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Friday, 15 February 2019

गली बॉय: रनवीर ‘आग’, जोया ‘हार्ड’, फिल्म ‘मज़बूत’! (4/5)


ज़िंदगी में जब दुखों का शोर बरदाश्त से बाहर हो जाये, बेबसी बात-बात पर मुंह चिढ़ाये और अपने साथ हो रहे हर सितम-हर गलत के खिलाफ़ आवाज़ उठाने को ज़बान लड़खड़ाये, बेहतर है कि अपने मोबाइल पर अपना पसंदीदा म्यूजिक फुल वॉल्यूम पर लगाईये, कानों में हैडफ़ोन अन्दर तक ठूंसिये, और मुस्कुराते दिखने की कोशिश कीजिये. हालाँकि इससे बदलेगा कुछ नहीं, पर बदलाव की कुलबुलाहट लिए अन्दर धधकती आग को थोड़ी और हवा जरूर मिलेगी. मुराद (रनवीर सिंह) ऐसा ही कर रहा है. उसके अब्बू (विजय राज) उसके लिए छोटी अम्मी ले आये हैं, उसकी खुद की अम्मी (अमृता प्रकाश) के रहते. मुराद के लिए निकाह के गाजे-बाजे का उबलता शोर कानों में इयरफ़ोन डालते ही हिप-हॉप की ठंडी बयार बन जाता है. जोया अख्तर की ‘गली बॉय धारावी की संकरी, बजबजाती गलियों और दड़बों से भी तंग कमरों में घुटते इंसानी चाहतों, अरमानों और सपनों का उदास चेहरा है. बेहतर जिंदगी की आस में कुछ ने हथियार पहले ही डाल दिए हैं, कुछ बच-बचा के निकलने की लगातार तरकीबें लड़ा रहे हैं, और कुछ सही वक़्त और सही जगह के इंतज़ार में राख के भीतर, आग बनके धधक रहे हैं.

मोईन (विजय वर्मा) गाड़ी चुराने निकला है, अपने दो साथियों के साथ. मुराद उनमें से एक है, कहानी का मुख्य पात्र होते हुए भी उसपे आपका ध्यान नहीं जाता. पीछे से आगे आने में अभी उसको वक़्त है. मुराद के इस इंतज़ार में तेज-तर्रार सैफीना (आलिया भट्ट) 9 साल से उसके साथ है. कुछ इस कदर ज़रूरी, मानो वो ना हो तो जिंदगी बिना बचपन की हो के रह जाए. मुराद खुद भी नहीं जानता, कौन सा रास्ता उसे धारावी की गलियों से निकाल कर उसे उसके अपने सपनों के आसमान तक ले जाएगा. कॉलेज के नोटबुक के बीचोबीच लिखी कवितायें उसका गुबार भर हैं, तब तक जब तक रैपर एमसी शेर (सिद्धांत चतुर्वेदी) के रूप में उसकी पहचान अपने आप से नहीं होती.
                                         
हिंदी फिल्मों ने हिप-हॉप और रैप कल्चर को भुनाने और निचोड़ने की होड़ में, उसकी असल बनावट और उसके होने के पीछे के जरूरी मकसद को पेश करने में ख़ासी बेईमानी बरती है. समाज के दबे-कुचले गरीब, असहाय और निचले तबके के गुस्से और अकुलाहट को तेवर भरे अंदाज़ और मज़बूत आवाज़ की शकल में ठीक-ठीक परोसने में ‘गली बॉय की ईमानदारी काबिल-ए-तारीफ़ है. मुराद के लिखे गीतों में गाड़ी में पीछे बैठी मालकिन के आंसू न पोछ पाने की बेबसी भी है, सामाजिक बन्धनों से आज़ाद होने की तड़प भी और हिन्दुस्तान को असली हिप-हॉप से मिलाने का जोश भी. सच्चाई से मैच करने वाले सपने देखने की हिदायत अब्बू का अपना सच है, मुराद तो सपनों से मैच कराने के लिए अपनी सच्चाई तक को बदल देने का दम रखता है.

