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Thursday, 1 August 2019

बाबा (मराठी): मोहक, मार्मिक और मनोरंजक! [3.5/5]


‘पालने वाला बड़ा है, या पैदा करने वाला?’ सवाल द्वापर युग से चला आ रहा है, जब कृष्ण को लेकर यशोदा और देवकी दोनों अपने-अपने दावों पर मज़बूत खड़े दिखाई देते हैं. फिल्मों में भी इस तरह का भावनात्मक द्वन्द आज तक परदे पर आना कायम रहा है, शायद इसलिये क्यूंकि भारतीय पारिवारिक मनोरंजन का एक काफी बड़ा हिस्सा माँओं के साथ गहरा जुड़ाव महसूस करता है. मराठी की ही एक और बेहतरीन फिल्म ‘नाळ’ में दो माँओं को एक बच्चे के लिए तड़पते हमने पिछले साल ही देखा है. राज आर. गुप्ता की ‘बाबा थोड़ी अलग है. पालने और पैदा करने वाली माँओं के ज़ज्बाती उथल-पुथल भरे समन्दर के बीच, बड़ी निर्ममता से पिता के प्रेम और पुरुषार्थ को सवालिया कठघरे में खड़े करने वाली एक छोटी सी नाव डूबने के लिये छोड़ देती है. सवाल अब और पेचीदा हो गया है- ‘पालने वाला क्या बच्चे को, पैदा करने वाले से बेहतर भविष्य दे पायेगा?’. ख़ास कर तब, जब मामला आर्थिक दुर्बलता के साथ साथ शारीरिक विकलांगता का भी हो.

माधव (दीपक डोबरियाल) और आनंदी (नंदिता पाटकर) सुन-बोल नहीं सकते. आठ साल का शंकर (आर्यन मेघजी) 3 दिन का था, जब उन्होंने उसे अपनाया था. माधव-आनंदी को अंदाज़ा भी नहीं है कि उनके साथ रहते रहते शंकर भी कभी बोलना सीख नहीं पाया. कुछ रिश्तों को समझने, पनपने के लिए शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती. माधव-आनंदी-शंकर के आपसी रिश्तों में शब्दों के लिए जगह ही नहीं है, न ही उसकी कोई कमी ही महसूस होती है. हाँ, एक त्रयम्बक (चितरंजन गिरि) ही उनका नज़दीकी है, जिसका शब्दों से लेना-देना है, वो भी थोड़ा-बहुत ही. त्रयम्बक हकलाता है. ऐसे में, एक दिन शंकर को जन्म देने वाली माँ पल्लवी (स्पृहा जोशी) अपने पति के साथ शंकर पर अपना खोया हुआ हक़ जमाने आ पहुँचती है. कोर्ट में माधव और आनंदी की परवरिश पर उंगलियाँ उठाईं जा रही हैं. शंकर का भविष्य दांव पर है. अगली सुनवाई में अभी 22 दिन बाकी हैं, और अगर इस बीच माधव शंकर को बोलना सीखा देता है तो शंकर पर उसके दावेदारी की कुछ उम्मीद बन सकती है.

‘बाबा पिताओं के लगातार संघर्ष की कहानी है. वो पिता, जो अपने बच्चे की भलाई के लिए दिन-रात लगा रहे और माथे पर शिकन भी न आने दे. दीपक डोबरियाल के सजीव अभिनय में माधव फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष बनकर उभरता है. माधव को तमाम नाउम्मीदी और कठिनाइयों के बीच भी आप कभी रोते हुए नहीं पायेंगे, हालाँकि उसका गुस्सा, उसकी खीझ जरूर आपको बीच बीच में कोंचती रहेगी- कभी भगवान की मूर्ति के आगे सवाल करते हुए, तो कभी जज साब के फैसले से नाराजगी जताते हुए. रेडियो खरीदने से लेकर रोज़ाना 50 रूपये में रटंत तोते वाले को घर पर रखने और गाँव की दुकान पर लड़की के मेकअप में पुतला बनकर दिन भर खड़ा रहने तक, माधव शंकर को बोलना सिखाने के लिए जान लगा देता है, और उस माधव को परदे पर जिंदा करने के लिए दीपक अभिनय में अपनी. दीपक अब तक की फिल्मों में अपने ‘वन-लाइनर्स’ के साथ आपको गुदगुदाते रहे हैं, ‘बाबा उनके लिए और उनके चाहने वालों के लिए आसान किरदार नहीं है. बहुत मुमकिन है कि इसके बाद आप दीपक को इसी रूप में देखने की चाह रखने लगें.

