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Friday, 8 September 2017

डैडी: कहानी औसत, ट्रीटमेंट उम्दा! [3.5/5]

असीम अहलूवालिया की सिनेमाई दुनिया मुख्यधारा में रहते हुए भी बहाव से अलग, उलटी तरफ बहने का जोखिम पहले भी 'मिस लवली' जैसी फिल्म में उठा चुकी है. कहानी जहां हाशिये पर धकेल दिये गए सामाजिक वर्गों की हो, चेहरे जहां खुरदुरे हों, चेचक के निशान और खड्डों भरे या फिर गहरे लाल रंग की लिपस्टिक में बेतरतीब, बेजा पुते-पुताये, और कमरे इतने घुटन भरे कि सीलन की बास भी नाक से उतर कर अन्दर गले तक आ जाये. असीम इस कम-रौशन, सलीके से बिखरी-बिखराई दुनिया की, तसल्ली-पसंद तरीके से कही जाने वाली कहानी में जिस बारीकी से परदे के आगे बैठे दर्शक के लिए 'माहौल' बनाते हैं, उन्हें बॉलीवुड में ज़ुर्म की दुनिया पर बनने वाली फिल्मों का 'संजय लीला भंसाली' घोषित कर देना चाहिए. कुख्यात अपराधी अरुण गवली की जिंदगी पर आधारित, असीम की 'डैडी' हालाँकि एक ठोस कहानी के तौर पर सामान्य से आगे बढ़ने का हौसला नहीं जुटा पाती, पर फिल्म-मेकिंग के दूसरे जरूरी पहलुओं पर अपनी छाप छोड़ने में कतई निराश नहीं करती.

मुंबई के दगड़ी चॉल में रहने वाले तीन लफंगों की अपनी एक गैंग है. BRA गैंग, B से बाबू (आनंद इंगले), R से रामा (राजेश श्रृंगारपुरे) और A से अरुण गवली (अर्जुन रामपाल). बड़ा हाथ मारने और भाई (फ़रहान अख्तर) के टक्कर का बनने के लिए जो तेवर और ताव चाहिए, अरुण में ही सबसे कम दिखता है. फट्टू भी वही सबसे ज्यादा है, फिर भी हालात उसे भाई के ठीक सामने ला खड़ा करते हैं. सिस्टम की मार से अपराधी बनने की दुहाई देने वाला गवली धीरे-धीरे खुद ही एक पैरलल सिस्टम की तरह काम करने लगता है. जेल में काफी उम्र काट ली है, अब सफ़ेद टोपी पहन के 'गांधी' बनने चला है. शान से कहता है कि वो भाई की तरह 'भगोड़ा' नहीं है. लोग कहने लगे हैं, पर 'रॉबिनहुड' का मतलब भी उसे उसकी बेटी से पता चलता है.

अरुण गुलाब गवली की कहानी या यूँ कहें तो उसकी जिंदगी से काट-छांट कर फिल्म के लिए बुनी गयी कहानी में कुछ भी ऐसा अलग या नया नहीं है, जो इस तरह के तमाम गैंगस्टर-ड्रामा में आपने पहले देखा-सुना न हो. हाँ, घटनाओं को पिरोने और उन्हें एक-एक कर के बड़े तह और तमीज से आपके सामने रखने का असीम का अपना एक ख़ास स्टाइल है, वो इस तरह की फिल्मों के लिए नया और बेहतर जरूर है. असीम अलग-अलग किरदारों के जरिये गवली की कहानी को परदे पर सिलसिलेवार पेश करते हैं, और काफी हद तक कामयाब कोशिश करते हैं कि गवली का किरदार इंसानी लगे और सिनेमाई परदे को फाड़ कर बाहर आने की जुगत से बचता रहे. यही वजह है कि गवली का किरदार जेल में अपनी मौत की आहट भर से ही पसीने-पसीने हो उठता है; उसका एक गुर्गा उसे नयी टेक्नोलॉजी वाली पिस्तौल दिखा रहा है, पर गवली रोती हुई बेटी को झुनझुना बजा कर चुप कराने में ज्यादा मशगूल दिखता है. 