जोया की खिंचाई अक्सर इस बात पर होती रही है कि उनकी कहानियों का संसार अमीरी की चमक का मोहताज़ रहता है, हालाँकि ‘लस्ट स्टोरीज’ के अपने हिस्से वाली कहानी (भूमि पेडणेकर अभिनीत) में उन्होंने इस भ्रम को ख़ूब सलीके से तोड़ा है; फिर भी ‘गली बॉय सच्चे मायनों में उन्हें सिनेमा के जानकारों के साथ-साथ, आम दर्शकों के सामने भी एक नए कलेवर में पेश करती है. गौरतलब है कि जोया मुंबई के सबसे बदहाल इलाके की कहानी कहते वक़्त भी किरदारों के हाल-ओ-हालात, और उनकी जेहनी जद्दो-जेहद पर ज्यादा पैनी नज़र रखती हैं, ना कि ‘अंडरडॉग को ‘स्लमडॉग’ बना कर बेचने की आसान कोशिश.

अभिनय में रनवीर लाजवाब हैं. ‘पद्मावत’ और ‘सिम्बा’ से अलग इस फिल्म में न सिर्फ उनकी चुनौती कमउम्र लगने की थी, बल्कि विपरीत हालातों के आगे सहम सहम कर चलने वाले नौजवान के किरदार में जान फूंकने की भी. लोकल गाइड विदेशी सैलानियों को धारावी के लोगों की जिंदगियों का नज़ारा दिखाने लाया है, मुराद बिना लाग-लपेट, बेफिक्री से वहीँ कोने में अधनंगी हालत में लेटा सब देख रहा है. मुराद की आँखों में नमी हो या चमक, रनवीर उसे आप तक पहुँचाने में कोई कमी-कोई कसर नहीं छोड़ते. आलिया के तो क्या ही कहने! बोलने की शैली से लेकर, शरारत भरी भाव-भंगिमाओं तक; आलिया दिलकश हैं. इन दोनों के साथ, दो और ख़ास अभिनेता जो बड़ी शिद्दत के साथ अपना दमखम दर्ज कराते हैं, वो हैं, मोईन के किरदार में विजय वर्मा और एमसी शेर बने सिद्धांत चतुर्वेदी. विजय उन कलाकारों में से हैं, जिनकी शुरुआत ‘मानसून शूटआउट जैसी फिल्म में तारीफें बटोरने से भले ही हुई हो, हिंदी फिल्मों ने हमेशा उनकी प्रतिभा को कमतर ही आंका है. आप इस फिल्म से पहले उन्हें पहचानते भले ही न रहें हों, इस फिल्म के बाद उन्हें भूलने की गलती नहीं करेंगे. सिद्धांत बेमिसाल अदाकार हैं. कुछ इतने मंजे हुए, सधे हुए कि रनवीर भी कहीं कहीं उनके आगे फीके नज़र आते हैं. बहुत मुमकिन है कि आप उन्हें असल में कोई जाना-माना रैपर मान बैठें. 

आखिर में; ‘गली बॉय अपनी धीमी रफ़्तार के बावजूद, लम्बे सफ़र और कहीं कहीं दोहराव की शिकायतों के बीच, एक बेहतरीन फिल्म है. एक ऐसी मुकम्मल फिल्म जिसका जादू आप पर देर से भी चढ़ेगा, और रहेगा भी देर तक. ‘भोत हार्ड है, ‘मज़बूत है, भाई लोग, और ‘अपना टाइम आएगा जैसे टपोरी संवादों के साथ-साथ, यकीनन सिनेमाघरों से बाहर निकलते वक़्त आप मुराद बन कर रैप करने की असफल कोशिशों में अपने आप को चहकते-चमकते पायेंगे. दर्शकों पर ऐसा असर, आज के दौर में न आसान है, ना ही आम! जोया को बधाई! [4/5]   

Friday, 2 June 2017

अ डेथ इन द गंज: रोचक, रोमांचक! इंसानी फ़ितरतों का ‘गंज’! [4/5]

सन् 1979 का मैकक्लुस्कीगंज बस यूँ ही ‘अ डेथ इन द गंज’ का हिस्सा नहीं है. रांची से सटे इस छोटे से पहाड़ी इलाके का एक अपना रोचक किरदार है, जो फिल्म में वक़्त-बेवक्त खुलता रहता है. साहब लोगों का क़स्बा है ये. एंग्लो-इंडियन साहब लोग, जो जितनी दिलचस्पी से संथाली लोकगीतों पर नाच लेते हैं, उतनी ही तबियत से नए साल का जश्न मनाते हुए स्कॉट्स भाषा के गीत ‘ऑल्ड लैंग साईन’ को भी एक सुर में दोहराते हैं. जंगलों से घिरे, ठण्ड के सफ़ेद धुएं ओढ़े बड़े से एक बंगले में, ऐसे ही एक परिवार के साथ वक़्त बिताने का मौका देती है ‘अ डेथ इन द गंज’! पूरे एक हफ्ते के फ़िल्मी वक़्त में ऐसे किरदारों के साथ, जिनकी नीयत, जिनकी तबियत और जिनकी सीरत में आप अपने आप को ही कट-कट कर बंटते हुए देखते हैं. किसी के साथ ज़्यादा, किसी के साथ थोड़ा कम.

