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Friday, 15 March 2019

फ़ोटोग्राफ : उदासी, ख़ामोशी, खालीपन...और मुंबई! (4/5)

उदासी का रिश्ता अलग ही होता है. मुंबई जैसे भीड़ भरे शहर में भी, जहां वक़्त को भी ठहरने का वक़्त नहीं, दो एकदम अनजान उदास लोग एक-दूसरे को जानने-समझने लगे हैं. दोनों की दुनिया ही पूरी तरह अलग है, मगर खालीपन का एक कमरा दोनों ही के हिस्से बराबर आया है. दोनों अपने-अपने बंद कमरों से निकलने को छटपटा रहे हैं. हालाँकि ये छटपटाहट महसूस करने के लिए आपको उनकी लील लेने वाली ख़ामोशी में गहरे उतरने का हौसला और हुनर, दोनों साथ रखना पड़ेगा. अपनी पहली फिल्म ‘द लंचबॉक्स में इंसानी ज़ज्बातों की कुछ ऐसी ही उथलपुथल रितेश बत्रा पहले भी दिखा चुके हैं. उन्हें आता है, ढर्रों पर भागते अनजान किरदारों को धकेल-धकेल कर एक दूसरे के करीब ले आना, उन्हें भाता है. ‘फ़ोटोग्राफ’ का ज़ायका भी कमोबेश वैसा ही है.

मिलोनी (सान्या मल्होत्रा) टॉपर है. उसे चार्टर्ड अकाउंटेंट बनाने के लिए पूरी फैमिली नज़र गड़ाये बैठी है. ऐसी लड़कियों की तस्वीरें अक्सर पासपोर्ट साइज़ की ही बन के रह जाती हैं, कभी किसी फॉर्म पे, कभी किसी आई कार्ड पे और ज्यादा हुआ तो किसी ‘अनुपम सर की कोचिंग क्लास’ के बिलबोर्ड पे. ऐसे में, एक दिन गेटवे ऑफ़ इंडिया पर टहलते हुए मिलोनी पासपोर्ट साइज़ के फोटो से निकल कर पोस्टकार्ड साइज़ में छप जाती है. कैमरे की मेहरबानी कहिये या फोटोग्राफर की वो ‘एक पैसा मुस्कुराईये’ वाली रटी-रटाई गुज़ारिश; मिलोनी को फोटो में अपनी ही शकल अनजान लगने लगती है, पहले से थोड़ी ज्यादा खुश, पहले से थोड़ी ज्यादा ख़ूबसूरत.

रफ़ी (नवाज़ुद्दीन सिद्दिकी) जैसे तमाम फोटोग्राफर आपको गेटवे ऑफ़ इंडिया पर ’पचास (रूपये) में, गेटवे के साथ ताज़ (होटल)’ बेचते नज़र आ जायेंगे, शायद ही आप उनमें से किसी एक के साथ उनके घर तक लौटते हों. रितेश हमें ले जाते हैं, उस एक तंग कमरे में जहां हर कोई अपनी-अपनी आपबीती खुल के बयाँ कर रहा है, यहाँ तक कि कमरे का पंखा भी. रफ़ी को वसीयत में बाप का क़र्ज़ और एक बेबाक बोलने वाली दादी (फारुख जफ़र) नसीब हुई हैं, जिनकी जिद रफ़ी के निकाह पर आ कर बंद घड़ी की सुई जैसे टिक गयी है. टालने के लिए रफ़ी ने शाम की खिंची तस्वीर दादी को पोस्ट कर दी है. मिलोनी अब रफ़ी की ‘नूरी बन गयी है.

‘फ़ोटोग्राफ’ में मुंबई शहर फिल्म का एक अलग से किरदार बन कर सामने आता है, चाहे वो इंसानी शक्ल में घर की नौकरानी (गीतांजलि कुलकर्णी) हो, जिसे चौपाटी पर लिपस्टिक लगाए, बैग लटकाए घूमते देख आप मुश्किल से पहचान पायेंगे या फिर इमारती तौर पर रफ़ी का वो कमरा, जहां चार-चार लोग एक साथ करवट बदल रहे हैं. ‘फ़ोटोग्राफ’ के मिलोनी और रफ़ी ‘द लंचबॉक्स’ के इला और साजन फ़र्नान्डिस से परे नहीं हैं. दोनों की जिंदगियों के टुकड़े मिले-जुले तो हैं, पर जिनके एक होने की उम्मीदें कम ही हैं. मिलोनी बचपन के ‘कैम्पा कोला से बंधी हुई है, तो रफ़ी महीने के आखिर में ‘कुल्फी खाने की आदत के साथ अपने अब्बू की यादों से जुड़ा हुआ. बेहतर है कि दोनों को करीब लाने में बत्रा ज़ज्बातों को कोई नाम देने की जल्दबाजी नहीं दिखाते.

