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Friday, 26 July 2019

जजमेंटल है क्या: कुछ नया, कुछ रोमांचक...और थोड़ी सी कसर! [3/5]

आम जिंदगी की बात करें, तो किसी को भी बात-बात पर हंसी-मज़ाक में ‘पागल करार देने और वास्तव में किसी गंभीर मनोरोग से जूझते व्यक्ति को ‘मेंटल कह कर संबोधित करने में हम किसी तरह का कोई फ़र्क या अपराध-बोध महसूस भी नहीं करते. इसका काफी दारोमदार हमारी फिल्मों के सर भी जाना चाहिए. दिमाग़ी रूप से असंतुलित व्यक्ति को ‘दुनिया तबाह करने पर तुला हुआ खलनायक साबित करने के सिवा हमारी समझ कुछ और देखना या दिखाना ही नहीं चाहती. ‘जजमेंटल है क्या इस लकीर से बंध कर नहीं रहती, और अपने दायरे बढ़ाने की हर मुमकिन कोशिश करती है.

फिल्म की मुख्य किरदार एक्यूट सायकोसिस नाम के मनोरोग से ग्रस्त है, पूरी फिल्म में उसकी मन:स्थिति सत्य और भ्रम के झूले में हिचकोले खाती रहती है. उसे दिन के उजाले में वो लोग भी दिखाई और सुनाई देते हैं, जो असल में हैं ही नहीं और सिर्फ और सिर्फ उसके दिमाग का खलल हैं. 80 और 90 के दशक की दर्जनों फिल्मों में ‘पागलखाना खलनायक द्वारा नायक को रास्ते से हटाने के लिए महज़ एक जरिया बना कर दर्शाया जाता रहा है. सलाखों के पीछे ऊल-जलूल बकते और अतरंगी हरकतें करते लोगों को देखकर आप बस हंस ही सकते थे, या फिर इस इंतज़ार में रहते थे कि कब नायक वहाँ से भगे और देश को खलनायक के घातक इरादों से बचाये.  

बॉबी (कंगना रानौत) सलाखों के पीछे नहीं रहती. वो मुंबई के एक इलाके में आपकी अजीब-ओ-गरीब पड़ोसी हो सकती है. अकेले रहती है. फिल्मों में डबिंग आर्टिस्ट का काम करती है. पूरी फिल्म में दवाइयां खाती है, और जब नहीं खाती, उसे कॉकरोच दिखने लगते हैं- मतलब हालत बिगड़ रही है. बचपन में माँ-बाप के बीच रोज़ाना के झगड़े के दौरान उनकी दुर्घटनावश मौत की ज़िम्मेदार ठहरा दिए जाने के बाद, अब बॉबी के ज़ेहन में वही किरदार लुका-छिपी खेलते रहते हैं, जिनको बॉबी परदे पर अपनी आवाज़ दे रही होती है. ऐसे में, एक दिन किरायेदार बन कर आते हैं केशव (राजकुमार राव) और उसकी पत्नी रीमा (अमायरा दस्तूर). शुरू-शुरू में तो बॉबी का झुकाव केशव की तरफ होने लगता है, पर बाद में उसे लगने लगता है कि केशव अपनी बीवी को मारना चाहता है. एक दिन रीमा का क़त्ल हो भी जाता है, लेकिन बॉबी केशव को क़ातिल साबित नहीं कर पाती, उलटे अपने मनोरोग की वजह से खुद शक के घेरे में आ जाती है.

‘जजमेंटल है क्या अपने टीज़र-ट्रेलर और पोस्टर्स से एक ऐसी थ्रिलर फिल्म होने का अनुमान पैदा करती है, जहां एक क़त्ल के दो आरोपी हैं और आरोप-प्रत्यारोप में दोनों की अपनी-अपनी दलीलें, जो केस का रुख बार-बार एक-दूसरे की तरफ मोड़ती रहती हैं. फिल्म में इस तरह का रोमांच बस कुछ पलों के लिए ही बना रहता है, बाक़ी के वक़्त में फिल्म कंगना के किरदार की अतरंगी खामियों और कमियों को हास्यास्पद बना कर पेश करने में, या फिर कंगना की मनोदशा को प्रभावित करते मनगढ़ंत किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती रहती है. फिल्म कुल मिलाकर जिन दो निष्कर्षों पर अपने होने की ज़मीन तय करती है- एक, ‘सीता-हरण रावण की चाल न होकर, सीता की सोची-समझी रणनीति भी तो हो सकती है’ और दूसरा- मनोरोग से ग्रस्त लोगों को समझने की ज़रूरत; दोनों फिल्म में उस दम आते हैं, जब तक दर्शक और लेखक-निर्देशक अंत का मुंह ताकते-ताकते थक चुके हैं.

बॉबी कॉकरोच के एक ख़ास तस्वीर पर जाकर बैठ जाने को क़त्ल के सबूत के तौर पर पुलिस के सामने पेश कर रही है, और दर्शक उसकी मानसिक अवस्था पर सहानुभूति दिखाने के बजाय हंस रहे हैं. लेखक-निर्देशक मौन हैं, क्यूंकि सारा ज्ञान अंत के लिए बचा के रखा है. और अंत भी इतना जाना-पहचाना कि जो बिलकुल मखमल में टाट के पैबंद की तरह खटकता हो. कनिका ढिल्लों की कहानी और स्क्रीनप्ले में एक महिला मनोरोगी को मुख्य किरदार बनाने की हिम्मत तो दिखा लेती है, पर जब उस किरदार के साथ दर्शकों का जुड़ाव बनाये रखने की बारी आती है तो थ्रिलर के नाम हथकंडे आजमाने लगती हैं. हालाँकि संवादों में धारदार हास्य और तेवर की कमी नहीं होती.      

