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Friday, 21 July 2017

लिपस्टिक अंडर माय बुर्का: औरतों के 'सीक्रेट सपने' [3.5/5]

मुझे रत्ती भर समझ नहीं आता कि किसी (पहलाज निहलानी) भी थोड़े-बहुत समझदार आदमी को अलंकृता श्रीवास्तव की फिल्म 'लिपस्टिक अंडर माय बुर्का' से क्या परेशानी हो सकती है? ओह, याद आया. खिड़कियाँ खुलने लग सकती हैं. दरवाजों पर 'खोलो, खोलो' की थाप और मज़बूत होने लग सकती है. 'हाँ', 'हूँ', 'ह्म्म्म' और 'ठीक है' में ख़तम हो जाने वाले लाचार जवाब, आकार बदलकर सुरसा के मुंह की तरह निगल जाने वाले भयानक सवाल बनने लग सकते हैं. सुनाने का दंभ छोड़ना पड़ सकता है, सुनने की आदत डालनी पड़ सकती है. परेशानी तो है. पहाड़ जैसी भारी-भरकम पुरुषवादी सोच के अस्तित्व पर 'लिपस्टिक अंडर माय बुर्का' जैसे एक कड़कती बिजली बन के टूट पड़ती है. पहाड़ टूटे न टूटे, हिलने तो ज़रूर लगता है. अपने-अपने दौर में तमाम प्रशंसनीय फिल्में हैं, जिन्होंने परदे पर औरतों को मर्दों का 'साज़-ओ-सामान' बनाकर पेश करने से अलग, उन्हें खालिस औरत समझ कर उनकी निजी आशाओं-अपेक्षाओं और अधिकारों को तवज्जो दी. इस दौर की वैसी ही एक बेहद ज़रूरी फिल्म है, 'लिपस्टिक अंडर माय बुर्का', जो बड़ी दिलेरी से अपने हक का सवाल पूछती है, "आखिर आप हमारी आजादी से इतना डरते क्यूँ हैं?" पूछते वक़्त किरदार कैमरे के ठीक सामने खड़ा है. सवाल आप ही से है, आप सभी से, हम सभी से. 

बुआजी (रत्ना पाठक शाह) भजन-कीर्तन की उम्र में छुप-छुपा कर 'मसालेदार कहानियों' का मज़ा लेती हैं. उनकी कहानी की नायिका रोज़ी भी उन्ही की तरह प्यार ढूंढ रही है. महज़ आँखों-आँखों वाला प्यार नहीं, वो जिसमें कोई बंदिशें न हों, लाज-लिहाज़ न हो, वो जिसमें बेरोक-टोक जिस्मों के उतार-चढ़ाव नापे जा सकें. बुआजी विधवा हैं, ऊपर से उनकी उम्र; बाहर पैर रखना हो तो सत्संग के अलावा कोई और दूसरा बहाना भी क्या ही हो सकता है? रत्ना पाठक शाह इस किरदार की शर्म, झिझक, कसक और लालसा को चेहरे पे बखूबी पोत लेती हैं, और फिर जब एक के बाद उतारना शुरू करतीं हैं, तो आप के पास वाहवाही करने के अलावा कुछ और बचता नहीं. 

भोपाल के उसी तंग मोहल्ले में और भी 'रोज़ी'यां हैं. सब की सब एक दिन उड़ने का सपना पलकों में दबाये जिये जा रही हैं. 4 बच्चों की माँ शीरीन (कोंकणा सेन शर्मा) दिन में एक डोर-टू-डोर मार्केटिंग कंपनी में 'टॉप' सेल्सगर्ल है, पर घर में उसकी रातें अक्सर बिस्तर में पति के 'नीचे' घुटते-दबते-पिसते ही कटतीं हैं. पति (सुशांत सिंह) की मर्दानगी कंडोम न पहनने से लेकर दुबई से 'जब भी आना, एक बच्चा देकर जाना' तक के बीच ही सीमित रहती है. पास के पार्लर में वैक्सिंग कराते हुए लीला (आहना कुमरा) पूछ लेती है, "कभी प्यार से नीचे नहीं छूता न वो तुम्हें? कभी किस भी किया है?" शीरीन कराह पड़ती है, "सब जानती हो, तो पूछती क्यूँ हो?". कोंकणा की तड़प देखनी हो, तो उनके क्लिनिक वाले दृश्य को देखिये, जब वो अपने पति के कंडोम न पहनने की आदत को 'वो ज़ज्बातों में बह जाते हैं' कहकर छुपाने की कोशिश कर रही हैं. 

