाप नायक के शानदार दिखने वाले वाहियात स्टंट्स पर मंत्रमुग्ध होने के लिए. सवाल पूछने का हक अब आप खो चुके हैं. ‘तब कहाँ थे?’ वाले झांसे में फँस चुके हैं.

‘बाग़ी 2’ में कहानी किसकी है? पता नहीं चलता (या शायद मैंने ही मिस कर दिया हो), पर ‘स्टोरी अडॉप्टेशन’ का श्रेय लेने में फिल्म के निर्माता साजिद नाडियादवाला कोई झिझक नहीं दिखाते. फिल्म पूरी तरह तेलुगु फ़िल्म ‘क्षणम’ से ली हुई है. ली हुई इसलिए क्यूंकि इसके ‘ऑफिशियल रीमेक’ होने का ज़िक्र अभी तक कम से कम मैंने तो कहीं किसी से नहीं सुना. बॉर्डर पर लड़ रहे रणवीर प्रताप सिंह उर्फ़ रॉनी (टाइगर श्रॉफ) को 4 साल बाद उसकी एक्स-गर्लफ्रेंड नेहा (दिशा पटनी) का फ़ोन आता है. उसकी बेटी रिया 2 महीने से अगवा है. रॉनी उसकी मदद के लिए गोवा की स्थानीय पुलिस से लेकर वहाँ के ड्रग-माफिया से अकेला लड़ रहा है. हालाँकि पत्थरबाज़ को जीप से बाँधने से ज्यादा उसके खोजी या जासूसी दिमाग की कोई उपलब्धि आपने देखी नहीं है, फिर भी गोवा आते ही वो अपने आप सबूतों, गवाहों और संदिग्धों तक बड़ी आसानी से पहुँच जाता है.

फिल्म के बारे में बात करते हुए, मैं चाहूं तो टाइगर और दिशा को बड़ी आसानी से नज़रन्दाज़ कर सकता हूँ, और आपको उनकी कमी भी नहीं खलेगी. जहां ग्रैंडमास्टर शिफूजी जैसा स्व-घोषित देशभक्त अपनी बनावटी अकड़ को ही परदे पर बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने में लगा रहता है, दीपक डोबरियाल और मनोज बाजपेयी जैसे उम्दा कलाकार भी जाने किस बेहोशी की हालत में अपने किरदार निभाते दिखते हैं. (स्पॉइलर अलर्ट) फिल्म के आखिरी दृश्य में टाइगर का किरदार मनोज के किरदार को लात चला-चला कर मार रहा होता है, फिल्म की वाहियात दलीलों और बेकार की अदाकारी से, इस वक़्त तक मेरा दिमाग सुन्न और शरीर जकड चुका होता है, वरना उठ कर थिएटर छोड़ने के लिए अब और किसी वजह की जरूरत नहीं बचती थी. रणदीप हुडा जरूर मनोरंजन की थोड़ी उम्मीद बचाए रखते हैं, और अभिनय में वही सबसे कम निराश करते हैं.

आखिर में; बेहद जरूरी है कि फिल्म देखते वक़्त आप सवाल करें. खुद से भी, और फिल्म से भी. देश के राजनीतिक हालात और हिंदी सिनेमा के गिरते स्तर में ज्यादा फर्क बचा नहीं है. तो टाइगर जब भी किसी का कॉलर पकड़ के चीखे, “रिया कहाँ है?”, आप भी पूछिए. “पांचवी फिल्म है. एक्टिंग कहाँ है?. निर्देशक अहमद खान जब गोवा के जंगलों में वियतनाम वॉर छेड़ दें, तो पूछिए, “एक्शन तो ठीक है, लॉजिक कहाँ है?’. अभी पूछिए. कहीं नौबत ना आ जाये, जब पूछना पड़े, “सिनेमा कहाँ है?’. [1/5]

Friday, 16 February 2018

अय्यारी: लम्बी, उबाऊ, नीरस! [2/5]

गनीमत है कि हिंदी फिल्मों के सीक्रेट सर्विस एजेंट्स अपने 'टारगेट' पर नज़र बनाये रखने की गरज से, आजकल सड़कों पर गाना गाते हुए दिखाई नहीं देते. रामानंद सागर की 'आँखें' याद हैं ना? हालाँकि भिखारियों का गेटअप अभी भी उनका पसंदीदा है. नीरज पांडे ने पिछले कुछ सालों में राष्ट्रीय सुरक्षा और देशप्रेम के सवालों से सीधे-सीधे तौर पर जुड़ी कहानियों के ज़रिये इतना तो किया ही है. इंटेलिजेंस के लोग अब लाल, पीले, हरे बल्बों से सजी दीवारों और पैनलों के आगे बैठे, रेडियो पर जोर जोर से 'ओवर एंड आउट' नहीं बोलते, बल्कि हफ़्तों तक बिना किसी हलचल एक कमरे में कैद रहते हैं, भीड़ भरी गलियों में, मौके की तलाश में 'टारगेट' के पीछे-पीछे चुपचाप चलते रहते हैं और काम निपटा कर वापस भीड़ में खो जाते हैं. 'अय्यारी' करीब करीब इतनी ही लम्बी, उबाऊ और नीरस फिल्म है. 

मोटी दलाली की लालच में, सेना का रिटायर्ड अधिकारी गुरिंदर सिंह (कुमुद मिश्रा) चौगुनी कीमतों पर सेना को अपने खास लोगों से ही हथियार खरीदने की पेशकश करता है. मना करने पर सेना के एक गुप्त गैरकानूनी संगठन का मीडिया में भंडाफोड़ करने की उसकी धमकी के बाद अब सेना की साख दांव पर है. खुफिया जानकारी मुहैया कराने वाला गद्दार उसी संगठन से है, मेजर जय बक्शी (सिद्दार्थ मल्होत्रा). और उसे रोकने की जिम्मेदारी है, संगठन के सबसे काबिल अफसर और मुखिया कर्नल अभय सिंह (मनोज बाजपेयी) पर. गुरु-शिष्य आमने-सामने हैं. दोनों की अपनी जायज़ वजहें हैं. दोनों के अपने-अपने दांव-पेंच. हालाँकि कहानी में ना ही जय की बग़ावत का कोई ठोस इरादा पता चलता है, ना ही अभय की कथातथित 'अय्यारी' का कोई बहुत दिलचस्प नमूना देखने को मिलता है.      

सेना का मनोबल न घटे, अक्सर इस वजह से सेना में भ्रष्टाचार की सुगबुगाहट को सिरे से नकारा जाता रहा है. नीरज पांडे जब 'अय्यारी' में सैनिक हथियारों की खरीद-फरोख्त में भ्रष्टाचार के मामले के इर्द-गिर्द अपनी कहानी बुनना शुरू करते हैं, तो लगता है कि उनके जरिये परदे पर कुछ हिम्मत दिखेगी, पर जल्द ही वो भी सेना के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करने की कवायद में कहानी के साथ जबरदस्त छेड़छाड़ करने लगते हैं. नतीजा, कहानी के सिरे इतने कटे-फटे और बेमतलब हो जाते हैं कि कहने को कोई मुद्दा बचता ही नहीं. तभी तो जहां सेना पर मीडिया द्वारा उनके गुप्त संगठन का खुलासा कर दिये जाने की तलवार लटक रही होती है, 'आदर्श हाउसिंग सोसाइटी' से मिलते-जुलते एक घोटाले की खबर के साथ उसे बदल देने में ही कर्नल अभय सिंह अपनी जीत मनवा लेता है. जय का रुख और रवैया भ्रष्टाचार को लेकर बहुत ही बचकाना लगता है, खास तौर पर तब जब वो भी उन्ही लोगों के साथ सौदेबाजी में जुट जाता है. यकीन मानिए, इसमें उसकी कोई सोची-समझी रणनीति भी नहीं है, जो फिल्म के आखिर में जाकर आपको चौंका दे. 

