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Thursday, 1 August 2019

बाबा (मराठी): मोहक, मार्मिक और मनोरंजक! [3.5/5]


‘पालने वाला बड़ा है, या पैदा करने वाला?’ सवाल द्वापर युग से चला आ रहा है, जब कृष्ण को लेकर यशोदा और देवकी दोनों अपने-अपने दावों पर मज़बूत खड़े दिखाई देते हैं. फिल्मों में भी इस तरह का भावनात्मक द्वन्द आज तक परदे पर आना कायम रहा है, शायद इसलिये क्यूंकि भारतीय पारिवारिक मनोरंजन का एक काफी बड़ा हिस्सा माँओं के साथ गहरा जुड़ाव महसूस करता है. मराठी की ही एक और बेहतरीन फिल्म ‘नाळ’ में दो माँओं को एक बच्चे के लिए तड़पते हमने पिछले साल ही देखा है. राज आर. गुप्ता की ‘बाबा थोड़ी अलग है. पालने और पैदा करने वाली माँओं के ज़ज्बाती उथल-पुथल भरे समन्दर के बीच, बड़ी निर्ममता से पिता के प्रेम और पुरुषार्थ को सवालिया कठघरे में खड़े करने वाली एक छोटी सी नाव डूबने के लिये छोड़ देती है. सवाल अब और पेचीदा हो गया है- ‘पालने वाला क्या बच्चे को, पैदा करने वाले से बेहतर भविष्य दे पायेगा?’. ख़ास कर तब, जब मामला आर्थिक दुर्बलता के साथ साथ शारीरिक विकलांगता का भी हो.

माधव (दीपक डोबरियाल) और आनंदी (नंदिता पाटकर) सुन-बोल नहीं सकते. आठ साल का शंकर (आर्यन मेघजी) 3 दिन का था, जब उन्होंने उसे अपनाया था. माधव-आनंदी को अंदाज़ा भी नहीं है कि उनके साथ रहते रहते शंकर भी कभी बोलना सीख नहीं पाया. कुछ रिश्तों को समझने, पनपने के लिए शब्दों की जरूरत नहीं पड़ती. माधव-आनंदी-शंकर के आपसी रिश्तों में शब्दों के लिए जगह ही नहीं है, न ही उसकी कोई कमी ही महसूस होती है. हाँ, एक त्रयम्बक (चितरंजन गिरि) ही उनका नज़दीकी है, जिसका शब्दों से लेना-देना है, वो भी थोड़ा-बहुत ही. त्रयम्बक हकलाता है. ऐसे में, एक दिन शंकर को जन्म देने वाली माँ पल्लवी (स्पृहा जोशी) अपने पति के साथ शंकर पर अपना खोया हुआ हक़ जमाने आ पहुँचती है. कोर्ट में माधव और आनंदी की परवरिश पर उंगलियाँ उठाईं जा रही हैं. शंकर का भविष्य दांव पर है. अगली सुनवाई में अभी 22 दिन बाकी हैं, और अगर इस बीच माधव शंकर को बोलना सीखा देता है तो शंकर पर उसके दावेदारी की कुछ उम्मीद बन सकती है.

‘बाबा पिताओं के लगातार संघर्ष की कहानी है. वो पिता, जो अपने बच्चे की भलाई के लिए दिन-रात लगा रहे और माथे पर शिकन भी न आने दे. दीपक डोबरियाल के सजीव अभिनय में माधव फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष बनकर उभरता है. माधव को तमाम नाउम्मीदी और कठिनाइयों के बीच भी आप कभी रोते हुए नहीं पायेंगे, हालाँकि उसका गुस्सा, उसकी खीझ जरूर आपको बीच बीच में कोंचती रहेगी- कभी भगवान की मूर्ति के आगे सवाल करते हुए, तो कभी जज साब के फैसले से नाराजगी जताते हुए. रेडियो खरीदने से लेकर रोज़ाना 50 रूपये में रटंत तोते वाले को घर पर रखने और गाँव की दुकान पर लड़की के मेकअप में पुतला बनकर दिन भर खड़ा रहने तक, माधव शंकर को बोलना सिखाने के लिए जान लगा देता है, और उस माधव को परदे पर जिंदा करने के लिए दीपक अभिनय में अपनी. दीपक अब तक की फिल्मों में अपने ‘वन-लाइनर्स’ के साथ आपको गुदगुदाते रहे हैं, ‘बाबा उनके लिए और उनके चाहने वालों के लिए आसान किरदार नहीं है. बहुत मुमकिन है कि इसके बाद आप दीपक को इसी रूप में देखने की चाह रखने लगें.