लीला (अहना कुमरा) की सगाई हो रही है. उसकी मर्ज़ी के बिना. सगाई की रात ही वो अपने विडियो-फोटोग्राफर प्रेमी (विक्रांत मैसी) के साथ एमएमएस बना रही है, "हरामी, स्साले! धोखा दिया ना, तो फेसबुक पे डाल दूँगी". लीला का सपना है, अपना खुद का बिज़नेस ताकि उसकी माँ को पैसे के लिए आर्ट-स्टूडेंट्स के सामने न्यूड पेंटिंग्स का 'मॉडल' न बनना पड़े. अहना बड़ी बेबाकी से अपना किरदार निभाती हैं, और अपने दृश्यों में एक ख़ास तरह की एनर्जी ले आती हैं. फिल्म में एक स्टूडेंट रिहाना (प्लबिता बोर्थाकुर) भी है. कॉलेज के मोर्चे में  'जीन्स का हक दो, जीने का हक दो' का झंडा बुलंद करती है, बैंड में माइली सायरस के गाने गाने गाती है, पर घर लौटने से पहले 'सुलभ शौचालय' में जाकर बुर्का पहनना नहीं भूलती. अब्बू की सिलाई की दुकान है, थोक में बुर्के सिलते हैं. उनकी ही बेटी बुर्का न पहनने, क़यामत न हो जायेगी, जैसे बेटी नहीं, उनके बुर्कों की 'ब्रांड-एम्बेसडर' हो.   

फिल्म अपनी पृष्ठभूमि तंग शहर भोपाल की ही तरह, अलग-अलग वर्ग की औरतों के उन तमाम मसअलों से ढूंस-ढूंस कर भरी पड़ी है, जिनपे चर्चा करने से हम मर्द भागते रहते हैं. प्यार, उम्मीदें, ज़ज्बात, जिस्मानी जरूरतें, बंदिशें, पहरे और वो सब जिनसे मिलकर एक लफ्ज़ बनता है, 'आजादी'. आज़ाद होने का, हदों को लांघने और बन्धनों को तोड़ने का ख़याल अलंकृता बड़ी चतुराई से फ्रेम-दर-फ्रेम अपनी फिल्म में पिरोती रहती हैं. परदे पर ऐसे कई सारे दृश्य हैं, जो आपको विचलित करने के लिए काफी हैं. लीला का एमएमएस वाला दृश्य हो, बुआजी का उनके स्विमिंग ट्रेनर के साथ फ़ोन-सेक्स या फिर शीरीन का पार्लर वाला दृश्य; 'लिपस्टिक अंडर माय बुर्का' परदे पे खुलने में थोड़ी भी झिझक नहीं दिखाती. हालाँकि कुछ गिनती के दृश्य जाने-पहचाने, देखे-दिखाए जरूर हैं, मसलन बुआजी का पहली बार मॉल में एस्केलेटर पर चढ़ना. एक बात और, यहाँ के मर्दों से कुछ भी अच्छा उम्मीद करना आपकी बेवकूफी होगी. फिल्म इस मामले में थोड़ी तो कंजूस और दकियानूसी होने का सबूत देती है.