नीरज को एक बात की दाद तो मिलनी ही चाहिए. अपने लम्बे-लम्बे दृश्यों में जिस ठहराव के साथ वो आपको लिप्त कर लेते हैं, परदे पर सस्पेंस थ्रिलर का पूरा पूरा माहौल बन जाता है. दिक्कत तब पेश आती है, जब इन लम्बे-लम्बे दृश्यों का अंत और उद्देश्य फिल्म की कहानी में कोई बहुत बड़ा योगदान नहीं दे पाता. 'अय्यारी' कुछ बेहद जाने-पहचाने चेहरों (कुमुद मिश्रा, निवेदिता भट्टाचार्या, जूही बब्बर, राजेश तैलंग और आदिल हुसैन) और गिनती के बेहतरीन अभिनय (मनोज बाजपेयी, नसीर साब) से ही थोड़ी बहुत उम्मीद बचा पाती है. मनोज जहाँ अपनी ईमानदारी से पूरी फिल्म में छाए रखते हैं, नसीर साब मेहमान भूमिका में भी कमाल कर जाते हैं. सिद्धार्थ अभिनय में बहुत संयमित हैं, पर नीरज उन्हें फिल्म में 'स्टाइल' का पुट लाने के लिए ही ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. रकूल प्रीत बस फिल्म में होने के लिए ही हैं. 

आखिर में; 'अय्यारी' अपने विषय-वस्तु की वजह से रोचक तो लगती है, मगर नीरज पांडे की दूसरी फिल्मों (स्पेशल 26, बेबी) की तरह तनिक भी रोमांचक नहीं है. अभिनय में मनोज बाजपेयी की आसानी देखनी हो, तो भी उनकी अच्छी फिल्मों की लिस्ट बहुत बड़ी है. यहाँ तो मनोज सिर्फ आपको उकताहट से बचाने के लिए मौजूद रहते हैं. कहानी में धार न होने के बावजूद, अगर 'जय हिन्द', 'गद्दार' और 'देश', जैसे शब्द कहीं न कहीं आपमें बेमतलब की ऊर्जा भर देते हैं, तभी देखने जाईये. [2/5] 

Friday, 12 May 2017

सरकार 3: कंपनी नई-माल वही! [1/5]

‘फैक्ट्री’ बंद हो चुकी है. ‘कम्पनी’ खुल गयी है. बाकी का सब कुछ वैसे का वैसा ही है. पुराने माल को उसी पुराने बदरंग पैकेजिंग में डाल कर वापस आपको बेचने की कोशिश की जा रही है. अपनी ही फिल्म के एक संवाद ‘मुझे जो सही लगता है, मैं करता हूँ’ को फिल्ममेकर राम गोपाल वर्मा ने अपनी जिद बना ली है. ‘सरकार 3’ जैसी सुस्त, थकाऊ और नाउम्मीदी से भरी तमाम फिल्में, एक के बाद एक लगातार अपने ज़माने के इस प्रतिभाशाली निर्देशक को उसके खात्मे तक पहुंचाने में मदद कर रही हैं. तकनीकी रूप से फिल्म-मेकिंग में जिन-जिन नये, नायाब तजुर्बों को रामगोपाल वर्मा की खोज मान कर हम अब तक सराहते आये थे, वही आज इस कदर दकियानूसी, वाहियात और बेवजह दिखाई देने लगे हैं कि दिल, दिमाग और आँखें परदे से बार-बार भटकती हुई अंधेरों में सुकून तलाशने लगती है. और ऐसा होता है, क्यूंकि रामगोपाल वर्मा के सिनेमा की भाषा अब बासी हो चली है. पानी ठहरा हुआ हो, तो सड़न पैदा होती ही है. अपने दो सफल प्रयासों (सरकार और सरकार राज) के बावजूद, ‘सरकार 3’ से उसी सड़न की बू आती है.

अपने दोनों बेटों की मौत के बाद भी, सुभाष नागरे (अमिताभ बच्चन) का दम-ख़म अभी देखने लायक है. ठीक ‘सरकार’ की तरह, फिल्म के दूसरे-तीसरे दृश्य में ही नागरे एक बिज़नेसमैन का गरीब बस्तियों को हटाने के लिए करोड़ों का ऑफर ठुकराते हुए कहते हैं, ‘मैं नहीं करूंगा, और किसी को करने भी नहीं दूंगा’. इस बीच उनका पोता शिवाजी (अमित साध) भी लौट आया है. उधर विरोधी भी एकजुट होने लगे हैं. गोविन्द देशपांडे (मनोज बाजपेई) राजनीति के गंदे खेल का सबसे नया-नवेला चेहरा है. दुबई में बैठा वाल्या (जैकी श्रॉफ) अंडरवर्ल्ड की कमान संभाले है. साथ ही, शिवाजी की प्रेमिका अनु (यामी गौतम), जिसके पिता की हत्या सरकार ने करवा दी थी. षड्यंत्र और विश्वासघात से बुनी इस बिसात पर कोई नहीं कह सकता कि कौन सा मोहरा किस करवट बैठेगा? ‘सरकार 3’ एक बार फिर सरकार की सोच को सही साबित करने और उसकी शक्ति को बरक़रार रखने की लड़ाई है.

फिल्म की सबसे कमज़ोर कड़ी है, फिल्म की बेतरतीब पटकथा और हद बनावटी संवाद. रामगोपाल वर्मा से बेहतर स्क्रिप्ट या कहानी की समझ रखना तो बेवकूफी है ही, इस बार फिल्म-लेखकों की टीम भी बुरी तरह निराश करती है. फिल्म का कोई भी हिस्सा आपको चौंकाने में सफल नहीं होता, बल्कि अपनी चौकन्नी समझ से आप खुद कदम-दो कदम आगे ही रहते हैं. फिल्म के संवाद बड़ी बेशर्मी से न सिर्फ अपने आप को दोहराते हैं, बल्कि सुनने में ही इतने बेस्वाद और बकवास लगते हैं कि कभी-कभी लगता है, उन्हें बोलते वक़्त अभिनेताओं की अपनी समझ कहाँ घास चरने चली गयी थी? मनोज बाजपेयी जैसे दिग्गज अभिनेता परदे पर 3 मिनट तक लगातार बोल रहे हों, और आप में तनिक भी जोश-ओ-ख़रोश पैदा न हो, तो गलती अभिनेता में नहीं, उन बेदम अल्फाजों में है जो आपने उन्हें परोसे हैं. फिल्म के शुरूआती दृश्य में ही, अमिताभ बच्चन परदे पर बूढ़े शेर की तरह दहाड़ रहे हैं, पर अफ़सोस! आपका ध्यान खींचने के लिए सिर्फ उनकी आवाज़ ही काफी नहीं है. ‘शेर की खाल पहन लेने से कोई कुत्ता शेर नहीं बन जाता’, ‘शेर कितना भी शक्तिशाली हो, जंगली कुत्ते मिलके शेर का शिकार कर ही लेते हैं’, ऐसे घटिया संवादों से भरी फिल्में मुझे वीसीआर के ज़माने में अच्छी लगती थीं.