नीली अम्बेसडर में नंदू (गुलशन देवैया) अपनी बीवी बोनी (तिलोत्तमा शोम) और बच्ची तानी (आर्या शर्मा) के साथ कलकत्ता से मैकक्लुस्कीगंज अपने घर जा रहा है. साथ में, बोनी की सहेली मिमी (कल्कि कोचलिन) और मौसेरा भाई शुटू (विक्रांत मैसी) भी हैं. माँ (तनूजा) घर की बेतरतीबी को कोस रही हैं, तो बाप (ओम पुरी) रम के पैग बना-बना पेश कर रहा है. जल्द ही, महफ़िल जमने लगती है. लंगोटिए दोस्त विक्रम (रणवीर शौरी) और ब्रायन (जिम सरभ) भी आ पहुंचे हैं. एक-दो दिन में ही सबके चेहरे से धूल हटने लगती है, और अन्दर की कालिख़ गहराने लगती है. इंसानी फितरतें खुल कर सामने आने लगती हैं. किसी एक कमज़ोर पर झुण्ड में दाना-पानी लेकर चढ़ जाने का खेल किसने नहीं खेला होगा? रात को सोने से पहले भूतों का जिक्र, दोपहर में अपने-अपने कमरों में घंटे-दो घंटे के लिए पसर जाने का सुख, एक शाम सबके लिए खाना बनाने का पूरा तामझाम; और इस बीच घर पे काम करने वाली औरत का अपने मरद से पूछना, “कब जइहें ई लोग? इतना काम करे के पड़त है”!

माहौल से नरमी सूखने लगी है. बाप देर रात को उठकर कमरे तक आता है, कुछ खोज रहा है, जाने क्या? बेटा शतरंज की बाज़ी लगाए बैठा है, पूछता है, “आपको कुछ चाहिए?”  “नहीं, भाई! तुम खेलो न”. बेटा अब भी अड़ा है, “सुबह खोज लीजियेगा”, बाप झुंझला के बोल पड़ता है, “बाप मैं हूँ या तुम?” अगले दृश्य में बाप फिर कुछ खोजते हुए बड़बड़ा रहा है, “इस घर में कुछ भी रख दो, मिलता ही नहीं”. कुछ और भी दफ़न है इस घर में, हँसते चेहरों के पीछे. कुछ छुपे हुए सच, कुछ दबी हुई चाहतें, हसरतें, घुटन, कुढ़न, बहुत कुछ. डर यही है कि जब खुलेगा तो अपनी चपेट में किसको लील लेगा? आप और हम सिर्फ अंदाजा लगा सकते हैं, ठीक ठीक कह नहीं सकते.

‘अ डेथ इन द गंज’ कोंकना सेन शर्मा के पिता मुकुल शर्मा की कहानी पर आधारित है, जिसे परदे पर पसारते वक़्त, कोंकना महान फ़िल्मकार सत्यजित रे की ‘अरण्येर दिन रात्रि’ से ख़ासा प्रभावित और प्रेरित दिखाई देती हैं, पर शुरू-शुरू के झिझक के बाद आपके लिए जानना मुश्किल नहीं रह जाता कि यह समानता सिर्फ कहानी कहने की कला, बनावट और सजावट तक ही सीमित है, उसके बाद कोंकना जब अपनी छाप छोड़ती हैं, तो उनकी दखलंदाजी पूरी तरह उनकी अपनी होती है. चाहे वो 1979 के वक़्त को दीवाल पर घड़ी की तरह टांकने की हो, या फिर किरदारों के पसंद-नापसंद को माहौल से जोड़े रखने की. कोंकना जिस तरह दृश्यों की परिकल्पना तैयार करती हैं, सिनेमा की एक नयी, बुलंद आवाज़ बन कर उभरती हैं. नए साल के जश्न के बीच, बंगले के एक अँधेरे हिस्से में नौकर दम्पति सूखे चावल निगल रहा है. उन्हीं के साथ साहब लोगों का कुत्ता भी.