नंदिता पाटकर अपनी अदाकारी में हर वो तेवर इस्तेमाल करती हैं, जिसकी कमी आपको दीपक के अभिनय में दिखती है. आनंदी माधव की तरह अपने आपको बाँध के नहीं रखती. उसके ज़ज्बात ज्यादा मुखर होके उभरते हैं, शायद इसीलिए उसके साथ जुड़ना आसान लगता है. आर्यन की कास्टिंग फिल्म के लिए वरदान की तरह है. आर्यन की मासूमियत और शरारतें कहीं से भी बनावटी या अभ्यास की हुई नहीं लगतीं. कोर्ट के एक दृश्य में वो उबासियाँ ले रहा है. सिग्नल न मिलने के कारण पूरे दिन में उसने रेडियो से सिर्फ खरखराहट की आवाज़ ही सीखी है. उसी की नक़ल उतार रहा है. हाँ, स्पृहा और अभिजीत का चुनाव फिल्म के खराब पहलुओं में जरूर शामिल है. दोनों के अभिनय बेहद नपे-तुले और औसत दर्जे के नज़र आते हैं, तब जबकि दीपक और नंदिता दूसरी तरफ बिलकुल सहज हों. उनके फ्रेम में आते ही फिल्म अपनी नैसर्गिक ख़ूबसूरती से हटकर बनावटी साज़-सजावट वाली दुनिया में चली जाती है. सरकारी वकील की भूमिका में जयंत गडेकर हंसाने-गुदगुदाने में कामयाब रहते हैं. गिरि बेहतरीन है.

पहली ही फिल्म होने के बावज़ूद, ‘बाबा में राज आर गुप्ता अपनी पकड़ कहीं भी कमज़ोर नहीं पड़ने देते. फिल्म में ऐसे दृश्यों की भरमार है, जहां फिल्म में वक़्त और जगह को कैद करने में छोटी-छोटी डीटेल्स का पूरा ध्यान रखा गया है. फिल्म 90 के दशक में है. घर में डालडा घी का डब्बा पड़ा है. पुलिस स्टेशन में पुराने प्रधानमंत्री वीपी सिंह का फोटो हटाकर नए प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की तस्वीर लगाई जा रही है. एक अन्य बेहद प्रशंसनीय दृश्य में रेडियो पर उन्हीं का भाषण चल रहा है, जब कुछ बच्चे रेडियो चुराकर भाग रहे हैं. शंकर अपने पिता के साथ लौट रहा है- चार्ली चैपलिन की फिल्म ‘द किड देख कर. ‘बाबा की कहानी ‘द किड के कथानक से मेल खाती है. फिल्म में गानों का इस्तेमाल में बेहद कंजूसी और जरूरत के हिसाब से ही है. हालाँकि फिल्म अपने कुछ हिस्सों में बहुत धीमी पड़ने लगती है, लम्बी लगने लगती है, कुछ में बार-बार अपने आप को दोहराती भी है. सवालों की एक खेप भी खड़ी होती है, जैसे शंकर स्कूल क्यूँ नहीं जाता? पर ज़ज्बातों के बहाव में सब पीछे छूट जाते हैं.  

आखिर में, ‘बाबा’ मराठी फिल्मों के उस प्रयोग का हिस्सा है, जहां सीधी-साधी दिल छू लेने वाली कहानी के साथ-साथ आपको क्वालिटी सिनेमा का पुट भी ख़ूब मिलता है. चाहे वो खूबसूरत सिनेमेटोग्राफी से हो, या फिर दमदार अभिनय से. वैसे तो ‘बाबा सिर्फ और सिर्फ दीपक डोबरियाल को खुले दिल से सराहे जाने के लिए भी देखी जा सकती है, पर आप देखिये क्यूंकि कुछ कहानियाँ ज़ज्बाती तौर पर आपको द्रवित करने में कभी पुरानी नहीं होतीं. [3.5/5]              

Friday, 30 March 2018

बाग़ी 2: एक्शन तो है, पर एक्टिंग? लॉजिक? सिनेमा? [1/5]

‘बाग़ी 2’ देखना ढाई घंटे ज़िम में बिताने जितना ही तकलीफ़देह है. फायदेमंद इसलिए नहीं बोलूँगा क्यूंकि आप खुद कोई कसरत, कोई मेहनत नहीं कर रहे और बैठे-बैठे सिर्फ कुछ मुस्टंडों, कुछ बॉडी बिल्डर्स (और एक नाम भर के टाइगर) को गुर्राते, गरजते और चीखते-चिल्लाते हुए ऐसा करते देख रहे हैं. अब आप कितनी देर तक इन्हें निहार सकते हैं, आपकी अपनी बौद्धिक क्षमता, सहनशीलता और आपकी अपनी दिलचस्पी पर निर्भर करता है. और अगर आप ज़िम के साथ फिल्म की मेरी इस समानता को सही-सही समझ पायें, तो फिल्म और फिल्म के किरदारों से किस तरह की और कितनी उम्मीद करनी है, आपके लिए बेहद आसान हो सकता है. अपने मुख्य किरदार को परदे पर पेश करने के लिए फिल्म कश्मीर के हालिया ‘जीप के आगे पत्थरबाज़ को बाँध के घुमाने’ वाली घटना का ना सिर्फ सहारा लेती है, बल्कि उसे बड़ी बेशर्मी से उचित ठहराने का भी पूरा स्वांग रच देती है.