उदासी, बेबसी और नाउम्मीदी भले ही हवा में सीलन की तरह पसरी हो, पर बत्रा उस माहौल में भी हंसी के पल ढूंढ ही लेते हैं. एक ऐसी हंसी जो देर तक कचोटती भी है. मौत जैसे गंभीर मामलों वाले दृश्यों में खास तौर पर. रफ़ी के कमरे में किसी ने कभी ख़ुदकुशी कर ली थी, और उसका एहसास कमरे में रहने वाले को तब हुआ था, जब लाश के बोझ से पंखे ने घूमना बंद कर दिया था और कमरे में गर्मी बढ़ गयी थी. पंखा आज भी घिघिया रहा है. रफ़ी ने अपने माँ-बाप को बचपन में ही खो दिया था, दादी से नूरी बनकर मिलते वक़्त, मिलोनी अपने परिवार को भी मस्जिद की दीवार के तले दबा कर मार देती है. उनके दर्द में साझा होने की गरज़ से.

अदाकारी में, नवाज़ जहाँ अपनी जानी-पहचानी दुनिया में पूरे दमखम के साथ लौटते नज़र आते हैं, सान्या अपने अब तक के निभाए सबसे मुश्किल किरदार में पाँव धरती हैं. मिलोनी बेहद कम बोलती है. उसकी ख़ामोशी उससे कहीं ज्यादा बातें करती है. उसकी ज्यादातर जिंदगी उसके परिवार की चुनी हुई है. रफ़ी के साथ बिताये वक़्त ही उसके अपने हैं. ऐसे किरदार में सान्या पूरी शिद्दत से रच-बस जाती हैं. फारुख जफ़र अपनी बेबाक बकबक से गुदगुदाती रहती हैं. उनके उलाहने, उनकी कहानियाँ, अपने पोते रफ़ी को लेकर उनकी शिकायतें सब इतनी ईमानदार हैं कि आपको उनके अदाकारा होने का भरम भी नहीं होता. गीतांजलि कुलकर्णी भी कुछ इतनी ही जबरदस्त हैं. एक नौकरानी के किरदार में, जहाँ कहने-सुनने से ज्यादा फ्रेम में आने-जाने भर का ही स्कोप रह जाता हो, वहाँ भी और गिनती के उन दो-तीन दृश्यों में भी, गीतांजलि अकेली ही मुझे फिल्म दोबारा देखने को उत्साहित करती हैं. उनके हाव-भाव मुझे घंटों बाद भी याद हैं.

आखिर में, ‘फ़ोटोग्राफ एक ऐसी फिल्म है जो आसान नहीं है. घंटों बाद भुलानी भी, और अपने दो घंटे के कम वक़्त में बिना विचलित हुए देखनी भी. फिल्म जहाँ कुछ दृश्यों में अपने आपको दोहराने की गुनाहगार समझी जा सकती है, वहीँ अपनी धीमी रफ़्तार की वजह से लम्बी होने का एहसास भी करा जाती है. बावजूद इसके, आखिर कितनी बार आप इंसानी ज़ज्बातों का कोई ऐसा ताना-बाना देख पाते हैं, जहाँ रिश्तों में ईमानदारी इस हद तक हो कि उसे नाम देने की जरूरत ही न पड़े! [4/5]

Friday, 29 June 2018

संजू: दत्त, रनबीर, हिरानी...मनोरंजन सब पर भारी! [3.5/5]


क्या कोई भी 3 घंटे की फिल्म या 400 पन्नों की किताब किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति या उसके व्यक्तित्व के बारे में आपकी राय बदलने में कामयाब हो सकती है? नहीं. भले ही वो फिल्म राजकुमार हिरानी जैसे चहेते फ़िल्मकार ने ही क्यूँ न बनायी हो. क्या राजकुमार हिरानी ने संजू के साथ संजय दत्त की छवि सुधारने की ऐसी कोई कोशिश की है? मुझे नहीं लगता. संजय दत्त जैसे सनसनीखेज जिंदगी जीने वाले मशहूर शख्सियत से जुड़ा हर पहलू जानने-समझने-टटोलने के लिए संजू कम पड़ जाती है. तय वक़्त के कथानक में पिरोने के लिए घटनाओं के अपने चुनाव में भी, और मनोरंजन को मद्देनजर रख कर उन घटनाओं के इर्द-गिर्द अतिरंजित भावनाओं का जाल बुनने में भी. जाल शब्द का इस्तेमाल बहुत सोच समझकर कर रहा हूँ. अभिजात जोशी के साथ मिलकर हिरानी स्क्रिप्ट लिखते वक़्त ‘LCD’ फ़ॉर्मूले को ध्यान में रखते हैं, यानी कागज़ पर लिखे जिस दृश्य में LAUGHTER, CRY या DRAMA नहीं, उसका फिल्म में बने रहना जरूरी नहीं. इस गरज़ से, संजू मनोरंजक लगने की कोशिश करते हुए ज्यादा नज़र आती है, और सिनेमाई तौर पर परिपक्व या सम्पूर्ण फिल्म होने का हक़ खोती चली जाती है.

