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Friday, 4 May 2018

ओमार्ता (A): राजकुमार राव के अभिनय में एक और तमगा! [3.5/5]


सिनेमाई खलनायकों में अक्सर हमें मानवीय संवेदनाएं ढूँढने की आदत है. उनके अतीत में सेंध लगाकर जानने की कोशिश कि आखिर वो जैसे हैं, वैसे क्यूँ हैं? समाज या फिर सिस्टम से चोट खाए, बदले की आग में सब कुछ जला देने की सनक लिए ऐसे ढेर सारे एंटी-हीरोज को हमने सालों तक सर बिठाया है. और फिर आते हैं कुछ वो क्रूर, निर्दयी लेकिन रंग-बिरंगे, अजीब-ओ-गरीब खलनायक (मोगैम्बो, सर जूडा, शाकाल) जिनका पागलपन एकदम समझ से परे है. दुनिया पर कब्ज़ा करने की सनक में अंधे, अलग ही किस्म के हंसोड़ विलेन. हंसल मेहता की ओमार्ता का नायक भी खलनायक ही है, असल जिंदगी का है, पर इन दोनों किस्मों के खलनायकों से बिलकुल अलग. उसका अड्डा किसी काली पहाड़ी के पीछे की गुफा नहीं है. उसका पहनावा किसी सर्कस के रिंगमास्टर की याद नहीं दिलाता. किसी ने उसके माँ-बाप की हत्या बचपन में उसकी आँखों के सामने नहीं की थी. उसकी जमीन भी किसी साहूकार के हाथों बंधक नहीं पड़ी. पर फिर भी उसकी सनक, उसका पागलपन, उसका शैतानी दिमाग आपकी हड्डियों तक को कंपा देने में कहीं से भी कम नहीं पड़ता.

पुरानी दिल्ली के एक छोटे से मकान में 4 विदेशियों को बंधक रखा गया है. पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश आतंकवादी अहमद उमर सईद शेख़ (राजकुमार राव) का शायद पहला ही मिशन है ये. उमर पकड़ा जाता है. बोस्निया में उसके अपने भाइयों पर हो रहे ज़ुल्म के चलते उसने अपने लिए ज़ेहाद का रास्ता चुना है. उसे छुडाने के लिए कंधहार में इंडियन एयरलाइन्स का जहाज़ तक अगवा कर लिया गया है. ये उमर ही है, जिसके तार आगे चलकर अमेरिका में 9/11 अटैक और वॉल स्ट्रीट जर्नल के पत्रकार डेनियल पर्ल की निर्मम हत्या से जुड़े. मुंबई में 26/11 हमले के वक़्त, इसी शैतानी दिमाग ने भारत और पाकिस्तान को अलग-अलग फ़ोन करके युद्ध की स्थिति तक ला खड़ा किया था. धार्मिक उन्माद किस तरह पढ़े-लिखे जहीन दिमाग नौजवानों को हैवानियत की हद तक ला फेंकता है, ओमार्ता इसका बेहद करीबी और एकदम सटीक तस्वीर पेश करती है. वो भी असलियत के एकदम आसपास रहते हुए.

किसी खोजी रिपोर्ट या काबिल डाक्यूमेंट्री ड्रामा की तर्ज़ पर बनी ओमार्ता एक डार्क क्राइम थ्रिलर है, जहां निर्देशक हंसल मेहता आपके रोंगटे खड़े करने के लिए अख़बारों की असल सुर्ख़ियों, समाचारों के फुटेज और रूह कंपा देने वाली भयावह तस्वीरों का बेझिझक और बेख़ौफ़ इस्तेमाल करते हैं. ये तब और भी जरूरी लगने लगता है, जब हंसल उमर सईद शेख़ के आतंकवादी बनने की तरफ बढ़ने की आग को किसी और इमोशनल ईंधन से भड़काने की कोई होशियारी नहीं दिखाते, और तब भी जब उसके वहशियाना शख्सीयत को उधेड़ कर सामने रख देना चाहते हैं. अनुज राकेश धवन की बाकमाल सिनेमेटोग्राफी के साथ, हंसल फिल्म के दृश्यों को पूरी तरह आप पर ज़ाहिर होने देने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाते. यहाँ तक कि फिल्म के सबसे नाटकीय दृश्य (डेनियल पर्ल की हत्या) में भी आपको सब कुछ होते हुए साफ़-साफ़ नहीं दिखता, कैमरा उमर के चेहरे तक ही सीमित रहता है, पर घृणा, डर और दर्द से आपका दिल बैठा देने में नाकाम नहीं होता. इससे भयावह कुछ हिंदी सिनेमा में कम ही देखा है मैंने.

ओमार्ता राजकुमार राव के कद्दावर अभिनय में एक और तमगा है. जिस ख़ामोशी और ठहराव से वो उमर के किरदार में दाखिल होते हैं, और फिर वक़्त-बेवक्त उसके गुस्से, उसकी सनक और उसकी नफरत को बराबर मात्रा में नाप-जोख के परदे पर निकालते हैं, देखने लायक है. चेहरे पर कोई पछतावा नहीं, दिल में कोई मलाल नहीं, और वो हलकी सी शैतानी मुस्कराहट (रावण का अट्टहास नहीं); राजकुमार राव का यह किरदार हालिया खलनायकों की लिस्ट में बड़ी आसानी से, बहुत वक़्त तक याद रखा जाने लायक है. अगर याद हो, शाहिद में हंसल ने जेल के दृश्य में शाहिद आज़मी (राजकुमार राव) की मुलाक़ात कुछेक दृश्यों में उमर सईद शेख़ (तब, प्रबल पंजाबी) से कराई थी. अपने भाइयों पर हो रहे जुल्म से लड़ने के लिए दोनों अलग-अलग रास्ते चुनते हैं. इसे महज़ एक रोचक तत्थ्य मानने से हटकर देखें, तो हंसल इस तरह इस्लामिक आतंकवाद और धार्मिक भेदभाव के सन्दर्भ में अपना घेरा पूरा कर लेते हैं.  
             
