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Friday, 15 June 2018

लस्ट स्टोरीज़ (A): ‘लव’ से ज्यादा असल और अलग! [4/5]


प्यार की कहानियाँ सदियों से अनगिनत बार कही और सुनाई जाती रही हैं. वासना के हिस्से ऐसे मौके कम ही आये हैं. हालाँकि दोनों में फर्क बस सामाजिक बन्धनों और नैतिकता के सीमित दायरों का ही है. कितना आसान लगता है हमें, या फिर कुछ इस तरह के हालात बना दिए गये हैं हमारे लिए कि प्यार के नाम पर सब कुछ सही लगने लगता है, पाक-साफ़-पवित्र; और वासना का जिक्र आते ही सब का सब गलत, गंदा और अनैतिक. रिश्तों में वासना तो हम अक्सर अपनी सतही समझ से ढूंढ ही लेते हैं, वासना के धरातल पर पनपते कुछ अलग रिश्तों, कुछ अलग कहानियों को समझने-तलाशने की पहल नेटफ्लिक्स की फिल्म लस्ट स्टोरीज़ में दिखाई देती है, जो अपने आप में बेहद अनूठा प्रयास है. ख़ास कर तब, जब ऐसी कहानियों को परदे पर कहने का दारोमदार हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के चार बड़े नामचीन फिल्मकारों (अनुराग कश्यप, जोया अख्तर, दिबाकर बैनर्जी, करण जौहर) के मजबूत और सक्षम कन्धों पर टिका हो.

चार छोटी-छोटी कहानियों से सजी लस्ट स्टोरीज़ अपने नाम की वजह से थोड़ी सनसनीखेज भले ही लगती हो, पर कहानी और किरदार के साथ अपनी संवेदनाओं और सिनेमा के लिए अपनी सशक्त जिम्मेदारियों में खुद को तनिक भी लचर या लाचार नहीं पड़ने देती. अनुराग की कहानी एक महिला प्रोफेसर के अपने ही एक स्टूडेंट के साथ जिस्मानी सम्बन्ध बनाने से शुरू होती है. कालिंदी (राधिका आप्टे) का डर, उसकी नर्वसनेस, तेजस (सैराट के आकाश ठोसर) पर जिस तरह वो अपना अधिकार जमाती है, सब कुछ एक सनक से भरा है. एक हिस्से में तो वो तेजस का बयान तक अपने मोबाइल में रिकॉर्ड करने लगती है, जिसमें तेजस सब कुछ आपसी सहमति से हुआ था की हामी भर रहा है. हालांकि अपने एक से ज्यादा रिश्तों में कालिंदी की तड़प उन दृश्यों में साफ़ होने लगती है, जिनमें वो कैमरे से रूबरू होकर कुछ बेहद अहम् सवाल पुरुषों की तरफ उछालती है. राधिका अपने किरदार के पागलपन में हद डूबी हुई दिखाई देती हैं, पर फिल्म कई बार दोहराव से भी जूझती नज़र आती है, अपने 35 मिनट के तय वक़्त में भी लम्बी होने का एहसास दे जाती है.

सुधा (भूमि पेडणेकर) अजीत (नील भूपलम) के साथ कुछ देर पहले तक बिस्तर में थी. अब फर्श पर पोछा लगा रही है. पोहे की प्लेट और चाय का कप अजीत को दे आई है. अब बर्तन कर रही है. बिस्तर ठीक करते हुए ही दरवाजा बंद होने की आवाज़ आती है. अजीत ऑफिस जा चुका है. सुधा उसी बिस्तर पर निढाल होकर गिर गयी है. जोया अख्तर की इस कहानी में ऊंच-नीच का दुराव बड़ी संजीदगी से पिरोया गया है. सुधा एक काम करने वाली नौकरानी से ज्यादा कुछ नहीं है, उसे भी पता है. अजीत के साथ शारीरिक सम्बन्धों के बावजूद, अपने ही सामने अजीत को लड़की वालों से मिलते-बतियाते देखते और उनके लिए चाय-नमकीन की तैयारी करते वक़्त भी उसे अपनी जगह मालूम है, फिर भी उसकी ख़ामोशी में उसके दबते-घुटते अरमानों और ख्वाहिशों की चीख आप बराबर सुन पाते हैं. भूमि को उनकी रंग-ओ-रंगत की वजह से भले ही आप इस भूमिका में सटीक मान बैठे हों, पर असली दम-ख़म उनकी जबरदस्त अदाकारी में है. गिनती के दो संवाद, पर पूरी फिल्म में क्या दमदार उपस्थिति. इस फिल्म में जोया का सिनेमा भी क्या खूब निखर कर सामने आता है. कैमरे के साथ उनके कुछ दिलचस्प प्रयोग मज़ा और दुगुना कर देते हैं.