‘जजमेंटल है क्या में नयेपन की झलक ख़ूब है, आखिर तक बांधे रखने वाला रोमांच भी है, गुदगुदाने वाला मनोरंजन भी. मगर फिल्म जहां दो ऐसे मज़बूत लोगों को, जो एक-दूसरे को अपनी-अपनी मनोस्थितियों से बार-बार चकमा देते हैं, आमने-सामने खड़ा करके और रोचक बना सकती थी, सिर्फ एक किरदार (बॉबी) के प्रचलित हाव-भाव और तीखे तेवरों पर अपना पूरा भरोसा झोंक देती है. कंगना ऐसी भूमिकाओं में आम सी हो गयी हैं, ख़ास कर जबकि असल जिंदगी में भी उनका व्यक्तित्व कुछ इसी खांचे-ढाँचे का नज़र आता है- बेबाक, मुंहफट, तेज़ तर्रार. हालाँकि बॉबी के किरदार में वो पूरी तरह फिट हैं, उनसे कोई शिकायत नहीं रहती, फिर भी बार-बार ख्याल उठता है कि आखिर इस किरदार में राधिका आप्टे क्यूँ नहीं हैं? राजकुमार राव उन दृश्यों में खासा कमाल हैं, जिनमें वो अपने किरदार का बना-बनाया भ्रम तोड़ते हुए दिखते हैं.

आखिर में; ‘जजमेंटल है क्या श्रीराम राघवन की रंगीन आपराधिक दुनिया में ही पली बढ़ी नज़र आती है. कुछ उसी तरीके का रोमांच, कुछ उसी मिट्टी के बने किरदार, पुराने हिंदी फ़िल्मी गानों का इस्तेमाल; लेकिन इन सबके बाद भी फिल्म एक स्तर के बाद न सिर्फ ऊपर उठने से इनकार कर देती है, बल्कि आखिर तक आते-आते अपनी बनी-बनायी साख को भी नीचे लुढ़कने से बचा नहीं पाती. एक अच्छी प्रयोगधर्मी फिल्म को मुख्यधारा में मिलने की कीमत चुकानी पड़ जाती है. फिर भी, फिल्म में बहुत कुछ है, जो नया है. [3/5]

Friday, 12 January 2018

मुक्काबाज़: कश्यप की सबसे जिम्मेदार फिल्म! शायद साल की भी! [4/5]

मवेशी ले जा रहे कुछ लोगों पर 'गौरक्षकों' ने हमला कर दिया है. 'भारत माता की जय' के जोशीले नारों के बीच मोबाइल पर हिंसा के वीडियो बनाए जा रहे हैं. कोच साब के घर का गेंहू पिसवाने आया बॉक्सर श्रवण कुमार सिंह (विनीत सिंह) विडियो में मुंह बांधे एक तथाकथित गौरक्षक को तुरंत पहचान जाता है. वो उस जैसे तमाम कोच साब के बेरोजगार चेलों में से ही एक है. पूछने पर साफ़ मुकर जाता है, और श्रवण के लिए भी यह कोई हिला देने वाली बात नहीं है. इस एक वाकिये में ही देश की लगातार विकृत होती राजनीतिक प्रवृत्ति और गर्त में धकेली जा रही नयी पीढ़ी के सपनों का क्रूर मर्दन ज़ोरदार तरीके से सामने आता है. इस लिहाज़ से अनुराग कश्यप की 'मुक्काबाज़' शायद उनकी सबसे जिम्मेदार फिल्म मानी जा सकती है, जहाँ कुछ भी महज़ मनोरंजन के लिए नहीं है, बल्कि सब कुछ सिनेमा के जरिये कुछ कहने की एक सशक्त कोशिश.  

...और फिर ये तो सिर्फ शुरुआत है, 'मुक्काबाज़' वास्तव में एक ही फिल्म में कई फिल्में एक साथ हैं. अगर उत्तर प्रदेश की संस्कृति में भी राजस्थानी थाली जैसी कोई परिकल्पना प्रचलित होती तो मैं कहता कि 'मुक्काबाज़' उत्तर प्रदेश की एक बड़ी सी सामाजिक, राजनीतिक और जातीय जायकों से लबरेज एक मनोरंजक थाली है. कुछ स्वाद अगर ज़बान मीठा कर जाते हैं, तो कुछ ऐसे भी हैं जो दिल खट्टा, मन कड़वा और आँखें नम. हो सकता है कि पहली नज़र में 'मुक्काबाज़' उत्तर प्रदेश की धमनियों में रचे-बसे, जाति के सामाजिक खेल और खेलों में जाति की राजनीति के उलझाव में फँसी एक सुलझी हुई प्रेम-कहानी ही लगे, जहां नायिका नायक को लड़ता देख मुग्ध हो जाती है, सामाजिक दुराव और जातिगत भेद के बावजूद दोनों में प्रेम पनपता है और फिर खलनायक की साज़िशों और जिंदगी की कठोर सच्चाईयों से हाथापाई करते दोनों आखिर में एक सुखद अंत की ओर बढ़ निकलते हैं. ऐसा है भी, पर इस बार कहानी के तेवर सीधे सीधे मुद्दों को निशाना बनाने से परहेज़ नहीं करते. 

स्टेट बॉक्सिंग फेडरेशन के शीर्ष पर काबिज़ कोच भगवान दास मिश्रा (जिम्मी शेरगिल) अपने ही साथी कोच से उसकी जाति पूछने का सिर्फ दुस्साहस ही नहीं करता, उसके हरिजन होने पर वेटर को अलग बर्तन में पानी पेश करने का आदेश भी पूरे गर्व से देता है. अपनी भतीजी से प्यार करने के खामियाज़े में अपने ही सबसे अच्छे बॉक्सर श्रवण को बॉक्सिंग रिंग से दूर रखने में पूरा दम ख़म झोंक देता है. उधर देश के लिए खेलने की आशायें पाले प्रतिभावान खिलाड़ी कोच साब की मालिश करने, उनके घर का राशन लाने और अपने अधिकारियों की बीवियों को 'मार्केटिंग' पर ले जाने में जाया हो रहे हैं.

