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Friday, 29 June 2018

संजू: दत्त, रनबीर, हिरानी...मनोरंजन सब पर भारी! [3.5/5]


क्या कोई भी 3 घंटे की फिल्म या 400 पन्नों की किताब किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति या उसके व्यक्तित्व के बारे में आपकी राय बदलने में कामयाब हो सकती है? नहीं. भले ही वो फिल्म राजकुमार हिरानी जैसे चहेते फ़िल्मकार ने ही क्यूँ न बनायी हो. क्या राजकुमार हिरानी ने संजू के साथ संजय दत्त की छवि सुधारने की ऐसी कोई कोशिश की है? मुझे नहीं लगता. संजय दत्त जैसे सनसनीखेज जिंदगी जीने वाले मशहूर शख्सियत से जुड़ा हर पहलू जानने-समझने-टटोलने के लिए संजू कम पड़ जाती है. तय वक़्त के कथानक में पिरोने के लिए घटनाओं के अपने चुनाव में भी, और मनोरंजन को मद्देनजर रख कर उन घटनाओं के इर्द-गिर्द अतिरंजित भावनाओं का जाल बुनने में भी. जाल शब्द का इस्तेमाल बहुत सोच समझकर कर रहा हूँ. अभिजात जोशी के साथ मिलकर हिरानी स्क्रिप्ट लिखते वक़्त ‘LCD’ फ़ॉर्मूले को ध्यान में रखते हैं, यानी कागज़ पर लिखे जिस दृश्य में LAUGHTER, CRY या DRAMA नहीं, उसका फिल्म में बने रहना जरूरी नहीं. इस गरज़ से, संजू मनोरंजक लगने की कोशिश करते हुए ज्यादा नज़र आती है, और सिनेमाई तौर पर परिपक्व या सम्पूर्ण फिल्म होने का हक़ खोती चली जाती है.

संजय दत्त तमाम बदनामियों और अपनी बिगडैल छवि के बावजूद, दर्शकों के एक बहुत बड़े हिस्से के चहेते अभिनेता रहे हैं. उनसे जुड़े हजारों किस्सों और किंवदंतियों में उन्हें तलाशना अपने आप में किसी रहस्य से कम नहीं है. हिरानी उनकी जिंदगी को जब अपनी सीधी-सरल, पर बेहद चमकदार रंगीन दुनिया में जगह देते हैं, आपकी उम्मीद रहती है कि आप हिरानी की मदद से इस पहेली को आसानी से सुलझा पायेंगे. ऐसा नहीं होता. कम से कम हर बार नहीं होता. संजू में बहुत सारा कुछ ऐसा है, जो आपको असलियत से परे लगता है. अक्सर क्या ऐसा हुआ था?’ से कहीं आगे बढ़कर आप अरे, ऐसा थोड़े ही हुआ होगा की तरफ पहुँचने लगते हैं. और उसकी वजह शायद हर बार हिरानी साब का मनोरंजन को लेकर अपना एक ख़ास नजरिया और तय रवैया ही है. 4 सफल फिल्मों के बाद, अब दर्शक के तौर पर आपको भी उनके दांव-पेंच समझ आने लग गये हैं. चौंकाने के लिए अब हिरानी साब के तरकश में कम ही तीर बचे हैं. हालाँकि अभी भी आप और हम उनसे उबेंगे नहीं, पर बासीपने के हलकी गंध आने लग पड़ी है.