दिबाकर बैनर्जी की कहानी एक बीचहाउस पर शाम होते ही गहराने लगती है. रीना (मनीषा कोईराला) साथ ही बिस्तर में है, जब सुधीर (जयदीप अहलावत) को सलमान (संजय कपूर) का फ़ोन आता है. सलमान को लगने लगा है कि उसकी बीवी रीना का कहीं किसी से अफेयर चल रहा है. शादी-शुदा होने का बोझ और बीवी होने से ज्यादा बच्चों की माँ बन कर रह जाने की कसक अब रीना की बर्दाश्त से बाहर है. सलमान को खुल कर सब सच-सच बता देने में ही सबकी भलाई है. वैसे भी तीनों कॉलेज के ज़माने से एक-दूसरे को जानते हैं. शादी से बाहर जाकर अवैध प्रेम-संबंधों और अपने पार्टनर से वफादारी के मुद्दे पर दिबाकर इन अधेड़ उम्र किरदारों के जरिये एक बेहद सुलझी हुई फिल्म पेश करते हैं, जहां एक-दूसरे की जरूरतों को बात-चीत के लहजे में समझने और समझ कर एक माकूल रास्ता तलाशने में सब के सब परिपक्व और समझदार बन कर सामने आते हैं. मनीषा और संजय को नब्बे के दशक में हम बहुत सारी मसाला फिल्मों में नॉन-एक्टर घोषित करते आये हैं, इस एक छोटी फिल्म में दोनों ही उन सारी फिल्मों में अपने किये-कराये पर मखमली चादर डाल देते हैं. जयदीप तो हैं ही बाकमाल.

आखिरी किश्त करण जौहर के हिस्से है, और शायद सबसे फ़िल्मी भी. कहानी पिछले साल की शुभ मंगल सावधान से बहुत अलग नहीं है. मेघा (कियारा आडवाणी) के लिए बिस्तर पर अपने पति पारस (विक्की कौशल) के साथ सुख के पल गिनती के ही रह जाते हैं (हर बार वो उँगलियों से गिनती रहती है), और उसके पति को कोई अंदाज़ा ही नहीं कि उसकी बीवी का सुख उसके सुख से अलग है, और कहीं ज्यादा है. मनचाही ख़ुशी के लिए बैटरी और रिमोट से चलने वाले खिलौने की दखल के साथ, करण कहानी को रोचक बनाने में ज्यादा उत्तेजित दिखते हैं, कुछ इस हद तक कि अपनी महान पारिवारिक फिल्म कभी ख़ुशी कभी गम के गाने का मज़ाक उड़ाने में भी झिझकते नहीं. विक्की कौशल मजेदार हैं.

आखिर में, लस्ट स्टोरीज़ 2013 में आई अनुराग, ज़ोया, दिबाकर और करण की बॉम्बे टॉकीज वाले प्रयोग की ही अगली कड़ी है. फिल्म इस बार बड़े परदे पर नहीं दिखेगी, और सिर्फ नेटफ्लिक्स पर ही मौजूद रहेगी, इसलिए अपनी सहूलियत से कभी भी और कहीं भी देखने का लुत्फ़ आप उठा सकते हैं. ज़ोया और दिबाकर की कहानियों के बेहतर होने के दावे के साथ ही, एक बात की ज़मानत तो दी ही जा सकती है कि हिंदी सिनेमा के आज में इस तरह की समर्थ, सक्षम और असामान्य कहानियां कहने की कोशिशें कम ही होती हैं, खुद इन चारों फिल्मकारों को भी आप शायद ही इन मुद्दों पर एक बड़ी फिल्म बनाते देख पायें, तब तक एक ही फिल्म में चारों अलग-अलग ज़ायकों का मज़ा लीजिये. लव से ज्यादा मिलेगा, कुछ नया मिलेगा. [4/5]

Friday, 13 March 2015

NH10: Raw, real and ruthless! Anushka leads the way!! [4/5]

The female protagonist has been put in a situation where every door knocked for help is an added danger to her life; this is not some breaking news for a Bollywood thriller. We have witnessed our leading ladies running after one possible hand of help turning ugly to another many a times and even rising from dust to stand at her own (Rekha is my personal favorite in such given stricture] against all odds. But when Anushka Sharma, calm and cold as corpse, with an iron-rod in her hand sits and lights a cigarette while watching her challenger crawling with a broken leg, this easily becomes ‘my’ moment to cheer for the invincible human survival instinct and all the women empowerment slogans coined just for the sake of it. This is raw. This is real. This is never seen before.  

With a powerfully violent, gritty and dark NH10; Navdeep Singh of MANORAMA SIX FEET UNDER returns to his deep-rooted den of atmospheric crime thrillers where the landscape speaks the language of ruthless nature of criminal mind and the characters don’t even need dialogues to express their anger, anxiety and agitation. Meera [Anushka in a ‘would die for’ role] and Arjun [Perfectly cast Neil Bhoopalam] is your regular career-focused, party-loving couple from Gurgaon- the emerging city of hopes seen working on laptops at their side of the same bed. A perfect holiday at a private villa in the outskirts is planned. It’s Meera’s birthday. A day-long road-trip on highway has started. Beware; even a small brawl can land you in the most brutal nightmare of your life. This is no bright-lit Gurgaon. This is the dark lawless badland where ‘killings’ are an ‘honor’ to the power man upholds. Of course, there is no looking back!