फिल्म में कैमरा अपने लिए आरामदायक जगह नहीं ढूंढता, अक्सर खिड़कियों और दरवाजों के धूल लगे शीशों से लगकर अन्दर झांकना मंजूर करता है. रौशनी बेख़ौफ़ धूप में छन कर नहीं आती, रंगीन लाल-नीले बल्बों में नहा कर चेहरों, पर्दों, और बिस्तरों पर उतनी ही पड़ती है, जितने से उसके होने का वहम बना रहे. किरदारों की स्टाइलिंग से लेकर प्रॉडक्शन-डिजाईन के छोटे से छोटे हिस्सों तक में असीम की पैनी नज़र और पूरी-पूरी दिलचस्पी साफ़ देखने को मिलती है. डिस्को-बार में 'जिंदगी मेरी डांस-डांस' गाने पर थिरकते कलाकारों के साथ, आपको '80 के दशक का बॉलीवुड जीने से एक पल को परहेज़ नहीं होता. जेल में नया कैदी आया है, खूंखार है, खतरनाक है, और मुंह से 'खलनायक' की धुन निकालता रहता है. ज़ाहिर है, 90 का दशक आ गया है. अब सैलून में संजय दत्त और जैकी श्रॉफ के पोस्टर चस्पा हैं. 

असीम अहलूवालिया का सिनेमा अगर 'डैडी' का शरीर है, तो गवली के किरदार में अर्जुन रामपाल का अभिनय साँसे फूंकने जितना ही जरूरी. प्रोस्थेटिक तकनीक से चेहरे की बनावट में ख़ास बदलाव करने तक ही नहीं, अर्जुन एक अदाकार के तौर पर भी पूरी फिल्म में अपनी ईमानदारी से तनिक पीछे नहीं हटते. उनकी खुरदुरी आवाज़, उनकी चाल-ढाल, उनका डील-डौल बड़ी सहजता से उन्हें हर वक़्त उनके किरदार के आस-पास ही रखता है. निश्चित तौर पर यह उनके अभिनय-कैरियर की चुनिन्दा देखने लायक परफॉरमेंसेस में से एक है. कास्टिंग के नजरिये से फ़रहान अख्तर को भाई (दाऊद इब्राहिम के किरदार से प्रेरित) के तौर पर पेश करना सबसे निराश करने वाला प्रयोग रहा. पुलिस इंस्पेक्टर विजयकर की भूमिका में निशिकांत कामत खूब जंचते हैं. अन्य किरदारों में ऐश्वर्या राजेश, श्रुति बापना और राजेश श्रृंगारपुरे बेहतरीन हैं. 

आखिर में; बॉलीवुड क्राइम फिल्मों का जमीनी जुड़ाव एक अरसे से लापता सा था. गैंगस्टर काफी वक़्त से दुबई में कहीं पूल-साइड पर लेट कर बिकनी में लड़कियों को देखते हुए जुर्म के फरमान सुनाने में अपनी शान समझने लगे थे. फिल्मों ने उनमें अपने स्टाइल-आइकॉन तलाशने शुरू कर दिये थे. पक्या, गोट्या, रग्घू और मुन्ना की टेढ़ी-मेढ़ी शक्लों की जगह गोरे-चिट्टे-चिकने चेहरों ने ले ली थी. असीम अहलूवालिया की 'डैडी' उस खाली जगह में बड़ी आसानी और ईमानदारी से फिट बैठ जाती है. [3.5/5]  

Friday, 2 December 2016

कहानी 2- दुर्गा रानी सिंह : तैयार रहिये, ‘नहीं’ चौंकने के लिए! [2/5]