फिल्म का तकनीकी पहलू भी उतना आजमाया हुआ है. फिल्म के सेट पर मौजूद किसी भी चीज़ का वहाँ पाया जाना सिर्फ एक ही जरूरत पूरी करता है, कैमरे की फ्रेमिंग को लेकर रामगोपाल वर्मा का पागलपन. टेबल पर पड़ा चश्मा हो, हाथ में कॉफ़ी का मग, चाय का कप, फर्श पर पत्थर का बना कुत्ता, कोने में खड़ा ‘लॉफिंग बुद्धा’; कभी न कभी सबको कैमरे के सामने आना ही है, वो भी पूरे क्लोज-अप में. वर्मा जाने किस ग़लतफहमी का शिकार फिल्ममेकर हैं, जो आज भी जोशीले फिल्म-स्टूडेंट की तरह आईने में एक हल्का शॉट डिजाईन करते हैं, और खुद को के. आसिफ मान कर बैठ जाते हैं. मानो अपने हिस्से का ‘शीशमहल’ उन्होंने पा लिया. फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर शोर-शराबे से भरा तो है ही, भड़काऊ भी है. जब भी आप सुनते हैं, आपको चीखने का मन करता है.

फिल्म की दो ही अच्छी बातें है. एक तो अमिताभ बच्चन, जो 12 साल बाद भी सुभाष नागरे के किरदार में उसी शिद्दत से फिट हो जाते हैं, जैसे पहली वाली ‘सरकार’ में. दूसरा मनोज बाजपेयी की अदाकारी, खास कर उस दृश्य में जहाँ वो राजनीति की तुलना समंदर की लहरों के साथ करते हैं. उनके किरदार का पागलपन उस दृश्य में सम्मोहित कर देता है. वरना तो पूरी फिल्म में हर अभिनेता खराब अभिनय की दौड़ में एक-दूसरे से आगे निकलना चाहता है. हाँ, जाने क्यूँ जैकी श्रॉफ का किरदार हर वक़्त एक कम-अक्ल मॉडल के साथ दिखाया जाता है? यकीन नहीं होता, इसी रामगोपाल वर्मा ने ‘कंपनी’ में हमें मलिक (अजय देवगन) जैसा ज़मीनी गैंगस्टर भी दिया था.

आखिर में, ‘द गॉडफ़ादर’ से ‘सरकार सीरीज’ की तुलना करने वाले रामगोपाल वर्मा खुद कांति शाह से ज्यादा काबिल नज़र नहीं आते, खास कर हिंदी सिनेमा में उनके हालिया योगदान को देखते हुए. दोनों में ‘बैक टू बैक’ फिल्में बनाने का ज़ज्बा तो कूट-कूट कर भरा है, पर दोनों को ही अपने आप को खुश रखने से फुर्सत नहीं. सिनेमा जाता है गर्त में, तो जाये, मेरी बला से! तकलीफ ये है, कि चाहकर भी 25 सालों से हिंदी फिल्में बनाने वाले रामगोपाल वर्मा हिंदी में मेरे ये जज़्बात पढ़ नहीं पायेंगे. तो सवाल ये है कि अब उन्हें ‘सरकार 4’ बनाने से रोकेगा कौन? [1/5]             

Friday, 31 March 2017

नाम शबाना: ‘पुअर बेबी’! [2/5]

देश की सुरक्षा का ज़िम्मा जितना सीमा पर तैनात सेना के जाबांजों का है, उतना या उससे थोड़ा सा ज्यादा ही ऐसी गुप्तचर सुरक्षा एजेंसियों का भी, जिन्हें गुमनामी के अँधेरे में रहकर हर पल खतरे के साये में जीना और मरना मंजूर होता है. नीरज पाण्डेय की ‘बेबी’ अगर आपने देखी हो, तो इन ‘अंडरकवर’ लड़ाकों के काम करने के तरीकों को तो अब तक आप जान ही गए होंगे? ‘नाम शबाना’ थोड़ा पीछे जाने की कोशिश करती है, कहानी के साथ भी और इन सीक्रेट एजेंट्स को चुने जाने की कड़ी कार्यवाही को सामने रखने के साथ भी. बहुत हैरतअंगेज़ है सब कुछ, एक ऐसी रहस्यमयी दुनिया, जहां फिल्मों की मानें तो 5 साल से एक ऐसी लड़की (तापसी पन्नू) पर पल-पल नज़र रखी जा रही है, जो अपने शराबी बाप की गैर-इरादतन हत्या के अपराध में सज़ा भुगत चुकी है. नज़र रखने वाले ने लड़की के जाने कितने फोटोग्राफ्स खींचे होंगे इस दरमियान? ऐसी दुनिया में आपका उम्रदराज़ केबल वाला (वीरेंद्र सक्सेना) भी ‘रॉ’ का एक अच्छा-खासा सीनियर टाइप ट्रेनर निकल सकता है, इसीलिए जब वो फ़ोन पर कहे, “मैडम, नया स्कीम चाहिए?’ तो ‘हाँ’ या ‘ना’ बोलने में पूरा वक़्त लीजिये, क्यूंकि बात सिर्फ आपके केबल कनेक्शन की नहीं है, सवाल सीक्रेट एजेंट के तौर पर आपके कैरियर का भी है.   

हालाँकि चौबीसों घंटे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का जाप करने वाली ये ‘एजेंसी’ अपनी एक उम्मीदवार और उसके साथी पर हो रहे जानलेवा हमले में सिर्फ इसलिए दखल नहीं देती क्यूंकि अभी तक वो उनकी ‘अपनी’ नहीं हुई है, पर उसी जानलेवा हमले का बदला लेने के लिए क़ानून की हद से आगे बढ़कर, उसे कातिल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती. जाहिर है, इस दुनिया के अपने कायदे क़ानून हैं, और इस फिल्म की स्क्रिप्ट में जरूरत से कहीं ज्यादा ‘कॉमन सेंस’ की कमी. ‘बेबी’ में तापसी की किरदार शबाना खान महज़ 20 मिनट के लिये परदे पर आती है, और अपने हाव-भाव-ताव से ताकतवर मर्दों से भरे उस फ्रेम में अपनी जगह बहुत दिलेरी से छीन लेती है, बना लेती है. ‘बेबी’ में शबाना के उस 20 मिनट वाले रुतबे तक पहुँचने में ‘नाम शबाना’ ढाई घंटे तक का वक़्त खर्च कर देती है, और फिर भी उसे छू पाने का दावा पेश नहीं कर पाती. जहां नीरज पाण्डेय की स्क्रिप्ट कहीं भी अपने आप को गंभीरता से नहीं लेती, वहीँ अपने ढीले-ढाले निर्देशन से शिवम् नायर पहले तो फिल्म का पूरा पहला हिस्सा सुरक्षा एजेंसी से दूर-दूर रह कर शबाना के निजी जिंदगी में झाँक-झांक कर निकाल देते हैं और उसके बाद, जब रोमांच का सारा खेल गढ़ने की बारी आती है तो बेवजह के ‘ट्विस्ट’ परोस कर (प्लास्टिक सर्जरी से चेहरे बदल लेने वाला विलेन, पृथ्वीराज सुकुमारन) और ‘बेबी’ के किरदारों का अधपका हवाला देकर (...और सर, ऑपरेशन बेबी कहाँ तक पहुंचा?) मनोरंजन की नैय्या पार लगाने की कोशिश करने लगते हैं.  