'मुक्काबाज़' के ज़रिये, परदे पर अनुराग दो बेहद सशक्त किरदार परोसते हैं. वो भी एक-दूसरे के आमने-सामने. सुनयना (ज़ोया हुसैन) बोल नहीं सकती, पर उसे सुनने-समझने में आपको ज्यादा मुश्किल नहीं होगी. सुनयना का छिटकना, उसका गुस्सा, उसकी झुंझलाहट, उसकी दिलेरी, उसके ताव, उसके तेवर सब बेआवाज़ हैं, पर बेख़ौफ़ और बेरोक-टोक बोलते हैं. सुनयना के किरदार में ज़ोया कहीं भी कमतर नहीं दिखाई पड़तीं. ठीक वैसे ही, जैसे श्रवण के किरदार में विनीत. निराश, हताश और गुस्सैल श्रवण जैसे परदे पर हर वक़्त पटाखे की तरह फटता रहता है, और हर बार धमाका उतना ही बड़ा होता है, उतना ही जोरदार. 

विनीत का एक बॉक्सर के तौर पर, अपने किरदार श्रवण में ढल जाना बॉलीवुड के अभिनेताओं के लिए एक चुनौती बनकर उभरता है. सिर्फ कद-काठी तक ही नहीं, विनीत अपने अदाकारी में भी वो धार-वो चमक लेकर आते हैं, जिसे भुलाना आसान नहीं होगा. अपने पिता के साथ उनकी खीज़ भरी बहस का दृश्य हो, सुनयना के साथ 'साईन लैंग्वेज' में बात करने वाले दृश्य या फिर बॉक्सिंग रिंग में उनकी शानदार मौजूदगी; विनीत इस फिल्म को अपना सब कुछ बक्श देते हैं. फ़िल्मकार के तौर पर अनुराग कश्यप को तो सीमाएं लांघते आपने दसियों बार सराहा होगा, पर इस बार विनीत कुमार सिंह के अभिनय में वो लोहा दिखेगा कि तमाम खान, कपूर जैसे बॉलीवुड के दिग्गज़ धूल चाटते नज़र आयेंगे. मेरी लिए, साल की सबसे दमदार परफॉरमेंस.

'मुक्काबाज़' कोई 'स्पोर्ट्स' फिल्म नहीं है, जो खिलाड़ियों की जीत का रोमांच बेचने में यकीन रखती हो, पर जितनी देर भी परदे पर खेलों-खिलाड़ियों और उनके इर्द-गिर्द जाल की तरह फैले राजनीति के बारे में बोलती है, असल स्पोर्ट्स फिल्म ही लगती है. यूँ तो फिल्म में बॉक्सर श्रवण हैं, 'मुक्काबाज़' में सबसे जोरदार घूंसे और मुक्के अनुराग कश्यप की तरफ से ही आते हैं. कभी तीख़े व्यंग्य की शक्ल में, तो कभी मज़ेदार संवादों के ज़रिये. हालाँकि ढाई घंटे की इस लम्बी फिल्म पर दूसरे हिस्से में कई बार अपने आप को दोहराने का आरोप भी जड़ा जा सकता है, पर दिलचस्प संगीत, जबरदस्त अभिनय, मनोरंजक संवादों और कहानी में बखूबी पिरोये गए मुद्दों की अहमियत फिल्म को अलग ही मुकाम तक ले जा छोडती है. [4/5]     

Friday, 19 August 2016

हैप्पी भाग जायेगी: पाकिस्तानी ‘तनु वेड्स मनु’! [2/5]

हैप्पी करोड़ो में एक लड़की है. फिल्म में अली फज़ल का किरदार हैप्पी के किरदार को बयान करते हुए वैसी ही शिद्दत दिखाता है, जिस शिद्दत से शायद फिल्म के निर्देशक मुदस्सर अज़ीज़ ने फिल्म के निर्माताओं के सामने हैप्पी का किरदार बढ़ा-चढ़ा के पेश किया होगा. पर सच तो ये है कि हैप्पी जैसी नायिकायें बॉलीवुड की पसंदीदा हमेशा से रही हैं. स्वभाव से दबंग, जबान से मुंहफट, दिल से साफ़, कद-काठी से बेहद खूबसूरत! अब सारा दारोमदार सिर्फ इस एक बात पर आकर टिक जाता है कि उसे गढ़ने में कितनी अच्छी और कितनी ‘वाटरटाइट’ स्क्रिप्ट का इस्तेमाल होता है. सब कुछ सही रहा तो वो ‘तनु वेड्स मनु’ की तनु भी बन सकती है, वरना थोड़ी सी भी झोल-झाल उसे वैसी ही ‘हैप्पी’ बना के छोड़ेगा, जैसी हम हर दूसरी-तीसरी रोमांटिक कॉमेडी फिल्मों में देखते सुनते आये हैं. हालाँकि फिल्म के साथ आनंद एल राय [निर्देशक, तनु वेड्स मनु और राँझणा] और हिमांशु शर्मा [संवाद लेखक, तनु वेड्स मनु और राँझणा] जैसे बेहतरीन नाम जुड़े है, पर ‘हैप्पी भाग जायेगी’ हैप्पी को ‘तनु’ बनने का मौका नहीं देती.