बिद्या’ लौट आई है. ‘बागची’ नहीं, इस बार ‘सिन्हा’ बन कर. बाकी का सारा सेट-अप तकरीबन वैसा ही है. हाँ, दर्शक के तौर पर आप और हम कुछ ज्यादा ही सजग और सचेत हो गए हैं. ‘कहानी’ में मिस बागची की छलावे वाली कहानी से पहले ही ठगे जा चुके हैं, तो इस बार खुद को तैयार रखे बैठे हैं कि कुछ न कुछ तो होगा ही. परदे पर जो कुछ बड़ी आसानी से शरबत कहकर पिलाया जा रहा है, ज़रूर उसमें कोई कड़वी दवाई मिलाई गयी होगी. चौकाने से पहले चौकन्ना कर देना; सुजॉय घोष की ‘कहानी 2: दुर्गा रानी सिंह’ कम से कम इस मामले में तो पूरे नंबर हासिल कर ही लेती है. पर कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती, लेखक-निर्देशक घोष बाबू के लिए चुनौती अब और कड़ी हो चली है. ठगे जाने के लिए जो पहले से ही तैयार बैठे हैं, उन्हें एक जबरदस्त झटका देने का दो ही तरीका हो सकता था, पहले वाले से अबकी बार कुछ बहुत बड़ा किया जाये या फिर कुछ भी न किया जाये! अफ़सोस, सुजॉय घोष सबसे आसान तरीके के साथ समझौता करना मंज़ूर कर लेते हैं. हालांकि, इसे समझते-समझते आपका काफी वक़्त गुज़र जाता है.  

रात का सन्नाटा खाली सड़कों से होता हुआ सोती संकरी गलियों तक फैला है. रेडियो पर गाना चल रहा है. पीले बल्बों की रौशनी पुराने मकानों को और पुराना बना रही है, और रहस्यमयी भी. ये कोलकाता नहीं है, पर ये भी बंगाल ही है. बिद्या सिन्हा (विद्या बालन) अपनी 14 साल की बेटी मिनी (तुनिषा शर्मा) को इलाज़ के लिए अमेरिका ले जाना चाहती है. मिनी व्हीलचेयर पर है और चल नहीं सकती. रोजाना की ही तरह, एक शाम जब बिद्या ऑफिस से घर लौटती है, मिनी को किसी ने अगवा कर लिया है. मिनी को बचाने के लिए बिद्या को कोलकाता जाना होगा, पर उससे पहले ही उसका एक्सीडेंट हो जाता है और अब वो कोमा में है. तफ्सीस में इंस्पेक्टर इन्द्रजीत सिंह (अर्जुन रामपाल) के हाथ एक डायरी लगती है. फिल्म अब फ्लैशबैक में है और डायरी के जरिये आपको कहानी सुना रही हैं, दुर्गा रानी सिंह (विद्या बालन), जो खुद हत्या और किडनैपिंग की आरोपी है.  

कहानी’ और ‘कहानी 2’ के बीच इसी साल सुजॉय घोष की ‘तीन’ भी आ चुकी है. हास्यास्पद है कि अपने क्राइम-थ्रिलर होने की फितरत और कोलकाता में बसे होने आदत दोनों की वजह से, कोरियाई फिल्म का रीमेक होने के बावजूद, ‘तीन’ पूरी तरह ‘कहानी’ श्रृंखला की ही फिल्म लगी थी. जबकि ‘कहानी 2’ अपने डार्क सब्जेक्ट (बाल यौन शोषण) और कहानी में कुछेक बहुत ठेठ घुमावदार मोड़ों की वजह से एक कोरियाई फिल्म ज्यादा लगती है. फिल्म का पहला हिस्सा जिस तरह परत-दर-परत आपको दुर्गा रानी सिंह की पिछली ज़िन्दगी और 6 साल की मिनी के यौन-शोषण से जुड़े राज़ का खुलासा करती है, वो न ही बहुत गूढ़ रहस्य लगते हैं और न ही किसी दूसरे बड़े राज़ के छुपे होने का अंदेशा कराते हैं. हाँ, फिल्म में जिस संजीदगी और सफाई से बाल यौन शोषण की बात की गयी है, वो बेहद जरूरी और काबिल-ऐ-तारीफ़ है. 6 साल की मिनी को उसके ‘चाचू’ (जुगल हंसराज) ही इधर-उधर छूते हैं, पर किसी बड़े से वो ये बात करने में कैसे सहज हो? वो भी जब दुर्गा उसके स्कूल में काम करने वाली एक औरत हो, कोई अपनी सगी नहीं.