नंदिता पाटकर अपनी अदाकारी में हर वो तेवर इस्तेमाल करती हैं, जिसकी कमी आपको दीपक के अभिनय में दिखती है. आनंदी माधव की तरह अपने आपको बाँध के नहीं रखती. उसके ज़ज्बात ज्यादा मुखर होके उभरते हैं, शायद इसीलिए उसके साथ जुड़ना आसान लगता है. आर्यन की कास्टिंग फिल्म के लिए वरदान की तरह है. आर्यन की मासूमियत और शरारतें कहीं से भी बनावटी या अभ्यास की हुई नहीं लगतीं. कोर्ट के एक दृश्य में वो उबासियाँ ले रहा है. सिग्नल न मिलने के कारण पूरे दिन में उसने रेडियो से सिर्फ खरखराहट की आवाज़ ही सीखी है. उसी की नक़ल उतार रहा है. हाँ, स्पृहा और अभिजीत का चुनाव फिल्म के खराब पहलुओं में जरूर शामिल है. दोनों के अभिनय बेहद नपे-तुले और औसत दर्जे के नज़र आते हैं, तब जबकि दीपक और नंदिता दूसरी तरफ बिलकुल सहज हों. उनके फ्रेम में आते ही फिल्म अपनी नैसर्गिक ख़ूबसूरती से हटकर बनावटी साज़-सजावट वाली दुनिया में चली जाती है. सरकारी वकील की भूमिका में जयंत गडेकर हंसाने-गुदगुदाने में कामयाब रहते हैं. गिरि बेहतरीन है.

पहली ही फिल्म होने के बावज़ूद, ‘बाबा में राज आर गुप्ता अपनी पकड़ कहीं भी कमज़ोर नहीं पड़ने देते. फिल्म में ऐसे दृश्यों की भरमार है, जहां फिल्म में वक़्त और जगह को कैद करने में छोटी-छोटी डीटेल्स का पूरा ध्यान रखा गया है. फिल्म 90 के दशक में है. घर में डालडा घी का डब्बा पड़ा है. पुलिस स्टेशन में पुराने प्रधानमंत्री वीपी सिंह का फोटो हटाकर नए प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की तस्वीर लगाई जा रही है. एक अन्य बेहद प्रशंसनीय दृश्य में रेडियो पर उन्हीं का भाषण चल रहा है, जब कुछ बच्चे रेडियो चुराकर भाग रहे हैं. शंकर अपने पिता के साथ लौट रहा है- चार्ली चैपलिन की फिल्म ‘द किड देख कर. ‘बाबा की कहानी ‘द किड के कथानक से मेल खाती है. फिल्म में गानों का इस्तेमाल में बेहद कंजूसी और जरूरत के हिसाब से ही है. हालाँकि फिल्म अपने कुछ हिस्सों में बहुत धीमी पड़ने लगती है, लम्बी लगने लगती है, कुछ में बार-बार अपने आप को दोहराती भी है. सवालों की एक खेप भी खड़ी होती है, जैसे शंकर स्कूल क्यूँ नहीं जाता? पर ज़ज्बातों के बहाव में सब पीछे छूट जाते हैं.  

आखिर में, ‘बाबा’ मराठी फिल्मों के उस प्रयोग का हिस्सा है, जहां सीधी-साधी दिल छू लेने वाली कहानी के साथ-साथ आपको क्वालिटी सिनेमा का पुट भी ख़ूब मिलता है. चाहे वो खूबसूरत सिनेमेटोग्राफी से हो, या फिर दमदार अभिनय से. वैसे तो ‘बाबा सिर्फ और सिर्फ दीपक डोबरियाल को खुले दिल से सराहे जाने के लिए भी देखी जा सकती है, पर आप देखिये क्यूंकि कुछ कहानियाँ ज़ज्बाती तौर पर आपको द्रवित करने में कभी पुरानी नहीं होतीं. [3.5/5]              