न चाहते हुए भी मानना पड़ता है कि फिल्म में तापसी स्क्रीन पर भले ही सबसे ज्यादा वक़्त के लिए दिखाई देती हों, भले ही उनकी मौजूदगी परदे पर जरूरी रोमांच बनाए रखने में सौ फीसदी सही साबित होती हो; नीरज पाण्डेय की चलताऊ स्क्रिप्ट उन्हें अक्षय कुमार के किरदार से आगे न निकलने देने के लिए बार-बार रोकती है. शबाना जब-जब मुसीबतों में घिरती नज़र आती है, अक्षय का किरदार उसे बांह पकड़ कर खींचता हुआ बाहर ले आता है. मुश्किलें जैसे जान-बूझकर आसान ही रखी गयी हों, क्योंकि फिल्म की हीरो तापसी हैं, अक्षय नहीं. शबाना को सुरक्षा एजेंसी तक लाने वाले अफसर की भूमिका में मनोज बाजपेई जंचते हैं, पर उनके किरदार की तह में जाने के लिए शायद एक और ‘स्पिन-ऑफ’ की जरूरत अलग से पड़े. कास्टिंग के नजरिये से फिल्म में दो अभिनेताओं को बड़ी चतुराई से उनके किरदार के लिए चुना गया है. शबाना के बॉयफ्रेंड की भूमिका में ताहेर शब्बीर जैसे मेहनती, पर कम तजुर्बे और सीमित अभिनय वाले नए कलाकार को, ताकि तापसी का किरदार उभर कर सामने आये...और विलेन के तौर पर, पृथ्वीराज सुकुमारन. पृथ्वीराज की मौजूदगी फिल्म के पोस्टर और कैनवस को जरूर बड़ा करती है, पर उन जैसे मंजे अभिनेता को इस तरह के वाहियात किरदारों में इस्तेमाल कर बॉलीवुड सिर्फ अपना ही नुक्सान कर रहा है.

आखिर में, ‘नाम शबाना’ अपनी अधपकी, कच्ची, बचकानी स्क्रिप्ट और दकियानूसी निर्देशन से सही मायनों में ‘बेबी’ की ‘प्रीक्वल’ ही लगती है. ऐसी ‘प्रीक्वल’ जो दो साल बाद नहीं आई हो, दो साल पहले आई हो. ऐसी ‘प्रीक्वल’ जो अपने इरादों में ही इतनी कमज़ोर, इतनी सुस्त लगती है कि उसमें ‘बेबी’ का बेंचमार्क छूने भर लेने तक का भी कोई जज़्बा नहीं बचता. फिल्म में एकाउंट्स पढ़ाने वाले मोहन कपूर की भाषा में कहें तो, “बेबी’ अगर संपत्ति (asset) है तो ‘नाम शबाना’ देनदारी (liability)”! [2/5] 

Tuesday, 27 December 2016

देखन में छोटन लगें...! (Small in Size, Big on Content)

साल 2016 जाने को है. वक़्त है, एक बार फिर मुड़ कर देखने का. हर शुक्रवार भाग-भाग कर फिल्में देखना और उनके बारे में लिखने का सारा जोश-ओ-खरोश एक बार फिर समेट कर कागज़ पर उड़ेलना है. साल की बेहतरीन फिल्मों को एक और बार इज्ज़त बक्शने की बारी आ गयी है...पहल करता हूँ उन 10 फिल्मों से, जो देखने में ज़रूर छोटी लगी होंगीं, कभी नए कलाकारों की वजह से तो कभी ख़बरों और अख़बारों में कम सुर्खियाँ बटोर पाने की वजह से, पर इन सभी ने अपनी-अपनी अलग-अलग खूबियों से सिनेमाहाल तक जाने का मेरा फैसला ग़लत साबित नहीं होने दिया. बहुत बहुत शुक्रिया...


#ज़ुबान #जुगनी #साला खड़ूस #अमरीका #बुधिया सिंह- बोर्न टू रन #लाल रंग #वेटिंग #धनक #पार्च्ड #चौरंगा





पहली बार निर्देशन की बागडोर सँभालते मोज़ेज सिंह की ‘ज़ुबान’ एक ऐसे नौजवान की कहानी है, जो अपने सपनों के लिए किसी भी हद तक जा सकता है पर, एक दिन जब उसके चाहतों की दुनिया उसके क़दमों में बिछी दिखाई देती है, उसे एहसास होता है इस पूरे सफ़र में उसने अपनी पहचान ही खो दी है, अपनी जुबान ही खो दी है.

‘ज़ुबान’ में सब कुछ अच्छा है, ऐसा नहीं है. कहानी की पकड़ अक्सर आप पर बनती-छूटती रहती है. फिल्म की रफ़्तार भी कुछ इस तरह की है कि आप इसे एक ‘स्लो’ फिल्म कहने से गुरेज नहीं करते, पर इन सबके बावजूद ‘ज़ुबान’ एक आम फिल्म नहीं है, एक आसान फिल्म नहीं है. 








A simple, unpretentious and wide-eyed country boy is trying to be apologetic to the girl he’s been with all night under the same sheet. Local liquor brand can be held responsible but the girl is taken aback, “Sorry? What for?” “For everything”, the boy is in deep guilt. “Not for everything. Say sorry only for why you left me alone there.” The girl is definitely more independent, free and open, and emotionally less complicated. So is Shefali Bhushan’s JUGNI. It likes to have its own sense of rhythm with melodies that induce extreme likeness and energy in you to match up with the beats life throws at you.






SAALA KHADOOS charms you with the uninhibited, wild and fresh performance by Ritika Singh, a professional boxer before making her first attempt at acting. Her free-spirited, loud-mouthed and all moody role-play is efficiently delightful. 


Madhavan gives SAALA KHADOOS everything it demands from him. He looks every bit of a full-grown ex-boxer with all the attitude, arrogance and aggression in him, hitting the right cord. One of his highly approving works!









प्रशांत नायर की ‘अमरीका’ उत्तर भारतीय गाँवों की आकांक्षाओं, आशाओं और अपेक्षाओं पर भावनात्मक चोट है. कहानी वर्तमान की नहीं है पर वर्तमान से परे भी नहीं है. बड़ा बेटा [प्रतीक बब्बर] अमेरिका चला गया है. माँ को लगता है सारा सुख, सारा भविष्य अमेरिका में ही है. चिट्ठियों से ही पूरे गाँव को बेटे और अमेरिका के बारे में नई-नई बातों का पता चलता है. घटनाएं तब एक तगड़ा मोड़ लेती हैं जब पिता की मृत्यु के बाद छोटे बेटे [‘लाइफ ऑफ़ पाई’ के सूरज शर्मा] को छुपी हुई सच्चाइयों का पता चलता है. साथ ही कुछ सवाल, जिनके जवाब सिर्फ अमेरिका जा कर पता चल सकते हैं. 