संजू का पहला हिस्सा संजय दत्त (रनबीर कपूर) और ड्रग्स के साथ उनकी उठा-पटक के नाम रहता है. इस दौरान, कथानक में माँ नर्गिस जी (मनीषा कोईराला) की बीमारी, उनकी असामयिक मृत्यु, बेटे को ड्रग्स के दलदल से निकालने में पिता सुनील दत्त (परेश रावल) की नाकाम कोशिशों और संजय की ख़ुद से ही लड़ाई को अहमियत मिलती है. हलके-फुल्के पलों और एक-दो इमोशनल दृश्यों के अलावा, इस हिस्से में अगर कुछ आपको बहुत बांधे रखता है, तो वो है संजय के दोस्त कमलेश (विक्की कौशल) का किरदार. परदे पर विक्की के आते ही जैसे कोई तूफ़ान सा उठने लगता है. इस किरदार के बारे में आपको शायद ही पहले से कुछ पता रहा हो. संजय के साथ कमलेश की दोस्ती के पल हों, या इंटरवल से ठीक पहले कमलेश का एक सनसनीखेज खुलासा; इस एक किरदार के साथ आप हमेशा उत्सुक और उत्साहित रहते हैं. यही एक किरदार है, जो संजय के साथ-साथ रहते हुए कहानी में एक अलग तरह की निरपेक्षता और सकारात्मकता लेकर आता है. यहाँ तक कि पहली मुलाक़ात में ही संजय को दो-टूक सुनाने की हिम्मत दिखा देता है.  

संजय दत्त के अंडरवर्ल्ड से रिश्तों और एके-47 रायफल रखने के वाकये से होकर येरवडा जेल से छूटने तक का सफ़र फिल्म का दूसरा हिस्सा बनता है, जहां ज्यादातर कोशिशें और वक़्त मामले को लेकर संजय की सफाई के इर्द-गिर्द ही घूमता रहता है. पिछले हिस्से में जहां परदे का संजय (रनबीर) असल जिंदगी के संजय पर हर लहजे से हावी होता दिखाई दे रहा था, यहाँ तक आते-आते संजय दत्त का हालिया व्यक्तित्व आपको ज्यादा भाने लगता है. मुन्नाभाई एमबीबीएस घटने और संजू के बाबा बनने के दौर और दृश्य खासे सुहावने लगते हैं. हालाँकि हिरानी का फार्मूला अब भी आपको परेशान कर ही रहा होता है. दोस्तों के बीच गलतफहमियों से पनपी दूरियों को सुलझाने का दृश्य पीके के उस दृश्य की याद दिलाता है, जहां जग्गू और सरफ़राज़ शामिल हैं. कहानी को लम्बे-चौड़े बयानों में बोल बोल कर बताने की कला आप 3 इडियट्स में देख ही चुके हैं. यहाँ तक कि गानों में सपनीली दुनिया की सैर करते किरदारों (3 इडियट्स का ज़ुबी-ज़ुबी) का प्रयोग यहाँ भी ख़ूब (रूबी-रूबी) इस्तेमाल होता है.

अभिनय में, संजू पूरी तरह रनबीर में ढली-रची-बसी फिल्म है. सोनम कपूर के साथ बाथरूम वाला दृश्य हो, या फिर परेश रावल के साथ इमोशनल सीन्स; रनबीर संजय दत्त की तरह सिर्फ चलने, बोलने या दिखने से परे लगते हैं. परदे पर उनके होते हुए कुछ और देखने-सुनने की चाह भी नहीं रहती, हालाँकि विक्की कौशल के साथ वाले दृश्यों में उन्हें साफ़ टक्कर मिलती है. विक्की यहाँ अपने पूरे रंग में हैं. रनबीर जैसे बेहतर अभिनेता के सामने होते हुए भी उनकी अदाकारी में एक छटांक को भी बिखराव नहीं दिखता. आखिर में, संजू एक ऐसी फिल्म हैं जिसके मुख्य किरदार से आप पहले से ही वाकिफ हैं, और उसके बारे में जितना जानते हैं उतना ही और जानना चाहते हैं. इस लिहाज़ से संजू आपको छोटे-बड़े ढेर सारे मजेदार किस्से सुना डालती है. अब आपको तय करना है, हिरानी के फार्मूले में कौन कितना फिट बैठ गया था, और कौन सा बैठाया गया था? बहरहाल, मीडिया को  एकतरफ़ा ठहराने की कोशिश में फिल्म गंभीरता की ओर जरूर बढती दिखती है, पर आप इसे सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन के चश्मे से ही देखने की जेहमत उठाएं, तो बेहतर नतीजे मिलेंगे. [3.5/5]           

Thursday, 8 February 2018

पैडमैन: सामाजिक झिझक 'सोखने' वाली एक सुपर-हीरो फिल्म! [3.5/5]