आखिर में; 'लिपस्टिक अंडर माय बुर्का' एक कोशिश है कि आप औरतों की शख्सियत का वो पहलू भी देख पायें, जहां उनकी पहचान माँ, बेटी, बहन, बीवी से अलग हटकर सिर्फ और सिर्फ एक औरत होने की है. मर्दों के बदलने का इंतज़ार छोड़िये, अगर फिल्म देख कर औरतें भी अपने आप और अपनी ख्वाहिशों के लिए कदम बढ़ाने की हिम्मत जुटा पायें; समझिये लिपस्टिक अंडर माय बुर्का' की कामयाबी वहीँ कहीं मिलेगी. फिल्म के आखिर में चारों अहम् किरदार (बुआजी, लीला, शीरीन, रिहाना) तमाम गहमा-गहमी के बीच एक कमरे में बैठ कर रोज़ी की कहानी का अंत पढ़ने में मशगूल हो जाते हैं; कोई क्रांति नहीं आती, कोई भूचाल नहीं आता. वो आपको करना है, और अगर आप पहलाज निहलानी नहीं हैं, तो ये ज्यादा मुश्किल भी नहीं है. [3.5/5]    

Friday, 2 June 2017

अ डेथ इन द गंज: रोचक, रोमांचक! इंसानी फ़ितरतों का ‘गंज’! [4/5]

सन् 1979 का मैकक्लुस्कीगंज बस यूँ ही ‘अ डेथ इन द गंज’ का हिस्सा नहीं है. रांची से सटे इस छोटे से पहाड़ी इलाके का एक अपना रोचक किरदार है, जो फिल्म में वक़्त-बेवक्त खुलता रहता है. साहब लोगों का क़स्बा है ये. एंग्लो-इंडियन साहब लोग, जो जितनी दिलचस्पी से संथाली लोकगीतों पर नाच लेते हैं, उतनी ही तबियत से नए साल का जश्न मनाते हुए स्कॉट्स भाषा के गीत ‘ऑल्ड लैंग साईन’ को भी एक सुर में दोहराते हैं. जंगलों से घिरे, ठण्ड के सफ़ेद धुएं ओढ़े बड़े से एक बंगले में, ऐसे ही एक परिवार के साथ वक़्त बिताने का मौका देती है ‘अ डेथ इन द गंज’! पूरे एक हफ्ते के फ़िल्मी वक़्त में ऐसे किरदारों के साथ, जिनकी नीयत, जिनकी तबियत और जिनकी सीरत में आप अपने आप को ही कट-कट कर बंटते हुए देखते हैं. किसी के साथ ज़्यादा, किसी के साथ थोड़ा कम.

नीली अम्बेसडर में नंदू (गुलशन देवैया) अपनी बीवी बोनी (तिलोत्तमा शोम) और बच्ची तानी (आर्या शर्मा) के साथ कलकत्ता से मैकक्लुस्कीगंज अपने घर जा रहा है. साथ में, बोनी की सहेली मिमी (कल्कि कोचलिन) और मौसेरा भाई शुटू (विक्रांत मैसी) भी हैं. माँ (तनूजा) घर की बेतरतीबी को कोस रही हैं, तो बाप (ओम पुरी) रम के पैग बना-बना पेश कर रहा है. जल्द ही, महफ़िल जमने लगती है. लंगोटिए दोस्त विक्रम (रणवीर शौरी) और ब्रायन (जिम सरभ) भी आ पहुंचे हैं. एक-दो दिन में ही सबके चेहरे से धूल हटने लगती है, और अन्दर की कालिख़ गहराने लगती है. इंसानी फितरतें खुल कर सामने आने लगती हैं. किसी एक कमज़ोर पर झुण्ड में दाना-पानी लेकर चढ़ जाने का खेल किसने नहीं खेला होगा? रात को सोने से पहले भूतों का जिक्र, दोपहर में अपने-अपने कमरों में घंटे-दो घंटे के लिए पसर जाने का सुख, एक शाम सबके लिए खाना बनाने का पूरा तामझाम; और इस बीच घर पे काम करने वाली औरत का अपने मरद से पूछना, “कब जइहें ई लोग? इतना काम करे के पड़त है”!