‘अमरीका’ एक बहुत ही करीने से बनाई गयी फिल्म है, जहां कुछ भी, और मैं बहुत सोच समझ के कह रहा हूँ, कुछ भी बेतरतीब या बेढंगा नहीं है.





इस फिल्म में ‘आगे क्या होगा’ वाला रोमांच कम है, मैच के आख़िरी पलों में गोल दाग कर या छक्का मार कर टीम जिताने वाला हीरो भी कोई नहीं है, और ना ही फिल्म की सफलता के लिए ‘देशभक्ति’ का बनावटी छौंका लगाकर आपके अन्दर के ‘भारतीय’ को जबरदस्ती का झकझोरने की कोशिश. 

‘बुधिया सिंह- बॉर्न टू रन’ फार्मूले से अलग एक ऐसी ‘स्पोर्ट्स’ फिल्म है, जो सिर्फ सतही तौर पर खेल से जुड़े रोमांच को भुनाने की कोशिश नहीं करती, बल्कि उसके पीछे की मेहनत-मशक्कत, लगन और मुश्किलातों को सच्चे मायनों में आपके सामने उसकी असली ही शकल-ओ-सूरत में पेश करती है.









LAAL RANG is a good thriller that may not pump your heartbeat up in the usual way most of bollywood thrillers do. It also might not give you much of a pulsating action to cheer, and it definitely would not pitch obligatory twists & turns in the plot but even then, the firm writing has enough to make it an enjoyably unlike experience. 

Syed Ahmad Afzal makes sure it takes its own course of time to grow on the viewers. He never looks in hurry when establishing scenes or while making the shift from one to another.



अनु मेनन की ‘वेटिंग’ ज़िन्दगी और मौत के बीच के खालीपन से जूझते दो ऐसे अनजान लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है जिनमें कहने-सुनने-देखने में कुछ भी एक जैसा नहीं है, पर एक पीड़ा, एक व्यथा, एक दुविधा है जो दोनों को एक दूसरे से बांधे रखती है. 

प्रोफ़ेसर शिव धीर-गंभीर और शांत हैं, जबकि तारा अपनी झुंझलाहट-अपना गुस्सा दिखाने में कोई शर्म-लिहाज़ नहीं रखती. तारा को मलाल है कि ट्विटर पर उसके पांच हज़ार फ़ॉलोवर्स में से आज उसके पास-उसके साथ कोई भी नहीं, जबकि प्रोफ़ेसर को अंदाज़ा ही नहीं ट्विटर क्या बला है? इसके बावज़ूद, अपने अपनों को खो देने का डर कहिये या फिर वापस पा लेने की उम्मीद, दोनों एक-दूसरे से न सिर्फ जुड़े रहते हैं, अपना असर भी एक-दूसरे पर छोड़ने लगे हैं.







एक सच की दुनिया है जो हमारे आस-पास चारों तरफ पसरी है, और एक दुनिया है जैसी हम अपने लिये तलाशते हैं, जिसके होने में हम यकीन करना चाहते हैं. अपने देश के साथ भी ऐसा ही कुछ कनेक्शन है हमारा. एक, जैसी हम देखना चाहते हैं, मानना चाहते हैं और दूसरा जो वाकई में है. 

नागेश कुकूनूर की ‘धनक’ हमारी परिकल्पना और सच्चाई की इन्हीं दो दुनियाओं के बीचोंबीच कहीं बसी है. अगर आप अच्छे हैं, दिल के सच्चे हैं तो आपके साथ बुरा कैसे हो सकता है? परीकथाओं में अक्सर इस तरह के मनोबल बढ़ाने और नेकी की राह पर चलते रहने के लिए हिम्मत बंधाने वाली उक्तियाँ आपने भी पढ़ी या सुनी होंगी. ‘धनक’ किसी एक प्यारी और मजेदार परी-कथा जैसी ही है, जिसमें बहुत सारे अच्छे लोग हैं और जो बुरे भी हैं वो सदियों पुराने, जाने-पहचाने जैसे हमेशा कोसते रहने वाली ‘डायन’ चाची और बच्चे उठाने वाला दुष्ट गिरोह.





हाव-भाव और ताव में लीना यादव की ‘पार्च्ड’ पिछले साल रिलीज़ हुई पैन नलिन की ‘एंग्री इंडियन गॉडेसेज’ से बहुत कुछ मिलती-जुलती है, और अपने रंग-रूप में केतन मेहता की ‘मिर्च मसाला’ जैसी तमाम भारतीय सिनेमा के मील के पत्थरों से भी. जाहिर है, इस तरह का ‘पहले बहुत कुछ देख लेने’ की ऐंठ आप में भी उठेगी, पर जिस तरह की बेबाकी, दिलेरी और दबंगई ‘पार्च्ड’ दिखाने की हिमाकत करती है, वो कुछ अलग ही है. 

यहाँ ‘आय ऍम व्हाट आय ऍम’ का जुमला बेडरूम के झगड़ों और कॉफ़ी-टेबल पर होने वाली अनबन में सिर्फ जीत भर जाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता. ‘पार्च्ड’ अपने किरदारों को उनके तय मुकाम तक छोड़ आने तक की पूरी लड़ाई का हिस्सा बन कर एक ऐसा सफ़रनामा पेश करती है, जो हमारी ‘घर-ऑफिस, ऑफिस-घर’ की रट्टामार जिन्दगी से अलग तो है, पर बहुत दूर और अनछुई नहीं.






जातिगत विसंगतियों के दुष्प्रभाव, छूत-अछूत के लाग-लपेट और धर्म के नाम पर विकलांग मानसिकता का परिचय देते भारतीय समाज को हमने पहले भी श्याम बेनेगल और गोविन्द निहलाणी के सिनेमा में तार-तार होते देखा है. ‘चौरंगा’ भी काफी हद तक इसी दायरे में फैलती-सिमटती दिखाई देती है, इसीलिए एक मूल प्रश्न बार-बार दिमाग में कौंधता रहता है. ‘क्या कुछ भी नहीं बदला है?’ 

उत्तर फिल्म ख़तम होने के तुरंत बाद कुछ सरकारी तथ्यों के परदे पर उभरने के साथ ही मिलने शुरू हो जाते हैं. सच में, कुछ भी नहीं बदला है. और अगर नहीं बदला है तो सिर्फ सिनेमा में बदलाव दिखा देने भर से क्या सचमुच बदलाव आ जायेगा? ‘चौरंगा’ की पृष्ठभूमि, ‘चौरंगा’ के कथानक और ‘चौरंगा’ के पात्रों से पुराने होने की गंध भले ही आती हो, पर ‘चौरंगा’ के प्रासंगिकता की चमक पर कहीं कोई धूल जमी दिखाई नहीं देती. ‘चौरंगा’ एक सार्थक कोशिश है भारतीय समाज के उस एक वर्ग को टटोलने में, जिसे हम शहरी चकाचौंध के लिए कहीं अँधेरे में छोड़ आये हैं.  