तमिलनाडु के अरुणाचलम मुरुगनान्थम भारत के उन चंद 'सुपरहीरोज' में से हैं, जिन्होंने सस्ते सेनेटरी पैड बनाने और उन्हें गाँव-गाँव में महिलाओं तक पहुंचाने के अपने लगातार प्रयासों के जरिये, टेड-टॉक्स जैसे वर्चुअल प्लेटफार्म से लेकर यूनाइटेड नेशन्स जैसे विश्वस्तरीय मंच पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है. उनकी सादगी, उनके बोलने के अंदाज़, उनके खुशमिजाज़ व्यक्तित्व और समाज में बदलाव लाने की उनकी ललक, उनकी जिद, उनके संघर्षों को, आर. बाल्की की फिल्म 'पैडमैन' एक फ़िल्मी जामा पहनाकर ही सही, परदे पर बड़ी कामयाबी से सामने रखती है. ये अरुणाचलम मुरुगनान्थम की ईमानदार कहानी और उनकी मजेदार शख्सियत ही है, जो थोड़ी-बहुत कमियों के बावजूद, फिल्म और फिल्म के साथ-साथ परदे पर मुरुगनान्थम का किरदार निभा रहे अक्षय कुमार को बहुत सारी इज्ज़त उधार में दे देती है. और जिसके वो हक़दार हैं भी, आखिर हिंदी फिल्मों में कितनी बार आपने एक मुख्यधारा के बड़े नायक को कुछ मतलब की बात करते सुना है, जो उसके सिनेमाई अवतार से अलग हो, जो सामाजिक ढ़ांचे में 'अशुद्ध, अपवित्र और अछूत' माना जाता रहा हो. 

'पैडमैन' महिलाओं की जिंदगी में हर महीने आने वाले उन 5 दिनों के बारे में बात करती है, जिसे अक्सर हम घरों में देख कर भी अनदेखा कर देते हैं. महीने भर की शॉपिंग-लिस्ट तैयार करते हुए कितनी बार आपने सेनेटरी पैड्स का जिक्र किया होगा? वो काली थैली या अखबार में लपेटे हुए पैकेट्स कैसे सबकी नज़रों से नज़र चुराते हुए किसी आलमारी में ऐसे दुबक जाते हैं, जैसे सामने खुल जाएँ तो क्या क़यामत आ जाये? मध्यप्रदेश का लक्ष्मीकांत चौहान (अक्षय कुमार) अपनी पत्नी गायत्री (राधिका आप्टे) को गन्दा कपड़ा इस्तेमाल करते देखता है, तो चौंक जाता है, "मैं तो अपनी साइकिल न साफ़ करूं इससे", और पत्नी 'ये हम औरतें की दिक्कत है, आप इसमें मत पड़िये' बोल के 5 दिन के लिए बालकनी में बिस्तर लगा लेती है. गली में क्रिकेट खेल रहे लौंडे भी खूब जानते हैं, "गायत्री भाभी का (5 दिन का) टेस्ट मैच चल रहा है". 

ये भारत के उस हिस्से की बात है, जहां पहली बार 'महीना' शुरू होने पर लड़की से औरत बनने का उत्सव मनाया जाता है. रस्में होती हैं, पूजा होती है, भोज होता है, पर सोना लड़की को बरामदे में ही पड़ता है. लक्ष्मी की समझ से परे है कि थोड़ी सी रुई और जरा से कपड़े से बनी इस हलकी सी चीज का दाम 55 रूपये जितना महंगा कैसे हो सकता है? और इसी गुत्थी को सुलझा कर सस्ते सेनेटरी पैड्स बनाने की जुगत में लक्ष्मी बार-बार नाकामयाबी, डांट-फटकार, सामाजिक बहिष्कार और पारिवारिक उथल-पुथल से जूझता रहता है. तब तक, जब तक परी (सोनम कपूर) के रूप में उसे उसकी पहली ग्राहक और एक मददगार साथी नहीं मिल जाता है. 