माहौल से नरमी सूखने लगी है. बाप देर रात को उठकर कमरे तक आता है, कुछ खोज रहा है, जाने क्या? बेटा शतरंज की बाज़ी लगाए बैठा है, पूछता है, “आपको कुछ चाहिए?”  “नहीं, भाई! तुम खेलो न”. बेटा अब भी अड़ा है, “सुबह खोज लीजियेगा”, बाप झुंझला के बोल पड़ता है, “बाप मैं हूँ या तुम?” अगले दृश्य में बाप फिर कुछ खोजते हुए बड़बड़ा रहा है, “इस घर में कुछ भी रख दो, मिलता ही नहीं”. कुछ और भी दफ़न है इस घर में, हँसते चेहरों के पीछे. कुछ छुपे हुए सच, कुछ दबी हुई चाहतें, हसरतें, घुटन, कुढ़न, बहुत कुछ. डर यही है कि जब खुलेगा तो अपनी चपेट में किसको लील लेगा? आप और हम सिर्फ अंदाजा लगा सकते हैं, ठीक ठीक कह नहीं सकते.

‘अ डेथ इन द गंज’ कोंकना सेन शर्मा के पिता मुकुल शर्मा की कहानी पर आधारित है, जिसे परदे पर पसारते वक़्त, कोंकना महान फ़िल्मकार सत्यजित रे की ‘अरण्येर दिन रात्रि’ से ख़ासा प्रभावित और प्रेरित दिखाई देती हैं, पर शुरू-शुरू के झिझक के बाद आपके लिए जानना मुश्किल नहीं रह जाता कि यह समानता सिर्फ कहानी कहने की कला, बनावट और सजावट तक ही सीमित है, उसके बाद कोंकना जब अपनी छाप छोड़ती हैं, तो उनकी दखलंदाजी पूरी तरह उनकी अपनी होती है. चाहे वो 1979 के वक़्त को दीवाल पर घड़ी की तरह टांकने की हो, या फिर किरदारों के पसंद-नापसंद को माहौल से जोड़े रखने की. कोंकना जिस तरह दृश्यों की परिकल्पना तैयार करती हैं, सिनेमा की एक नयी, बुलंद आवाज़ बन कर उभरती हैं. नए साल के जश्न के बीच, बंगले के एक अँधेरे हिस्से में नौकर दम्पति सूखे चावल निगल रहा है. उन्हीं के साथ साहब लोगों का कुत्ता भी.

अभिनय की नज़र से फिल्म का हर कलाकार अपने चरम पर बैठा आपको अपनी तरफ खींचता है. रणवीर शौरी अगर अपनी अकड़ और तेवर से करिश्माई लगते हैं, तो गुलशन की ईमानदारी उनके झुंझलाहट वाले दृश्यों में साफ़ नज़र आती है. तिलोत्तमा बेहतरीन हैं. तनूजा जी को वापस परदे पर देखना अच्छा लगता है. एक दृश्य में कोंकना उन्हें खर्राटे लेते हुए दिखाती हैं. ये एक दृश्य दोनों के बारे में बहुत कुछ कह जाता है. कल्कि अपनी बेबाकी में अव्वल हैं, पर फिल्म में सबसे ख़ास, सबसे आगे अगर कोई मशाल लिए खड़ा दिखता है, तो वो हैं विक्रांत मैसी! विक्रांत चेहरे पर अलग-अलग भाव एक के बाद एक यूँ और इतनी सफाई से बदलते हैं, जैसे कोई टेलीविज़न पर चैनल बदल रहा हो. दर्शकों से जुड़ाव कायम करने में विक्रांत कुछ इस हद तक सफल रहते हैं कि जब वो परदे पर नहीं भी होते, या कहीं पीछे चुपचाप खड़े भी, तो भी उनके लिए आपकी फ़िक्र जैसे की तैसे ही रहती है. कोई शक ही नहीं, ये साल की सबसे ख़ास और चुनिन्दा परफॉरमेंसेस में से एक है. एक ऐसी परत-दर-परत अदाकारी, जिसे पूरी तरह जानने-समझने के लिए बार-बार देखा और सराहा जाना चाहिए.