सुजॉय घोष पूरी कोशिश करते हैं कि ‘कहानी 2’ आपको ‘कहानी’ जैसी ही लगे, इसीलिए यहाँ भी एक नौजवान पुलिसवाला है, बॉब बिस्वास की तर्ज़ पर एक मजेदार सुपारी-किलर (इस बार एक लड़की) है, विद्या बालन हैं, और कहने को ही सही, पर एक ऐसा क्लाइमेक्स है जो फिल्म के बारे में आपकी अब तक की समझ को झुठला दे. हालाँकि, ये अंत वो आसान अंत है, जो आप चाहते तो काफी पहले से देख पाते, पर आप इतना आसान कुछ देखना ही नहीं चाहते थे. ‘कहानी’ का अंत आप चाह कर भी नहीं देख पाते. विद्या अपने ‘डी-ग्लैम’ अवतार को बखूबी अपने अभिनय का सबसे मज़बूत पक्ष बना लेती हैं. अरुण (तोता रॉय चौधरी) के साथ उनके दृश्य उनके अभिनय की एकरसता को तोड़ने में कामयाब दिखते हैं. अर्जुन रामपाल से कोई ख़ास शिकायत नहीं होती, हालांकि ‘कहानी’ के परम्ब्रता चटर्जी जैसे चेहरे अर्जुन की जगह ज्यादा सटीक कास्टिंग होते. जुगल हंसराज ने काफी दिनों बाद निराश किया.

आखिर में; ‘कहानी 2’ एक अच्छी फिल्म हो सकती थी, और कई मायनों में है भी...जहां तक इसके विषय-वस्तु (चाइल्ड एब्यूज) की संजीदगी और अहमियत का सवाल है, पर इसे ‘कहानी’ जैसा जामा पहना कर क्राइम-सस्पेंस थ्रिलर के तौर पर पेश करने की कोशिश और कवायद एक अलग तरह की उम्मीद जगा देते हैं, जिसे छू पाना इस फिल्म के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है. देखिये, पर तैयार रहिये...‘नहीं’ चौंकने के लिए! [2/5]               

Friday, 11 November 2016

रॉक ऑन 2: बैंड बज गया! [2/5]

अभिषेक कपूर की ‘रॉक ऑन’ कुछ आठ साल पहले आई थी. यारी, दोस्ती, मस्ती और म्यूजिक के बीच रिश्तों में उतार-चढ़ाव और हाथ-धो कर सपनों के पीछे पड़ जाने की जिद लिए कुछ मनमौजी दोस्तों की कहानी, जहां कभी खुदगर्ज़ी और खुद्दारी दूरियाँ बढ़ा देती थी तो म्यूजिक के लिए उनका साझा ज़ज्बा नाराज दोस्तों के हाथ खींच कर गले भी मिला देती थी. शुजात सौदागर की ‘रॉक ऑन 2’ ने आने में थोड़ी देर ज़रूर लगायी है, पर ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ के साथ इन्साफ बिलकुल नहीं करती. ‘रॉक ऑन’ अगर पुराने लव लैटर की तरह है, जिसके गुलाबी पन्ने अभी भी उनको छूने वाली नरम मुलायम उँगलियों का एहसास कराते हैं, जिसकी सियाही अब भी बंद लिफाफे से ही एक जानी-पहचानी खुशबू बिखेरती रहती है, तो ‘रॉक ऑन 2’ उसी पुराने लव लैटर की एक ज़ेरॉक्स कॉपी भर है. देखने में कमोबेश वैसा ही, पर रंग बासी और खुशबू बेअसर.