संजय दत्त तमाम बदनामियों और अपनी बिगडैल छवि के बावजूद, दर्शकों के एक बहुत बड़े हिस्से के चहेते अभिनेता रहे हैं. उनसे जुड़े हजारों किस्सों और किंवदंतियों में उन्हें तलाशना अपने आप में किसी रहस्य से कम नहीं है. हिरानी उनकी जिंदगी को जब अपनी सीधी-सरल, पर बेहद चमकदार रंगीन दुनिया में जगह देते हैं, आपकी उम्मीद रहती है कि आप हिरानी की मदद से इस पहेली को आसानी से सुलझा पायेंगे. ऐसा नहीं होता. कम से कम हर बार नहीं होता. संजू में बहुत सारा कुछ ऐसा है, जो आपको असलियत से परे लगता है. अक्सर क्या ऐसा हुआ था?’ से कहीं आगे बढ़कर आप अरे, ऐसा थोड़े ही हुआ होगा की तरफ पहुँचने लगते हैं. और उसकी वजह शायद हर बार हिरानी साब का मनोरंजन को लेकर अपना एक ख़ास नजरिया और तय रवैया ही है. 4 सफल फिल्मों के बाद, अब दर्शक के तौर पर आपको भी उनके दांव-पेंच समझ आने लग गये हैं. चौंकाने के लिए अब हिरानी साब के तरकश में कम ही तीर बचे हैं. हालाँकि अभी भी आप और हम उनसे उबेंगे नहीं, पर बासीपने के हलकी गंध आने लग पड़ी है.

संजू का पहला हिस्सा संजय दत्त (रनबीर कपूर) और ड्रग्स के साथ उनकी उठा-पटक के नाम रहता है. इस दौरान, कथानक में माँ नर्गिस जी (मनीषा कोईराला) की बीमारी, उनकी असामयिक मृत्यु, बेटे को ड्रग्स के दलदल से निकालने में पिता सुनील दत्त (परेश रावल) की नाकाम कोशिशों और संजय की ख़ुद से ही लड़ाई को अहमियत मिलती है. हलके-फुल्के पलों और एक-दो इमोशनल दृश्यों के अलावा, इस हिस्से में अगर कुछ आपको बहुत बांधे रखता है, तो वो है संजय के दोस्त कमलेश (विक्की कौशल) का किरदार. परदे पर विक्की के आते ही जैसे कोई तूफ़ान सा उठने लगता है. इस किरदार के बारे में आपको शायद ही पहले से कुछ पता रहा हो. संजय के साथ कमलेश की दोस्ती के पल हों, या इंटरवल से ठीक पहले कमलेश का एक सनसनीखेज खुलासा; इस एक किरदार के साथ आप हमेशा उत्सुक और उत्साहित रहते हैं. यही एक किरदार है, जो संजय के साथ-साथ रहते हुए कहानी में एक अलग तरह की निरपेक्षता और सकारात्मकता लेकर आता है. यहाँ तक कि पहली मुलाक़ात में ही संजय को दो-टूक सुनाने की हिम्मत दिखा देता है.  

संजय दत्त के अंडरवर्ल्ड से रिश्तों और एके-47 रायफल रखने के वाकये से होकर येरवडा जेल से छूटने तक का सफ़र फिल्म का दूसरा हिस्सा बनता है, जहां ज्यादातर कोशिशें और वक़्त मामले को लेकर संजय की सफाई के इर्द-गिर्द ही घूमता रहता है. पिछले हिस्से में जहां परदे का संजय (रनबीर) असल जिंदगी के संजय पर हर लहजे से हावी होता दिखाई दे रहा था, यहाँ तक आते-आते संजय दत्त का हालिया व्यक्तित्व आपको ज्यादा भाने लगता है. मुन्नाभाई एमबीबीएस घटने और संजू के बाबा बनने के दौर और दृश्य खासे सुहावने लगते हैं. हालाँकि हिरानी का फार्मूला अब भी आपको परेशान कर ही रहा होता है. दोस्तों के बीच गलतफहमियों से पनपी दूरियों को सुलझाने का दृश्य पीके के उस दृश्य की याद दिलाता है, जहां जग्गू और सरफ़राज़ शामिल हैं. कहानी को लम्बे-चौड़े बयानों में बोल बोल कर बताने की कला आप 3 इडियट्स में देख ही चुके हैं. यहाँ तक कि गानों में सपनीली दुनिया की सैर करते किरदारों (3 इडियट्स का ज़ुबी-ज़ुबी) का प्रयोग यहाँ भी ख़ूब (रूबी-रूबी) इस्तेमाल होता है.