आखिर में, ‘अ डेथ इन द गंज’ उन चंद रोमांचक बॉलीवुड फिल्मों में से है, जो आपके अन्दर सिहरन पैदा करने के लिए कोई झूठा खेल नहीं रचतीं, बल्कि आपको उस माहौल में हाथ पकड़ कर खींच ले जाती हैं, जहां आप हर वक़्त अपने दिल-ओ-दिमाग़ के साथ ‘जो हुआ, वो कैसे हुआ’, ‘जो हुआ, वो किसके साथ हुआ’ और ‘जो हुआ, वो कब होगा’ की लड़ाई लड़ते रहते हैं. ‘अ डेथ इन द गंज’ इस साल की ‘मसान’ है, उतनी ही ईमानदार, उतनी ही संजीदा, उतनी ही रोचक! [4/5]     

Friday, 19 May 2017

हाफ़ गर्लफ्रेंड: अधपकी, कच्ची, आधी-अधूरी! [1/5]

कुछ लोगों को साहित्य और सिनेमा के नाम पर कुछ भी परोसने की लत लग चुकी है. ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ बनाने के पीछे मोहित सूरी की वजह थी, इसी नाम से चेतन भगत की ‘बेस्टसेलिंग’ किताब; पर चेतन भगत के लिए ‘हाफ़ गर्लफ्रेंड’ लिखने की क्या माकूल वजह थी, मुझे नहीं समझ आता. एक ऐसी किताब, जिसके किरदारों में न रीढ़ की हड्डी हो, न दिमाग़ की नसें, न कायदे के कुछ ठीक-ठाक ज़ज्बात, आखिर क्यूँ कर कोई पढ़ेगा और फिर परदे पर देखेगा भी? तमाम प्रेम-कहानियों में दो आधे-अधूरे मिल कर एक हो ही जाते हैं, ‘हाफ़ गर्लफ्रेंड’ इतनी वाहियात है कि आधा और आधा मिल के भी आधे-अधूरे ही रहते हैं.

भला राजा और रानी के बगैर भी कभी कोई कहानी लिखी गयी है? तो यहाँ भी एक राजकुमार हैं. बिहार के सिमराव गाँव के बाऊ साब माधव झा (अर्जुन कपूर). जब बस से गाँव उतरते हैं तो रुआब ऐसा, जैसे बर्मा के युवराज हों. सारे छोटे-बड़े झुककर सलामी ठोकने लगते हैं. बाऊ साब दिल्ली पहुँच गए समाजशास्त्र की पढ़ाई करने, तुर्रा ये कि इंग्लिश बोलने में फटती है फिर भी पढेंगे तो सेंट स्टीवन्स में. जेएनयू में पढ़ते तो स्पोर्ट्स ब्रा में बास्केटबाल खेलने वाली लड़की कहाँ मिलती? वहाँ तो झक मार के समाजशास्त्र ही पढ़ना पड़ता. खैर, इंटरव्यू में तो बोल आये कि सर, हम हिंदी में उत्तर देना चाहेंगे, तकलीफ ये है कि हिंदी भी कहाँ ठीक से आती है. शॉल पर रिया की जगह रीया लिखवा के आ गए. चेतन भगत और उनके लिखे इस नायक से बौद्धिक चेतना की उम्मीद रखना बेकार ही है, इसीलिए जब पूछा जाता है, ‘बिहार जैसा है, वैसा क्यूँ है?’, बाऊ साब इतिहास में दफ़न बिहार के चंद बड़े-बड़े नाम गिना कर चौड़े हो जाते हैं. ठरकी तो इतने हैं, कि लड़की सामने आते ही चेहरे पर बस एक ही एक्सप्रेशन, “मैं फिर भी तुमको चाहूँगा”, और लड़की के जाते ही दूसरा एक्सप्रेशन, “सर, माइसेल्फ कमिंग फ्रॉम विलेज एरिया...”! तीसरा कोई इनके लिए बना ही नहीं आज तक.