सालों बीत गए हैं. इतने कि आपको फ्लैशबैक में बार-बार ले जाया जा सके. केडी (पूरब कोहली) क्लाइंट्स के इशारों पर म्यूजिक बनाते-बनाते थक गया है. जो (अर्जुन रामपाल) एक रेस्टो-बार चलाता है और साथ ही, म्यूजिक रियलिटी शोज़ में टीआरपी दिलाने वाले बेहूदा कलाकारों को जज करता है. आदी (फरहान अख्तर) अब मेघालय के किसी गाँव में लोगों की सेवा में लगा रहता है. ‘मैजिक’ का कहीं कोई अता-पता नहीं. मैजिक की जगह अब ‘ट्रैजिक’ ने ले ली है. कहने को तो सारे दोस्त (बीवियों को गिनते हुए) आपस में मिलते-जुलते हैं, पर अन्दर ही अन्दर म्यूजिक छूट जाने का ग़म पाले बैठे हैं. तीनों के लिए उम्मीद की थोड़ी बहुत रौशनी लेकर आते हैं उदय (शशांक अरोरा, तितली वाले) और जिया (श्रद्धा कपूर), पर अभी बहुत कुछ कहानी फ्लैशबैक के काले दरवाजे के पीछे आपका इंतज़ार कर रही है.

रॉक ऑन 2’ एक बेहद उदास फिल्म लगती है, अपने किरदारों की उदासियों, मुश्किलों और परेशानियों की वजह से नहीं, बल्कि अपने थकाऊ गीतों, कहानी और परफॉरमेंस में उस ‘जादू’ के न होने से, जो ‘रॉक ऑन’ में हम पहले ही जी चुके हैं. ‘रॉक संगीत’ को पूरी तरह अपनाने वाले ‘मेरी लांड्री का एक बिल’ जैसे गानों की ताजगी को अब ज़िन्दगी के भारी-भरकम फलसफों वाली लाइनों ने कब्ज़े में ले लिया है. सहज, स्वाभाविक और कुदरती अभिनय को छोड़कर अब ड्रामेबाजी पर ज्यादा भरोसा दिखाया जाने लगा है. आठ साल पहले, दोस्ती के जिन मजेदार और निजी पलों को आप परदे पर महसूस करने में कामयाब रहे थे, अब वैसे पल फिल्म में न के बराबर हैं. उनकी जगह नए किरदारों की पेशोपेश अब आपको ज्यादा तंग करती है. फिल्म में संवाद, खासकर उन हिस्सों में जहां बार-बार केडी दर्शकों को कहानी सुनाने-समझाने की जिम्मेदारी ले लेता है, बेहद नाटकीय और फीके लगते हैं.

कहते हैं, संगीत सब दर्द भुला देता है. फिल्म में ऐसा सिर्फ एक या दो ही बार होता है. श्रद्धा की आवाज़ में गाये गीत और फिल्म के अंतिम क्षणों में म्यूजिक कॉन्सर्ट का पूरा हिस्सा (ऊषा उत्थुप  वाला गीत) ऐसे ही कुछ गिने-चुने पल हैं, जब फिल्म का संगीत आपको पूरी तरह बांधे रखने में कामयाब रहता है. अभिनय की दृष्टि से लगभग सभी मुख्य कलाकार एकदम से निराश तो नहीं करते, पर अपने आपको बेहिचक दोहरा रहते हैं. पूरब और अर्जुन अच्छे हैं. फरहान औसत हैं. श्रद्धा अपनी दूसरी फिल्मों से काफी बेहतर हैं. फिल्म में श्रद्धा के भाई और कुमुद मिश्रा के बेटे की भूमिका में प्रियांशु पैन्यूली काफी उम्मीद जगाते हैं.

आखिर में, ‘रॉक ऑन 2’ एक ऐसा सीक्वल है, जिसके न होने की वजहें बहुत सारी हो सकती थीं, और होने के बहाने बहुत कम. इसे देखना या झेलना किसी ऐसे कॉन्सर्ट से कम नहीं, जिसमें आपके पसंदीदा कलाकार तो हैं, पर उन्हें गाते हुए सुनने से ज्यादा आप उन्हें उदास चेहरे लिए घूमते देख रहे हैं. [2/5]             

Friday, 13 February 2015

ROY: A painful writer’s block!