'पैडमैन' अपने पहले हिस्से में जरूर कई बार खुद को दोहराने में फँसी रहती है. लक्ष्मी का सेनेटरी पैड को लेकर उत्साह और उसे मुकम्मल तरीके से बना पाने की जिद खिंची-खिंची सी लगने लगती है. हालाँकि इस हिस्से में अक्षय से कहीं ज्यादा आपकी नज़रें राधिका आप्टे पर टिकी रहती हैं, जो एक बहुत ही घरेलू, सामान्य सी दिखने वाली और सामजिक बन्धनों के आगे बड़ी आसानी से हार मान कर बैठ जाने वाली औरत और पत्नी के किरदार में जान फूँक देती हैं. उनके लहजे, उनकी झिझक, उनके आवेश, सब में एक तरह की ईमानदारी दिखती है, जिससे आपको जुड़े रहने में कभी कोई तकलीफ महसूस नहीं होती. अक्षय जरूर शुरू शुरू में आपको 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा' के जाल में फंसते हुए दिखाई देते हैं, पर फिल्म के दूसरे भाग में वो भी बड़ी ऊर्जा से अपने आप को संभाल लेते हैं. एक्सिबिशन में अपनी मिनी-मशीन को समझाने वाले दृश्य और यूनाइटेड नेशन्स के मंच पर अपनी टूटी-फूटी अंग्रेजी की स्पीच के साथ, अक्षय अपनी पिछली कुछ फिल्मों की तुलना में बेहतर अभिनय करते दिखाई देते हैं. ये शायद इस वजह से भी हो, कि 'पैडमैन' कहीं भी उनके 'देशभक्त' होने और परदे पे दिखने-दिखाने के पूर्वनियोजित एजेंडे पर चलने से बचती है. 

'पैडमैन' अपने विषय की वजह से पहले फ्रेम से ही एक जरूरी फिल्म का एहसास दिलाने लगती है. बाल्की 'माहवारी' के मुद्दे पर पहुँचने में तनिक देर नहीं लगाते, न ही कभी झिझकते हैं. फिल्म अपने कुछ हिस्सों में डॉक्यूमेंटरी जैसी दिखाई देने लगती है, तो वहीँ सोनम के किरदार के साथ लक्ष्मी का अधूरा प्रेम-प्रसंग जैसे हिंदी फिल्म होने की सिर्फ कोई शर्त पूरी करने के लिए रखा गया हो, लगता है. दो-एक गानों, अमिताभ बच्चन के एक लम्बे भाषण और फिल्म के मुख्य किरदार का नाम बदल कर अरुणाचलम मुरुगनान्थम से उनकी उपलब्धियों, उनके व्यक्तित्व का एक छोटा हिस्सा चुरा लेने के एक बड़े अपराध को नज़रंदाज़ कर दिया जाये, तो 'पैडमैन' एक मनोरंजक फिल्म होने के साथ साथ एक बेहद जरूरी फिल्म भी है. परिवार के साथ बैठ के देखेंगे, तो सेनेटरी पैड को लेकर आपस की झिझक तोड़ेगी भी, सोखेगी भी. [3.5/5]     

Friday, 19 February 2016

NEERJA: She’s the Hero! [3.5/5]

Real-life heroes are way better than the ones we see, create or admire on big screen. They might not look perfectly decked-up all the time, make a grand entry and an even greater exit from the frame in the most overrated slow-motion shots. They might not be so exceptionally skilled to kill every bad man in their way; on the other hand, they might get killed at the end. And trust me if they do so, it’s never pre-designed to sympathetically benefit their own image amongst their fans. Real-life heroes also necessarily don’t have to be always a ‘Hero’ to inspire; they can also come in as a bold, fearless, strong-headed and proud 23-year old girl from the next door! Ram Madhvani’s inspirational biopic NEERJA successfully brings us closer to one such hero, most of us wouldn’t have known of if the efforts were not made.

Neerja Bhanot [played on screen by Sonam Kapoor] is our regular girl next door who doesn’t miss her vanity box while leaving for work. She is a head purser in a leading international airways company. She has a promising career in modeling also but she prefers this ‘Mazdooron wala kaam’ as her mother [Shabana Azmi] ironically complains about the wee hours at work. She is just two days away to celebrate her 23rd birthday and her plane gets hijacked by a terrorist group seeking their associates’ freedom in return of 379 passengers on board. NEERJA confirms for the grave situation, tensed air and frightening faces of fear as we proceed further in the film. NEERJA also observes the bravura instinct of ‘never lose hope till it ends’ in Neerja Bhanot- an ardent fan of yesteryear Bollywood superstar Rajesh Khanna and his popular dialogue in Hrishkesh Mukherji’s ANAND, “Babu Moshay, Zindagi badi honi chayiye, lambi nahin!”.