नायक नायक है और ऊपर से भारतीय फौज़ का सिपाही, इसलिए उसकी देशभक्ति बार-बार परदे पर कुछ इस तरह ज़ाहिर की जाती है, जैसे आप बीमार हों और देशभक्ति का ये इंजेक्शन ही आपको बचा सकता है. वरना कौन सवाल करे, जब एक फौज़ी पूरे के पूरे पुलिस स्टेशन को ही नाकारा घोषित कर के हवलदार से लेकर थानेदार तक सबकी मरम्मत कर रहा हो. आप को तो सिर्फ उसके चेहरे पर सेना का मुखौटा और उसकी लात से टूटते हुए टेबल से गिरते हुए तिरंगे को स्लो-मोशन में बचाना ही दिख रहा है. कानून का टूटना और संविधान का गिरना तो आप देख ही नहीं पाए. खैर, ये तो नींव रखने वाली बात है. दरअसल आपको तैयार किया जा रहा है, फिल्म के आखिरी क्षणों में सवाल न पूछ कर चुपचाप नायक के शानदार दिखने वाले वाहियात स्टंट्स पर मंत्रमुग्ध होने के लिए. सवाल पूछने का हक अब आप खो चुके हैं. ‘तब कहाँ थे?’ वाले झांसे में फँस चुके हैं.

‘बाग़ी 2’ में कहानी किसकी है? पता नहीं चलता (या शायद मैंने ही मिस कर दिया हो), पर ‘स्टोरी अडॉप्टेशन’ का श्रेय लेने में फिल्म के निर्माता साजिद नाडियादवाला कोई झिझक नहीं दिखाते. फिल्म पूरी तरह तेलुगु फ़िल्म ‘क्षणम’ से ली हुई है. ली हुई इसलिए क्यूंकि इसके ‘ऑफिशियल रीमेक’ होने का ज़िक्र अभी तक कम से कम मैंने तो कहीं किसी से नहीं सुना. बॉर्डर पर लड़ रहे रणवीर प्रताप सिंह उर्फ़ रॉनी (टाइगर श्रॉफ) को 4 साल बाद उसकी एक्स-गर्लफ्रेंड नेहा (दिशा पटनी) का फ़ोन आता है. उसकी बेटी रिया 2 महीने से अगवा है. रॉनी उसकी मदद के लिए गोवा की स्थानीय पुलिस से लेकर वहाँ के ड्रग-माफिया से अकेला लड़ रहा है. हालाँकि पत्थरबाज़ को जीप से बाँधने से ज्यादा उसके खोजी या जासूसी दिमाग की कोई उपलब्धि आपने देखी नहीं है, फिर भी गोवा आते ही वो अपने आप सबूतों, गवाहों और संदिग्धों तक बड़ी आसानी से पहुँच जाता है.

फिल्म के बारे में बात करते हुए, मैं चाहूं तो टाइगर और दिशा को बड़ी आसानी से नज़रन्दाज़ कर सकता हूँ, और आपको उनकी कमी भी नहीं खलेगी. जहां ग्रैंडमास्टर शिफूजी जैसा स्व-घोषित देशभक्त अपनी बनावटी अकड़ को ही परदे पर बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने में लगा रहता है, दीपक डोबरियाल और मनोज बाजपेयी जैसे उम्दा कलाकार भी जाने किस बेहोशी की हालत में अपने किरदार निभाते दिखते हैं. (स्पॉइलर अलर्ट) फिल्म के आखिरी दृश्य में टाइगर का किरदार मनोज के किरदार को लात चला-चला कर मार रहा होता है, फिल्म की वाहियात दलीलों और बेकार की अदाकारी से, इस वक़्त तक मेरा दिमाग सुन्न और शरीर जकड चुका होता है, वरना उठ कर थिएटर छोड़ने के लिए अब और किसी वजह की जरूरत नहीं बचती थी. रणदीप हुडा जरूर मनोरंजन की थोड़ी उम्मीद बचाए रखते हैं, और अभिनय में वही सबसे कम निराश करते हैं.