Friday, 5 August 2016

बुधिया सिंह- बॉर्न टू रन: फिल्मों में स्पोर्ट्स बहुत देखा, अब एक ‘सच्ची’ स्पोर्ट्स फिल्म देखिये! [4/5]

5 साल का बुधिया 70 किलोमीटर के मैराथन दौड़ में 40-45 किलोमीटर पार कर आया है. उसे प्यास लग रही है. साथ-साथ साइकिल पर चल रहे अपने ‘कोच सर’ को इशारा कर रहा है. कोच सर उसे पानी तक पहुँचने भी नहीं दे रहे. आपका दिल बैठा जा रहा है. आपके मन में कोच सर के लिए बेदिली बढ़ती जा रही है, पर कोच सर के माथे पर कोई शिकन नहीं. क्योंकि उन्हें बुधिया की प्यास से ज्यादा फ़िक्र है बुधिया के भूख की. भूख दौड़ने की. भूख गरीबी, मुफलिसी और मायूसी के दलदल से निकल कर अपनी पहचान कायम करने की. भूख एक जोड़ी जूतों और एक लाल रंग के साइकिल की.

यूँ तो कहने को खेल और खिलाड़ियों की ज़िन्दगी पर बनी दर्जनों हिंदी फिल्में आपके जेहन में घूम रही होंगी, पर सोमेन्द्र पधि की ‘बुधिया सिंह- बॉर्न टू रन’ बिना किसी शक अब तक की सबसे अच्छी ‘स्पोर्ट्स फिल्म’ मानी जानी चाहिए. हालाँकि इस फिल्म में ‘आगे क्या होगा’ वाला रोमांच कम है, मैच के आख़िरी पलों में गोल दाग कर या छक्का मार कर टीम जिताने वाला हीरो भी कोई नहीं है, और ना ही फिल्म की सफलता के लिए ‘देशभक्ति’ का बनावटी छौंका लगाकर आपके अन्दर के ‘भारतीय’ को जबरदस्ती का झकझोरने की कोशिश. ‘बुधिया सिंह- बॉर्न टू रन’ फार्मूले से अलग एक ऐसी ‘स्पोर्ट्स’ फिल्म है, जो सिर्फ सतही तौर पर खेल से जुड़े रोमांच को भुनाने की कोशिश नहीं करती, बल्कि उसके पीछे की मेहनत-मशक्कत, लगन और मुश्किलातों को सच्चे मायनों में आपके सामने उसकी असली ही शकल-ओ-सूरत में पेश करती है.

जूडो कोच बिरंची दास [मनोज बाजपेयी] झुग्गी-झोपड़ियों के गरीब अनाथ बच्चों को अपने ही घर पर रख कर उन्हें जूडो सिखाते हैं. 850 रूपये में एक नशेडी को बेचे गए बुधिया [मयूर महेंद्र पटोले] के लिए भी बिरंची दास एक भले मददगार की तरह ही सामने आते हैं, पर बुधिया के लिए उनके पास कोई अलग, कोई ख़ास प्लान नहीं है. ऐसे में एक दिन, दौड़ने के लिए उसका जूनून देखकर दास को जैसे न सिर्फ उसकी बल्कि अपनी भी ज़िन्दगी का मकसद साफ़ दिखाई देने लगता है. बुधिया दौड़ेगा, और सिर्फ दौड़ेगा. मैराथन दौड़ेगा, ओलंपिक्स में दौड़ेगा, बस दौड़ेगा. मासूम बुधिया की ललक और जज्बाती बिरंची दास की सनक साथ मिलकर पूरे देश के खिलाडियों के लिए मिसालें कायम कर रही है, कि अचानक शुरू होता है राजनीतिक सत्ता और बेरहम सिस्टम का सर्कस!  

सोमेन्द्र पधि की ‘बुधिया सिंह- बॉर्न टू रन’ आपका दिल चीर के रख देगी, जब आप सिस्टम को बुधिया और उसके सपनों के बीच खड़ा पायेंगे. बाल कल्याण समिति की खोखली दिलचस्पी से खिन्न, बेबाक बिरंची एक जगह बोल भी पड़ते हैं, “ओड़िसा में हर दिन एक बच्चा भूख से मर रहा है. भूख से मरने से तो अच्छा है दौड़ कर मरे!”. बुधिया सिंह के दौड़ने पर बैन लगा दिया जाता है, और आज 10 साल बाद भी उसके ओलंपिक्स में दौड़ने के सपने को भारत सरकार ने जंजीरों से बाँध रखा है. अफ़सोस, आज कोई बिरंची दास उसके साथ, उसके पास नहीं है!  

बेहतरीन डायरेक्शन, सिनेमेटोग्राफी, एडिटिंग और म्यूजिक के बीच, फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष उभर कर आता है उसके किरदारों में बखूबी ढलते कलाकार. मनोज बाजपेयी ने तो मानो एक अलग ही मुहीम छेड़ रखी है. एक वक़्त था, जब अर्थपूर्ण फिल्मों को ‘पैरेलल सिनेमा’ का नाम दिया जाता था, मनोज जिस तरह की फिल्मों [अलीगढ, ट्रैफिक और अब ‘बुधिया सिंह- बॉर्न टू रन’] को अपना नाम दे रहे हैं, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि अगर हिंदी सिनेमा के लिए नहीं, तो कम से कम अपने लिए ही सही वो एक ऐसे ही ‘पैरेलल मूवमेंट’ ही शुरुआत कर चुके हैं. उनके बिरंची में आपको सामान्य कुछ भी नहीं दिखता. ये वो गुरु नहीं है, जिसके लिए हर वक़्त आप नतमस्तक दिखें. उसकी नीयत पर भले ही आपको कोई शक-ओ-शुबहा न हो, उसे रूखे रवैये और तीखे तरीके आपको ज़रूर विचलित कर देंगे. बुधिया के किरदार में मयूर महेंद्र पटोले का चयन एकदम सटीक है. ‘हगा और भगा’ जैसे मासूम पलों में वो और भी कामयाब दिखते हैं.

अंत में; एनडीटीवी के हालिया इंटरव्यू में 15 साल के बुधिया को सुनते-देखते एक बात का एहसास बहुत दुःख के साथ होता है कि कैसे हमने, हमारी निकम्मी व्यवस्था, हमारी नौकरशाही ने एक प्रतिभा को पंगु बना रख छोड़ा है, कैसे एक जोशीले, ज़हीन और ज़ज्बाती इंसान के सपने को खंजर बना कर हमने उसी के सीने में उतार दिया. ‘बुधिया सिंह- बॉर्न टू रन’ एक टीस की तरह आपके दिल में काफी वक़्त तक दबी रह जायेगी. [4/5] 

Friday, 6 May 2016

ट्रैफिक: बैठे रहिये, बाजपेयी हैं ना! [3/5]

दिवंगत राजेश पिल्लै की मलयालम सुपरहिट थ्रिलर ‘ट्रैफिक’ का हिंदी रीमेक आपको थिएटर की कुर्सी से बांधे रखने के लिए गिने-चुने विकल्प ही सामने रखता है, जिनमें से एक तो है फिल्म की हद इमोशनल स्टोरीलाइन, और मनोज बाजपेयी का बेहद सटीक, संजीदा और समर्पित अभिनय. तकनीकी दृष्टि से फिल्म के कमज़ोर पल हों या कथानक को रोमांचक बनाये रखने के लिए नाटकीयता भरे उतार-चढ़ाव, मनोज बड़ी मुस्तैदी, ख़ामोशी और शिद्दत से ड्राइविंग सीट पर बैठे-बैठे पूरी फिल्म को अकेले खींच ले जाते हैं. हालाँकि अच्छे और नामचीन अभिनेताओं की एक पूरी जमात आपको इस फिल्म का हिस्सा बनते दिखाई देती है, पर एक मनोज ही हैं जिनसे, जिनके अभिनय से और जिनकी कोशिशों से आप लगातार जुड़े रहते हैं...हमेशा!