In Neerja Bhanot, there is a lot more than just a submissive, fearless and sensibly human flight staff. She is an awful and abusive arranged-marriage survivor too. Ram Madhvani skillfully manages to showcase both of her traumatic positions in past and present where she has to make choices that could make or break her identity as an individual. She could have chosen to die in peace by going ahead with the ‘adjustment clause’ in the marriage most mothers preach to their daughters or else could live long with the guilt of not standing with the right. She picks to die for humanity and live long for the human race as a great example of unshaken courage, undying hope and incomparable heroism!

NEERJA doesn’t hit every cord right especially in the first half where Madhvani tries to convince us investing in the characters emotionally. The excessive mentions of the Rajesh Khanna references are also not well-received at all the time. In fact, this is the part where you know with your experiences in the past that what exactly comes after. The good thing is Madhvani smells it sooner than you think and doesn’t wait too long to go jump in the pool of terror where an extraordinary tale of great courage awaits to unfold. With an abrupt interval point, Ram also dares us to think again about bringing the much-needed and long-awaited ‘No interval’ initiative in the current Bollywood scenario.

NEERJA is a surprising set of some grounded performances. Sonam Kapoor handles to make us believe in her skills well. If she is not bothering you as Sonam while watching it, you should know how blessed you and the film are. Shabana Azmi is the strongest when it comes to target your tear glands. Yogendra Tiku as her father and the actor playing Khalil- one of the hysterical terrorists deserve a special mention!

At the end, NEERJA makes you feel indebted, obliged and appreciative towards such brave souls. In the desperate times of ‘pseudo-nationalism’ taking over the spirit of individual’s freedom, choice and humanity at large, it has the guts to show a mirror to the society. A 23-year old teaches us to live and die as it should be; and now, it’s time to respect her sacrifice!  [3.5/5]  

Thursday, 12 November 2015

PREM RATAN DHAN PAYO: Once upon a time….zzzZZZ! [1.5/5]

Enough said about films that still fall [in literal sense] for 80’s/90’s standard set of emotions to put the cash-registers ringing at the box-office! No, they aren’t nostalgic anymore. Do not hide your sorry state of creative drought behind the curtains of so-called ‘classic age-old charm’! Kings do exist in today’s world; I am aware of some leading that extravagant life in those grand forts of the ‘half palace-half heritage hotel’ nature but trust me, there is no ‘Praja’ in any part of the country that dresses homogeneously in pink sarees and in white kurta-dhoti. But for that tiny little piece of insight, Sooraj R. Barjatya needs to get up from his dining table which serves a daily dose of ‘Sanskar’ more than the reality. Rajshri Productions Pvt Ltd’s PREM RATAN DHAN PAYO is the most confused film I have come across in my life. It neither bores you with its trademark spell of ‘gyaan’ on true Indian values in a ‘softer than melting cheese’ tone nor does tickle you with the all well-bred, polite and ‘cultured’ idea of romance.

PREM RATAN DHAN PAYO comes from the house of traditions where a copy of Ramayana should constantly be there on your study table, no matter how old or young you are. Though the plot takes its cues from THE PRISONER OF ZENDA- an 1894 novel by Anthony Hope and Mark Twain’s THE PRINCE AND THE PAUPER, you can easily find the inspirations and the aspirations straight from the Ramayana. The king of ‘Whatever-pur’ [Sameer Dharmadhikari] had 3 wives like King Dashrath had. Two of the wives being legal and one being often called as ‘mashooka’ of the king, there sure is plenty scope of step-brothers and step-sisters to deal with.