Never judge a book by its cover; and a film by its trailer. Looks can be deceiving. Debutante writer-director Vikramjit Singh’s self-indulgent thriller ROY falls for the same. Suggestively projected as a romantic thriller with some nail-biting tension and edge-of-the-seat action, it is actually a slow, dreary and superficial psychological thriller that travels far too many places but reaches nowhere. Though it is not some Herculean task to anticipate the flight of a thriller having a writer in it as its main lead, Vikramjit Singh tries his best to create a perfect setting for a perfect thriller but couldn’t bless it with a taut story to pull it off.

Writers live their lives through their characters. Characters walk through pathways their creators have crafted for them. And then there are blurred lines in the narration where they both transit into each other’s territory. It may sound easy and simple as lighting a cigarette but it is not when you are a first-timer. Filmmaker Kabir Grewal [the stylishly cool and casual Arjun Rampal] is a perfectionist in almost everything he does and as precise as those three cubes of ice in his favorite drink. His sources of inspiration were categorically been the women in his life. 22 to be exact! And now, he is facing writer’s block. Enters Ayesha Aamir [Jacqueline Fernandez] another filmmaker from London [probably to give Miss J’s distant accent a valid reason]! Kabir starts stealing moments from his relationship with Ayesha to complete his third film about a mysterious serial thief Roy [Ranbir Kapoor in a well-coined dynamic role] but before he could meet the end, Ayesha is gone.

In ROY, Vikramjit Singh gives us a shiny-glossy world as much high on style and sophistication that even the statutory ‘smoking kills’ caption on the screen is written in some fancy font. The psychosomatic bond between the writer and his creation is, though, well-thought; it often gets confusing with a not-so neat & clever screenplay mixed abruptly with the romantic track. The dried out dialogues forcibly talking heavy just for the sake of sounding profound low down the shades of an engaging thriller. One of the high-points in the film takes more than an hour to show up where Kabir & Roy are seen coming ‘not exactly’ together but in one frame. Smartly written and brilliantly shot! Writer’s block allowing the leading man in the film within film in a long-waiting ‘stay where you are’ situation is another smart piece in the writing. Sadly, these are very few in numbers and placed at a tiring distant interval.

Cinematography captures it beautifully; be it the picturesque locations in Malaysia or the esthetically rich sets. Arjun Rampal looks more like coming straight from one of his shoots for fashion magazines. So does Jacqueline but then, there is a lot more to comment on her acting skills; an ineffective effort she needs to do better in. Ranbir Kapoor is the only saving grace for the film. He gives screen the much-needed depth and a starry presence that could make your being there an endeavor worth taking. Well-shot songs are also reasonably good part.

To end, ROY suffers multiple climaxes in the most frustrating screenplay. The comments given to the film within the film like, “Finally, it’s over!”, “pata nahin, yeh film kaise bann gayi?” and “yeh film toh mujhe duba hi degi” help none but to express the exasperation viewers feel and face while seeking out quick exit from the theater. Watch out if you have tons of patience, and love and likings for Ranbir Kapoor! Writer’s block is a painful state for writers; this time it’s for viewers too! [2/5]     

Friday, 30 August 2013

SATYAGRAHA: Formulaic Exploitation of Freedom of speech! Corruption hits cinema! [2/5]

Corruption in our system has been in practice for so long now that you can easily find its traces in our day-to-day life. It is so rehearsed-so exercised that we might not even consider it now a threat to our society but when the same strikes in art like cinema, it still hurts, badly. Prakash Jha’s so-called social drama SATYAGRAHA is a victim of corruption in cinema. Formulaic approach of Jha’s own league contaminates the power of story-telling. Forced Star-value pollutes the intensity and effort.
Taking a prominent lead from Anna Hazare’s anti-corruption movement and a few other sensational news headlines in the past, SATYAGRAHA roams around an idealistic retired principal [played passionately by Amitabh Bachchan] who is so much confined into his ideas that he can be very blatant with anyone against his concept of morality. Trust me, in few scenes you would be thanking God that your father in real is not like him. After losing his extremely talented engineer son in a road-accident [referring to the Satyendra Dubey murder case, if you remember], in frustration to not know how to deal with corruption in the system, Daduji slaps the district magistrate and is now behind the bars.