हम अल्लाह के बन्दे हैं’, अल्लाह हमारे साथ है’, जैसे घिसे-पिटे संवादों से भरे दो-चार मौलानाओं की दकियानूसी और फ़िल्मी बर्गालाहट भरे दृश्यों को नज़रंदाज़ कर दें, तो किसी आतंकवादी की एकलौती बायोपिक होने के साथ-साथ ओमार्ता एक जरूरी और बेहद मुश्किल फिल्म है, देखने के लिए भी और बनाने के तौर पर भी. फिल्म किसी तरह का कोई सन्देश देने की या फिर एक मुकम्मल अंत देने की जिद से बचती है, इसलिए और भी सच्ची लगती है. [3.5/5]

Friday, 8 September 2017

डैडी: कहानी औसत, ट्रीटमेंट उम्दा! [3.5/5]

असीम अहलूवालिया की सिनेमाई दुनिया मुख्यधारा में रहते हुए भी बहाव से अलग, उलटी तरफ बहने का जोखिम पहले भी 'मिस लवली' जैसी फिल्म में उठा चुकी है. कहानी जहां हाशिये पर धकेल दिये गए सामाजिक वर्गों की हो, चेहरे जहां खुरदुरे हों, चेचक के निशान और खड्डों भरे या फिर गहरे लाल रंग की लिपस्टिक में बेतरतीब, बेजा पुते-पुताये, और कमरे इतने घुटन भरे कि सीलन की बास भी नाक से उतर कर अन्दर गले तक आ जाये. असीम इस कम-रौशन, सलीके से बिखरी-बिखराई दुनिया की, तसल्ली-पसंद तरीके से कही जाने वाली कहानी में जिस बारीकी से परदे के आगे बैठे दर्शक के लिए 'माहौल' बनाते हैं, उन्हें बॉलीवुड में ज़ुर्म की दुनिया पर बनने वाली फिल्मों का 'संजय लीला भंसाली' घोषित कर देना चाहिए. कुख्यात अपराधी अरुण गवली की जिंदगी पर आधारित, असीम की 'डैडी' हालाँकि एक ठोस कहानी के तौर पर सामान्य से आगे बढ़ने का हौसला नहीं जुटा पाती, पर फिल्म-मेकिंग के दूसरे जरूरी पहलुओं पर अपनी छाप छोड़ने में कतई निराश नहीं करती.

मुंबई के दगड़ी चॉल में रहने वाले तीन लफंगों की अपनी एक गैंग है. BRA गैंग, B से बाबू (आनंद इंगले), R से रामा (राजेश श्रृंगारपुरे) और A से अरुण गवली (अर्जुन रामपाल). बड़ा हाथ मारने और भाई (फ़रहान अख्तर) के टक्कर का बनने के लिए जो तेवर और ताव चाहिए, अरुण में ही सबसे कम दिखता है. फट्टू भी वही सबसे ज्यादा है, फिर भी हालात उसे भाई के ठीक सामने ला खड़ा करते हैं. सिस्टम की मार से अपराधी बनने की दुहाई देने वाला गवली धीरे-धीरे खुद ही एक पैरलल सिस्टम की तरह काम करने लगता है. जेल में काफी उम्र काट ली है, अब सफ़ेद टोपी पहन के 'गांधी' बनने चला है. शान से कहता है कि वो भाई की तरह 'भगोड़ा' नहीं है. लोग कहने लगे हैं, पर 'रॉबिनहुड' का मतलब भी उसे उसकी बेटी से पता चलता है.

अरुण गुलाब गवली की कहानी या यूँ कहें तो उसकी जिंदगी से काट-छांट कर फिल्म के लिए बुनी गयी कहानी में कुछ भी ऐसा अलग या नया नहीं है, जो इस तरह के तमाम गैंगस्टर-ड्रामा में आपने पहले देखा-सुना न हो. हाँ, घटनाओं को पिरोने और उन्हें एक-एक कर के बड़े तह और तमीज से आपके सामने रखने का असीम का अपना एक ख़ास स्टाइल है, वो इस तरह की फिल्मों के लिए नया और बेहतर जरूर है. असीम अलग-अलग किरदारों के जरिये गवली की कहानी को परदे पर सिलसिलेवार पेश करते हैं, और काफी हद तक कामयाब कोशिश करते हैं कि गवली का किरदार इंसानी लगे और सिनेमाई परदे को फाड़ कर बाहर आने की जुगत से बचता रहे. यही वजह है कि गवली का किरदार जेल में अपनी मौत की आहट भर से ही पसीने-पसीने हो उठता है; उसका एक गुर्गा उसे नयी टेक्नोलॉजी वाली पिस्तौल दिखा रहा है, पर गवली रोती हुई बेटी को झुनझुना बजा कर चुप कराने में ज्यादा मशगूल दिखता है. 

फिल्म में कैमरा अपने लिए आरामदायक जगह नहीं ढूंढता, अक्सर खिड़कियों और दरवाजों के धूल लगे शीशों से लगकर अन्दर झांकना मंजूर करता है. रौशनी बेख़ौफ़ धूप में छन कर नहीं आती, रंगीन लाल-नीले बल्बों में नहा कर चेहरों, पर्दों, और बिस्तरों पर उतनी ही पड़ती है, जितने से उसके होने का वहम बना रहे. किरदारों की स्टाइलिंग से लेकर प्रॉडक्शन-डिजाईन के छोटे से छोटे हिस्सों तक में असीम की पैनी नज़र और पूरी-पूरी दिलचस्पी साफ़ देखने को मिलती है. डिस्को-बार में 'जिंदगी मेरी डांस-डांस' गाने पर थिरकते कलाकारों के साथ, आपको '80 के दशक का बॉलीवुड जीने से एक पल को परहेज़ नहीं होता. जेल में नया कैदी आया है, खूंखार है, खतरनाक है, और मुंह से 'खलनायक' की धुन निकालता रहता है. ज़ाहिर है, 90 का दशक आ गया है. अब सैलून में संजय दत्त और जैकी श्रॉफ के पोस्टर चस्पा हैं. 

असीम अहलूवालिया का सिनेमा अगर 'डैडी' का शरीर है, तो गवली के किरदार में अर्जुन रामपाल का अभिनय साँसे फूंकने जितना ही जरूरी. प्रोस्थेटिक तकनीक से चेहरे की बनावट में ख़ास बदलाव करने तक ही नहीं, अर्जुन एक अदाकार के तौर पर भी पूरी फिल्म में अपनी ईमानदारी से तनिक पीछे नहीं हटते. उनकी खुरदुरी आवाज़, उनकी चाल-ढाल, उनका डील-डौल बड़ी सहजता से उन्हें हर वक़्त उनके किरदार के आस-पास ही रखता है. निश्चित तौर पर यह उनके अभिनय-कैरियर की चुनिन्दा देखने लायक परफॉरमेंसेस में से एक है. कास्टिंग के नजरिये से फ़रहान अख्तर को भाई (दाऊद इब्राहिम के किरदार से प्रेरित) के तौर पर पेश करना सबसे निराश करने वाला प्रयोग रहा. पुलिस इंस्पेक्टर विजयकर की भूमिका में निशिकांत कामत खूब जंचते हैं. अन्य किरदारों में ऐश्वर्या राजेश, श्रुति बापना और राजेश श्रृंगारपुरे बेहतरीन हैं. 