अभिनय की नज़र से फिल्म का हर कलाकार अपने चरम पर बैठा आपको अपनी तरफ खींचता है. रणवीर शौरी अगर अपनी अकड़ और तेवर से करिश्माई लगते हैं, तो गुलशन की ईमानदारी उनके झुंझलाहट वाले दृश्यों में साफ़ नज़र आती है. तिलोत्तमा बेहतरीन हैं. तनूजा जी को वापस परदे पर देखना अच्छा लगता है. एक दृश्य में कोंकना उन्हें खर्राटे लेते हुए दिखाती हैं. ये एक दृश्य दोनों के बारे में बहुत कुछ कह जाता है. कल्कि अपनी बेबाकी में अव्वल हैं, पर फिल्म में सबसे ख़ास, सबसे आगे अगर कोई मशाल लिए खड़ा दिखता है, तो वो हैं विक्रांत मैसी! विक्रांत चेहरे पर अलग-अलग भाव एक के बाद एक यूँ और इतनी सफाई से बदलते हैं, जैसे कोई टेलीविज़न पर चैनल बदल रहा हो. दर्शकों से जुड़ाव कायम करने में विक्रांत कुछ इस हद तक सफल रहते हैं कि जब वो परदे पर नहीं भी होते, या कहीं पीछे चुपचाप खड़े भी, तो भी उनके लिए आपकी फ़िक्र जैसे की तैसे ही रहती है. कोई शक ही नहीं, ये साल की सबसे ख़ास और चुनिन्दा परफॉरमेंसेस में से एक है. एक ऐसी परत-दर-परत अदाकारी, जिसे पूरी तरह जानने-समझने के लिए बार-बार देखा और सराहा जाना चाहिए.

आखिर में, ‘अ डेथ इन द गंज’ उन चंद रोमांचक बॉलीवुड फिल्मों में से है, जो आपके अन्दर सिहरन पैदा करने के लिए कोई झूठा खेल नहीं रचतीं, बल्कि आपको उस माहौल में हाथ पकड़ कर खींच ले जाती हैं, जहां आप हर वक़्त अपने दिल-ओ-दिमाग़ के साथ ‘जो हुआ, वो कैसे हुआ’, ‘जो हुआ, वो किसके साथ हुआ’ और ‘जो हुआ, वो कब होगा’ की लड़ाई लड़ते रहते हैं. ‘अ डेथ इन द गंज’ इस साल की ‘मसान’ है, उतनी ही ईमानदार, उतनी ही संजीदा, उतनी ही रोचक! [4/5]     

Tuesday, 27 December 2016

देखन में छोटन लगें...! (Small in Size, Big on Content)

साल 2016 जाने को है. वक़्त है, एक बार फिर मुड़ कर देखने का. हर शुक्रवार भाग-भाग कर फिल्में देखना और उनके बारे में लिखने का सारा जोश-ओ-खरोश एक बार फिर समेट कर कागज़ पर उड़ेलना है. साल की बेहतरीन फिल्मों को एक और बार इज्ज़त बक्शने की बारी आ गयी है...पहल करता हूँ उन 10 फिल्मों से, जो देखने में ज़रूर छोटी लगी होंगीं, कभी नए कलाकारों की वजह से तो कभी ख़बरों और अख़बारों में कम सुर्खियाँ बटोर पाने की वजह से, पर इन सभी ने अपनी-अपनी अलग-अलग खूबियों से सिनेमाहाल तक जाने का मेरा फैसला ग़लत साबित नहीं होने दिया. बहुत बहुत शुक्रिया...


#ज़ुबान #जुगनी #साला खड़ूस #अमरीका #बुधिया सिंह- बोर्न टू रन #लाल रंग #वेटिंग #धनक #पार्च्ड #चौरंगा





पहली बार निर्देशन की बागडोर सँभालते मोज़ेज सिंह की ‘ज़ुबान’ एक ऐसे नौजवान की कहानी है, जो अपने सपनों के लिए किसी भी हद तक जा सकता है पर, एक दिन जब उसके चाहतों की दुनिया उसके क़दमों में बिछी दिखाई देती है, उसे एहसास होता है इस पूरे सफ़र में उसने अपनी पहचान ही खो दी है, अपनी जुबान ही खो दी है.

ज़ुबान’ में सब कुछ अच्छा हैऐसा नहीं है. कहानी की पकड़ अक्सर आप पर बनती-छूटती रहती है. फिल्म की रफ़्तार भी कुछ इस तरह की है कि आप इसे एक ‘स्लो’ फिल्म कहने से गुरेज नहीं करतेपर इन सबके बावजूद ‘ज़ुबान’ एक आम फिल्म नहीं हैएक आसान फिल्म नहीं है. 