हैप्पी [डायना पेंटी] एक तेज-तर्रार लड़की है. उसके पैर कहीं रुकते नहीं. बाप की पसंद के लड़के बग्गा [जिम्मी शेरगिल] से शादी न करनी पड़े, इसलिए शादी के दिन ही घर से भाग जाती है. हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि वो अपने बॉयफ्रेंड गुड्डू [अली फज़ल] के पास न पहुँच कर अमृतसर से लाहौर पहुँच जाती है. लाहौर में उसकी मदद करने को तैयार बैठे हैं पाकिस्तानी सियासत के मुस्तकबिल बिलाल अहमद [अभय देओल]. बिलाल अपने वालिद की सियासी ख्वाहिशों को चुपचाप ख़ामोशी से पूरा करने में लगा है, जबकि उसकी अपनी मर्ज़ी कभी क्रिकेट के मैदान में झंडे गाड़ने की थी. कहने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए कि हैप्पी से मिलकर उसे अपनी खोई शख्सियत हैप्पी में दिखने लगती है. बहरहाल, घटनायें और फिल्म के लेखक-निर्देशक खींच-खांच के सारे ख़ास किरदारों को प्रियदर्शन की फिल्मों की तरह, उनके तमाम सह-कलाकारों के साथ हिन्दुस्तान से पाकिस्तान में ला पटकते हैं. शायद इसलिए भी कि स्क्रीन पर पाकिस्तान का ‘सब चलता है’ हिंदुस्तान के ‘सब चलता है’ से ज्यादा मजाकिया लगता हो.

फिल्म के मजेदार किरदार हों, उनके रसीले संवाद या फिर काफी हद तक कहानी में जिस तरह के हालातों का बनना और बुना जाना, ‘हैप्पी भाग जायेगी’ वास्तव में ‘तनु वेड्स मनु’ बनने की राह पर  ही भागती नज़र आती है. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार उन किरदारों में आपको बनावटीपन और घटनाओं में बेवजह की भागा-दौड़ी ज्यादा शामिल दिखाई देती है. हैप्पी लाहौर से वापस अमृतसर क्यूँ नहीं आना चाहती? हैप्पी अगर इतनी ही निडर और निर्भीक है कि पूरा लाहौर उससे परेशान हो जाए, वहाँ की पुलिस, वहाँ के गुंडे सब उसके सामने घुटने टेक दें तो उसे अपने बाप के सामने शादी की मुखालफत करने में क्या दिक्कत हो जाती है? कहानी की घिसी-पिटी सूरत यहाँ किरदारों की भली सी-भोली सी सीरत पर बुरी तरह हावी हो जाती है. नतीज़ा? फिल्म कुल मिलाकर एक औसत दर्जे की कोशिश भर दिखाई देती है.

जिम्मी शेरगिल यहाँ भी नाकाम प्रेमी की भूमिका को जीते नज़र आते हैं, जिसे फिल्म के अंत में ‘पति’ बनने का सुख नहीं मिलता, पर दर्शकों की ‘सिम्पैथी’ मिलने का हौसला ज़रूर दिया जाता है. फिल्म के असरदार पलों में पाकिस्तान पर गढ़े गए सीधे-सादे, साफ़-सुथरे जोक्स आपके चेहरे पे हर बार मुस्कान लाने में कामयाब रहते हैं. पीयूष मिश्रा साब का औघड़पन, उनकी अहमकाना हरकतें और खालिस उर्दू के इस्तेमाल से बनने वाला हास्य आपको थोड़ी तो राहत देते हैं. अली फज़ल और अभय देओल अपनी करिश्माई मौजूदगी भर से परदे को एक हद तक जिंदा रखते हैं. डायना काबिले-तारीफ हैं. जिस तरह की झिझक और झंझट उनके अभिनय में एक वक़्त दिखाई देता था, उससे वो काफी दूर निकल आई हैं.

आखिर में; मुदस्सर अज़ीज़ की ‘हैप्पी भाग जाएगी’ में एक किरदार कहता है, “काश! ऐसी लव-स्टोरीज़ पाकिस्तान में होतीं.” सच मानिए, कुछ मामलों में ये ‘तनु वेड्स मनु’ बनाने की चाह में भटकी हुई कोई अच्छे बजट की, पर सस्ती सी पाकिस्तानी फिल्म ही नज़र आती है. यहाँ सब कुछ मिलेगा, पर सब आधा-अधूरा, अधपका और जल्दबाजी से भरा हुआ! [2/5]         

Friday, 22 July 2016

मदारी: इरफ़ान का ‘तमाशा’! [2.5/5]

किसी एक सतर्क, सजग आम आदमी का सतह से उठना और कानून की हद से बाहर जा के पहाड़ जैसे अजेय दिखने वाले सिस्टम से सीधे-सीधे भिड़ जाना; बॉलीवुड के लिए ये फार्मूला हमेशा से एक ऐसा ऊंट रहा है, जो बड़े आराम से दोनों करवट बैठ लेता है. चाहे वो बॉक्स ऑफिस पर भीड़ इकट्ठी करनी हो या फिल्म समीक्षकों से थोक में सितारे बटोरने हों. वजह बहुत साफ़ है, कहीं न कहीं सब बहुत त्रस्त हैं. दिन भर दफ़्तर की हांक के बाद घर की घुटी-घुटी सांस और ऊपर से महंगाई, भ्रष्टाचार और मूलभूत अधिकारों के हनन जैसे मसलों से हताश आम आदमी को ऐसी फिल्मों के नायक में ही अपना चेहरा ढूंढ लेने की मजबूरी भी है.

पहले भी और मौजूदा हाल में भी आपको बहुत सारे ऐसे नाम खोजने से मिल जायेंगे, जो लाख मुश्किलों के बाद भी सरकार और सिस्टम दोनों की नाकामियों को कठघरे में खड़ा करने की लगातार कोशिश करते रहे हैं, पर जो सुख, जो रोमांच, जो तृप्ति फ़िल्मी परदे पर एक अदना से आम आदमी के सामने सिस्टम को घुटने टेकते देखने में आता है, वो ‘अन-रियल’ ही है. ‘मदारी’ अपनी ज्यादातर अच्छाइयों और इरफ़ान खान जैसे दिग्गज अभिनेता के अच्छे अभिनय के बावजूद, कहीं न कहीं एक ऐसा ही ‘अभूतपूर्व’ अनुभव बनते-बनते रह जाती है.