So, the elder son Vijay [Salman Khan] has Ajay [Neil Nitin Mukesh], Chandrika [Swara Bhaskar], Radhika [Aashika Bhatia] as his step-siblings and all the setbacks a family of such nature could have. Just a couple of days before his coronation; the prince meets a schemed fatal accident and now, the trustworthy associates [Anupam Kher and gang] have no other choices left but to replace him with his look-alike Prem [Salman, again] to save the situation. Sonam Kapoor plays Maithili- the princess engaged to the real prince but is now reinventing love in the fake one.

PREM RATAN DHAN PAYO is a shoddily directed film where the scale is intentionally big but the soul in the content hardly makes an appearance. Film opens in Ayodhya (a dream location for Rajshri] where Prem is seen switching his accent carelessly and shamelessly from Awadhi to Rajasthani. The battleground for the plot supposedly finds its root in a location 50 Kms away from Ayodhya but can clearly be judged as some rocky royal place in Rajasthan. Aren’t Google maps free to double-check? It’s not that Sooraj doesn’t show any evolution in his mind. There is a constant joke on Anupam Kher being a virgin and I think that’s an achievement for a Rajshri film. So what if in the same film, the cleavage showing girl has to be the wicked one or vice-a-versa and the short-skirts can only be worn behind the closed doors. In a scene; when asked by a reporter if the coronation is not an out-dated procedure in today’s times, the prince intimidates him with, “do you think traditions are funny?” I wish I could answer on his behalf, “No sire, they aren’t funny but looking at what you [Mr. Barjatya] suggest, they are definitely too plain, painful, pale and pointless to be on screen”.

On the performances, I would not dare rate Mr Salman Khan. Though he’s completely comfortable and contented in his zone, his fans would certainly miss a lot of his ‘I don’t give a damn’ mannerism and slapstick action. Sonam Kapoor tries hard, as usual. Arman Kohli as one of the conspirators looks all bulky, grisly and ‘suit’able to the part but acts no better than Neil Nitin Mukesh. Deepak Dobriyal impresses in a scene or two. Swara is so typecast you would hardly notice if she’s from the sets of RAANJHNAA. And what was Sanjai Mishra doing here?

At the end, I don’t see why and how this PREM RATAN DHAN PAYO will entertain families in today’s times especially when there is no ‘Sanskar’ to look up to, no ‘Prem’ to feel shivers of emotion and no cinema [apart from the grand sets and the heavily aspirational designer clothing] to at least calm your senses. There is a scene having a camel gulping down Salman’s diary and suddenly Salman starts calling it ‘Kamil’ for no rhyme and reason. Well, Kamil is none other than the lyricist of the film Irshad Kamil and the joke is not at him but at the makers as how ‘Sanskari’ you are towards your people of strength! Anything 3-hr long can be a drag but this one sets the milestone. ‘Raja-rani ki kahani’ still works to put you to sleep! [1.5/5]

Sunday, 25 January 2015

DOLLY KI DOLI: An enjoyable ride! Short & sweet!! [2.5/5]

Marriage is a box full of surprises. You never know what comes next and in what shape, each & everyday. Sometimes, you keep waiting for one all your life and it never happens. But few are really the luckiest to have it experienced the very first morning. At least, for the on-screen grooms and their families in Abhishek Dogra’s con-comedy DOLLY KI DOLI!

A fake, cheat and single-minded bride is on loose to con filthy rich grooms. She [Sonam Kapoor, too fragile for a con artist] makes the target fall in love with her, marries him, drugs the whole family on her very last of the ‘first nights’ and runs away with all their shitloads of money and jewellery. In her victims, there is Sonu Sehrawat [Rajkummar Rao] a Haryanvi flashy boy and a desperate mumma’s boy from Delhi [Varun Sharma of FUKREY fame]. Picture this; when they meet each other appreciating the fact that Dolly is the one married to both, Varun asks naively, “bhai, iss hisaab se humara rishta kya hua? (Bro, what kind of relationship we are in now?”. Giggles come with guarantee at such cases and there are many in DOLLY KI DOLI, no doubt on that.