आखिर में; बेहद जरूरी है कि फिल्म देखते वक़्त आप सवाल करें. खुद से भी, और फिल्म से भी. देश के राजनीतिक हालात और हिंदी सिनेमा के गिरते स्तर में ज्यादा फर्क बचा नहीं है. तो टाइगर जब भी किसी का कॉलर पकड़ के चीखे, “रिया कहाँ है?”, आप भी पूछिए. “पांचवी फिल्म है. एक्टिंग कहाँ है?. निर्देशक अहमद खान जब गोवा के जंगलों में वियतनाम वॉर छेड़ दें, तो पूछिए, “एक्शन तो ठीक है, लॉजिक कहाँ है?’. अभी पूछिए. कहीं नौबत ना आ जाये, जब पूछना पड़े, “सिनेमा कहाँ है?’. [1/5]

Tuesday, 26 December 2017

अदाकार, जो किरदार बन गए...(2017's 10 Best Performances)


राजकुमार राव, ट्रैप्ड में
झल्लाहट हो, डर हो, खीझ हो, विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की जिद हो या फिर नाउम्मीदी में टूट कर बिखरने और फिर खुद को समेट कर उठ खड़े होने का दम; राव अविश्वसनीय तरीके से पूरी फिल्म को अपने मज़बूत कंधे पर ढोते रहते हैं. फिल्म की दमदार कहानी, अपने सामान्य से दिखने वाले डील-डौल की वजह से राव पर हमेशा हावी दिखाई देती है, जिससे दर्शकों के मन में राव के किरदार के प्रति सहानुभूति का एक भाव लगातार बना रहता है, पर धीरे-धीरे जब राव अपने ताव बदलते हैं, फिल्म उनकी अभिनय-क्षमता के आगे दबती और झुकती चली जाती है.

रणबीर कपूर, जग्गा जासूस में 
'जग्गा जासूस' बिना शक रणबीर कपूर की सबसे मजेदार, मनोरंजक और बढ़िया अदाकारी वाली फिल्मों में शामिल होती है. गिनती में 'बर्फी' और 'रॉकस्टार' के ठीक बाद. हालाँकि उनके किरदार में एक वक़्त बाद एकरसता आने लगती है, पर परदे पर उनका करिश्मा तनिक भी कम नहीं पड़ता.

स्वरा भास्कर, अनारकली ऑफ़ आरा में
अनारकली ऑफ़ आरा’ में स्वरा भास्कर एक ज्वालामुखी की तरह परदे पर फटती हैं. अपने किरदार में जिस तरह की आग और जिस तरीके की बेपरवाही वो शामिल करती हैं, उसे देखकर आप उनके मुरीद हुए बिना रह नहीं सकते. ये उनका तेज़-तर्रार अभिनय ही है, जो इस फिल्म के ‘साल के सबसे पावरफुल क्लाइमेक्स’ में आपके रोंगटे खड़े कर देता है. अनारकली का ‘तांडव’, अभिनेत्री के तौर पर स्वरा भास्कर का ‘तांडव’ है. इसके बाद अब शायद ही आप उनके अभिनय-कौशल को शक की नज़र से देखने की भूल करें!

पंकज त्रिपाठी, न्यूटन में
आत्मा सिंह जब बन्दूक न्यूटन के हाथ में थमा कर कहता है, 'ये देश का भार है, और हमारे कंधे पर है'; या फिर जब विदेशी रिपोर्टर पूछती है, 'चुनाव सुचारू रूप से चलाने के लिए आपको क्या चाहिए?" और उसका जवाब होता है, "मोर वेपन (और हथियार)!"; वो आपको खलनायक नहीं लगता, बल्कि आपको उसकी हालत और उसके हालात पर दया ज्यादा आती है. वो भी उसी सिस्टम का मारा है, और महंगा जैतून का तेल खरीदते वक़्त उसके माथे पर भी शिकन आती है.

संजय मिश्रा, कड़वी हवा में 
सूखे, बंजर और रेतीले ज़मीनी समन्दर में लाठी टेकते-टेकते भटकते हुए बूढ़े बाबा के किरदार में संजय मिश्रा बहुत कम बोलते हैं, और सिर्फ जरूरत का ही बोलते हैं, पर उनके अन्दर की कराह, बदलते मौसम और कर्जे में डूबे परिवार की परवाह आपको हर वक़्त, हर फ्रेम में सुनाई देती है. बाप-बेटे में बातचीत नहीं होती, ऐसे में एक दिन बेटा बाबा को घर से बिना बताये बाहर जाने के लिए डांटता है, और बाप सिर्फ इतने से खुश कि इसी बहाने आज मुकुंद ने उनसे बात तो की. संजय मिश्रा इस भूमिका को कुछ इस हद तक परदे पर जीवंत रखते हैं कि आप सोचने पर मजबूर हो जाते हैं, आखिरकार एक नेत्रहीन किरदार के रूप में इतना सजीव अभिनय आपने आखिरी बार किसका, कब और कहाँ देखा था? 