आखिर में; बॉलीवुड क्राइम फिल्मों का जमीनी जुड़ाव एक अरसे से लापता सा था. गैंगस्टर काफी वक़्त से दुबई में कहीं पूल-साइड पर लेट कर बिकनी में लड़कियों को देखते हुए जुर्म के फरमान सुनाने में अपनी शान समझने लगे थे. फिल्मों ने उनमें अपने स्टाइल-आइकॉन तलाशने शुरू कर दिये थे. पक्या, गोट्या, रग्घू और मुन्ना की टेढ़ी-मेढ़ी शक्लों की जगह गोरे-चिट्टे-चिकने चेहरों ने ले ली थी. असीम अहलूवालिया की 'डैडी' उस खाली जगह में बड़ी आसानी और ईमानदारी से फिट बैठ जाती है. [3.5/5]  

Friday, 2 September 2016

अकीरा: मानसिक अत्याचार! [1/5]

आर मुरुगदास की नई फिल्म ‘अकीरा’ की शुरुआत एक सूफी कहावत से होती है. “कुदरत भी आपके उसी गुण का बार बार इम्तिहान लेती है, जो आपके अन्दर सबसे ज्यादा है”. ये बात मुझ जैसे फिल्म समीक्षकों पर एकदम सटीक बैठती है. शुक्रवार-दर-शुक्रवार खराब फिल्मों को झेलने का जिस तरह का और जितना जोखिम हम उठा रहे होते हैं, उतनी ही बेदर्दी से ख़राब फिल्मों का ज़खीरा अगले हफ्ते फिर हमारी तरफ रुख कर लेता है. इन्तेहा तब हो जाती है, जब ऐसी फिल्मों का तूफ़ान गुज़र जाने के बाद भी, उनके बारे में लिखते वक़्त हमें उस मंज़र को दोबारा याद करना पड़ता है. खैर, ये तो अपनी ही चुनी राह है, तो शिकायत क्यूँ?

अकीरा’ देखने-सुनने से आपको महिलाओं के सशक्तिकरण के हक में आवाज़ उठाने वाली एक अलग फिल्म ज़रूर लग रही होगी, और लगती भी है खासकर फिल्म के पहले 10 मिनट में, जब महिलाओं पर होने वाले ‘एसिड अटैक’ जैसे घिनौने अपराधों का सहारा लेकर फिल्म लड़कियों को आत्म-रक्षा के लिए तैयार रहने की सीख देती है. पर, जल्द ही ये सारा माहौल बदलने लगता है और पूरे का पूरा ध्यान गिनती के चार भ्रष्ट पुलिस वालों के खिलाफ एक तेज़-तर्रार लड़की के संघर्ष पर केन्द्रित हो जाता है. गोविन्द राणे [अनुराग कश्यप] की अगुवाई में चार पुलिसवाले एक एक्सीडेंट के दौरान क्षतिग्रस्त कार की डिग्गी से करोड़ो रूपये उड़ा लेते हैं. गोविन्द के जुल्मों से आजिज़ एक सेक्स-वर्कर गोविन्द के इस इकबालिया बयान की विडियो बना लेती है, पर उसका फायदा उठाने से पहले ही विडियो कैमरा एक कैफ़े से चोरी हो जाता है. शक कुछ स्टूडेंट्स पर जाता है, जो पास के ही हॉस्टल में रहते हैं. उसी हॉस्टल की एक स्टूडेंट है अकीरा [सोनाक्षी सिन्हा], निडर, लड़ाकू और दबंग.

अकीरा’ एक दोयम दर्जे की राइटिंग की शिकार फिल्म है, जहां थ्रिलर के नाम पर कुछ भी उल-जलूल पेश किया जाता है, और जिसकी भनक आपको बहुत पहले ही लग जाती है. एक तरफ तो जहां फिल्म अकीरा के बेख़ौफ़ किरदार के साथ कुछ नया पेश करने का ज़ज्बा दिखाती है, वहीँ पुराने ढर्रे की कहानी और कहानी कहने के तरीके में नयापन न ढूंढ पाने की वजह से बहुत ही आलसी और थकी हुई नज़र आती है. ये वो फिल्म है जो सत्तर या अस्सी के दशक से अब तक कोमा में थी, और जहां अब भी दुश्मनों से निपटने के लिए उन्हें ‘पागलखाने’ भेज दिया जाता है. यहाँ मानसिक रोगियों को ‘पागल’ दिखाने और बोलने में किसी को कोई गुरेज़ या झिझक नहीं होती. यहाँ अब भी हर मनोरोगी का इलाज़ बिजली के झटके और इंजेक्शन ही होते हैं. फिल्म एक हिस्से में बालाजी टेलीफिल्म के धारावाहिकों से भी प्रेरित लगती है, जब नए ज़माने की बहू अपनी सास को पहली बार देखती है और दौड़ कर उसके पैरों के पास से बच्चे के खिलौने उठाने लगती है. सास को लगता है, वो पैर छूने आई थी. बेटे के चेहरे पर कोई भाव नहीं हैं.

अकीरा’ दर्शक के तौर पर आपकी मानसिक क्षमता को कमतर आंकने का दुस्साहस बार-बार करती है. हर छोटी से छोटी बात को तसल्ली से बयान करने में इतना उलझी रहती है कि अपने ढाई घंटे के पूरे वक़्त में ज्यादातर बेमतलब और वाहियात ही लगती है. फिल्म के चंद गिने-चुने मजेदार पल अनुराग कश्यप को देखते हुए बीतते हैं, जहां उनका मजे ले-लेकर अभिनय करना, उनके किरदार के कमीनेपन पर भारी पड़ता रहता है. आखिर के दृश्य में, ये बावलापन और भी बढ़ कर गुदगुदाता है. ईमानदार और चौकस गर्भवती पुलिस अफसर की भूमिका में कोंकना सेन शर्मा पूरी फिल्म में अलग-थलग सी पड़ी रहती हैं. उनका फिल्म में आना-जाना बड़ी बेतरतीबी से होता है. सोनाक्षी अपनी पिछली फिल्मों से अलग यहाँ पूरी शिद्दत से अपने किरदार में ढली रहने की कोशिश करती हैं. एक्शन दृश्यों में उनका आत्मविश्वास और खुल के सामने आता है.