Friday, 29 June 2018

संजू: दत्त, रनबीर, हिरानी...मनोरंजन सब पर भारी! [3.5/5]


क्या कोई भी 3 घंटे की फिल्म या 400 पन्नों की किताब किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति या उसके व्यक्तित्व के बारे में आपकी राय बदलने में कामयाब हो सकती है? नहीं. भले ही वो फिल्म राजकुमार हिरानी जैसे चहेते फ़िल्मकार ने ही क्यूँ न बनायी हो. क्या राजकुमार हिरानी ने संजू के साथ संजय दत्त की छवि सुधारने की ऐसी कोई कोशिश की है? मुझे नहीं लगता. संजय दत्त जैसे सनसनीखेज जिंदगी जीने वाले मशहूर शख्सियत से जुड़ा हर पहलू जानने-समझने-टटोलने के लिए संजू कम पड़ जाती है. तय वक़्त के कथानक में पिरोने के लिए घटनाओं के अपने चुनाव में भी, और मनोरंजन को मद्देनजर रख कर उन घटनाओं के इर्द-गिर्द अतिरंजित भावनाओं का जाल बुनने में भी. जाल शब्द का इस्तेमाल बहुत सोच समझकर कर रहा हूँ. अभिजात जोशी के साथ मिलकर हिरानी स्क्रिप्ट लिखते वक़्त ‘LCD’ फ़ॉर्मूले को ध्यान में रखते हैं, यानी कागज़ पर लिखे जिस दृश्य में LAUGHTER, CRY या DRAMA नहीं, उसका फिल्म में बने रहना जरूरी नहीं. इस गरज़ से, संजू मनोरंजक लगने की कोशिश करते हुए ज्यादा नज़र आती है, और सिनेमाई तौर पर परिपक्व या सम्पूर्ण फिल्म होने का हक़ खोती चली जाती है.

संजय दत्त तमाम बदनामियों और अपनी बिगडैल छवि के बावजूद, दर्शकों के एक बहुत बड़े हिस्से के चहेते अभिनेता रहे हैं. उनसे जुड़े हजारों किस्सों और किंवदंतियों में उन्हें तलाशना अपने आप में किसी रहस्य से कम नहीं है. हिरानी उनकी जिंदगी को जब अपनी सीधी-सरल, पर बेहद चमकदार रंगीन दुनिया में जगह देते हैं, आपकी उम्मीद रहती है कि आप हिरानी की मदद से इस पहेली को आसानी से सुलझा पायेंगे. ऐसा नहीं होता. कम से कम हर बार नहीं होता. संजू में बहुत सारा कुछ ऐसा है, जो आपको असलियत से परे लगता है. अक्सर क्या ऐसा हुआ था?’ से कहीं आगे बढ़कर आप अरे, ऐसा थोड़े ही हुआ होगा की तरफ पहुँचने लगते हैं. और उसकी वजह शायद हर बार हिरानी साब का मनोरंजन को लेकर अपना एक ख़ास नजरिया और तय रवैया ही है. 4 सफल फिल्मों के बाद, अब दर्शक के तौर पर आपको भी उनके दांव-पेंच समझ आने लग गये हैं. चौंकाने के लिए अब हिरानी साब के तरकश में कम ही तीर बचे हैं. हालाँकि अभी भी आप और हम उनसे उबेंगे नहीं, पर बासीपने के हलकी गंध आने लग पड़ी है.

संजू का पहला हिस्सा संजय दत्त (रनबीर कपूर) और ड्रग्स के साथ उनकी उठा-पटक के नाम रहता है. इस दौरान, कथानक में माँ नर्गिस जी (मनीषा कोईराला) की बीमारी, उनकी असामयिक मृत्यु, बेटे को ड्रग्स के दलदल से निकालने में पिता सुनील दत्त (परेश रावल) की नाकाम कोशिशों और संजय की ख़ुद से ही लड़ाई को अहमियत मिलती है. हलके-फुल्के पलों और एक-दो इमोशनल दृश्यों के अलावा, इस हिस्से में अगर कुछ आपको बहुत बांधे रखता है, तो वो है संजय के दोस्त कमलेश (विक्की कौशल) का किरदार. परदे पर विक्की के आते ही जैसे कोई तूफ़ान सा उठने लगता है. इस किरदार के बारे में आपको शायद ही पहले से कुछ पता रहा हो. संजय के साथ कमलेश की दोस्ती के पल हों, या इंटरवल से ठीक पहले कमलेश का एक सनसनीखेज खुलासा; इस एक किरदार के साथ आप हमेशा उत्सुक और उत्साहित रहते हैं. यही एक किरदार है, जो संजय के साथ-साथ रहते हुए कहानी में एक अलग तरह की निरपेक्षता और सकारात्मकता लेकर आता है. यहाँ तक कि पहली मुलाक़ात में ही संजय को दो-टूक सुनाने की हिम्मत दिखा देता है.  