दीपक डोबरियाल, हिंदी मीडियम में
दीपक का अभिनय फिल्म में उस ठहराव की कमी पूरी करता है, जो आम तौर पर इरफ़ान से उनकी किसी भी फिल्म में किया जाता है. राज और मीता के मीठे मनोरंजक पलों के बीच सच्चाई का एक बेहद जरूरी व्यंग्यात्मक कसैलापन दीपक ही ले आ पाते हैं. दीपक उन दृश्यों में भी कहीं से कमजोर दिखाई नहीं पड़ते, जिनमें इरफ़ान भी मौजूद हों, और अभिनय में ये रुतबा बहुत कम अदाकारों को ही नसीब है.

विद्या बालन, तुम्हारी सुलू में
'तुम्हारी सुलू' जैसे विद्या बालन के लिए ही बनी हो, बनाई गयी हो. सुलू और विद्या एक पल को भी कभी एक-दूसरे से अलग दिखाई नहीं देते. फिल्म में ऐसे ढेरों दृश्य हैं, जहां आप सुलू की कसक, सुलू की चहक, सुलू की चमक और सुलू के किरदार में विद्या के सरल, सहज, सफल अभिनय के लिए बीच फिल्म में खड़े होकर तालियाँ पीटना चाहते हैं. 

मेहर विज, सीक्रेट सुपरस्टार में
फिल्म भले ही छोटी आँखों वाली इन्सिया के बड़े सपनों की हो, एक किरदार जो उसके साथ-साथ बड़ी मजबूती से उभर कर सामने आता है, वो है नज़मा का. नज़मा के किरदार में मेहर बड़ी आसानी से घुल-मिल जाती हैं. एक समझदार, ज़ज्बाती, सुकून भरी माँ, पति के गरम मिजाज़ सहती-दबती बीवी और इन दोनों के बीच अपनी छोटी-छोटी खुशियों के पल चुराती एक आम सी लगने वाली औरत के किरदार में मेहर का अभिनय कहीं से भी आम नहीं है.  

ललित बहल, मुक्ति-भवन में
ललित बहल के अभिनय में ठहराव फिल्म की रफ़्तार से पूरी तरह कदम मिला कर चलती है. मौत के इंतज़ार में लेटे-लेटे भजन-मंडली से 'सुर में गाने' की फरमाईश हो, या बार-बार अपने सपने को तसल्ली से बेटे-बहू को सुनाने-समझाने की ललक और सनक; ललित अपने अभिनय से हंसाते भी हैं तो एक सूनेपन के साथ. ऐसा सूनापन जो आपको दिनों तक कचोटता रहेगा.  

श्रीदेवी, मॉम में 
'मॉम' श्रीदेवी की 300वीं फिल्म है, और उन्हें परदे पर अदाकारी करते देख लगता है कि जैसे उनके लिए 'कट' की आवाज़ का कोई मतलब ही नहीं. एक बार जो किरदार में उतरीं, तो उसे किनारे तक छोड़ आने से पहले कोई 'कट' नहीं. फिल्म में ऐसे दसियों दृश्य हैं, जिनमें श्री जी को देखते-देखते आप किरदार याद रखते हैं, अदाकारी याद रखते हैं, फिल्म भूल जाते हैं. 

Friday, 15 September 2017

लखनऊ सेन्ट्रल: फर्ज़ी जेल, फ़िल्मी बैंड! [2/5]

फ़रहान अख्तर फिल्म में हों, और आपको मज़ा दो-चार दृश्यों में ही दिखने वाले रवि किशन से मिलता हो, तो आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि रंजीत तिवारी की 'लखनऊ सेंट्रल' कितनी अच्छी या बुरी हो सकती है? यशराज फ़िल्म्स की हालिया रिलीज़ हुई फिल्म 'कैदी बैंड' से हद मिलती-जुलती कहानी पर बनी 'लखनऊ सेंट्रल' अपने मुख्य कलाकार की कमज़ोर अदाकारी और परदे पर नाकामयाब किरदार को कुछ काबिल सह-कलाकारों के बेहतरीन अभिनय से ढकने, छुपाने की कोशिश तो भरपूर करती है, पर कितनी देर? 

उत्तर प्रदेश के गंवई गायक किशन गिरहोत्रा की भूमिका में फ़रहान की स्टाइलिंग इतनी बनावटी और चिकनी-चुपड़ी है, जैसे तेल में चुपड़े उनके बाल, जैसे उनके गले में पूरे तमीज से तह किया हुआ मफलर. निश्चित तौर पर उनकी कास्टिंग फिल्म का सबसे कमज़ोर पक्ष है, हालाँकि फर्जीवाड़ा यहीं तक नहीं रुका है. मुंबई फिल्मसिटी में बने लखनऊ के सेंट्रल जेल का सेट पहाड़ों से घिरा है, और न तो कैमरा इसे परदे पर दिखाने से कोई परहेज़ करता है, न ही निर्देशक रंजीत तिवारी को इस मामूली सी गलती से फिल्म की साख पर लगने वाली बड़ी चोट का अंदाज़ा होता है. गनीमत है, फिल्म में राजेश शर्मा, इनामुलहक, मानव विज और दीपक डोबरियाल जैसे कुछ छोटे ही सही, पर मज़बूत कंधे तो हैं.