गृहमंत्री [तुषार दलवी] का बेटा किडनैप हो गया है. अगवा करने वाले [इरफ़ान] ने अपना भी बेटा सिस्टम की नाकामी के चलते खो दिया था. हिसाब बराबर करने का वक़्त आ गया है. बेटा लाओ-बेटा पाओ! पर कौन है ये आदमी? ढूँढें तो कहाँ? वो खुद कहता है, “कपड़े-लत्ते, शकल-सूरत से 120 करोड़ लोगों जैसा दिखता हूँ, कैसे पहचानोगे?”. सीरत और सूरत में कुछ-कुछ नीरज पाण्डेय की ‘अ वेडनेसडे’ जैसे सेटअप में नचिकेत वर्मा [जिम्मी शेरगिल] ने स्पेशल टास्क फ़ोर्स के साथ अपनी पूरी जान लड़ा दी है. चूजे पर बाज़ का शिकंजा कसता चला जा रहा है. अब कोई जांच समिति नहीं, कोई सुनवाई नहीं, सीधे दोषियों को सज़ा. इसी बीच अगवा हुए बच्चे को लगता है, उसके साथ कुछ कुछ ‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’ जैसा हो रहा है. (जिसमें किडनैपर और विक्टिम के बीच एक तरह का इमोशनल सम्बन्ध बनने लगता है).

निशिकांत कामत की ‘मदारी’ आपको सीधी, सपाट और सहज रास्ते पर नहीं ले जाती. यहाँ कहानी में हिचकोले बहुत हैं, जो बार-बार फिल्म की लय और आपके सफ़र की उम्मीदों को तोड़ते रहते हैं. फिल्म में पिता-पुत्र के निजी पलों वाले इमोशनल दृश्यों का इसमें ख़ासा योगदान दिखता है. हालाँकि फिल्म जब उठती है तो अपने पूरे उफान पे होती है (अक्सर इरफ़ान की मौजूदगी में), पर जब सरकने की ठान लेती है तो उतनी ही निर्जीव और बेस्वाद! सोशल नेटवर्किंग साइट्स और मीडिया का आम जन-मानस पर क्षणिक, बदलता और बढता असर इस फिल्म में बखूबी पेश किया गया है.

फिल्म को थ्रिलर का जामा पहनाने के लिए कामत नायक के इरादों और वजहों को बड़ी फ़िल्मी तरीके से छुपाते और उजागर करते रहते हैं. इसी कड़ी में वो फिल्म को दोहरा अंत देने का खेल भी आजमाते नज़र आते हैं, जहां एक अंत पर पहुँच कर आपको बताया जाता है कि पिच्चर तो अभी बाकी है. ‘इमोशनल’ और ‘थ्रिलर’ होने के बीच झूलने वाली ‘मदारी’ अंत तक किसी एक तय मुकाम पर पहुँचने का सुख हासिल नहीं कर पाती.

इरफ़ान ‘मदारी’ हैं और ‘मदारी’ इरफ़ान; इस बात से किसी को इनकार नहीं होगा पर फिल्म के ज्यादातर दृश्य मानो इरफ़ान की काबिलियत को ही भुनाने का और मांजने का एक जरिया भर बनाने की कोशिश लगते हैं. इतने पर भी, अस्पताल में उनका फूट-फूट कर रोने वाला दृश्य हो या फिर अपने बेटे को खो देने के दर्द में खोया हुआ पिता, इरफ़ान आपको उन्हें याद रखने के लिए काफी कुछ दे जाते हैं.

आखिर में, ‘मदारी’ सत्ता-कानून व्यवस्था और सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार पर हर उस तरीके से बोलने की नीयत दिखाती है, जो आजकल के परिवेश में एकदम फिट बैठते हैं. पर न तो खुद किसी साफ़ नतीजे पर पहुँचती है, न ही आपको पहुँचने के लिए उकसाती है. कुल मिलाकर, ये वो तमाशा है जहां आप खेल की दांव-पेंच पर कम, बाजीगर की उछल-कूद पर ज्यादा तालियाँ बजाते हैं. [2.5/5]          

Friday, 6 May 2016

ट्रैफिक: बैठे रहिये, बाजपेयी हैं ना! [3/5]

दिवंगत राजेश पिल्लै की मलयालम सुपरहिट थ्रिलर ‘ट्रैफिक’ का हिंदी रीमेक आपको थिएटर की कुर्सी से बांधे रखने के लिए गिने-चुने विकल्प ही सामने रखता है, जिनमें से एक तो है फिल्म की हद इमोशनल स्टोरीलाइन, और मनोज बाजपेयी का बेहद सटीक, संजीदा और समर्पित अभिनय. तकनीकी दृष्टि से फिल्म के कमज़ोर पल हों या कथानक को रोमांचक बनाये रखने के लिए नाटकीयता भरे उतार-चढ़ाव, मनोज बड़ी मुस्तैदी, ख़ामोशी और शिद्दत से ड्राइविंग सीट पर बैठे-बैठे पूरी फिल्म को अकेले खींच ले जाते हैं. हालाँकि अच्छे और नामचीन अभिनेताओं की एक पूरी जमात आपको इस फिल्म का हिस्सा बनते दिखाई देती है, पर एक मनोज ही हैं जिनसे, जिनके अभिनय से और जिनकी कोशिशों से आप लगातार जुड़े रहते हैं...हमेशा!