सच्ची घटनाओं को आधार बना कर, ‘ट्रैफिक’ मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत एक ऐसी दिलचस्प और रोमांचक कहानी आप तक पहुंचाती है, जहां जिंदगी तमाम मुश्किलों और मायूसियों के बावज़ूद आखिर में जीत ही जाती है. कभी न हार मानने वाले इसी इंसानी जज़्बे को सलाम करती है ‘ट्रैफिक’! फिल्मस्टार देव कपूर (प्रोसेनजीत चटर्जी] की बेटी को पुणे में जल्द से जल्द हार्ट ट्रांसप्लांट की दरकार है. पता चला है कि मुंबई के एक अस्पताल में एक ऐसा ‘पॉसिबल डोनर’ है जिसके जिंदा रहने की उम्मीद अब लगभग दम तोड़ चुकी है. माँ-बाप (किटू गिडवानी और सचिन खेड़ेकर) अपने बेटे को ‘दी बेस्ट गुडबाई गिफ्ट’ देने का मन बना चुके हैं पर मुंबई से पुणे तक १६० किलोमीटर की दूरी को ढाई घंटे में पूरा करने का बीड़ा कौन उठाये? ट्रैफिक हवलदार रामदास गोडबोले (मनोज बाजपेयी) के लिए ये सिर्फ ड्यूटी बजाने का मौका नहीं है. मिशन पर जाने से पहले वो अपनी बीवी से कहता है, “पता नहीं कर पायेगा या नहीं, पर घूसखोर का लांछन लेके नहीं जीना”.

फिल्म पहले हिस्से में कई बार अपनी ढीली पकड़ और सुस्त निर्देशन से आपको निराश करती है, खास कर जब किरदार एक-एक कर आपके सामने बड़ी जल्दी-जल्दी में परोस दिए जाते हैं. फिल्म को तेज़ रफ़्तार देने के लिए, घटनाओं को घड़ी की टिक-टिक के बीच बाँट कर दिखाने का चलन भी बहुत घिसा पिटा लगता है. हालाँकि इंटरवल आपको हल्का सा असहज महसूस कराने में कामयाब होता है. दूसरे हिस्से में फिल्म जैसे एकाएक सोते हुए जग जाती है और बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ने लगती है, पर फिर ड्रामा के नाम पर जिस तरह के उतार-चढ़ाव शामिल होने लगते हैं, उनमें गढ़े होने की बू दूर से ही नज़र आने लगती है. ऐसा लगता है मानो जिंदगी की ये दौड़ अब कोई सस्ती सी विडियो गेम बन कर रह गई है, जहाँ मुश्किलें जानबूझ के हर मोड़ पे और बड़ी होती जा रही हैं. मलयालम फिल्मों में वैसे भी ये कोई नया चलन नहीं.

पियूष मिश्रा जैसे वजनी नामों के बाद भी ‘ट्रैफिक’ के संवाद उतने ही फीके और उबाऊ हैं, जितने उसके नामचीन कलाकारों के बंधे-बंधे बासी अभिनय. प्रोसेनजीत दा का किरदार जाने-अनजाने अनिल कपूर के इतना इर्द-गिर्द बुना गया है कि उससे बाहर उन्हें देख पाना मुश्किल हो जाता है. दिव्या दत्ता, किटू गिडवानी, जिम्मी शेरगिल, सचिन खेड़ेकर, परमब्रता चटर्जी  सभी को हम पहले भी इस खूंटे से बंधे देख चुके हैं. सब अपने घेरे अच्छी तरह पहचानते हैं और उसे तोड़ने की पहल से बचते नज़र आते हैं.

इतने सब के बाद भी, ‘ट्रैफिक’ अपने जिंदा जज़्बे, सच्ची कहानी के तमगे, कुछेक गिनती के ही सही सचमुच के रोमांचक पलों और मनोज बाजपेयी के मजबूत कन्धों के सहारे एक अच्छी फिल्म कहलाने की खुशकिस्मती हासिल कर लेती है. मनोज मिसाल हैं, संवाद अभिनय का एक अभिन्न अंग है, मात्र एक अभिन्न अंग...पूरे का पूरा अभिनय नहीं. देखिये, अगर उनके जरिये अभिनय के बाकी रंग भी देखने हों! देखिये, अगर एक थ्रिलर देखनी हो जिसमें दिल हो, एकदम जिंदा ‘धक-धक’ धड़कता हुआ! [3/5] 

Friday, 26 February 2016

अलीगढ़ (A): अब नहीं तो कब? [3.5/5]

दो-चार-दस गिनती की फिल्में को छोड़ दें तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने समलैंगिकों और समलैंगिकता को जिस बेरुखी, जिस छिछले तरीके से परदे पर अपने मतलब (...और भौंडे मनोरंजन) के लिए इस्तेमाल किया है, उसे साफ़ और पाक करने के लिए कोई एक फिल्म काफी साबित नहीं हो सकती, ये एक शर्मनाक सच है...पर इसी के साथ एक सच और भी है, कोशिशों ने हौसलों का दामन अभी छोड़ा नहीं है. हंसल मेहता की बेहद सुलझी हुई, संजीदगी और सादगी से भरी हुई ईमानदार फिल्म ‘अलीगढ़’ ऐसी ही एक बेहतरीन कोशिश है, जो समलैंगिकता को सनसनीखेज बनाकर परोसने की बेहयाई नहीं करती बल्कि उसे ‘निजता के अधिकार’ के साथ मिलाकर एक ऐसा मुहीम छेड़ देती है जिससे बचना-मुंह मोड़ना और अनदेखा कर देना किसी भी संवेदनशील आदमी के लिए आसान नहीं रह जाता!