अभिनय में, संजू पूरी तरह रनबीर में ढली-रची-बसी फिल्म है. सोनम कपूर के साथ बाथरूम वाला दृश्य हो, या फिर परेश रावल के साथ इमोशनल सीन्स; रनबीर संजय दत्त की तरह सिर्फ चलने, बोलने या दिखने से परे लगते हैं. परदे पर उनके होते हुए कुछ और देखने-सुनने की चाह भी नहीं रहती, हालाँकि विक्की कौशल के साथ वाले दृश्यों में उन्हें साफ़ टक्कर मिलती है. विक्की यहाँ अपने पूरे रंग में हैं. रनबीर जैसे बेहतर अभिनेता के सामने होते हुए भी उनकी अदाकारी में एक छटांक को भी बिखराव नहीं दिखता. आखिर में, संजू एक ऐसी फिल्म हैं जिसके मुख्य किरदार से आप पहले से ही वाकिफ हैं, और उसके बारे में जितना जानते हैं उतना ही और जानना चाहते हैं. इस लिहाज़ से संजू आपको छोटे-बड़े ढेर सारे मजेदार किस्से सुना डालती है. अब आपको तय करना है, हिरानी के फार्मूले में कौन कितना फिट बैठ गया था, और कौन सा बैठाया गया था? बहरहाल, मीडिया को  एकतरफ़ा ठहराने की कोशिश में फिल्म गंभीरता की ओर जरूर बढती दिखती है, पर आप इसे सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन के चश्मे से ही देखने की जेहमत उठाएं, तो बेहतर नतीजे मिलेंगे. [3.5/5]           

Wednesday, 24 January 2018

पद्मावत: दकियानूसी पुरुष मानसिकता का 'पैम्फलेट'! [2.5/5]

ऐसे मुश्किल वक़्त में, जब हमारा समाज महिलाओं के सम्मान, उनके अधिकारों और उनके साथ होने वाले अपराधों के प्रति संवेदनशील होने की हर शर्त नज़रंदाज़ करता जा रहा है; मुझे समझ नहीं आता, संजय लीला भंसाली जैसे जज़्बाती और काबिल फ़िल्मकार को परदे पर 'पद्मावत' कहने की क्या सूझी? हालाँकि मैं देश की संस्कृति और इतिहास से जुड़े महाकाव्यों और लोकगाथाओं को सिनेमाई चोगा पहनाने के खिलाफ नहीं हूँ, और विषय चुनने की स्वतंत्रता को भी फ़िल्मकार का कलात्मक अधिकार समझता हूँ, मानता हूँ; फिर भी भंसाली जैसे फ़िल्मकार से इतनी तो उम्मीद की ही जा सकती थी. 'पद्मावत' राजपूतों की आन-बान और शान के भव्य कशीदों के बीच फँसी एक ऐसी दकियानूसी, गर्वीली और ठेठ पुरुष मानसिकता का 'पैम्फलेट' है, जिसे कोरा इतिहास मान कर देखना, सराहना और उसका जश्न मनाना किसी दुरुस्त दिमाग या दिल के लिए आसान नहीं होगा. राजपूताना शौर्य की नायिका को जौहर के लिए पति से अनुमति मांगते देखना ह्रदय-विदारक नहीं है, तो क्या है? 

भंसाली की 'पद्मावत', मलिक मोहम्मद जायसी के इसी नाम वाले महाकाव्य को अपनी बुनियाद बनाकर इतनी भव्यता से परदे पर परोसती है, कि लोकगाथा जैसी लगने वाली कमज़ोर कहानी उसके नीचे कई बार दम तोड़ती नज़र आती है. मेवाड़ के राजपूत राजा रतन सिंह (शाहिद कपूर) अपनी पहली पत्नी की जिद पूरी करने के लिए, अनूठे मोतियों की खोज में सिंहल (अब श्रीलंका) तक चले आये हैं. वापस लौट रहे हैं, तो साथ हैं सिंहल की राजकुमारी पद्मावती (दीपिका पादुकोण). पद्मावती का रूप इतना बाकमाल कि दिल्ली सल्तनत का खूंखार सुल्तान खिलजी (रणवीर सिंह) उन्हें देखने की गरज से, महीनों तक अपने सैनिकों के साथ मेवाड़ के किले के सामने डेरा जमाये बैठा रहा. दिवाली मनाई, होली मनाई और पता नहीं क्या-क्या! युद्ध टालने के लिए रानी की झलक आईने में दिखा दी गयी है. खिलजी की भूख बढ़ती जा रही है. और कहानी धीरे-धीरे ही सही, खिलजी के षडयंत्रों और राजा रतन सिंह के तेवरों से होते हुए रानी पद्मावती के जौहर की तरफ.

फिल्म का लुक हो, लोकेशन, बड़े-बड़े सेट या किरदारों का पहनावा; भंसाली अपनी पैनी नज़र से दृश्यों की सजावट का ख़ासा ध्यान रखते हैं. 'पद्मावत' जैसी पीरियड फिल्म को इसकी दरकार भी थी, और फिल्म को भंसाली अपने इस पागलपन से नवाजते भी खूब हैं, पर कहीं न कहीं दृश्यों की बनावट, किरदारों के तेवर और फिल्म में इस्तेमाल गानों का फिल्मांकन भंसाली की पिछली फिल्म 'बाजीराव मस्तानी' से इस हद तक मेल खाता है कि भंसाली साब की रचनात्मकता को सराहने की ललक जाती रहती है. फिल्म में रानी पद्मावती का जौहर को जायज़ ठहराने और वीरता का प्रतीक बताने वाले दृश्य के बाद, संजय लीला भंसाली का अपने ही बनाये उम्मीदों के सिनेमा के खंडहर में खुद को दोहराते, ढहते, ढमिलाते देखना दूसरा सबसे दिल बैठा देने वाला वाकया है. और परेशान करने वाला भी. 