Based on a real chain of events and a crime-story of ‘Looteri Dulhan’ in northern India, Abhishek Dogra’s DOLLY KI DOLI works because of the humor in the script that comes easy like one after the other and the characters who despite being the typical ones, charm you endlessly. Rajkummar Rao is in top form. Watching him dancing like there’s no one to care in an item number with Malaika, is a treat. His Haryanvi is perfectly portrayed and wins your heart by the simplicity in the character and the sincerity in the performance. Sonam plays Dolly with total ease yet she doesn’t look very convincing as a con artiste. Varun is cute, indeed. He, in a sense continues his FUKREY performance. So, if you had liked him earlier, have another slice of the same. Pulkit Samrat as the cop after Dolly’s capture definitely had Salman Khan’s Chulbul Pandey in DABANGG as his acting reference. Taking cues from Salman’s dialogue, “hum yahaan ke robin hood hain”, he even possesses the name Robin.

And then, my favorite track in the film. Mohammed Zeeshan Ayyub [of RAANJHANAA] plays the fake brother to Sonam’s Dolly and at one point; he declines to play her brother anymore as he has romantic feelings for her. This alone has so much potential in creating comedy and drama both. Alas, it wasn’t treated well. Film’s biggest strength is the length. In its crisper than masala papad 107 mins of total duration, film could have been a laugh-riot but it comprises with being just an enjoyable watch; and the culprit here is the uneven screenplay lacking the power to convince. Film hurriedly tries to justify Dolly’s reasons to go for fake marriages after she fails in one. In today’s times, can you imagine a courtship of more than a couple of months and there is no ‘kiss’ happening between the two because of the stupidest of all ‘yeh sab shaadi ke baad’ excuse? All because, we can’t show our bad girl being so bad! Black is here not so dark. I wish writing in Bollywood gets mature soon.

At the end, DOLLY KI DOLI is an enjoyable ride you won’t regret much after leaving theatre. Rajkummar Rao ensures most of it. It’s short & sweet unlike Indian marriages. [2.5/5] 

Friday, 19 September 2014

KHOOBSURAT: Maddening Beauty!! The overacting lead spoils the fun! [2/5]

Opposites attract. Just like in most of the romantic fairytales; they do meet, greet & kiss each other in Shashanka Ghosh’s candy floss love-story KHOOBSURAT too, but it’s more like ‘Irresistible meets irritating’ and ‘alluring meets annoying’. The later being Sonam Kapoor, of course! First reaction, why should a chick-flick need to be a dumb comedy of convenience? Why should the girl being portrayed as the most carefree, lively and good-natured human on earth has to be loud, noisy, illogical and a stack of overacting on the performer’s side? No wonder, there are times you want to call it off but then, multiplexes aren’t your personal home theatre system that comes with a full functional remote.

Official remake of Hrishikesh Mukherji’s classic family drama of same name, KHOOBSURAT sticks to the basic premise from the old reference. A young, fashionable and spontaneous physiotherapist [Sonam playing mostly herself] is sent to a royal palace to take care of ‘His Highness’ on wheel chair. This perfectly punctual & controlled museum of people with religiously followed discipline in veins is lead by a sophisticated yet dominating ‘Her Highness’, played by the very reliable Ratna Pathak Shah. No prizes for guessing that there is a prince charming [Pakistani poster boy Fawad Khan in a well-suited role] ready to be the last & final nail in the coffin before the house of infinite rules gets down by our sweet, silly and stylish physiotherapist.

Shashanka Ghosh creates a world of picture perfect frames with royal real locations, best of props, designer dresses, all flashy colors, vibrant and charmingly polished characters and also succeeds in giving us some extremely beautiful scenes like prince Vikram Singh Rathore trying to talk casual things with his father & the ‘His Highness’. You could actually feel the uncomfortable zone they are in. In other merits, the very experimental music by Sneha Khanwalkar of ‘Gangs of Wasseypur’ fame is a refreshing and notable change in Bollywood soundtracks.  

Film if falters, it is all because of piercing loudness in characters supposedly being the biggest admirers of life. So despite being a known physiotherapist to a T-20 Cricket Team, this ‘Barbie doll’ in hot pants doesn’t necessarily know the dining table etiquettes and also doesn’t bother to hesitate while asking a young girl of 17 about her boyfriend, that too in front of her mother and just a minute later their first meeting. She is also seen invading premise of historic importance to pose for her Facebook profile picture. You can giggle or laugh out loud considering this funny but I would settle this as another dose of Sajid Khan Humor.