संजय दत्त के अंडरवर्ल्ड से रिश्तों और एके-47 रायफल रखने के वाकये से होकर येरवडा जेल से छूटने तक का सफ़र फिल्म का दूसरा हिस्सा बनता है, जहां ज्यादातर कोशिशें और वक़्त मामले को लेकर संजय की सफाई के इर्द-गिर्द ही घूमता रहता है. पिछले हिस्से में जहां परदे का संजय (रनबीर) असल जिंदगी के संजय पर हर लहजे से हावी होता दिखाई दे रहा था, यहाँ तक आते-आते संजय दत्त का हालिया व्यक्तित्व आपको ज्यादा भाने लगता है. मुन्नाभाई एमबीबीएस घटने और संजू के बाबा बनने के दौर और दृश्य खासे सुहावने लगते हैं. हालाँकि हिरानी का फार्मूला अब भी आपको परेशान कर ही रहा होता है. दोस्तों के बीच गलतफहमियों से पनपी दूरियों को सुलझाने का दृश्य पीके के उस दृश्य की याद दिलाता है, जहां जग्गू और सरफ़राज़ शामिल हैं. कहानी को लम्बे-चौड़े बयानों में बोल बोल कर बताने की कला आप 3 इडियट्स में देख ही चुके हैं. यहाँ तक कि गानों में सपनीली दुनिया की सैर करते किरदारों (3 इडियट्स का ज़ुबी-ज़ुबी) का प्रयोग यहाँ भी ख़ूब (रूबी-रूबी) इस्तेमाल होता है.

अभिनय में, संजू पूरी तरह रनबीर में ढली-रची-बसी फिल्म है. सोनम कपूर के साथ बाथरूम वाला दृश्य हो, या फिर परेश रावल के साथ इमोशनल सीन्स; रनबीर संजय दत्त की तरह सिर्फ चलने, बोलने या दिखने से परे लगते हैं. परदे पर उनके होते हुए कुछ और देखने-सुनने की चाह भी नहीं रहती, हालाँकि विक्की कौशल के साथ वाले दृश्यों में उन्हें साफ़ टक्कर मिलती है. विक्की यहाँ अपने पूरे रंग में हैं. रनबीर जैसे बेहतर अभिनेता के सामने होते हुए भी उनकी अदाकारी में एक छटांक को भी बिखराव नहीं दिखता. आखिर में, संजू एक ऐसी फिल्म हैं जिसके मुख्य किरदार से आप पहले से ही वाकिफ हैं, और उसके बारे में जितना जानते हैं उतना ही और जानना चाहते हैं. इस लिहाज़ से संजू आपको छोटे-बड़े ढेर सारे मजेदार किस्से सुना डालती है. अब आपको तय करना है, हिरानी के फार्मूले में कौन कितना फिट बैठ गया था, और कौन सा बैठाया गया था? बहरहाल, मीडिया को  एकतरफ़ा ठहराने की कोशिश में फिल्म गंभीरता की ओर जरूर बढती दिखती है, पर आप इसे सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन के चश्मे से ही देखने की जेहमत उठाएं, तो बेहतर नतीजे मिलेंगे. [3.5/5]           

Friday, 8 September 2017

डैडी: कहानी औसत, ट्रीटमेंट उम्दा! [3.5/5]