अंत में, ‘अकीरा’ नारी-शक्ति की जिन उम्मीदों की दुहाई देती है, उन्हें तोड़ने और मिट्टी में मिलाने का सुख भी अपने हिस्से ही रखती है. अकीरा की सारी लड़ाई अपने अस्तित्व तक ही सीमित रख कर, वो भी एक ऐसे घटनाक्रम के ज़रिये जहां उसकी मौजूदगी में न कोई वाजिब वजह हो, न कोई संवेदनशील उद्देश्य, फिल्म अपने औसतपन से ऊपर उठने की कोशिश भी नहीं करती. और नीचे गिराने में रही सही कसर पूरी कर देता है, फिल्म का बहुत ही ठंडा, हल्का और लचीला स्क्रीनप्ले. इसे देखना खुद पर एक मानसिक अत्याचार से कम नहीं! [1/5]      

Friday, 12 August 2016

रुस्तम: सुस्तम, सुस्तम!! [1.5/5]

बॉलीवुड को कुछ चीजों में खासा मज़ा आता है. सच्ची घटनाओं को उठाओ, उनके जुड़े जमीनी किरदारों को कार्टून की तरह लम्बे, चौड़े, भद्दे बना दो, और फिर उन्हें इस शान से परोसो जैसे आपने कितना बड़ा एहसान किया हो हिंदी सिनेमा और देश के दर्शकों पर. 1959 के मशहूर और ऐतिहासिक नानावटी केस पर आधारित, टीनू सुरेश देसाई की ‘रुस्तम’ एक ऐसी ही बेशरम और ढीठ फिल्म है, जिसकी हिम्मत पर आपको सिर्फ गुस्सा और झुंझलाहट आती है, खासकर तब जब आप जानते हैं कि इसके निर्माताओं ने ‘ वेडनेसडे’, ‘स्पेशल छब्बीस’ और ‘बेबी’ जैसी समझदार फिल्मों से बॉलीवुड का एक नया चेहरा गढ़ा है. ‘रुस्तम’ न सिर्फ नानावटी केस की अहमियत और संजीदगी का मज़ाक बनाती है, बल्कि हिंदी सिनेमा में अब तक का सबसे वाहियात ‘कोर्टरूम’ ड्रामा दिखाने का सौभाग्य भी हासिल करती है.

फिल्मों में देशभक्ति का नया ‘पोस्टर-बॉय’ बनते जा रहे अक्षय कुमार यहाँ भारतीय नौसेना के कमांडर बने हैं, कमांडर रुस्तम पावरी, जिनकी एंट्री तिरंगे के सामने सफ़ेद यूनिफार्म में कदमताल करते हुए होती है. बीवी सिंथिया [इलियाना डी’क्रूज़] का अवैध सम्बन्ध अमीर दिलफेंक विक्रम मखीजा [अर्जन बाजवा] के साथ है. पता चलते ही, रुस्तम विक्रम के सीने में 3 गोलियों उतार कर उसकी हत्या कर देता है, और फिर खुद पुलिस स्टेशन में जाकर सरेंडर. आपकी जानकारी के लिए बता दूं, मुंबई का नानावटी केस भारतीय न्याय व्यवस्था का वो मशहूर मामला है, जिसमें फैसले तक पहुँचने के लिए आख़िरी बार ज्यूरी का इस्तेमाल हुआ था. एक ऐसा सनसनीखेज मामला, जब पूरी पब्लिक एक खूनी की रिहाई के लिए सड़कों पर उतर आई थी. असली मामले में भले ही सारा फोकस इस बात पे रहा हो कि खून तैश में आकर किया गया था, या ठंडे दिमाग से सोचकर; यहाँ फिल्म अक्षय कुमार के स्टारडम को ही सजाने-संजोने में लगी रहती है. फिल्म में देशभक्ति का तड़का भी इसी इमेज को और चमकाने की एक सस्ती कोशिश है.

90 के दशक की फिल्मों में अक्सर आपने नायक को कोर्ट में लकड़ी के कठघरे को उखाड़ कर विरोधी पक्ष के वकील या गवाहों की तरफ दौड़ते देखा होगा (अक्षय खुद भी ऐसी फिल्मों का हिस्सा रहे हैं). राहत की बात है यहाँ ऐसा कुछ नहीं होता, पर यहाँ जो होता है वो भी कुछ कम नहीं. दलीलों के नाम पर बचकानी जिरहें, हँसी के लिए ओछे मज़ाक, कोर्ट में मौजूद पब्लिक की बेमौसम तालियों और ’एक रुका हुआ फैसला’ की तर्ज़ पर ज्यूरी की अधपकी कशमकश; ‘रुस्तम’ हर तरफ अपने दिमागी दिवालियेपन की नुमाईश करती नज़र आती है.

परदे पर खूबसूरत फ्रेम को पेटिंग्स कहकर आपने कई फिल्मों के आर्ट डायरेक्शन और कैमरावर्क की दिल खोल कर सराहना की होगी. इस फिल्म में भी इस तरह के तारीफ़ की पूरी गुंजाइश है, अगर आपको अपने 5 साल के बच्चे की ‘माइक्रोसॉफ्ट पेंट’ में की गई हरकतें भी पेंटिंग लग्रती हों तो. इतने सारे चटख रंगों को एक साथ इससे पहले शायद मैंने ‘एशियन पेंट्स’ के शेड कार्ड में ही देखे होंगे. फिल्म का कानफाडू बैकग्राउंड स्कोर जज साहब के हथोड़े की तरह सर पे बजता ही रहता है. और उसपे, एक्टिंग में परफॉरमेंस का अकाल. कोई न कोई इंडस्ट्री में है, जो ‘सीरियस एक्टिंग’ का मतलब कैमरे के सामने सीरियस रहना समझता है और दूसरों को समझाता भी है. वैसे ‘रुस्तम’ में कुमुद मिश्रा साब एकलौते ऐसे कलाकार हैं, जिनकी एक्टिंग के रंग फिल्म के दूसरे कलाकारों से कहीं ज्यादा और बेहतर तरीके से खिल के और खुल के सामने आते हैं. पवन मल्होत्रा और कंवलजीत सिंह उनके बाद आते हैं.