किशन (फ़रहान अख्तर) का सपना है मशहूर गायक बनने का, पर एक दिन एक झड़प के बाद उसे आईएएस अफसर की हत्या के झूठे इलज़ाम में उम्रकैद सुना दी जाती है. उसके मुरझाते सपने को थोड़ी हवा तब लगती है, जब युवा मुख्यमंत्री (रवि किशन) के आदेश पर जेल में 15 अगस्त जलसे के लिए कैदियों का बैंड बनाने की मुहिम शुरू होती है. खुद का बैंड जहां एक तरफ उसके सपनों को उड़ान दे सकता है, उसे नाम, मुकाम और पहचान दे सकता है, दूसरी तरफ बैंड की आड़ में जेल से भाग कर आज़ादी का स्वाद चखने का मौका भरपूर है. हालाँकि जेलर (रोनित रॉय) के रहते ऐसा सोचना भी खतरे की घंटी है. 

'कैदी बैंड' जहां इसी कहानी को बेहतर, पर चमकदार प्रोडक्शन डिज़ाईन के जरिये परदे पर बयाँ करती है, 'लखनऊ सेंट्रल' अपने लुक में थोड़ा तो खुरदुरापन, कालिख़ और मटमैलापन लाकर विश्वसनीयता के पैमाने पर ज्यादा अंक बटोर जाती है. हालाँकि रंजीत तिवारी की इस तरह की हॉलीवुड फिल्मों में दिलचस्पी साफ़ दिख जाती है, जब भी वो जेल में इस्तेमाल होने वाले तरीकों, चालाकियों और रणनीति की बात करते हैं. जहां फ़रहान और डायना पेंटी अपनी पूरी कोशिशों के बावजूद अभिनय के सुर लगाने में कमज़ोर दिखते हैं, वहीँ उनके साथी कलाकारों की भूमिकाओं में राजेश शर्मा, इनामुलहक, मानव विज और दीपक डोबरियाल बेहतरीन हैं. रवि किशन बेहद सटीक हैं. इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस और ट्रैफिक पुलिस की वर्दी का रंग एक होने पर उनका कटाक्ष फिल्म में कई बार दोहराया जाता है, पर हर बार उतना ही मजेदार लगता है. 

आखिर में, 'लखनऊ सेंट्रल' अपने कुछ गिनती के हिस्सों के रोमांच और कुछ सह-कलाकारों के अभिनय के आगे या पीछे और कुछ नहीं है. बचकानी 'कैदी बैंड' से हाथ लगी निराशा ने इस फिल्म से उम्मीदें काफी बढ़ा दी थीं, पर अफ़सोस! फिल्म के खाते में 'उतनी भी बुरी नहीं है' से ज्यादा तारीफ़ नसीब नहीं होती. असली जेलों के असली बैंडों की तुलना में ये फ़िल्मी बैंड 'बैन'ड' कर दिये जाएँ तो ही अच्छा!! [2/5] 

Friday, 19 May 2017

हिंदी मीडियम: ‘क्लास’ की क्लास, और क्लास की एक्टिंग! [3.5/5]

बच्चों की पढ़ाई-लिखाई को लेकर आजकल माँ-बाप कुछ ख़ासा ही जागरूक हो गए हैं. जिंदगी एक दौड़ है, और इस दौड़ में पीछे रह जाने वालों के लिए कोई जगह नहीं, इस पागलपन को सर पे लादे बेचारे माँ-बाप बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए क्या-क्या कर गुजरने का जोखिम नहीं उठाते, पर ध्यान से देखें तो इतनी भी बेचारगी नहीं है. खेल सब किया कराया है, उस एक छोटी समझ का, जिसके हिसाब से बच्चों की कामयाबी का सारा दारोमदार फर्राटेदार इंग्लिश बोलने की चाहत से शुरू होकर शहर के सबसे बड़े, सबसे महंगे स्कूल में एडमिशन मिल जाने तक ही सीमित है. इक जद्दो-जेहद समाज के ऊँचे तबके तक पहुँचने की. साकेत चौधरी की ‘हिंदी मीडियम’ माँ-बाप के उसी अँधाधुंध भाग-दौड़ को बड़े मनोरंजक तरीके से आपके सामने रखती है.