असीम अहलूवालिया की सिनेमाई दुनिया मुख्यधारा में रहते हुए भी बहाव से अलग, उलटी तरफ बहने का जोखिम पहले भी 'मिस लवली' जैसी फिल्म में उठा चुकी है. कहानी जहां हाशिये पर धकेल दिये गए सामाजिक वर्गों की हो, चेहरे जहां खुरदुरे हों, चेचक के निशान और खड्डों भरे या फिर गहरे लाल रंग की लिपस्टिक में बेतरतीब, बेजा पुते-पुताये, और कमरे इतने घुटन भरे कि सीलन की बास भी नाक से उतर कर अन्दर गले तक आ जाये. असीम इस कम-रौशन, सलीके से बिखरी-बिखराई दुनिया की, तसल्ली-पसंद तरीके से कही जाने वाली कहानी में जिस बारीकी से परदे के आगे बैठे दर्शक के लिए 'माहौल' बनाते हैं, उन्हें बॉलीवुड में ज़ुर्म की दुनिया पर बनने वाली फिल्मों का 'संजय लीला भंसाली' घोषित कर देना चाहिए. कुख्यात अपराधी अरुण गवली की जिंदगी पर आधारित, असीम की 'डैडी' हालाँकि एक ठोस कहानी के तौर पर सामान्य से आगे बढ़ने का हौसला नहीं जुटा पाती, पर फिल्म-मेकिंग के दूसरे जरूरी पहलुओं पर अपनी छाप छोड़ने में कतई निराश नहीं करती.

मुंबई के दगड़ी चॉल में रहने वाले तीन लफंगों की अपनी एक गैंग है. BRA गैंग, B से बाबू (आनंद इंगले), R से रामा (राजेश श्रृंगारपुरे) और A से अरुण गवली (अर्जुन रामपाल). बड़ा हाथ मारने और भाई (फ़रहान अख्तर) के टक्कर का बनने के लिए जो तेवर और ताव चाहिए, अरुण में ही सबसे कम दिखता है. फट्टू भी वही सबसे ज्यादा है, फिर भी हालात उसे भाई के ठीक सामने ला खड़ा करते हैं. सिस्टम की मार से अपराधी बनने की दुहाई देने वाला गवली धीरे-धीरे खुद ही एक पैरलल सिस्टम की तरह काम करने लगता है. जेल में काफी उम्र काट ली है, अब सफ़ेद टोपी पहन के 'गांधी' बनने चला है. शान से कहता है कि वो भाई की तरह 'भगोड़ा' नहीं है. लोग कहने लगे हैं, पर 'रॉबिनहुड' का मतलब भी उसे उसकी बेटी से पता चलता है.

अरुण गुलाब गवली की कहानी या यूँ कहें तो उसकी जिंदगी से काट-छांट कर फिल्म के लिए बुनी गयी कहानी में कुछ भी ऐसा अलग या नया नहीं है, जो इस तरह के तमाम गैंगस्टर-ड्रामा में आपने पहले देखा-सुना न हो. हाँ, घटनाओं को पिरोने और उन्हें एक-एक कर के बड़े तह और तमीज से आपके सामने रखने का असीम का अपना एक ख़ास स्टाइल है, वो इस तरह की फिल्मों के लिए नया और बेहतर जरूर है. असीम अलग-अलग किरदारों के जरिये गवली की कहानी को परदे पर सिलसिलेवार पेश करते हैं, और काफी हद तक कामयाब कोशिश करते हैं कि गवली का किरदार इंसानी लगे और सिनेमाई परदे को फाड़ कर बाहर आने की जुगत से बचता रहे. यही वजह है कि गवली का किरदार जेल में अपनी मौत की आहट भर से ही पसीने-पसीने हो उठता है; उसका एक गुर्गा उसे नयी टेक्नोलॉजी वाली पिस्तौल दिखा रहा है, पर गवली रोती हुई बेटी को झुनझुना बजा कर चुप कराने में ज्यादा मशगूल दिखता है. 