सच्ची घटनाओं को आधार बना कर, ‘ट्रैफिक’ मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत एक ऐसी दिलचस्प और रोमांचक कहानी आप तक पहुंचाती है, जहां जिंदगी तमाम मुश्किलों और मायूसियों के बावज़ूद आखिर में जीत ही जाती है. कभी न हार मानने वाले इसी इंसानी जज़्बे को सलाम करती है ‘ट्रैफिक’! फिल्मस्टार देव कपूर (प्रोसेनजीत चटर्जी] की बेटी को पुणे में जल्द से जल्द हार्ट ट्रांसप्लांट की दरकार है. पता चला है कि मुंबई के एक अस्पताल में एक ऐसा ‘पॉसिबल डोनर’ है जिसके जिंदा रहने की उम्मीद अब लगभग दम तोड़ चुकी है. माँ-बाप (किटू गिडवानी और सचिन खेड़ेकर) अपने बेटे को ‘दी बेस्ट गुडबाई गिफ्ट’ देने का मन बना चुके हैं पर मुंबई से पुणे तक १६० किलोमीटर की दूरी को ढाई घंटे में पूरा करने का बीड़ा कौन उठाये? ट्रैफिक हवलदार रामदास गोडबोले (मनोज बाजपेयी) के लिए ये सिर्फ ड्यूटी बजाने का मौका नहीं है. मिशन पर जाने से पहले वो अपनी बीवी से कहता है, “पता नहीं कर पायेगा या नहीं, पर घूसखोर का लांछन लेके नहीं जीना”.

फिल्म पहले हिस्से में कई बार अपनी ढीली पकड़ और सुस्त निर्देशन से आपको निराश करती है, खास कर जब किरदार एक-एक कर आपके सामने बड़ी जल्दी-जल्दी में परोस दिए जाते हैं. फिल्म को तेज़ रफ़्तार देने के लिए, घटनाओं को घड़ी की टिक-टिक के बीच बाँट कर दिखाने का चलन भी बहुत घिसा पिटा लगता है. हालाँकि इंटरवल आपको हल्का सा असहज महसूस कराने में कामयाब होता है. दूसरे हिस्से में फिल्म जैसे एकाएक सोते हुए जग जाती है और बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ने लगती है, पर फिर ड्रामा के नाम पर जिस तरह के उतार-चढ़ाव शामिल होने लगते हैं, उनमें गढ़े होने की बू दूर से ही नज़र आने लगती है. ऐसा लगता है मानो जिंदगी की ये दौड़ अब कोई सस्ती सी विडियो गेम बन कर रह गई है, जहाँ मुश्किलें जानबूझ के हर मोड़ पे और बड़ी होती जा रही हैं. मलयालम फिल्मों में वैसे भी ये कोई नया चलन नहीं.

पियूष मिश्रा जैसे वजनी नामों के बाद भी ‘ट्रैफिक’ के संवाद उतने ही फीके और उबाऊ हैं, जितने उसके नामचीन कलाकारों के बंधे-बंधे बासी अभिनय. प्रोसेनजीत दा का किरदार जाने-अनजाने अनिल कपूर के इतना इर्द-गिर्द बुना गया है कि उससे बाहर उन्हें देख पाना मुश्किल हो जाता है. दिव्या दत्ता, किटू गिडवानी, जिम्मी शेरगिल, सचिन खेड़ेकरपरमब्रता चटर्जी  सभी को हम पहले भी इस खूंटे से बंधे देख चुके हैं. सब अपने घेरे अच्छी तरह पहचानते हैं और उसे तोड़ने की पहल से बचते नज़र आते हैं.

इतने सब के बाद भी, ‘ट्रैफिक’ अपने जिंदा जज़्बे, सच्ची कहानी के तमगे, कुछेक गिनती के ही सही सचमुच के रोमांचक पलों और मनोज बाजपेयी के मजबूत कन्धों के सहारे एक अच्छी फिल्म कहलाने की खुशकिस्मती हासिल कर लेती है. मनोज मिसाल हैं, संवाद अभिनय का एक अभिन्न अंग है, मात्र एक अभिन्न अंग...पूरे का पूरा अभिनय नहीं. देखिये, अगर उनके जरिये अभिनय के बाकी रंग भी देखने हों! देखिये, अगर एक थ्रिलर देखनी हो जिसमें दिल हो, एकदम जिंदा ‘धक-धक’ धड़कता हुआ! [3/5] 

Friday, 22 May 2015

TANU WEDS MANU RETURNS: Just for Laughs…and the ‘QUEEN’! [3.5/5]

A hushed & muted father in 40 years of marriage [K K Raina] is comforting his son [Madhavan] who’s on the edge of making the hardest decision to get out of his dysfunctional marriage; and you can clearly eavesdrop on the mother complaining hysterically about this late night discussion. Towards the end of the conversation, the agitated father gets up, picks up a floor-wiper and breaks the only lit tube light in the house. The marriages anywhere on earth can bring the same effect on any one who claims to be sane. But then, there is always a way to escape the complications. Paying no attention and enjoying your regular spell of drinking could be one, as suggested by the father in the film but divorce is just not so done. How can we not have Tanu and Manu in same frame if the film has already pictured them as a couple? We dare not.

Despite managing a wonderful plot for a sequel, TANU WEDS MANU RETURNS prefers to join the successful league of highly entertaining bollywood films that might go for a clumsy climax and a fake happy-ending just for the sake of audience’s approval. The best part is you have a pool of talents and the powerhouse herself at your side, Kangana Ranaut if you want to play straight; so definitely no one is gonna raise his eyebrows over this preferred choice of not going bold but staying regular.