A simple, unpretentious and wide-eyed country boy is trying to be apologetic to the girl he’s been with all night under the same sheet. Local liquor brand can be held responsible but the girl is taken aback, “Sorry? What for?” “For everything”, the boy is in deep guilt. “Not for everything. Say sorry only for why you left me alone there.” The girl is definitely more independent, free and open, and emotionally less complicated. So is Shefali Bhushan’s JUGNI. It likes to have its own sense of rhythm with melodies that induce extreme likeness and energy in you to match up with the beats life throws at you.






SAALA KHADOOS charms you with the uninhibited, wild and fresh performance by Ritika Singh, a professional boxer before making her first attempt at acting. Her free-spirited, loud-mouthed and all moody role-play is efficiently delightful. 


Madhavan gives SAALA KHADOOS everything it demands from him. He looks every bit of a full-grown ex-boxer with all the attitude, arrogance and aggression in him, hitting the right cord. One of his highly approving works!









प्रशांत नायर की ‘अमरीका’ उत्तर भारतीय गाँवों की आकांक्षाओंआशाओं और अपेक्षाओं पर भावनात्मक चोट है. कहानी वर्तमान की नहीं है पर वर्तमान से परे भी नहीं है. बड़ा बेटा [प्रतीक बब्बर] अमेरिका चला गया है. माँ को लगता है सारा सुखसारा भविष्य अमेरिका में ही है. चिट्ठियों से ही पूरे गाँव को बेटे और अमेरिका के बारे में नई-नई बातों का पता चलता है. घटनाएं तब एक तगड़ा मोड़ लेती हैं जब पिता की मृत्यु के बाद छोटे बेटे [‘लाइफ ऑफ़ पाई’ के सूरज शर्मा] को छुपी हुई सच्चाइयों का पता चलता है. साथ ही कुछ सवालजिनके जवाब सिर्फ अमेरिका जा कर पता चल सकते हैं. 

‘अमरीका’ एक बहुत ही करीने से बनाई गयी फिल्म हैजहां कुछ भीऔर मैं बहुत सोच समझ के कह रहा हूँकुछ भी बेतरतीब या बेढंगा नहीं है.





इस फिल्म में ‘आगे क्या होगा’ वाला रोमांच कम है, मैच के आख़िरी पलों में गोल दाग कर या छक्का मार कर टीम जिताने वाला हीरो भी कोई नहीं है, और ना ही फिल्म की सफलता के लिए ‘देशभक्ति’ का बनावटी छौंका लगाकर आपके अन्दर के ‘भारतीय’ को जबरदस्ती का झकझोरने की कोशिश. 

बुधिया सिंह- बॉर्न टू रन’ फार्मूले से अलग एक ऐसी ‘स्पोर्ट्स’ फिल्म है, जो सिर्फ सतही तौर पर खेल से जुड़े रोमांच को भुनाने की कोशिश नहीं करती, बल्कि उसके पीछे की मेहनत-मशक्कत, लगन और मुश्किलातों को सच्चे मायनों में आपके सामने उसकी असली ही शकल-ओ-सूरत में पेश करती है.









LAAL RANG is a good thriller that may not pump your heartbeat up in the usual way most of bollywood thrillers do. It also might not give you much of a pulsating action to cheer, and it definitely would not pitch obligatory twists & turns in the plot but even then, the firm writing has enough to make it an enjoyably unlike experience. 

Syed Ahmad Afzal makes sure it takes its own course of time to grow on the viewers. He never looks in hurry when establishing scenes or while making the shift from one to another.



अनु मेनन की ‘वेटिंग’ ज़िन्दगी और मौत के बीच के खालीपन से जूझते दो ऐसे अनजान लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है जिनमें कहने-सुनने-देखने में कुछ भी एक जैसा नहीं है, पर एक पीड़ा, एक व्यथा, एक दुविधा है जो दोनों को एक दूसरे से बांधे रखती है. 