फिल्म में कैमरा अपने लिए आरामदायक जगह नहीं ढूंढता, अक्सर खिड़कियों और दरवाजों के धूल लगे शीशों से लगकर अन्दर झांकना मंजूर करता है. रौशनी बेख़ौफ़ धूप में छन कर नहीं आती, रंगीन लाल-नीले बल्बों में नहा कर चेहरों, पर्दों, और बिस्तरों पर उतनी ही पड़ती है, जितने से उसके होने का वहम बना रहे. किरदारों की स्टाइलिंग से लेकर प्रॉडक्शन-डिजाईन के छोटे से छोटे हिस्सों तक में असीम की पैनी नज़र और पूरी-पूरी दिलचस्पी साफ़ देखने को मिलती है. डिस्को-बार में 'जिंदगी मेरी डांस-डांस' गाने पर थिरकते कलाकारों के साथ, आपको '80 के दशक का बॉलीवुड जीने से एक पल को परहेज़ नहीं होता. जेल में नया कैदी आया है, खूंखार है, खतरनाक है, और मुंह से 'खलनायक' की धुन निकालता रहता है. ज़ाहिर है, 90 का दशक आ गया है. अब सैलून में संजय दत्त और जैकी श्रॉफ के पोस्टर चस्पा हैं. 

असीम अहलूवालिया का सिनेमा अगर 'डैडी' का शरीर है, तो गवली के किरदार में अर्जुन रामपाल का अभिनय साँसे फूंकने जितना ही जरूरी. प्रोस्थेटिक तकनीक से चेहरे की बनावट में ख़ास बदलाव करने तक ही नहीं, अर्जुन एक अदाकार के तौर पर भी पूरी फिल्म में अपनी ईमानदारी से तनिक पीछे नहीं हटते. उनकी खुरदुरी आवाज़, उनकी चाल-ढाल, उनका डील-डौल बड़ी सहजता से उन्हें हर वक़्त उनके किरदार के आस-पास ही रखता है. निश्चित तौर पर यह उनके अभिनय-कैरियर की चुनिन्दा देखने लायक परफॉरमेंसेस में से एक है. कास्टिंग के नजरिये से फ़रहान अख्तर को भाई (दाऊद इब्राहिम के किरदार से प्रेरित) के तौर पर पेश करना सबसे निराश करने वाला प्रयोग रहा. पुलिस इंस्पेक्टर विजयकर की भूमिका में निशिकांत कामत खूब जंचते हैं. अन्य किरदारों में ऐश्वर्या राजेश, श्रुति बापना और राजेश श्रृंगारपुरे बेहतरीन हैं. 

आखिर में; बॉलीवुड क्राइम फिल्मों का जमीनी जुड़ाव एक अरसे से लापता सा था. गैंगस्टर काफी वक़्त से दुबई में कहीं पूल-साइड पर लेट कर बिकनी में लड़कियों को देखते हुए जुर्म के फरमान सुनाने में अपनी शान समझने लगे थे. फिल्मों ने उनमें अपने स्टाइल-आइकॉन तलाशने शुरू कर दिये थे. पक्या, गोट्या, रग्घू और मुन्ना की टेढ़ी-मेढ़ी शक्लों की जगह गोरे-चिट्टे-चिकने चेहरों ने ले ली थी. असीम अहलूवालिया की 'डैडी' उस खाली जगह में बड़ी आसानी और ईमानदारी से फिट बैठ जाती है. [3.5/5]  

Friday, 28 November 2014

UNGLI: What a waste of a noble intent! [2/5]

Corruption has now been so widespread in our system and quite an acceptable thing in a sense that we often don’t even try to be judgmental about it. No wonder when the creative brain behind the critically acclaimed RANG DE BASANTI, Rensil D’Silva decides to bring the story of an unusual ‘fight against corruption movement’ on screen again, even he doesn’t try to sound deep, profound and sure about the solution. So, we see a group of young souls coming together to punish the ‘corrupts’ in the most absurd but enjoyable manner, of course to the viewers and not the victims. Despite showing sincerity in the objective, UNGLI stays low, average, mindless and an infertile effort, mainly because of the lack of gravity in the treatment.

A retired old man [S M Zaheer seen in a long time] is forced to make regular visits at the government office to get his hard-earned pension sanctioned as he can’t stand the significance of bribery in the system. An autowallah asks for double-fare as the distance is too short to make big money. And then, there is corruption in the police organization to get preferred profitable postings by paying heavy sum to some illicit third party. All the instances are no new but the punishments set by the new ray of hope fondly called as the ‘Ungli’ gang are sure innovative and dramatically entertaining. Corrupts are made running non-stop for their lives in the sports ground. Some go under trial to eat the money in its most literal sense. And the Mumbai autowallah is sent to Delhi in the rail-cargo with his auto to satisfy his hunger for ‘lamba-bhaada’.  