Four years is a term looking too much to be in marriage for the temperamental Tanu [Kangana] and maddened Manu [Madhavan]. Their latest verbal spat has landed Manu in mental asylum and Tanu in killing loneliness. She returns to her zone, of ex-boyfriends, fewer limitations and an all flying high life with no strings attached. Manu meets a mirror image of Tanu and falls in love instantly. This new entrance [the overpowering double role of Kangana] is a Haryanvi athlete- a lot rough in her vocals but much more susceptible and sensitive within. Meanwhile, returns Pappi [Deepak Dobriyal]- the uproarious friend who never runs out of droll one-liners. Then, there is Raja Awasthy [Jimmy Shergil] adding the drama led by power, passion and attitude. Zeeshan Ayyub plays your regular mean and tricky one-sided lover who considers himself belonging to a certain ‘kandha’ type men known for offering their shoulders to broken girls to cry at.

TANU WEDS MANU RETURNS takes off from the base of its prequel and lands up in the territory of ‘RAANJHNAA’. Aanand L Rai being the powering team-lead and Himanshu Sharma the delectable writing force, it doesn’t fail as an experiment. Film guarantees uncontainable laughs especially in the first half before the ineptness in the screenplay starts bothering you soon. Be it the wedding-scene where Pappi kidnaps his ‘whats app’ female friend to marry just because she would reply on his even lamest jokes with ‘LOL’ text messages or where Swara Bhaskar sounds like she had done anything unethical in going medical way to conceive a child without telling her husband; the second half eventually becomes the rush-rush, hush-hush mission to meet the forged happy ending. When would we stop pretending that marriages are not done until the very last ‘phera’? When would we stop taking our climaxes to the ‘mundup’ at the very final moments?

Anyways, keeping my issues aside; it’s a film that establishes Kangana’s success in QUEEN wasn’t a fluke. She surfaces as a towering performer in both her roles. No matter what get up, what accent she’s into; Kangana is there to spellbind you. Her flawless performance gives you goose bump moments we rarely experience or expect from Bollywood films. Madhavan is equally competent. His charms never fade. His kind, compassionate and fragile Manu makes his own place in your hearts. The casting is superbly accomplished.

Overall, TANU WEDS MANU RETURNS is a film made for laughs! Frequent laughs! Fabulous laughs!! If only Aanand L Rai had not been so conservative about divorces, film would have been blessed with a much appreciative climax. Watch out for the ‘Queen’ whose vivacious presence alone makes every penny of yours a ‘worth it’ investment to gain super-sized entertainment! [3.5/5]

Thursday, 2 October 2014

BANG BANG: Mission Entertainment, Failed! [2/5]

Tom Cruise-Cameron Diaz starrer KNIGHT AND DAY wasn’t an extraordinary action movie outing at the first place; so when Bollywood has come up with an idea to officially remake it, expecting anything better to come out of it is surely our fault and not of the makers. Since Bollywood has now become quite an expert with remaking their own classics into the most forgettable ones, you can only imagine what would have they done with an average Hollywood action thriller. Siddharth Anand’s BANG BANG is a regular bollywood junk suitable only to those who crave for quick, forgettable and mindless adrenaline rush for their dose of entertainment.

Rajveer [Played by the delectably charming Hrithik] is a daredevil wanted for stealing the historical Kohinoor Diamond from a museum in London and can frequently be seen in Shimla roaming with the ‘diamond’ in his pocket. In a ‘written as in the script’ incident, he meets a middle-class desperate girl [Katrina, of course] with starry dreams to tour the world someday. And now the both should be together in the hide & seek game with cops [Pavan Malhotra, wasted] & the international crime syndicates [Danny Denzongpa & Javed Jaffrey] to save each other’s lives. But there is a twist, Rajveer is hardly who he pretends to be.

Problems with BANG BANG never really end. Where the original Hollywood flick had its own share of logic behind every action and plot developments, this Bollywood version hardly tries to be imaginative or logical. One action sequence leads to an abrupt song & dance number followed by another action sequence and another song & dance number! This goes on & on until the intermission. You take the loo-break, join the movie and it starts all over again. The most irritating transitions between scenes are Katrina waking up in the bed, in a new location, in a new country. 2 hours 35 minutes and you hardly see a smart espionage moment. Yes, there are brilliantly performed action thrills but no moment of shock even in the climax. If you could not see it coming, that’s never because of their excellence but your inattentiveness.  

Siddharth actually doesn’t leave any stone unturned to make it a proper Bollywood film. A bollywood film that never doubts on the moves of its hero, in fact it tries to cover him up. BANG BANG does exactly the same…with all of the film. So, more than 25 films in her name and we still have to give reasons [read: excuses] for Katrina’s accented vocal presentation. So she might possess ‘Harleen’ as her name, she is a Canada born child whose parents are dead in a terrible road accident [as convenient as swimming is to a fish] and now she is living with her grandmother in Shimla from last 10 years or more. Established in first half an hour, now do not you dare to ask why she can’t talk in proper accent?

My two favorite moments are probably the only moment I had an effortless smile on my face. When press asks the grandmother about Harleen’s whereabouts, she tells them that she had to consult her lawyer first and one media-person reacts, “Dadi, American serials dekhna band karo!” In other, Hrithik makes faces and pun about Katrina’s boring single life and her search for boyfriend on dating sites. Genuinely funny and natural!

On the performances, Hrithik manages to keep everyone hooked with his ease at action, silkiness in dance and the big screen charisma of the heroic chiseled-oiled body muscles. Deepti Naval & Kanwaljeet mark their presence felt. Rests in the supporting cast are either wasted completely or extremely regular. Watch out if breathtaking locales, hard to imitate dance moves, some good action sequences and your favorite stars are enough to make you spend [read: waste] your precious time and hard-earned money. It deserves nothing less than a place in the list of AAP MUJHE ACHCHE LAGNE LAGE and KITES! [2/5].