प्रोफ़ेसर शिव धीर-गंभीर और शांत हैं, जबकि तारा अपनी झुंझलाहट-अपना गुस्सा दिखाने में कोई शर्म-लिहाज़ नहीं रखती. तारा को मलाल है कि ट्विटर पर उसके पांच हज़ार फ़ॉलोवर्स में से आज उसके पास-उसके साथ कोई भी नहीं, जबकि प्रोफ़ेसर को अंदाज़ा ही नहीं ट्विटर क्या बला है? इसके बावज़ूद, अपने अपनों को खो देने का डर कहिये या फिर वापस पा लेने की उम्मीद, दोनों एक-दूसरे से न सिर्फ जुड़े रहते हैं, अपना असर भी एक-दूसरे पर छोड़ने लगे हैं.







एक सच की दुनिया है जो हमारे आस-पास चारों तरफ पसरी है, और एक दुनिया है जैसी हम अपने लिये तलाशते हैं, जिसके होने में हम यकीन करना चाहते हैं. अपने देश के साथ भी ऐसा ही कुछ कनेक्शन है हमारा. एक, जैसी हम देखना चाहते हैं, मानना चाहते हैं और दूसरा जो वाकई में है. 

नागेश कुकूनूर की ‘धनक’ हमारी परिकल्पना और सच्चाई की इन्हीं दो दुनियाओं के बीचोंबीच कहीं बसी है. अगर आप अच्छे हैं, दिल के सच्चे हैं तो आपके साथ बुरा कैसे हो सकता है? परीकथाओं में अक्सर इस तरह के मनोबल बढ़ाने और नेकी की राह पर चलते रहने के लिए हिम्मत बंधाने वाली उक्तियाँ आपने भी पढ़ी या सुनी होंगी. ‘धनक’ किसी एक प्यारी और मजेदार परी-कथा जैसी ही है, जिसमें बहुत सारे अच्छे लोग हैं और जो बुरे भी हैं वो सदियों पुराने, जाने-पहचाने जैसे हमेशा कोसते रहने वाली ‘डायन’ चाची और बच्चे उठाने वाला दुष्ट गिरोह.





हाव-भाव और ताव में लीना यादव की ‘पार्च्ड’ पिछले साल रिलीज़ हुई पैन नलिन की ‘एंग्री इंडियन गॉडेसेज’ से बहुत कुछ मिलती-जुलती है, और अपने रंग-रूप में केतन मेहता की ‘मिर्च मसाला’ जैसी तमाम भारतीय सिनेमा के मील के पत्थरों से भी. जाहिर है, इस तरह का ‘पहले बहुत कुछ देख लेने’ की ऐंठ आप में भी उठेगी, पर जिस तरह की बेबाकी, दिलेरी और दबंगई ‘पार्च्ड’ दिखाने की हिमाकत करती है, वो कुछ अलग ही है. 

यहाँ ‘आय ऍम व्हाट आय ऍमका जुमला बेडरूम के झगड़ों और कॉफ़ी-टेबल पर होने वाली अनबन में सिर्फ जीत भर जाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता. ‘पार्च्ड’ अपने किरदारों को उनके तय मुकाम तक छोड़ आने तक की पूरी लड़ाई का हिस्सा बन कर एक ऐसा सफ़रनामा पेश करती है, जो हमारी ‘घर-ऑफिस, ऑफिस-घर’ की रट्टामार जिन्दगी से अलग तो है, पर बहुत दूर और अनछुई नहीं.






जातिगत विसंगतियों के दुष्प्रभाव, छूत-अछूत के लाग-लपेट और धर्म के नाम पर विकलांग मानसिकता का परिचय देते भारतीय समाज को हमने पहले भी श्याम बेनेगल और गोविन्द निहलाणी के सिनेमा में तार-तार होते देखा है. ‘चौरंगा’ भी काफी हद तक इसी दायरे में फैलती-सिमटती दिखाई देती है, इसीलिए एक मूल प्रश्न बार-बार दिमाग में कौंधता रहता है. ‘क्या कुछ भी नहीं बदला है?’ 

उत्तर फिल्म ख़तम होने के तुरंत बाद कुछ सरकारी तथ्यों के परदे पर उभरने के साथ ही मिलने शुरू हो जाते हैं. सच में, कुछ भी नहीं बदला है. और अगर नहीं बदला है तो सिर्फ सिनेमा में बदलाव दिखा देने भर से क्या सचमुच बदलाव आ जायेगा? ‘चौरंगा’ की पृष्ठभूमि, ‘चौरंगा’ के कथानक और ‘चौरंगा’ के पात्रों से पुराने होने की गंध भले ही आती हो, पर ‘चौरंगा’ के प्रासंगिकता की चमक पर कहीं कोई धूल जमी दिखाई नहीं देती. ‘चौरंगा’ एक सार्थक कोशिश है भारतीय समाज के उस एक वर्ग को टटोलने में, जिसे हम शहरी चकाचौंध के लिए कहीं अँधेरे में छोड़ आये हैं.  