The ‘Ungli’ gang includes a medical intern [Kangna Ranaut], a crime-journalist [Randeep Hooda], a computer engineer [Neil Bhoopalam] and a pizza-loving muscleman [Angad Bedi] with the new entrance, an expert in kissing stuck in the midway to find out true colors in his personality [Emraan Hashmi]. Meanwhile, the police [Led by Sanjay Dutt playing his age for a change] are all seen treating them as the most dangerous group ever came on this planet. Come on, don’t they have enough celebrity programs to attend and provide security to the most undesirable politicians? Leave these guys alone, as they won’t last long considering their one-dimensional performances and the all uncooked mediocre lines they speak with full intensity. Picture this, “mujhe sudhaarte-sudhaarte, sudhaarne wale bigad gaye” or “Aansuon se sirf whisky dilute hoti hai”. Claps? Mention not, please!

Rensil D’Silva’s UNGLI is also a big fail in its screenplay. You always get confused with the timelines after each cut in the shots. Neha Dhupia playing a TV journalist and the veteran Raza Murad playing the Commissioner of Police come back in a regular interval only to show their disappointment in trying to catch & cover the gang but nothing to call it a success in their kitties as the gang is apparently so smart; which again they aren’t. Performances are equally unremarkable. Sanjay Dutt being the most avoidable to comment and Randeep being the most tolerable of the lot!    

D’Silva’s UNGLI takes huge inspiration from his RANG DE BASANTI in its intention but ends up abusing it in similar ways he gives the title ‘Basanti’ to the booty-shaking girl [Shraddha Kapoor tries her hands] in the most idiotically written item song ‘Dance Basanti’. What a repositioning! And what a waste of a noble intent! [2/5]

Friday, 6 September 2013

ZANJEER : Get yourself chained if you can’t hold your urge to watch but stay away! [0.5/5]

I know it is a bit exaggerated reaction but can we propose a cinema ACT or a regulation kind of thing in bollywood so that filmmakers like Ram Gopal Verma gets a ban […for shorter span at least] on making films further, after committing horrendous  crime of remaking old bollywood classics? But wait! He’s not alone there on the top […of the worsts] to enjoy all the beatings, Apoorva Lakhia joins him with his rare gem ZANJEER- a so-called official remake of 70’s Amitabh Bachchan starrer game-changer of same name! It is so disgusting that even calling it a film would mean immense disrespect to cinema.

Where the old classic, directed by Prakash Mehra was packed with good music, powerful performances, solid punches in the writing, a totally engaging story-line and possibly the need of the hour to represent anger of the youth, reciprocating in a blasting yet controlled aggressive manner to better the society,  Lakhia’s tribute goes wrong on all aspects. Neither it tries to entertain nor does it create the need to tell something or the other to its audiences. It merely looks like someone had an itch to satisfy his ‘though not found any traces of’ creative cells. It is a first in long time where everyone competes with each other not to offer their best but the worst.

Southern superstar Ram Charan plays ACP Vijay Khanna who in particular, can be seen wearing formals in day/on duty and a police uniform while being at home with his girl. That can also be cleared in explanatory debate but what about those couple of stiffed expressions on his face for most parts? Then, there is this ‘raghupati raaghav rajaram’ tune in the background whenever he decides to take a walk from the scene in slow-motion. Priyanka Chopra looks disinterested and takes her part so much for granted as if she has come for a picnic. Prakash Raj as the stylishly all docked up villain Teja bores with his one-dimensional comical portrayals of bad guys in recent. He doesn't offer anything new and that is a serious concern. Mahi Gill as Mona Darling irritates. Sanjay Dutt finds himself in shoes of Pran saab as Sher Khan but consoles with his looks only. In an added subplot, Atul Kulkarni plays an honest journalist with investigative instinct, loosely based on the real life crime journo J. Dey, murdered in suspicious circumstances.    

Overall, it is a sloppy-shoddy-shaky attempt that can only be dumped down as a trash. Watching it could make you feel like torturing yourself for all the sins you have been doing all these years. Some films accidentally entertain you with a certain level of absurdity and overtly self-indulgence; this doesn't even reach there to bring some relief. The worst of the year! Get yourself chained if you can’t hold your urge to watch but stay away at any cost! [0.5/5]