Friday, 13 June 2014

FUGLY: Nothing but F*cking Ugly! [1/5]

In a ripped-off yet muddled climax straight from the inspirational ‘fight against system’ drama RANG DE BASANTI, one of the four protagonists in Kabir Sadanand’s FUGLY announces his decision to take on the political system soaked & sopping in corruption & criminalization of power in the most unimaginative way unlike the original. No wonder, the other more aggressive partner is seen wearing a ‘Bhagat Singh’ t-shirt in the same scene. Now, how conveniently that sense of patriotism is positioned and promoted is very much obvious but how convincing it is, sure falls in questions. FUGLY is one hell of ride that merely knows where it is headed, much like the leading characters in the film.

FUGLY also gets ugly while portraying the reality through the stupidity and idiocy its characters sport in their act. Film continuously demonstrates the lecherous, lewd and lustful behavior of men of all kinds against women. That’s the reality everyone should check without any uncertainty but when it is being spoken on screen, the pain goes missing by and large. Though the sincere intention is there, the relevance and concern lose tracks soon after getting on to it. So, you see an enthusiastic journo reporting LIVE coverage of a critical patient crashing straight into the ICU. The same pretty lady also indulges herself in luring the ward-boy for sexual favors in good turn of access to the victim.

The typicality of the friendship gang is another reason for a big fail. Having a sensible guy with practical approach towards life and career [Mohit Marwah], a spoiled brat taking everything in its lightest [Vijender Singh the boxer], a chicken-heart who’s always in best of his doubts to take sides [Arfi Lamba] and a bold girl who can grab an eve-teaser by his balls literally [Kiara Advani], this uber-cool group has hardly anything new-fangled and fresh that you have never come across. The escorting incident of their life taking a full swing also resembles hugely with the plot from SHAITAN. The lingo that has been loved in FUKREY is a complete maddening here. I could hardly recall any of dialogues that is actually worth to. Jimmy Shergill holds his fort to some extent as a controlling & calculating bad cop in total power to make things worst but soon loses the steam after being repetitive and least intensifying after a point.

For a change; on the non-performing meter, Jimmy finds a place lowest of all. His is not actually a remarkable one but in the middle of such highly latent and dormant cast, he looks divine. Kiara does it good. Though he is ages behind wining an Oscar for his performance [As he had expressed his aspiration to a famous tabloid], Vijender is lovable but the one who disappoints the most is Mohit. Do not picture him in the songs and in lighter moments but watch him in the intense dramatic sequences and you will sure notice the room of improvement vast and bigger than he would imagine.

To its best, Kabir Sadanand’s FUGLY deserves stars not more than it showcases in its title-design. That’s counted to one. Don’t go anywhere near to this plain-unoriginal-uninspiring youth drama. [1/5] 

Friday, 29 November 2013

BULLETT RAJA: Commercial, predictable & average action thriller! Witty one-liners make it Watchable! [2.5]

Names suggest. Names carry perceptions. So whenever you hear ‘Tigmanshu Dhulia’, you expect razor-sharp story-telling [PAAN SINGH TOMAR], utter participation of passion mixed with art [SAAHEB, BIWI AUR GANGSTER] or if nothing else, earnestness shining in the framework for sure [HAASIL]. Intentionally or involuntarily; sounding as if another south action entertainer dubbed in Hindi, Dhulia’s ‘BULLETT RAJA’ has flares of all these but overshadowed & eclipsed heavily by added star value, superficial style & an undeclared delusion in one’s head to be in the sheep-race of 100 Cr club.


Uttar Pradesh- the terra firma of filthy politics, gory goonism, and caste-driven social establishment is the place where ‘BULLETT RAJA’ fits the most. With serenely ferocious Rudra [Played by confident Jimmy Shergill] joined at the hip, fearlessly rowdy Raja [Saif in a comfortable zone] is nothing but a political commando rising and shining under the most powerful politician played by Raj Babbar. Situation goes upside down when the grimy game of power & control gifts back Raja an unbearable loss of his lifetime to flame the anger of vengeance that would blaze the whole of enterprise behind.

A story weakened by confusing screenplay, shabby-unimpressive-infuriating work in the music department & a bad hand in editing were enough to mess up all the reputation Dhulia has earned until comes to rescue the writing, giving plenty of smart & quirky one-liners that hold your interest throughout. Hear this, when villainous Chunky Pandey narrates a mythological incident about Lord Brahma using some foul words [in smartly muted sound], Raja blasts him with bullets saying, “Dharmik mamlon mein hum ashleelta bardasht nahin karte!” Writing also celebrates the emotions one carries for his caste. Playing a Brahmin by caste, Saif will be seen mouthing arrogance profoundly in most of his lines e.g. “Brahmin bhookha toh sudama, rootha toh raavan” or “Brahmin hoon, janam se samajh ke aaya hoon”. Enjoyable & entertaining!

Performances are strictly average and there is nothing that could compel you for a jaw-drop response. Though Jimmy Shergill impresses in the first half and his equation with Saif creates a pleasant sight for eyes & most of the enjoyable moments. Vidyut Jammwal enters the scene after interval and his sequences don’t look more than his acting or rather action showreel. I would love to see him in a meatier role. Sonakshi disappoints the most. This one is a complete superfluous role for her in all these years. There is a hotel scene where Jimmy decides to lock himself in an adjacent room to give Saif & Sonakshi their own space and she is so unwanted that you don’t really want it to happen. Gladly, Saif doesn’t make you feel so and takes you through this partly intriguing action thriller relentlessly.

‘BULLETT RAJA’ is enjoyable in parts and watchable only for its harsh but satirical take on various political & social scenarios mainly in Uttar Pradesh. Dhulia shows his skill to extract raw humor soaked in an unsympathetic rustic feel with languages spoken physically and verbally both. Be attentive with what one-liner will come next from any of the characters and you might experience some good laugh. Overall, it is a revenge drama that is commercial, predictable and targeted only to create some buzz at the box-office, something that is never expected from Tigmanshu Dhulia![2.5/5]