Friday, 27 May 2016

वेटिंग (A): नसीर-कल्कि का अभिनय ही काफी है! [3/5]

अस्पताल के ‘वेटिंग रूम’ में खाली कैनवस जैसी बेदाग़-बेरंग दीवार पे टंगी घड़ी में सिर्फ छोटी-बड़ी दो सुईयां ही नज़र आ रही हैं. सही, सटीक और तय वक़्त जानने के लिए घंटों की गिनती और उनके बीच के मिनटों के फ़ासले जैसे किसी ने रबर से मिटा दिए हों. यहाँ इनकी कोई ख़ास जरूरत भी नहीं है. जब इंतज़ार का रास्ता लम्बा हो तो घंटे-मिनट-सेकंड वाले छोटे-छोटे मील के पत्थरों को नज़रअंदाज़ करना ही पड़ता है. कुछ ने इस फ़लसफ़े को अच्छी तरह समझ लिया है, जैसे प्रोफेसर शिव नटराज [नसीर साब] जिनकी पत्नी पिछले आठ महीनों से कोमा में हैं. तारा देशपांडे [कल्की] के लिए अभी थोड़ा मुश्किल है. शादी को अभी 6 महीने ही हुए थे और आज तारा का पति [अर्जुन माथुर] एक रोड-एक्सीडेंट के चलते आईसीयू में भर्ती है. दुःख को झेलने-सहने और समझने के अलग-अलग पड़ाव होते हैं, प्रोफेसर अगर आख़िरी पड़ाव पर हैं तो तारा के लिए अभी शुरुआत ही है.

अनु मेनन की ‘वेटिंग’ ज़िन्दगी और मौत के बीच के खालीपन से जूझते दो ऐसे अनजान लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है जिनमें कहने-सुनने-देखने में कुछ भी एक जैसा नहीं है, पर एक पीड़ा, एक व्यथा, एक दुविधा है जो दोनों को एक दूसरे से बांधे रखती है. प्रोफ़ेसर शिव धीर-गंभीर और शांत हैं, जबकि तारा अपनी झुंझलाहट-अपना गुस्सा दिखाने में कोई शर्म-लिहाज़ नहीं रखती. तारा को मलाल है कि ट्विटर पर उसके पांच हज़ार फ़ॉलोवर्स में से आज उसके पास-उसके साथ कोई भी नहीं, जबकि प्रोफ़ेसर को अंदाज़ा ही नहीं ट्विटर क्या बला है? इसके बावज़ूद, अपने अपनों को खो देने का डर कहिये या फिर वापस पा लेने की उम्मीद, दोनों एक-दूसरे से न सिर्फ जुड़े रहते हैं, अपना असर भी एक-दूसरे पर छोड़ने लगे हैं. ‘नम्यो हो रेंगे क्यों का जाप करने वाली तारा कभी खुद को नास्तिक कहलाना पसंद करती थी, कौन मानेगा? वहीँ प्रोफ़ेसर को आज ‘एफ़-वर्ड’ कहने में भी कोई दिक्कत पेश नहीं आती.

वेटिंग’ बड़ी ईमानदारी से और बहुत ही इमोशनल तरीके से इन दो किरदारों के साथ आपको ज़िन्दगी के बहुत करीब लेकर जाती है. हालाँकि अस्पताल जैसा नीरस-उदास और बेबस माहौल हो तो फिल्म के भी उसी सांचे में ढल जाने का डर हमेशा बना रहता है, पर अतिका चौहान के मजेदार संवाद हमेशा इस नीरसता को तोड़ने में कामयाब रहते हैं. फिल्म जहां एक तरफ बड़ी संजीदगी से आपको लगातार ज़िन्दगी और मौत से जुड़े कुछ अहम् सवालों के आस-पास खींचती रहती है, दूसरी ओर वो इस कोशिश में भी लगी रहती है कि आपका दिल नम रहे, चेहरे पर मुस्कराहट बराबर बनी रहे और आप बड़ी तसल्ली से तकरीबन सौ मिनट की इस फिल्म का पूरा लुत्फ़ लें.