राज बत्रा (इरफ़ान खान) चांदनी चौक में कपड़ों की दुकान चलाता है. रहने-खाने की कोई कमी नहीं है, पर उसकी बीवी मीता (सबा क़मर) का सारा ध्यान बस इसी एक कोशिश में रहता है कि उनकी बेटी पिया का एडमिशन कैसे भी दिल्ली के सबसे महंगे स्कूल में हो जाये. इसके लिए जरूरी है कि माँ-बाप न सिर्फ अमीर हों, अमीर दिखें और लगें भी. शुरुआत हो चुकी है, राज को अपने चांदनी चौक की गलियाँ छोड़कर वसंत विहार जैसे पॉश इलाके में घर लेना पड़ेगा. उसके बाद ‘द सूरी’ज़’, ‘द मल्होत्रा’ज़’ जैसे अमीरों से मेल-जोल बढ़ाना, ताकि पिया को अच्छी संगत मिले, और फिर स्कूल के इंटरव्यू की तैय्यारी. इंग्लिश में तंग हाथ लिए बिचारे राज के लिए तो जान पर बन आई है, पर मीता हार नहीं मानने वाली. बड़ी उलट-फेर तब होती है, जब इतनी जद्द-ओ-जेहद के बाद भी पिया का एडमिशन नहीं होता, और अब बस एक ही रास्ता बचा है. स्कूलों में ‘राईट टू एजुकेशन’ एक्ट के तहत मिलने वाले गरीबी कोटा में गरीब बनकर अप्लाई करना.

साकेत चौधरी बढ़ा-चढ़ाकर ही सही, पर आजकल के शिक्षा-जगत में फैली दुर्व्यवस्था पर हर तरीके और हर तरफ से व्यंग्यात्मक प्रहार करते हैं. मीता का इंग्लिश मीडियम स्कूलों को लेकर हद दर्जे का पागलपन अगर कई बार आपको झकझोरता है, तो कई बार झुंझलाहट भी पैदा करता है. फिल्म की शुरुआत में जब साकेत जवानी की दहलीज़ पर कदम रख रहे राज और मीता की लव-स्टोरी दिखाने का तय करते हैं, उसकी जरूरत आपको आगे चल कर समझ आती है. जिंदगी से राज और मीता दोनों की अपेक्षाएं, उम्मीदें और ख्वाहिशें हमेशा एक-दूसरे से जुदा रही हैं. जहाँ ‘एलिट’ बनने की चाह मीता की आँखों में चमक ले आती है, वहीँ राज के लिए अच्छा पति, अच्छा पिता बने रहना ज्यादा मायने रखता है.

फिल्म की कहानी में ठहराव और उबाल दोनों एक साथ तब आते हैं, जब परदे पर आपकी जान-पहचान श्याम (दीपक डोबरियाल) और उसकी बीवी (स्वाति दास) के किरदार से कराया जाता है. अपने बेटे के भविष्य के लिए उसकी पढ़ाई-लिखाई के प्रति जागरूक एक माँ-बाप ये भी हैं, जो गरीबी की मार सहते हुए भी कोशिश करने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते. जहां एक की बुनियाद में झूठी चमक-दमक है, इन माँ-बाप की जिद और धुन ईमानदारी की कसौटी पर पक्की और सच्ची है. हालाँकि अंत तक आते-आते, साकेत थोड़े तो नाटकीय होने लगते हैं, पर कमोबेश गुदगुदाते रहने की उनकी आदत पूरी फिल्म में एक सी ही रहती है. चूकते वो सिर्फ एक जगह हैं, जहां बात एक ही तराजू से सभी अमीरों और गरीबों को तोलने की आती है. सारे के सारे अमीर मुंहफट, बदतमीज़, सारे के सारे गरीब हमदर्द, मददगार.

इरफान खान घर की दाल जितने जाने-पहचाने हो गए हैं अब. रोज मिलते रहें, तब भी आपको कोई कोफ़्त नहीं होगी, कोई शिकायत नहीं होगी. हाँ, अगर ज्यादा दिन तक न मिलें, तब तरसना बनता है. कपड़े की दुकान पर जिस तरह ग्राहकों से पेश आते हैं, या फिर अमीर-गरीब बनने के खेल के बीच जिस तरह झूलते दिखाई देते हैं, उनका हर एक्ट तीर की तरह वही लगता है, जहाँ के लिए निशाना लगाया गया था. फिल्म खुद बहुत ज्यादा संजीदा होने से बचती है, तो आप भी इरफ़ान से मनोरंजन की ही उम्मीद लगाईये, निराश नहीं होंगे. सबा अपने किरदार से आपको जोड़े रखने में कामयाब रहती हैं, पर दीपक और स्वाति जिस दर्जे का अभिनय पेश करते हैं, आप उन्हें भूलने नहीं पाते. स्वाति अगर अपनी मौजूदगी मात्र से ही आपका ध्यान लगातार अपनी ओर खींचती रहती हैं, तो दीपक कुछ ख़ास पलों में बड़ी आसानी से आपकी आँखें नम कर जाते हैं. दीपक उन दृश्यों में भी कमजोर दिखाई नहीं पड़ते, जिनमें इरफ़ान भी मौजूद हों, और अभिनय में ये रुतबा बहुत कम अदाकारों को नसीब है.