The plot of NH10 is never unforeseen; in fact you can predict the twists and turns miles before reaching at the end of the road but the undertones used to shake your souls and shiver your guts are very much surprising. The headlines of honor-killings might have raised your eyebrows till the time it’s on your screen but this is like abducting you from your drawing room and throwing in the deserted land of crimes done in the name of cast, creed and culture. A sister is poisoned by her brother [Darshan Kumar from Mary Kom] for loving and marrying boy of same ‘Gothra’. One gentleman in uniform enlightens, “Social norms should not be broken. Never! Try to drive on the wrong side of the road and accidents will happen.” Heartbreaking! Nerve-wracking! And a threatening state of real India-rural India!!

NH10 marks the arrival of a new Anushka Sharma. The pouting glam-doll sheds her comfort cover and brilliantly plays the carter of the long and hard-pressed angst of Indian women. Every time she screams at her opponents, she doesn’t scream for herself but all the women been ever in such circumstances. She is the answer to every sexiest and stinking remark made ever on any women out there, and the most powerful and the most influential one. The top-slot in the list of year’s best performers has already been taken. Bravura performance!

In others, Neil Bhoopalam supports well. He boldly shifts from charming guy next flat in the apartment to the fearing-frightened soul shaken by the harsh reality and the evil face of society. Though Darshan Kumar doesn’t have much to do in length but still manages to chill your bones with sinful looks. Can’t miss out on Deepti Naval for her surprise cameo!

On the whole, NH10 is a ride to hell. A hell every one must visit, admit and act against it. It is sure not a film best described with words like ‘flawless’ and ‘extraordinary’ but these expressions will fit in well in admiring and approving Anushka’s performance. The last act alone is like a winning shot you would want to put on ‘repeat’! [4/5]  

Friday, 28 November 2014

UNGLI: What a waste of a noble intent! [2/5]

Corruption has now been so widespread in our system and quite an acceptable thing in a sense that we often don’t even try to be judgmental about it. No wonder when the creative brain behind the critically acclaimed RANG DE BASANTI, Rensil D’Silva decides to bring the story of an unusual ‘fight against corruption movement’ on screen again, even he doesn’t try to sound deep, profound and sure about the solution. So, we see a group of young souls coming together to punish the ‘corrupts’ in the most absurd but enjoyable manner, of course to the viewers and not the victims. Despite showing sincerity in the objective, UNGLI stays low, average, mindless and an infertile effort, mainly because of the lack of gravity in the treatment.

A retired old man [S M Zaheer seen in a long time] is forced to make regular visits at the government office to get his hard-earned pension sanctioned as he can’t stand the significance of bribery in the system. An autowallah asks for double-fare as the distance is too short to make big money. And then, there is corruption in the police organization to get preferred profitable postings by paying heavy sum to some illicit third party. All the instances are no new but the punishments set by the new ray of hope fondly called as the ‘Ungli’ gang are sure innovative and dramatically entertaining. Corrupts are made running non-stop for their lives in the sports ground. Some go under trial to eat the money in its most literal sense. And the Mumbai autowallah is sent to Delhi in the rail-cargo with his auto to satisfy his hunger for ‘lamba-bhaada’.  

The ‘Ungli’ gang includes a medical intern [Kangna Ranaut], a crime-journalist [Randeep Hooda], a computer engineer [Neil Bhoopalam] and a pizza-loving muscleman [Angad Bedi] with the new entrance, an expert in kissing stuck in the midway to find out true colors in his personality [Emraan Hashmi]. Meanwhile, the police [Led by Sanjay Dutt playing his age for a change] are all seen treating them as the most dangerous group ever came on this planet. Come on, don’t they have enough celebrity programs to attend and provide security to the most undesirable politicians? Leave these guys alone, as they won’t last long considering their one-dimensional performances and the all uncooked mediocre lines they speak with full intensity. Picture this, “mujhe sudhaarte-sudhaarte, sudhaarne wale bigad gaye” or “Aansuon se sirf whisky dilute hoti hai”. Claps? Mention not, please!

Rensil D’Silva’s UNGLI is also a big fail in its screenplay. You always get confused with the timelines after each cut in the shots. Neha Dhupia playing a TV journalist and the veteran Raza Murad playing the Commissioner of Police come back in a regular interval only to show their disappointment in trying to catch & cover the gang but nothing to call it a success in their kitties as the gang is apparently so smart; which again they aren’t. Performances are equally unremarkable. Sanjay Dutt being the most avoidable to comment and Randeep being the most tolerable of the lot!    

D’Silva’s UNGLI takes huge inspiration from his RANG DE BASANTI in its intention but ends up abusing it in similar ways he gives the title ‘Basanti’ to the booty-shaking girl [Shraddha Kapoor tries her hands] in the most idiotically written item song ‘Dance Basanti’. What a repositioning! And what a waste of a noble intent! [2/5]