अभिनय में 'पद्मावत' रणवीर सिंह के जुनूनी अदाकारी का जीता-जागता नमूना है. मांस के लोथड़े पर दांत गड़ाये, आँखों में धूर्तता और चालाकी की चमक जगाये और हाव-भाव में जिस तरह का पागलपन रणवीर लेकर आते हैं, बहुत अरसे बाद किसी हिंदी फिल्म के खलनायक में दिखे हैं. शाहिद थोड़े मिसफिट जरूर दिखते हैं, अपनी कद काठी की वजह से, पर अभिनय में कम ही निराश करते हैं. दीपिका परदे पर आग की तरह धधकती रहती हैं, और फिल्म के ज्यादातर दृश्यों को खूबसूरत बनाने में पूरा योगदान देती हैं. खिलजी के पुरुष-प्रेमी की भूमिका में जिम सरभ बोल-चाल के लहजे में कमज़ोर होने के बावजूद अच्छे लगते हैं. छोटी भूमिका में ही, अदिति राव हैदरी कहीं-कहीं दीपिका को भी पीछे छोड़ देती हैं.  

आखिर में; 'पद्मावत' एक राजपूताना मोम के पुतलों के अजायबघर जैसा है. देखने में भव्य, सुन्दर और शानदार, पर उन्हें बिना हिलते-डुलते पौने तीन घंटे तक एकटक देखते रहने का दुस्साहस कौन कर पायेगा भला? वैसे भी, तमाम उल-जलूल के विवादों के बीच 'पद्मावत' अब एक फिल्म से कहीं ज्यादा संवैधानिक, राजनीतिक और सामाजिक सतहों पर चल रही गुंडई के प्रति अपना विरोध दर्ज का आन्दोलन बन गई है, तो विरोध का स्वर मुखर करने के लिए ही सही, एक बार देखी जा सकती है. राजपूत कहलाने में सीना चौड़ा होता हो, तब तो जरूर...! [2.5/5] 

Friday, 9 June 2017

राब्ता: पुरानी 'पुनर्जन्म' वाली फ़िल्मों का बासी 'रायता'! [1/5]

एक धूमकेतु है, 'लव जॉय' नाम का. 800 साल में एक बार पृथ्वी के पास से होकर गुजरता है. अगले हफ्ते ये कुदरती करिश्मा फिर होने वाला है, और इसी के साथ कुछ और भी होने वाला है, जो पहले भी हो चुका है. ठीक इसी वक़्त पर, ठीक इसी मुहूर्त में. तकलीफ़ ये है कि चौसर की इस बाज़ी में सारे के सारे अहम् खिलाड़ी दुनिया के अलग-अलग कोनों में हैं. कहानी का राजकुमार (सुशांत सिंह राजपूत) पंजाब में गिन-गिन कर लड़कियां पटाने में व्यस्त है, अनाथ राजकुमारी (कृति सैनन) लन्दन में चॉकलेट शॉप चलाती हैं, और दुष्ट राजा (जिम सरभ) जाने कहाँ समन्दर के बीचो-बीच बने अपने महल में, एक काली-सफ़ेद तस्वीर में बने चेहरे के होठों पर लाल रंग पोत रहा है. 

अब कुदरत, लेखक (गरिमा-सिद्धार्थ) और निर्देशक दिनेश विजान की जिम्मेदारी बनती है, कि कैसे इस एक हफ्ते में तीनों को एक-दूसरे के सामने ला खड़ा करें? रास्ता कठिन है; पहले तो राजकुमार का लन्दन आना, मुलाक़ात के दूसरे दिन ही उनका राजकुमारी के बिस्तर से अंगड़ाईयां लेते हुए बाहर निकलना, दुष्ट राजा साहब का इत्तेफ़ाकन लन्दन आ टपकना, फिर धीरे-धीरे सबको पिछले जनम की याद दिलाना. किसी के आम फ़िल्मकार के बस की कहाँ ये माथापच्ची? फिल्मों में पहले कभी देखा-सुना हो, तो भी थोड़ी मदद हो जाती. खैर...राजकुमारी को सपने आते हैं, अजीब डरावने सपने. अपने 'करन-अर्जुन' की तरह, फोटो-नेगेटिव इफ़ेक्ट में. पानी से डर भी लगता है. राजकुमार के पीठ पर चोट की निशान जैसा बर्थ-मार्क भी है, जैसा शाहरुख़ को था 'ओम शांति ओम' में. राजा साहब से कोई पूछने की हिम्मत भी नहीं करता कि इस जनम में उन्हें सब कुछ याद कैसे आया? ना ही वो बताने की जरूरत भी समझते हैं, पर इन सबमें जो ढाई घंटे (पूरी की पूरी फिल्म) बर्बाद होते हैं, उसे बचाने का एक उपाय तो मैं ही दिनेश विजान साब को सुझा सकता था. अच्छा होता, अगर फिल्म की शुरुआत में ही सारे किरदारों को 'राज़ पिछले जनम का' के एक-दो एपिसोड दिखा दिये जाते. इसी बहाने रवि किशन से अभिनय के गुर भी सीखने को मिल जाते, और सबका दिमाग भी चलने लगता. 'आग से डर लगता है? आप पिछले जनम में जल के मरे थे' ' गले पे निशान है? आप रस्सी से लटक के मरे थे' और सबके सब पिछले जनम में राजा-रानी-सैनिक. कोई गरीब किसान नहीं, किसी की सामान्य मृत्यु नहीं. जाओ, ऐश करो और अपनी मौत का बदला लो.    