अब आते हैं राजकुमारी साहिबा पर! रिया सोमानी (श्रद्धा कपूर) इतनी बेखौफ और निडर हैं कि जब भी अकेलापन घेरता है, सिक्योरिटी को धता बताते हुए सीधे इंडिया गेट पर चढ़कर बैठ जाती हैं और शहर को ताकती रहती हैं, पर जब घर में बाप माँ के साथ मारपीट कर रहे होते हैं, तो एक कोने में दुबक कर गिटार पे गाने गाती हैं. बारिश की इतनी दीवानी कि जब भी होगी, मैडम खुले आसमान के नीचे भीगती दिखाई देंगी. कभी-कभी तो गिटार के साथ ही. ‘हाफ़ गर्लफ्रेंड’ का टर्म इजाद करने वाली रिया के दिमागी दिवालियेपन का भी कोई आदि-अंत नहीं. सेक्स न करने देने पर ‘देती है तो दे, वरना कट ले’ बोलने वाले बाऊ साब के साथ अब भी घूम रही हैं, क्यूंकि लड़का अच्छा है. अरिजीत सिंह के ‘तू मेरा सुकून, तू मेरा जूनून’ गाने पर मुंह लटकाए काफी दिन घूमता रहा था. पाप का प्रायश्चित पूरा, रोमांस का चैप्टर अभी भी अधूरा!

मोहित सूरी की इस फिल्म की सबसे कमज़ोर कड़ी हैं, अर्जुन कपूर. ऐसा नहीं है कि संवादों में कहीं कुछ बहुत ज्यादा आपत्तिजनक हो, पर उनके मुंह से ‘बिहारी हिंदी’ उतनी ही जाली और फर्ज़ी लगती है, जितनी लोहे की सरिया बनाने वाले ब्रांड के विज्ञापन में एक विदेशी का ‘सबसे सस्ता नहीं, सबसे अच्छा” बोलना. ताज्जुब है कि यही भाषा जब-जब फिल्म में दूसरे कलाकार (विक्रांत मैसी, सीमा बिस्वास) इस्तेमाल करते हैं, तो इतनी कोफ़्त नहीं होती. इतना ही नहीं, इस फिल्म में जो-जो इंग्लिश भी बोलता है, किसी न किसी एक्सेंट में. दोयम दर्जे की इस कहानी में प्यार के नाम पर बस अरिजीत सिंह के गाने हैं, और कुछ नहीं. फिल्म और गिरती चली जाती है, जैसे ही बाऊ साब की नीरस जिंदगी में बिल गेट्स एक बड़ा मकसद ले कर घुस आते हैं. घटिया विज़ुअल ग्राफ़िक्स के ज़रिये बिल गेट्स को परदे पर ‘जाने भी दो यारों’ का सतीश शाह बना कर छोड़ दिया जाता है.

विक्रांत मैसी एकलौते ऐसे कलाकार हैं, जिनको देख के लगता है अभिनय में अभी भी थोड़ी बहुत ईमानदारी बची है. भाषा के अलावा उनके हाव-भाव बहुत ही संतुलित और जरूरत के हिसाब से ही घटते-बढ़ते हैं. सीमा बिस्वास अपने किरदार में पूरी तरह फिट बैठती हैं, हालाँकि चेतन भगत की सतही राइटिंग यहाँ भी उन्हें बस एक ‘कैरीकेचर’ बना के रख देती है. श्रद्धा अपनी पिछली फिल्मों से कुछ भी नया, कुछ भी बेहतर परोसने में असफल रही हैं.