अभिनय में नसीर साब और कल्कि एक दूसरे को पूरी तरह कम्पलीट और कॉम्प्लीमेंट करते नज़र आते हैं. नसीर साब के साथ एक ख़ास सीन में, जहां दोनों एक-दूसरे पर बरबस बरस रहे होते हैं, कल्कि अपनी एक  अलग छाप छोड़ने में सफल रहती हैं. नसीर साब के तो कहने ही क्या! मतलबी से दिखने वाले डॉक्टर की भूमिका में रजत कपूर, बनावटी दोस्त की भूमिका में रत्नाबली भट्टाचार्जी और बेबाक, दो-टूक सहकर्मी बने राजीव रविन्द्रनाथन जंचते हैं.

सिनेमा बदल रहा है. सिनेमा से ‘अति’ विलुप्त होता जा रहा है. अनु मेनन की ‘वेटिंग’ भी इसी अहम् बदलाव का एक हिस्सा है. (इस तरह की) फिल्मों में नाटकीयता के लिए अब शायद ही कहीं कोई जगह बची है. कथानक से अब बेमतलब के ज़ज्बाती रंग हटने लगे हैं. जिसे जो कहना है, उसी लहजे से कह रहा है जिसमें उस किरदार की पैठ हो. तैयार रहिये, कई बार ये आपको विचलित भी कर सकता है. [3/5]

Friday, 17 April 2015

MARGARITA WITH A STRAW (A): A heartwarming ‘cheers’ to ‘life’! [4/5]

Cerebral Palsy is a disorder that could damage and affect the ability to move, balance and to walk in a normal posture. Difficulties with speaking or swallowing are also visible symptoms but that doesn’t play down the level of intelligence in brain or the degree of passion in heart. So next time, if you have luck to meet someone having Cerebral Palsy, greet him/her normally. Try not to be abnormal!

Well, that was an FYI. Otherwise; why to discuss, give importance or rather even care to mention something like CP, if you already have plenty reasons to celebrate a better syndrome called ‘Life’. MARGARITA WITH A STRAW is a passionate, moving and inspirational drama that is hardly any normal, regular or ordinary.

Maharashtrian mother [the ever-gifted Revathy] married to Punjabi father is driving a matador van with a sliding platform for her wheelchair-ridden daughter Laila (the exceptionally good Kalki Koechlin). And the daughter doesn’t blink her eyes while showing her middle finger to a traditional Indian saree clad socialite for being shamelessly and insensitively sympathetic to her disabilities. Laila is a rare breed. She is ready to fall for all the cute faces around and boldly explores every bit of her maturing sexuality, first with the emotionless sex-toys to a friend-for-all seasons [Hussain Dalal], Nima- the cute-faced lead singer of her college-band, the supportive batchmate in the university of New York and later, with Khanum [Sayani Gupta]- a rebellious visually impaired lesbian born to mixed parents from Pakistan & Bangladesh.

Shonali Bose’s MARGARITA WITH A STRAW is a delightfully delicious slice-of-life film that doesn’t accept to exploit the empathy ‘normal’ people build up for these differently-abled souls; not for once. And kudos to Bose and her co-writer/director Nilesh Maniyar for keeping that unflinching honesty and unadulterated emotions intact in the script! The highlights in the film are the reflective moments between Laila and her mother especially when the latter realizes about her daughter’s sexual preferences. Meanwhile, Bose gifts us one of the most beautiful characters in Laila who could inject varied emotions in you effortlessly, without making a fuss over it. She smiles, you smile! She cries, you don’t because you know she’ll bounce back the very next minute. Kalki Koechlin is not just there to fill in the blanks. She gives more than what required and transits her soul in Laila. It’s one of the toughest roles ever came to Indian actors, physically and emotionally too, and Kalki makes it look like an expert’s job. Neat, clean and sparkling!

Revathy, too doesn’t fail. Her ever-understanding, encouraging and extremely caring mother is a perfect pitch. Watch out for her immaculate performance in front of the mirror in her bedroom where she sheds it all after the day is over [I don’t put spoilers]! Be ready as the heart breaks and bleeds. Sayani Gupta as Khanum adds sparks, sensuousness and susceptibility. The background score is soft and uplifting so is the cinematography. Nice, cool and glittery!

Overall, Shonali Bose’s MARGARITA WITH A STRAW celebrates life, and the overwhelming spirit that never gets affected by anything bad or worse. It also handles some of the issues our society needs to open its eyes and minds to; in a very delectably endearing mood. Order a margarita; for a change, with a straw to taste it for a longer and lasting experience! Say ‘cheers’ to life!! [4/5]