'राब्ता' देखते हुए एक ख्याल बार-बार दिमाग में हथौड़े की तरह बजता है कि आखिर कोई भी समझदार इस तरह की बेवकूफ़ी भरी, घिसी-पिटी, वाहियात कहानी पर फिल्म बनाने और उसमें काम करने के लिए राजी क्यूँ, और क्यूँ होगा? फिर याद आये इस फिल्म से निर्देशन में कदम रख रहे दिनेश विजान साब, जो खुद 'बीइंग सायरस', 'लव आज कल', 'कॉकटेल', 'बदलापुर' और 'हिंदी मीडियम' के प्रोड्यूसर रह चुके हैं, और फिर अचानक ही मन की सारी शंकायें, दुविधाएं झट काफ़ूर हो गयीं. 'बॉस हमेशा सही होता है' की तर्ज़ पर एक कहावत फिल्म इंडस्ट्री में भी बहुत मशहूर है, 'मेरा पैसा, मेरा तमाशा'. पैसों की गड्डियों के नीचे दबी डेढ़ सौ पेज की स्क्रिप्ट में खामियां किसे दिखतीं भला. 

बहरहाल, फिल्म में अगर कुछ ठीक-ठाक है, तो वो हैं फिल्म के संवाद. हालाँकि उनका सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं और कई बार तो इतने पीछे चले जाते हैं, जैसे राजकुमार-वहीदा रहमान-मनोज कुमार के 'नीलकमल' की बची-खुची खुरचन हों; पर अपने नए ज़माने के तौर-तरीकों और लहजों से एक वही हैं जो थोड़ा बहुत मनोरंजन करते रहते हैं. अभिनय में कृति कम निराश करती हैं, और शिकायत के मौके भी कम ही देतीं हैं. सुशांत कोशिश तो बहुत करते हैं, पर चाह के भी आप उनको सराहने का ज़ोखिम नहीं ले पाते. जिम सरभ इस तरह की मेनस्ट्रीम मसाला फिल्मों के लिए बने नहीं दिखते. उनका अभिनय 'नीरजा' में चौंका देने वाला था. यहाँ वो आपके भरोसे को डगमगा देते हैं. मेहमान भूमिका में न तो राजकुमार राव खुद पहचाने जाते हैं, न ही उनके अभिनय की वो चिर-परिचित छाप. हाँ, उनके मेक-अप की जितनी तारीफ़ करनी हो, भले ही कर लीजिये. 

आखिर में, 'राब्ता' देखने की वजह तो छोड़ ही दीजिये, मुझे इस फिल्म के बनने की वजह भी दूर-दूर तक समझ नहीं आती. इस ढाई घंटे की एक भयंकर भूल को भुलाने में मुझे कोई ख़ास दिक्कत नहीं होगी, पर दिनेश विजान साब से एक शिकायत तो रहेगी. "ज़नाब, इतने ही बजट में चार छोटे-छोटे 'मसान' 'अ डेथ इन द गंज', 'बीइंग सायरस' आराम से आ जाते, इतनी क्या हाय-तौबा मची थी 'राब्ता' परोसने की?' पर मुझे क्या, पैसा आपका, तो तमाशा भी आपका'! [1/5]            

Friday, 2 June 2017

अ डेथ इन द गंज: रोचक, रोमांचक! इंसानी फ़ितरतों का ‘गंज’! [4/5]

सन् 1979 का मैकक्लुस्कीगंज बस यूँ ही ‘अ डेथ इन द गंज’ का हिस्सा नहीं है. रांची से सटे इस छोटे से पहाड़ी इलाके का एक अपना रोचक किरदार है, जो फिल्म में वक़्त-बेवक्त खुलता रहता है. साहब लोगों का क़स्बा है ये. एंग्लो-इंडियन साहब लोग, जो जितनी दिलचस्पी से संथाली लोकगीतों पर नाच लेते हैं, उतनी ही तबियत से नए साल का जश्न मनाते हुए स्कॉट्स भाषा के गीत ‘ऑल्ड लैंग साईन’ को भी एक सुर में दोहराते हैं. जंगलों से घिरे, ठण्ड के सफ़ेद धुएं ओढ़े बड़े से एक बंगले में, ऐसे ही एक परिवार के साथ वक़्त बिताने का मौका देती है ‘अ डेथ इन द गंज’! पूरे एक हफ्ते के फ़िल्मी वक़्त में ऐसे किरदारों के साथ, जिनकी नीयत, जिनकी तबियत और जिनकी सीरत में आप अपने आप को ही कट-कट कर बंटते हुए देखते हैं. किसी के साथ ज़्यादा, किसी के साथ थोड़ा कम.