अंत में, ‘हाफ़ गर्लफ्रेंड’ चेतन भगत और मोहित सूरी का एक और नया शगूफा है, जो साहित्य और सिनेमा में देश के युवाओं की पसंद-नापसंद जानने का उनका झूठा दम भरने में और इजाफा भले ही करे, है तो बकवास, वाहियात और बेहूदा ही. अगर आपने किताब पढ़ी है, और फिल्म देखने का इंतज़ार भी कर रहे हैं, तो मेरी पूरी सहानुभूति आपसे है. [1/5]            

Friday, 5 June 2015

DIL DHADAKNE DO: Parents, O Parents! A long family affair! [3.5/5]

An ideal family is a myth. Issues like gender discrimination, forceful implementations of the patriarchy power, constant manipulations over fake morality, compromises for the sake of saving relationships and a flair of hypocrisy even in the most sober looking character do lie in every family. It’s only a matter of time to experience what will surface and when. A dysfunctional family as they call it is nothing but an elaborated term for any family out in this world. Zoya Akhtar's DIL DHADAKNE DO offers you a chance for a paid visit to one of these 'dysfunctional' families.

Anil Kapoor plays the ‘self-made’ millionaire Mehra, who’s celebrating his 30th marriage anniversary with Mrs. Mehra [Shefali Shah] on a cruise. The daughter Mehra [Priyanka Chopra] losing her surname now to her husband’s after marriage is irked with the invitation-card not carrying her name as a family-member. The son Mehra [Ranveer Singh] is trying his hard to fit in his father’s shoes. Along with some close friends and relatives, Mehras are out on loose on the cruise. Everything looks perfectly planned, well-designed, glossy, shiny and desirable until the real issues within the family start melting down all the plastics on the most beautiful looking faces on earth. The daughter Mehra wants to move in life and is now asking for a divorce. The son Mehra is blackmailed emotionally to marry the daughter of one of the possible business partners. The catch for the son Mehra is a private jet he finds his true love in. Parents, O parents!

Zoya Akhtar with Reema Kagti presents to you a gorgeous looking family you might wish to have in your next life but with the short and sour problems chances are you’re already facing in this very life. Who haven’t been preached all his life hearing the same-old struggle-story of his father from the horse’s mouth? Do mothers ever fail in ‘baby-ing’ the son even if he’s started dating hot babes? And then, there is this epic scheming side of the parents who are alive only to see their sons/daughters getting married. The best part is the Zoya-Reema duo doesn’t try to sink you in the murkiness of the situations but saves you with the quirk in dialogues and a flashy wit in the nature of the characters. Despite a certain kind of dreariness in the plot and the slacken off duration, film manages to keep you smiling for the most parts.

With a picturesque star-cast that looks like coming to a special edition magazine cover photo-shoot, DIL DHADKANE DO never actually has a dull frame. Even the brigade of supporting actors like Divya Seth Shah, Parmeet Sethi, Vandana Sajnani, Ridhima Sud, Vikrant Massey and Manoj Pahwa charmingly finds its place to rise and shine. Also Farhan, Priyanka, Rahul Bose and Anushka are branded names to come up with performances you can’t crib about but eventually DIL DHADAKNE DO finds its acting-giants in Anil Kapoor, Ranveer Singh and Shefali Shah. All of these three names have rediscovered themselves in their own way. Anil Kapoor’s performance as a suave, money-driven, self-centered, crude, controlling and calculative patriarch is terrific. Ranveer Singh surprises as well. Probably for the first time, he has brought something called subtly in his performance and it’s totally rewarding. Move over his ‘ever ready’ charged up energy assurance, here is an actor a lot more yet to be explored. Shefali Shah is brilliant and makes you wonder why Bollywood hasn’t given her yet what she deserves. Well done, Ma’am!

To conclude, DIL DHADAKNE DO suffers two major slip-ups. One being the length of the film of course and the other is the narration given by none other than Aamir Khan lending his voice to the younger Mehra of the family; a dog! Yes, you heard it right.  Now, this can be an ‘Aww’ moment for puppy-loving beauties but for the film, it does throw a fit of boredom on you. Watch out for some real ‘surprising’ performances and dialogue-driven humor! [3.5/5]