प्रोफेसर सिरास [परदे पर मनोज वाजपेयी] अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में मराठी पढ़ाते हैं. तलाकशुदा हैं, सो अपने छोटे से कमरे में अकेले रहते हैं. अकेलेपन के दर्द से जूझते प्रोफेसर सिरास को लता मंगेशकर का ‘आपकी नज़रों ने समझा’ सुनना और सुनते-गुनगुनाते व्हिस्की के हलके-हलके घूंट गले से उतारना अच्छा लगता है. उनकी खाली शामें अक्सर ऐसे ही गुजरती हैं, बंद कमरे में! ऐसी ही एक रात अचानक कुछ रिपोर्टर उनके घर में घुस कर उन्हें एक दूसरे आदमी के साथ अन्तरंग स्थिति में होते हुए कैमरे में कैद कर लेते हैं. उनके साथ मारपीट भी होती है पर कड़ी मुश्किलें तब शुरू होती हैं जब समाज उन्हें इस पूरे वाकये के बाद एक अलग संकीर्ण नजरिये से देखना शुरू कर देता है. यूनिवर्सिटी से उन्हें ‘नैतिकता’ की दुहाई देकर निकाल दिया जाता है. इन सबके बावजूद प्रोफेसर लगातार हालातों से समझौते करने में जुटे रहते हैं. आखिरकार, उनकी ख़ामोशी को आवाज़ देता है एक नौजवान रिपोर्टर दीपू [राजकुमार राव] और तब, प्रोफेसर सिरास अपने अधिकारों, अपने सम्मान की लड़ाई के लिए खुल कर सामने आते हैं.

सच्ची घटनाओं से प्रेरित ‘अलीगढ़’ आपको बड़े धीरे-धीरे प्रोफेसर सिरास के करीब ले जाती है, जहां उनकी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से अलग एक ऐसा मासूम किरदार आपके सामने आ खड़ा होता है जो बड़ी समझदारी से प्यार को समझता है और उतनी ही सरलता से समझाता भी है. जैसे-जैसे आप प्रोफेसर को जानने लगते हैं, उनका समलैंगिक होना आपके जेहन से दूरी बनाने लगता है. उनकी कविताओं में आप प्रेम की नई परिभाषाएं तलाशने लगते हैं. उनकी आँखों का खालीपन धीरे-धीरे आपके दिल को कचोटने लगता है, और ये सब अगर मुमकिन होता है तो उसके पीछे है अपूर्व असरानी की दिल छू लेने वाली कहानी और मनोज बाजपेयी का शानदार अभिनय. मनोज का अभिनय बोलने से ज्यादा कहने में यकीन रखता है. प्रोफेसर सिरास को वो जिस संजीदगी से और नजाकत से दर्शकों तक पहुंचाते हैं, एक वक़्त आता है जब आप दोनों को [मनोज और प्रोफेसर सिरास] अलग-अलग करके देखना भूल ही जाते हैं. अदालत की उबाऊ कार्यवाई में बोर होते हुए, ‘हैंडसम’ बोलने पर शर्माते हुए, ‘आपकी नज़रों ने समझा’ गुनगुनाते वक़्त लय छोड़ते-तोड़ते हुए और संगम पर दीपू के साथ खिलते-मुस्कुराते हुए; मनोज एक ऐसी छाप छोड़ जाते हैं जो आपको बार-बार अभिनय में उनके कद की याद दिलाता रहेगा. सधे और नपे-तुले अभिनय से, राजकुमार राव अपने किरदार के साथ बड़ी मजबूती से खड़े दिखाई पड़ते हैं और फिल्म को आगे ले जाने में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ते.

इतने सब के बावजूद, ‘अलीगढ़’ में अगर (मुझे) थोड़ी बहुत शिकायत रह जाती है, तो वो है इसका ‘शाहिद’ की तरह का धारदार न होना. ‘अलीगढ़’ आपको सोचने पर मजबूर तो करती है, आपको प्रोफेसर सिरास की शख्सियत से बखूबी रूबरू भी कराती है पर पूरी तरह झकझोर देने में कहीं न कहीं कमज़ोर रह जाती है. फिल्म में दीपू सेबास्टियन का प्रेम-प्रसंग भी फिल्म में किसी तरह का कुछ ठोस, जरूरी और जायज़ इज़ाफा नहीं करता. पर इन चंद शिकायतों से परे, हंसल मेहता की ‘अलीगढ़’ एक बेहद जरूरी फिल्म है जो समलैंगिकता को कठघरे में खड़ा नहीं करती बल्कि उसे आपके ड्राइंग रूम में जगह देती है, आपकी बातचीत का हिस्सा बनती है और बेहतर समाज की तरफ एक अहम कदम बढ़ाती है. आखिर अब नहीं तो कब? जरूर देखिये! [3.5/5]

Friday, 9 January 2015

TEVAR: Stinking old, rotten & formulaic! ‘Manoj-Arjun’ does the repair! [2/5]

Remaking an 11-year old Telugu super hit doesn’t really sound a bad idea at first, as masala entertainers are the safest option in Bollywood to hit the jackpot of the 100 Cr club. First timers Sanjay Kapoor [being the producer] & Amit Ravindernath Sharma [the admaker takes a leap by directing a full-fledged feature film] try the same with showing their jam-packed confidence in family-boy Arjun Kapoor and the adeptly assured actor-performer Manoj Bajpayee in a negative role. Still, TEVAR suffers the stinks of being old, rotten and formulaic, mostly and mainly at the plot part.

In the murderous land of Northern Uttar Pradesh; where power rules and male-chauvinism takes hold of the dice in the game, you don’t really meet a Pintu Shukla [Arjun Kapoor] very often. Though he is a Salman Khan fan and wears same attitude as well and effortless as his trademark aviator shades, he can also be seen harassing an eve-teaser for giving him back what he was doing to a teenage girl, moments ago. He also cares for the girl’s presence while mouthing not-so-smooth verbal expressions. Now, that’s rare. Rare for a Bollywood movie which also could have Salman in the place! I wished it to have more of such attitude!

The drama soars high when a bigheaded, haughty and powerful scandalous brother [Manoj Bajpayee] of an influential politician starts feeling for a local girl doing her obvious best like dancing and attending drama classes. Who else but Sonakshi in real, and in reel? Pintu accidently crosses the path, beats the villain, meets the girl and takes it as a mission to save the girl from the lecherous. Don’t allow me to judge your intelligence about what comes next and in the finale! And it all happens with a plentiful of high-octane action and songs of every kind, alternatively and frequently.

The part where Amit Ravindernath Sharma scores big is the treatment, authenticity of the locations, characters that can easily charm the audience in mass and drama that never actually lacks the punch. He is confident for sure but it hurts to see such talent trembling all over a plot which could have been best in the year of 2005 but never a promising in 2015. Arjun Kapoor’s energy never runs out of charge. He CAN be as charismatic as Salman. He CAN beat the goons too, at beats. He CAN also lip smoothly the most absurdly written dialogues using slangs of male-organs. Only if the script had provided him more space and viewers some kind of novelty to stick around, it would have been a pleasant surprise!

Though not in full form; Manoj Bajpayee does his part well in the most theatrical manner. He successfully uses his corrupt, sinning and wicked eyes for the most. Don’t expect a GANGS OF WASSEYPUR from him but he’s better than the repetitive Prakash Raj any day. Sonakshi does what she’s been doing for ages now, and I really want to write more about her abilities as an actor but then, there is hardly anything new. Raj Babbar, Dipti Naval & Rajesh Sharma don’t disappoint.

With a tiring duration of 2 hour 39 minutes, age-old plot and mindlessly put songs, Amit Ravindernath Sharma’s TEVAR is an average action-entertainer saved hugely by Arjun Kapoor’s earnest & energetic performance and Manoj Bajpayee’s engagingly villainous character. Watch it if you are a fan of both, though it is not their best at all! [2/5]