अंत में; ‘रुस्तम’ एक बहुत ही थकी हुई फिल्म है, जो सिर्फ अक्षय कुमार की उस एक छवि का भरपूर फायदा उठाने के लिए बनाई गयी है, जिसमें वो अपने सस्ती, बेसिर-पैर की कॉमेडी से अलग कुछ संजीदा देने का दम भरते हैं. नायक कहानी में बड़ा हो, चलेगा! कहानी से बड़ा हो जाए? ये खतरनाक संकेत हैं. आखिर, एक और सलमान किसे चाहिए? [1.5/5]        

Friday, 24 June 2016

रमन राघव 2.0 (A) : कालिख़ से भी काली, कश्यप की दुनिया! [4/5]

जोड़ियां आसमानों में बनती हैं. अकेले हम अधूरे हैं और हमें पूरा करने वाला भी दुनिया में कहीं न कहीं अधूरा-अधूरा घूम रहा है, तब तक जब तक दोनों मिल नहीं जाते. कई बार हम उसे ग़लत जगह तलाशने में लगे रहते हैं, और कई बार एक झटके में ही वो सामने दिख जाता है. फिल्मों में पहली नज़र का प्यार अगर आपको लगता है कुछ ख़ास बड़े नामों की ही बपौती है? तो आप को बड़ी बुरी तरह ग़लत साबित करते हैं अनुराग कश्यप. अपनी नई फिल्म ‘रमन राघव 2.0’ को अनुराग उनकी सबसे ख़तरनाक लव-स्टोरी का दर्जा देते हैं.

अनुराग कश्यप और लव-स्टोरी?? इसका सटीक जवाब तो आपको फिल्म के आख़िरी पलों में ही मिलता है, पर अच्छी बात ये है कि ‘बॉम्बे वेलवेट’ की नाकामयाबी ने उन्हें वापस उनके अपने जाने-पहचाने दायरे में ला खड़ा किया है. हालांकि भारतीय सिनेमा में ये दायरा भी उन्हीं की बदौलत इस मुकाम तक पहुंचा है. यहाँ उनका कोई दूसरा सानी नहीं. इस बार भी उनसे कहीं कोई चूक नहीं होती. ‘रमन राघव 2.0’ अब तक की उनकी सबसे ‘डार्क’ फिल्म बिना किसी झिझक कही जा सकती है. रक्त का रस और गाढ़ा हो चला है. खौफ़ का चेहरा पल-पल मुखौटे बदल रहा है. अँधेरे का साम्राज्य और गहराने लगा है.

अनुराग शुरुआत में ही साफ़ कर देते हैं, फिल्म 60 के दशक में रूह कंपा देने वाले सनकी सीरियल किलर रमन राघव की कहानी बिलकुल नहीं है. हाँ, कहानी पर उस पुराने रमन राघव की परछाईं हमेशा ज़रूर मंडराती रहती है पर 2015 के आस-पास के कथाकाल में अब रमन और राघव दो अलग किरदारों में बंट जाते हैं. पिछले ढाई साल में 9 क़त्ल हुए हैं. रमन्ना [नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी] ने खुद को पुलिस के सामने पेश कर इकबालिया बयान में जुर्म कबूल भी कर लिया है, पर उसकी ऊटपटांग बातों और हद औसत हुलिये पर ना तो एसीपी राघवन [विक्की कौशल] को यकीन है ना ही दूसरे पुलिसवालों को. हालाँकि दर्शक के तौर पर आपके मन में रमन्ना को लेकर कोई संदेह नहीं रहता. असली रमन राघव वायरलेस पर भगवान से सीधे-सीधे बात करने का दम भरता था. अपना रमन्ना खुद को भगवान का ‘सीसीटीवी कैमरा’ मानता है और दोनों हाथों से हवाई दूरबीन बनाकर अपने शिकार को अपनी लोमड़ी वाली कंचई आँखों से देखता रहता है. मारना उसके लिए ‘खाना खाने और हगने’ जैसा ही है. रोजमर्रा का काम.

राघवन एक अलग तरह का जानवर है. बहुत कुछ हमारी ही तरह. पुरुष अहंवाद में लिपटाया, नारी-विरोधी और नशे में सर तक डूबा हुआ. सड़ रही लाशों के बीच क्राइम-सीन पर भी नाक में पाउडर उड़ेलता, बिस्तर पर ‘कंडोम’ न पहनने वाला आम मर्द, जिसे नशे के चलते अपने ढीली पड़ती मर्दानगी के ऊपर किये गए ठहाके अन्दर तक भेद जाते हैं. राघवन सोता नहीं. कभी नहीं. राघवन को तलाश है रमन की और मज़े की बात है कि रमन को भी राघवन उतना ही चाहिए, जितना सिगरेट के लिए माचिस. पकड़म-पकड़ाई के इस खेल में अँधेरा जब छंटता है तो उजाला नहीं होता, बल्कि अन्दर से एक और अँधेरा आपको निगलने के लिये बढ़ लेता है. पहले वाले से कहीं ज्यादा काला, घुप्प और डरावना.

मुंबई की झुग्गी-झोपड़ियों के बीच अनुराग एक ऐसी दुनिया खोज लेते हैं, जो आपका देखा-सुना-जाना तो लगता है पर एक अनजाने रहस्य की तरह आपके सामने परत-दर-परत खुलता भी रहता है. विचलित कर देने वाली हत्याओं के वक़्त, अनुराग डर, खौफ़ और सनक का एक ऐसा मिला-जुला माहौल बनाते हैं कि आप उसमें अन्दर धंसते चले जाते हैं. कैमरा इस बार खून में नहा जाता हो, ऐसा शायद ही कभी होता है (मैं शिकायत कत्तई नहीं कर रहा) पर जिस तसल्ली से अनुराग पहले रमन्ना के हाव-भाव पर नज़रें गड़ाये रहते हैं और बाद में उन खौफज़दा चेहरों पर, आप सहम कर अपनी सीटों में दुबक जाते हैं या फिर आँखें फेर लेते हैं. फिल्म में औरतों के किरदार से आप कमोबेश नाखुश ही लौटते हैं. डरी-सहमी, घुटने टेक देने वाली अपने ही भाई से यौन-पीड़ित बहन हो या तीन-तीन गर्भपातों से गुजर चुकी गर्लफ्रेंड, यहाँ आपको कुछ बहुत मज़बूत नहीं दिखने वाला.