आखिर में; ‘हिंदी मीडियम’ एक ऐसी जरूरी फिल्म है, जो भारत के अपर मिडिल-क्लास की खोखली महत्वाकांक्षाओं पर हंसती भी है, हंसाती भी है. वो जिनके घरों में रैपिडेक्स इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स की किताब शीशे की आलमारियों से मुंह निकाल कर झांकती हैं, और जयशंकर प्रसाद, मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ कहीं नीचे, पीछे दबी-दबी धूल फांकती हैं. देखिये, और हंसिये थोड़ा अपने आप पर भी! [3.5/5]    

Friday, 22 May 2015

TANU WEDS MANU RETURNS: Just for Laughs…and the ‘QUEEN’! [3.5/5]

A hushed & muted father in 40 years of marriage [K K Raina] is comforting his son [Madhavan] who’s on the edge of making the hardest decision to get out of his dysfunctional marriage; and you can clearly eavesdrop on the mother complaining hysterically about this late night discussion. Towards the end of the conversation, the agitated father gets up, picks up a floor-wiper and breaks the only lit tube light in the house. The marriages anywhere on earth can bring the same effect on any one who claims to be sane. But then, there is always a way to escape the complications. Paying no attention and enjoying your regular spell of drinking could be one, as suggested by the father in the film but divorce is just not so done. How can we not have Tanu and Manu in same frame if the film has already pictured them as a couple? We dare not.

Despite managing a wonderful plot for a sequel, TANU WEDS MANU RETURNS prefers to join the successful league of highly entertaining bollywood films that might go for a clumsy climax and a fake happy-ending just for the sake of audience’s approval. The best part is you have a pool of talents and the powerhouse herself at your side, Kangana Ranaut if you want to play straight; so definitely no one is gonna raise his eyebrows over this preferred choice of not going bold but staying regular.

Four years is a term looking too much to be in marriage for the temperamental Tanu [Kangana] and maddened Manu [Madhavan]. Their latest verbal spat has landed Manu in mental asylum and Tanu in killing loneliness. She returns to her zone, of ex-boyfriends, fewer limitations and an all flying high life with no strings attached. Manu meets a mirror image of Tanu and falls in love instantly. This new entrance [the overpowering double role of Kangana] is a Haryanvi athlete- a lot rough in her vocals but much more susceptible and sensitive within. Meanwhile, returns Pappi [Deepak Dobriyal]- the uproarious friend who never runs out of droll one-liners. Then, there is Raja Awasthy [Jimmy Shergil] adding the drama led by power, passion and attitude. Zeeshan Ayyub plays your regular mean and tricky one-sided lover who considers himself belonging to a certain ‘kandha’ type men known for offering their shoulders to broken girls to cry at.

TANU WEDS MANU RETURNS takes off from the base of its prequel and lands up in the territory of ‘RAANJHNAA’. Aanand L Rai being the powering team-lead and Himanshu Sharma the delectable writing force, it doesn’t fail as an experiment. Film guarantees uncontainable laughs especially in the first half before the ineptness in the screenplay starts bothering you soon. Be it the wedding-scene where Pappi kidnaps his ‘whats app’ female friend to marry just because she would reply on his even lamest jokes with ‘LOL’ text messages or where Swara Bhaskar sounds like she had done anything unethical in going medical way to conceive a child without telling her husband; the second half eventually becomes the rush-rush, hush-hush mission to meet the forged happy ending. When would we stop pretending that marriages are not done until the very last ‘phera’? When would we stop taking our climaxes to the ‘mundup’ at the very final moments?

Anyways, keeping my issues aside; it’s a film that establishes Kangana’s success in QUEEN wasn’t a fluke. She surfaces as a towering performer in both her roles. No matter what get up, what accent she’s into; Kangana is there to spellbind you. Her flawless performance gives you goose bump moments we rarely experience or expect from Bollywood films. Madhavan is equally competent. His charms never fade. His kind, compassionate and fragile Manu makes his own place in your hearts. The casting is superbly accomplished.

Overall, TANU WEDS MANU RETURNS is a film made for laughs! Frequent laughs! Fabulous laughs!! If only Aanand L Rai had not been so conservative about divorces, film would have been blessed with a much appreciative climax. Watch out for the ‘Queen’ whose vivacious presence alone makes every penny of yours a ‘worth it’ investment to gain super-sized entertainment! [3.5/5]