नीली अम्बेसडर में नंदू (गुलशन देवैया) अपनी बीवी बोनी (तिलोत्तमा शोम) और बच्ची तानी (आर्या शर्मा) के साथ कलकत्ता से मैकक्लुस्कीगंज अपने घर जा रहा है. साथ में, बोनी की सहेली मिमी (कल्कि कोचलिन) और मौसेरा भाई शुटू (विक्रांत मैसी) भी हैं. माँ (तनूजा) घर की बेतरतीबी को कोस रही हैं, तो बाप (ओम पुरी) रम के पैग बना-बना पेश कर रहा है. जल्द ही, महफ़िल जमने लगती है. लंगोटिए दोस्त विक्रम (रणवीर शौरी) और ब्रायन (जिम सरभ) भी आ पहुंचे हैं. एक-दो दिन में ही सबके चेहरे से धूल हटने लगती है, और अन्दर की कालिख़ गहराने लगती है. इंसानी फितरतें खुल कर सामने आने लगती हैं. किसी एक कमज़ोर पर झुण्ड में दाना-पानी लेकर चढ़ जाने का खेल किसने नहीं खेला होगा? रात को सोने से पहले भूतों का जिक्र, दोपहर में अपने-अपने कमरों में घंटे-दो घंटे के लिए पसर जाने का सुख, एक शाम सबके लिए खाना बनाने का पूरा तामझाम; और इस बीच घर पे काम करने वाली औरत का अपने मरद से पूछना, “कब जइहें ई लोग? इतना काम करे के पड़त है”!

माहौल से नरमी सूखने लगी है. बाप देर रात को उठकर कमरे तक आता है, कुछ खोज रहा है, जाने क्या? बेटा शतरंज की बाज़ी लगाए बैठा है, पूछता है, “आपको कुछ चाहिए?”  “नहीं, भाई! तुम खेलो न”. बेटा अब भी अड़ा है, “सुबह खोज लीजियेगा”, बाप झुंझला के बोल पड़ता है, “बाप मैं हूँ या तुम?” अगले दृश्य में बाप फिर कुछ खोजते हुए बड़बड़ा रहा है, “इस घर में कुछ भी रख दो, मिलता ही नहीं”. कुछ और भी दफ़न है इस घर में, हँसते चेहरों के पीछे. कुछ छुपे हुए सच, कुछ दबी हुई चाहतें, हसरतें, घुटन, कुढ़न, बहुत कुछ. डर यही है कि जब खुलेगा तो अपनी चपेट में किसको लील लेगा? आप और हम सिर्फ अंदाजा लगा सकते हैं, ठीक ठीक कह नहीं सकते.

‘अ डेथ इन द गंज’ कोंकना सेन शर्मा के पिता मुकुल शर्मा की कहानी पर आधारित है, जिसे परदे पर पसारते वक़्त, कोंकना महान फ़िल्मकार सत्यजित रे की ‘अरण्येर दिन रात्रि’ से ख़ासा प्रभावित और प्रेरित दिखाई देती हैं, पर शुरू-शुरू के झिझक के बाद आपके लिए जानना मुश्किल नहीं रह जाता कि यह समानता सिर्फ कहानी कहने की कला, बनावट और सजावट तक ही सीमित है, उसके बाद कोंकना जब अपनी छाप छोड़ती हैं, तो उनकी दखलंदाजी पूरी तरह उनकी अपनी होती है. चाहे वो 1979 के वक़्त को दीवाल पर घड़ी की तरह टांकने की हो, या फिर किरदारों के पसंद-नापसंद को माहौल से जोड़े रखने की. कोंकना जिस तरह दृश्यों की परिकल्पना तैयार करती हैं, सिनेमा की एक नयी, बुलंद आवाज़ बन कर उभरती हैं. नए साल के जश्न के बीच, बंगले के एक अँधेरे हिस्से में नौकर दम्पति सूखे चावल निगल रहा है. उन्हीं के साथ साहब लोगों का कुत्ता भी.