अभिनय में जूनून देखना हो तो ‘रमन राघव 2.0’ में सिद्दीकी को देखिये. हालाँकि उनमें ‘बदलापुर’ के ‘लायिक’ की झलक देखने को ज़रूर मिलती है, पर इस बार उनका पागलपन सारी हदें पार कर देता है. हैरत में डालते हैं आपको ‘मसान’ के विक्की कौशल. अपनी तीसरी ही फिल्म में उन्हें इस तरह का जटिल किरदार इतनी बखूबी निभाते देखना हैरतंगेज़ अनुभव है. अमृता सुभाष जबरदस्त हैं. अपने एक अदद सीन में ही वो आपको अन्दर तक झकझोर जाती हैं.

अंत में, ‘रमन राघव 2.0’ सिर्फ एक आम क्राइम थ्रिलर नहीं है. फिल्म उन अनुराग कश्यप की वापसी दर्ज कराती है जिन्हें लीक पर चलना आता ही नहीं. हिंदी सिनेमा के सदियों पुराने घेरे तोड़ने में जो बहुत उतावले भी दिखते हैं और कभी-कभी बहुत बनावटी भी, पर हैं दो-टूक. सनकी रमन्ना कहता है ना, “मैं आड़ में नहीं मारता. वर्दी की, धर्म की, इंसानियत की खाल के पीछे छुपकर नहीं मारता.” ठीक वैसे ही. [4/5]        

Friday, 10 June 2016

तीन: कहानी रिटर्न्स! [3/5]


फिल्मों के नाम इन दिनों काफी चर्चा में हैं. तो शुरुआत नाम से ही करते हैं. रिभु दासगुप्ता की ‘तीन’ का नाम ‘तीन’ ही क्यूँ रखा गया, ‘कहानी-2’ क्यूँ नहीं; फिल्म देखने के बाद भी मेरी समझ से परे है. कहीं ‘तीन’ सुजॉय घोष की ‘कहानी’ श्रृंखला की वो तीसरी पेशकश तो नहीं, जो ‘कहानी-2’ से पहले आ गयी? खैर, नाम के पीछे का रहस्य जो भी हो, एक बात तो तय है कोरियाई क्राइम थ्रिलर ‘मोंटाज़’ की ऑफिशिअल रीमेक ‘तीन’ पर सुजॉय घोष की ‘कहानी’ का असर साफ़-साफ़, सुन्दर-सुन्दर और सही मायनों में दिखता है. सुजॉय फिल्म के निर्माताओं में सबसे प्रमुख हैं तो ये गैर-इरादतन, नाजायज़ या हैरतंगेज़ भी नहीं लगता. बहरहाल, ‘तीन’ एक बहुत ही करीने से बनाई गयी थोड़ी अलग किस्म की थ्रिलर है, जो आपको हर पल नए-नए रहस्यमयी खुलासों की बौछार से असहज भले ही महसूस न कराये, एक जानलेवा ठहराव के साथ आपको अंत तक कुरेदती ज़रूर रहती है.

जॉन बिश्वास [अमिताभ बच्चन] पिछले आठ साल से पुलिस स्टेशन के चक्कर लगा रहे हैं. किडनैपिंग के बाद उनकी नातिन की मौत एक एक्सीडेंट में हो गयी थी, जिसके बाद अब तक किडनैपर का कोई सुराग पुलिस के हाथ नहीं लगा है. केस लगभग बंद हो चुका है. उस वक़्त के इंस्पेक्टर मार्टिन दास [नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी] नाकामी का बोझ सीने पर लिये अब चर्च में फ़ादर बनकर सुकून तलाश रहे हैं. नई पुलिस ऑफिसर सरिता सरकार [विद्या बालन] को भी जॉन से पूरी हमदर्दी है पर कहीं से कोई उम्मीद दिखाई नहीं देती. ऐसे में एक दिन, एक और बच्चे की किडनैपिंग का मामला सामने आता है. सब कुछ दोबारा ठीक वैसे ही घट रहा है जैसे आठ साल पहले जॉन के साथ हुआ था.

घटनाओं का पहले तो बड़ी बेदर्दी से इधर-उधर घाल-मेल कर देना और फिर धीरे-धीरे उन्हें उनके क्रम में पिरोकर आईने जैसी एक साफ़ तस्वीर सामने रख देना, किसी भी थ्रिलर के लिए ये सबसे अहम् चुनौती होती है. रिभु दासगुप्ता इन दोनों पहलुओं को बराबर तवज्जो देने में थोड़े ढीले नज़र आते हैं. जहां फिल्म के दूसरे भाग में रिभु बेतरतीब सिरों को जोड़ने में जल्दबाजी दिखाने लगते हैं, वहीँ पहले भाग में किरदारों के भीतर के सूनेपन, खालीपन और उदासी में सोख लेने वाली धीमी गति आपको परेशान भी करती रहती है. हालाँकि कोलकाता शहर के किरदार की रंगीनियत को बखूबी स्क्रीन पर उतार देने में रिभु कहीं कमज़ोर नहीं पड़ते. सरकारी दफ़्तरों में धूल चाटती फाइलों के अम्बार के बीच बैठे रूखे चेहरे हों या घरों-दीवारों पर लटकती बाबा आदम के ज़माने की तस्वीरें और तश्तरियां; फिल्म का आर्ट डायरेक्शन काबिल-ए-तारीफ है.

अमिताभ बच्चन जिस कद के अभिनेता हैं, उन्हें अब कुछ भी साबित करने की जरूरत नहीं है. सिनेमा और अभिनय के प्रति उनकी ललक भी बढ़ती उम्र के साथ बढ़ती ही रही है, पर ‘तीन’ में उनका अभिनय कोई नई ऊँचाईयाँ हासिल नहीं करता, बल्कि एकरसता ही दिखाई देती है. हाँ, उन्हें अपनी ही उम्र को परदे पर जीते देखना कोई कम अनुभव नहीं है. नवाज़ुद्दीन अच्छे हैं, पर उनके किरदार में थोड़ी उलझन है. कहीं वो फिल्म में हंसी की कमी पूरी करने में लगा दिए जाते हैं (चर्च वाले दृश्यों में खासकर) तो कहीं एक बड़े संजीदा पुलिस वाले की भूमिका जीने में मशगूल हो जाते हैं. विद्या बालन और सब्यसाची चक्रबर्ती छोटी भूमिकाओं में भी स्क्रीन पर चमक बिखेरने में कामयाब रहते हैं.