On the performances, Sonam plays it cool but thanks to the writing, she ends up being the most annoying and overacted piece of this beautifully painted picture-frame. Fawad shows that his popularity comes not merely with the looks but the earnestness in acting skills. I wish his female fans could switch from ‘He’s so hot’ to ‘He’s damn good’. He deserves that. Theatre veteran Aamir Raza Hussain as ‘His Highness’ is the surprise package! Ratna Pathak Shah’s is an extended ‘Sarabhai’ act beautifully done. Kirron Kher as the loudmouthed Punjabi Mother to Sonam’s character is too cliché to enjoy. I could only say, “Manju, [Sonam calls her by her name in the film] ab bass kar!”

At the end, KHOOBSURAT is ‘khoobsurat’ in the looks, amusingly witty in parts and depressingly maddening for the most. Revisiting episodes of ‘Sarabhai Vs Sarabhai’ on YouTube is way better option if you’re in search of good laugh. Watch it only if you can’t say ‘NO’ to your girlfriend! Doesn’t that include all of men on earth? Poor us!! [2/5]

Friday, 14 March 2014

BEWAKOOFIYAAN: A film too easy to celebrate its existence! [1.5/5]

Every creation of art; be it of a pure commercial aspect or for the approval of one’s inner conscious, needs to have a motive, a reason behind its very existence. Sadly, YashRaj Films’ BEWAKOOFIYAAN doesn’t show any sign of having it. I tried looking for it, genuinely. In fact, it is one of those rare romantic comedies where you find the contagious essence of romance missing from the air. All you take out from this dull, unexciting, blatantly too easy love-story is disappointment, exhaustion, drowsiness and a sense of doubt on your sensibility as why did I make the decision to bet my money on it at the first place.

Just before getting sacked from his well-paid job in the airlines sector, Mohit [Ayushmann Khurrana] had enough convincing reasons to make his life a big blasting party. A never complaining girlfriend Mayera [Sonam Kapoor], well almost; promotion in the job, brand new car and a Gold ranked credit card with massive credit-limit! Life is smooth, fast and lavish. Until comes his soon-to-be father-in-law [Rishi Kapoor, the only relief] in the scene; a strict retired IAS officer having close connections with Home Secretary and the head of Police in the state. No prizes for guessing, the love-story takes the much expected turn to be on the ‘Meet the parents’ route. As if it was really manageable, Mohit is jobless due to recession hitting the aviation industry. Next is the potholed ride to impress the father and keeping the love alive between two.

Directed by Nupur Asthana, BEWAKOOFIYAAN is a big let down for Habib Faisal who adeptly has been a pillar in the writing for DO DOONI CHAAR, BAND BAAJA BAARAT & ISHAQZAADE. The wit, rust and textured appeal to the lingo is not a complete miss here but not sharp enough too to create some stimulation. It is a film that runs at a certain pace and forgets to take off. The only part that manages to pull my attention to add some novelty to the part is where Mayera bursts in complain over Mohit for doing her bit of ‘sacrifices’ to not go shopping for a new pair of sandals since his ‘jobless’ status. It is funny but more than that, it has a connecting authenticity to Sonam’s character. I was looking for more of this kind.

Performances here are absolutely average at the most. Sonam’s role of a less crabby-all supportive girlfriend has some unseen flares but with her limitations, it goes for a toss. Ayushmann too is very constrained in terms of exhibiting his emotions. Though, he does seem comfortable in comic parts. If anyone here is really much more than what one expects, is the inimitable Rishi Kapoor. His energy, his aura and his gifted ability to slip in the characters he plays is terrifically tranquil even in such shaky circumstances. Some relief!

Romantic comedies are judged best by the youngsters in love, provided it does have some blazing romantic scenes, an exploding chemistry between the lead, hardcore emotions and some good laughs to make their time together a pleasurable experience to cherish. Deeply dejected in my heart and with all my guts gathered at one, I announce that BEWAKOOFIYAAN lacks most of the above. Watch it on DVD, if you must! [1.5/5]