अभिनय की नज़र से फिल्म का हर कलाकार अपने चरम पर बैठा आपको अपनी तरफ खींचता है. रणवीर शौरी अगर अपनी अकड़ और तेवर से करिश्माई लगते हैं, तो गुलशन की ईमानदारी उनके झुंझलाहट वाले दृश्यों में साफ़ नज़र आती है. तिलोत्तमा बेहतरीन हैं. तनूजा जी को वापस परदे पर देखना अच्छा लगता है. एक दृश्य में कोंकना उन्हें खर्राटे लेते हुए दिखाती हैं. ये एक दृश्य दोनों के बारे में बहुत कुछ कह जाता है. कल्कि अपनी बेबाकी में अव्वल हैं, पर फिल्म में सबसे ख़ास, सबसे आगे अगर कोई मशाल लिए खड़ा दिखता है, तो वो हैं विक्रांत मैसी! विक्रांत चेहरे पर अलग-अलग भाव एक के बाद एक यूँ और इतनी सफाई से बदलते हैं, जैसे कोई टेलीविज़न पर चैनल बदल रहा हो. दर्शकों से जुड़ाव कायम करने में विक्रांत कुछ इस हद तक सफल रहते हैं कि जब वो परदे पर नहीं भी होते, या कहीं पीछे चुपचाप खड़े भी, तो भी उनके लिए आपकी फ़िक्र जैसे की तैसे ही रहती है. कोई शक ही नहीं, ये साल की सबसे ख़ास और चुनिन्दा परफॉरमेंसेस में से एक है. एक ऐसी परत-दर-परत अदाकारी, जिसे पूरी तरह जानने-समझने के लिए बार-बार देखा और सराहा जाना चाहिए.

आखिर में, ‘अ डेथ इन द गंज’ उन चंद रोमांचक बॉलीवुड फिल्मों में से है, जो आपके अन्दर सिहरन पैदा करने के लिए कोई झूठा खेल नहीं रचतीं, बल्कि आपको उस माहौल में हाथ पकड़ कर खींच ले जाती हैं, जहां आप हर वक़्त अपने दिल-ओ-दिमाग़ के साथ ‘जो हुआ, वो कैसे हुआ’, ‘जो हुआ, वो किसके साथ हुआ’ और ‘जो हुआ, वो कब होगा’ की लड़ाई लड़ते रहते हैं. ‘अ डेथ इन द गंज’ इस साल की ‘मसान’ है, उतनी ही ईमानदार, उतनी ही संजीदा, उतनी ही रोचक! [4/5]     

Wednesday, 28 December 2016

किरदार मिलते हैं...(Canvas doesn’t matter, Strokes do)

छोटी-छोटी फिल्मों में बड़ी भूमिकाएं हों या बड़ी-बड़ी फिल्मों में छोटा सा रोल; कुछ ख़ास लोग अपने अभिनय की धार कभी कुंद नहीं पड़ने देते. ‘सहायक अभिनेता’ के ठप्पे के नीचे अक्सर फिल्म के सबसे दमदार अभिनेता दबे पड़े मिलते हैं. फिल्म जब ठंडी पड़ने लगती, इनका दिख भर जाना अलाव सी गर्माहट दे जाता है. अपने किरदार के चटख रंगों से बेरंग फिल्मों को परदे पर एक बार फिर जिंदा करने का हुनर बखूबी आता है इन्हें. हर फिल्म आपके साथ थिएटर से घर तक चली आये, मुमकिन नहीं, पर इन किरदारों को झटक के हटा पाना अपने ज़ेहन से इतना आसान भी नहीं.

साल 2016 में इन 15 अभिनेताओं ने अपनी कमाल की अदाकारी से न सिर्फ अपने लिए तालियाँ बटोरी हैं, बल्कि आपको पूरी तरह अचंभित भी किया है. ‘लाल रंग’ में औरतों की तरह बोलने वाले औघड़ की भूमिका में कुमार सौरभ हों, या ‘नीरजा’ में पागलपन की हद पार कर जाने वाले आतंकवादी बने जिम सरभ! कौन भूल सकता है ‘सुल्तान’ में सलमान खान के उस दोस्त (अनंत विधात शर्मा) को, जिसे अच्छी एक्टिंग के उम्मीद में हम फिल्म के बीचोंबीच ढूँढने लगते थे, या फिर ‘फोबिया’ की उस बातूनी टॉमबॉय (यशस्विनी दायमा) को!! हरेक को, और सभी को बड़ा वाला ‘थैंक यू’...!     

# रिया शुक्ला, निल बट्टे सन्नाटा में
# सिद्धांत बहल, जुगनी में
# प्रतीक बब्बर, अमरीका में
# सुरवीन चावला, पार्च्ड में
# प्रियांशु पेंयुली, रॉक ऑन 2 में
# पूरब कोहली, एयरलिफ्ट में
# कुमार सौरभ, लाल रंग में
# कीर्ति कुल्हारी, पिंक में
# सिकंदर खेर, तेरे बिन लादेन-डेड ऑर अलाइव में
# अनंत विधात शर्मा, सुल्तान में
# साक्षी तंवर, दंगल में
# मानव विज, उड़ता पंजाब में
# अमृता सुभाष, रमन राघव 2.0 में
# जिम सरभ, नीरजा में
# यशस्विनी दायमा, फोबिया में