कोरियाई फिल्म ‘मोंटाज़’ अगर आपने देखी हो, तो ‘तीन’ दूसरे रीमेक की तरह बेशर्मी से दृश्यों की नक़ल करने की होड़ नहीं दिखाती, बल्कि एक बेहतरीन आर्ट डायरेक्शन और सधे हुए अभिनय के साथ आपको कुछ अलग परोसने की कोशिश करती है. ‘मोंटाज़’ में जहां क्राइम और उससे जुड़े घटनाक्रम को रोमांचक बना कर पेश किया गया है, ‘तीन’ किरदारों के भीतर और बाहर दोनों की दुनिया को तसल्ली से देखने और दिखाने में अपना वक़्त ज्यादा लगाती है. हर कहानी ‘कहानी’ नहीं हो सकती, पर इसमें बहुत कुछ है जो आपको ‘कहानी’ की याद दिलाता रहेगा...और अच्छी यादें किसे पसंद नहीं? [3/5]                

Friday, 22 April 2016

LAAL RANG: Randeep Owns it, Nails it, Kills it! [3/5]

The boy is on his first date. He is leaving after dropping the girl at her hostel. He recalls something, returns to her and hands over a greeting card written ‘I Love You’ in blood all over it. The girl loses her calm, “Where have you cut yourself?” The boy throws a swayed smile, “Don’t worry, I haven’t.”Syed Ahmad Afzal’s crime-thriller LAAL RANG in the very same way has blood all over it in almost every frame; either they talk about it or they play with it but still, it never gets bloody except for one particular slackly done scene. In fact, LAAL RANG turns out to be a serenely invested, edgily engaging thriller with a good set of dark humor and at least one towering performance under the name, Randeep Hooda.

Syed Ahmad Afzal throws us in Haryana of a fascinating era where Yamaha RX100 used to be the class not many can afford. There rises Shankar (Randeep Hooda), an over-aged diploma student in local medical college of Karnal! He’s the kind every girl disgusts and every boy admires. The son of a government peon, Rajesh (Akshay Oberoi) too has no immunity to fall for swaggy Shankar’s persuasive power-display.  Shankar is a pro in the illegal blood-selling racket. His supplies come from the Bihar migrants in Karnal working as the rickshaw-pullers. A small token of money and they will lie down for you to suck the blood out. Considering Shankar’s influential connections in the system, it is nothing but an easy money territory Rajesh starts building his own mansion of dreams upon it, with Poonam (Piaa Bajpai). Things derail when one of the donors dies after excessive blood loss.

LAAL RANG has an interesting plot most of today’s Hindi films lack at the first place to start with. Syed Ahmad Afzal makes sure it takes its own course of time to grow on the viewers. He never looks in hurry when establishing scenes or while making the shift from one to another. Not many filmmakers believe in doing so when Syed actually does it, you feel more relaxed but evenly more anxious about the part of plot yet to be revealed. Another big merit film possesses is its lingo. Be it the conversational dialogues between its real-looking characters or the lyrics of the album used all of it as background songs; LAAL RANG entices you with its unapologetically raw, rusty, ruthless yet delicious Haryanvi language.

Film also carries a brigade of fascinating characters on screen. There is a fakir interestingly talking in a women’s voice. A subordinate of Shankar is fondly named as ‘Dracula’ as he deals in maximum transfer of blood. In the chart of performances, LAAL RANG solely belongs to the devoted portrayal of Shankar by Randeep Hooda. Being a Haryanvi himself, he fabulously adopts the lingo and the attitude in its right place. See him flaunting his powers in sunny days or trashing it all when his girlfriend breaks up with him; and you’ll see the range he is capable of pulling it off as a confident actor. This could be a plate of starters before you’ll enjoy and respect him more in SARBJIT in coming few weeks. Akshay Oberoi acts well but his all chalky appearance often creates a sense of disbelief in his performance.

Overall, LAAL RANG is a good thriller that may not pump your heartbeat up in the usual way most of bollywood thrillers do. It also might not give you much of a pulsating action to cheer, and it definitely would not pitch obligatory twists & turns in the plot but even then, the firm writing has enough to make it an enjoyably unlike experience. [3/5]

Friday, 31 October 2014

GONE GIRL: Miss it…and you will miss it! [4/5]

She is a Type A. She is a decorated scholar, bright and kind in personality. 5 years in the institution called marriage and still, you wouldn’t notice a single line of discontentment on her highly proud forehead. She is the ‘amazing Amy’ her proud parents has based their bedtime-story series on. She herself is a writer with almost no friends in the quite friendlier town of Missouri. She is missing from her house, under suspicious circumstances. 

He is a Type B. He is a writer too but the mean times of recession have had him quite bad. His double-chinned face has a villainous impression, according to his wife of 5 years. He’s lethargically casual, wittily complaining and looks hardly convinced about his wife & marriage. He is the prime suspect behind his wife’s disappearance, possibly murdered by now.

David Fincher is back in theatres with GONE GIRL- a relentlessly engaging missing-drama that never approves you sitting quietly through any of its chain of events. The incredulity in the character you had just made likeable to you and your own sense of judgment getting activated soon after the air gets clear keeps you in an unsettling mood & mode of ‘What might have happened?’ to ‘What actually has happened?”.

Adapted for the screen from the bestselling novel by screenwriter Gillian Flynn, GONE GIRL is more of a psychological drama than a crime-thriller. One fine morning on his Fifth marriage anniversary, Nick [Messily cool & composed Ben Affleck] returns to his home to find his wife Amy [Mysteriously ‘a treat-to-eyes’ Rosamund Pike] missing. Before the local detectives [Kim Dickens plays one of the two] could actually give the investigation a demanding pace comes the frenzied whirl of media to cover the story. It takes no time to trace the disrespect, missing love, dishonesty and the tense-air between the two in the married life. Rest follows the twisted plot, diverse perspectives to events and a layer-on-layer dissection of the most researched and widely conversed social school of commitment i.e. marriages!

Taking from the original work of fiction, David creates a parallel narrative of one in present with Nick getting plunged into the proceedings of investigation, while the other goes back in regular intervals to revisit the good old times of romance blooming in the air. David successfully hammers on the role of media and the broaden technology juicing the best they want. When the mother announces a dedicated website & hotline number to find any clue of her missing daughter, you sure find yourself in the midst of generous giggling and joining it with equal force.

With a haunting background score and commendably cinematographed scenes, GONE GIRL gels well with absolutely in-sync performances of Affleck and Pike both. Affleck with his paunchy, weathered, sluggish look and the contagious resilience in attitude delivers his most pitiable yet pretentious character on screen. Pike surprises you with the most being unforeseen and undercover due to the twists in the plot. I wish I could unravel more to add more to illustrate her part here. In short and sweet, it’s a stellar.

And the final word on the film! GONE GIRL is one the best thrillers, this year! No doubt on that. The duration and the pace could sure make you shifting eyes from the screen but the finesse in the storytelling and the craftsmanship involved will pay you back of your every single penny spent on it. Missing this ‘Missing Story’ is not at all recommended! [4/5] 

Friday, 1 August 2014

LUCY: Enjoyable mash-up of chaotic Creative Junk & high-on intellectual trash! [2.5/5]

Human Brain has endless possibilities and a kind of galaxy of information that make us better and more sensible than any other living souls on this planet. But if Newton could push his to unravel the mystery of gravity after the ‘apple’ effect or the Wright brothers could manage to pull out their aeronautical inventions; trust me, they all were using just 10% of their mind. Naturally, we the average people don’t even hit that level. Now think, if mere 10% can make someone a Newton or Leonardo Da Vinci or Aryabhatta, what magical excellence a 100% would produce? LUCY, I say and that’s the cynicism one develops while watching Luc Besson’s science-fiction thriller LUCY. Trying to sound multifaceted, intricate and advanced like THE TREE OF LIFE and look slick-pacy & pulsating as LA FEMME NIKITA, LUCY actually ends up in being not more than a chaotic creative junk mixed with high-on intellectual trash.

Lucy, played by the ever-startling Scarlett Johansson gets in trap of a Korean mob during an involuntary drug delivery mess. Soon, she finds herself as one of the human drug carriers with a pack of highly synthetic CPH4 powder positioned in their lower abdomen in a surgical operation. Much before she could be transported to her planned destination, an unwanted brawl lends her in a serious problem or magical transformation in disguise. The pack gets burst and now the invincible chemical reactions start stimulating human mental powers to reach its maximum. No wonder, Lucy is now a superwoman who needs to walk the path of retribution and revolution, later!

From the very speedy time-lapse shots to the earth evolution theory getting reproduced on screen with amazing visuals, LUCY at places looks a distant cousin to THE TREE OF LIFE, though the depth and connect go missing at large. But if it is not into its National Geographic Mode, it is sure a thriller that never loses the steam. Monologues by Morgan Freeman, playing a neurology expert scientist talking about magical capabilities of a human mind and how evolution can become revolution followed by the same getting applied on Lucy’s situation is nicely interwoven. With just a 90 minute of duration, this is in fact too much jam-packed in one box. Film doesn’t think much before slipping and swapping genres of all kinds. At one if it joins the league of science-fiction, minutes later you will find it covered as a regular Hollywood action-thriller. No wonder, you don’t really feel like connected to any.

Having said that, it is not an unwatchable film at all! Scarlett Johansson alone is capable of pulling it off for the most, her earlier performance in HER shouts out loud to prove the point. Morgan Freeman is as usual extremely sincere and charismatic, one of my favorites. Besides, the visual effects are never involved and incomprehensible like we see in most of Hollywood’s regular Friday flicks but simplified or I would say over-simplified. Film’s action sequences are average. Drama is almost overshadowed by the cerebral investigations and research theories. I doubt if even Luc Besson had his share of 10% implied on this film. This is not a piece of information you would like to keep in your mind but having a good time with it, is completely different. Watch out for Ms. Johansson! [2.5/5]

Saturday, 29 March 2014

STATION: …deserves a watch for the freshness it brings to Bollywood crime-thrillers! [3/5]

In midst of this week’s more than a couple of bogus Bollywood A-listers, there is a small film [in budget for sure] titled as ‘STATION’ getting unnoticed by most of us. So, when I reached at the box-office at the nearest PVR multiplex in Delhi-NCR, least I had expected to hear that the show got cancelled as it’s just me who had shown some guts to go for it. Anyways; thanks to the collective love for cinema, the guys at the box-office decided to run it despite me being the only one in the auditorium. And now that I have seen it, I would like to proclaim that this small one is bigger than the rest 3 new releases from Bollywood this week.  

Saad Khan’s STATION is the first Bollywood film that comes from Bangalore. A crime-thriller in its genre; it smells fresh, clean, crisp, mature, confident and quite a fine piece of film-making for so many newcomers involved in it. Though unlike most of indie filmmakers, it doesn’t prefer to be smarter than the smartest to grab attentions from left, right and centre of the industry and opts for a safe and sound route to tell a ‘perfect for Bollywood’ tale of plotting, betrayals, dark secrets, murders in the power hungry immoral world of crime.

Introduced by the badman of Bollywood Gulshan Grover, STATION puts you in the colonnade of a crime syndicate run by a formally dressed, soft-spoken King in frameless pair of glasses. The associates too are symbolically introduced as the facets in any playing-card pack. There is a loyal Queen, a hardcore Madhuri Dixit fan but murderous Joker who loves to joke even in a heated scenario, a cool-headed Jack with balanced mind as the right hand to the king and a game-changer Ace who talks to his dead girlfriend in his state of hallucination after getting drugged. The game on the board turns upside down when the King gets killed. And now the Queen has taken the charge to solve the mystery and punish the responsible! The plan must be executed by the rest three and then starts the mind games that doesn’t make you breathe in regular motion till you come to see the clearer picture of why, how and who.

Film’s biggest strength is undoubtedly the background score. Music by Jeet Singh celebrates the western elements in singing and in the composition to give it a young contemporary urban touch. The narrative pattern scatters the plot and the events at first and then tries to solve the puzzle by putting pieces together. Sharp, crisp and confident editing! Cinematography is absolutely appropriate for the genre. Performers are mostly newcomers and it looks. Though they act raw, conscious and amateurish sometimes, it is not much difficult to ignore as Saad sure knows his craft well to tell a story as it should be.

STATION is not some extraordinary thriller but it is not just any ordinary thriller too. It is a Bollywood film that doesn’t actually come from Bollywood.  It deserves a watch for the freshness it brings to the Bollywood crime-thrillers! [3/5]