To set him free, joins hands an ambitious businessman of promising future [Ajay Devgn in his usual], a local crowd-pulling youth leader [Arjun Rampal wasted in his ‘Rajneeti’ look] and a dedicated journalist [Kareena Kapoor Khan-the most irritating of all] who merely believes in just one rule of journalism that you should look presentable. So, you never find her without heavily done make-up in any of the frames she’s in. Manoj Bajpai slips into a caricature-ish comical politician who’s naively uncomfortable with the concept of lawmakers taking instructions & suggestions to improve from public as a part of democratic system. So, the conflict to bring inevitable change in the system turns into a final showdown between the government and team Satyagraha.

Problem with the film lies in its too idealistic characters to make connect and events happenings in the most suitable manner. Film struggles to speak loud and clear on the issue and ends up in an exploited version of the ‘freedom of speech’ that can also be referred as the ‘freedom to preach’. In its 2 hour 32 min of excruciating duration, it goes on and on and on till an equally infertile dramatic climax.

All I can request/warn/suggest Mr. Jha that please rediscover his own self beyond this fixed parameters of star-driven half-cooked hopeless social dramas just for the sake of making it or the day is not very far when we would have another ‘Ram Gopal Verma’ in Bollywood. If not in the right manner, some statements should not be made at all as you are killing the opportunity for someone else. [2/5]

Friday, 19 July 2013

D-DAY: drought of a good thriller still haunts Bollywood [2.5/5]

Every time a terrorist attack happens in any part of our country, the conversation among common people & the ‘on serious note’ panel discussions on TV get heated with mostly unrequited-unresolved demand for the exile of the most wanted criminal, reportedly residing now in one of the posh cities of our neighboring country.

We all have wanted that much-awaited extradition for ages, and God only knows if that would be possible ever in the future but for now, Nikhil Advani’s sincerely executed yet flawed-Bollywood at heart-taut thriller of high promises D-DAY offers a ‘dream come true’ fictional story line, largely getting built up on ‘would have been-should have been’ conditions applied.

Taking cues from real incidents, in-depth functioning of intelligence agencies & the earnest psyche of undercover agents, where an impressive first half suggests it being an intelligent, well researched, on real locations espionage drama with four Indian secret agents starting off their mission to get Goldman [the man in pink shades modeled on the Dawood Ibrahim, played by immensely likeable Rishi Kapoor] back to India, the second half pointlessly falters with focusing more on the masala; Bollywood is known to plant whenever they start lacking on gripping plots. So, we see emotional urges taking over obvious astuteness, regular tiffs between the team, hard-to-believe successful escape plans and an unfeasible end that totally is to please & blow away audience’s various sentiments regarding this national issue sounded more like a personal war for every countryman. Get your hands ready for claps when see that happen what if only on screen!

Advani’s premise is very appealing-very mass attracting. The execution part is also thoroughly intended and incessantly belongs to the likes of any docu-drama shot in the crowded lanes of Karachi. Narrative pattern that includes timelines of the events on screen to make it look documented effort, works in favor. Special mention to the ‘Alvida’ song for its bloody beautiful visualization, literally! On the acting front, Irrfan does his part with sheer honesty. Watch out for him in heartrending scenes with his family. Arjun Rampal, Shruti Haasan & Huma Quareshi is standard. But if we are talking about performances par expectations, Rishi Kapoor as stylishly dressed Don, Aakash Dahiya as fourth player in the operation and Shriswara as Irrfan’s affably adorable wife top the list. Chandan Roy Sanyal is a complete waste.

At the end, this thrilling operation that had all the means to finish the long-awaited drought of a good thriller miserably could not meet its desirable end, thanks to its own flaws that lie in the high octane drama & a forcibly commercial end in the second half. A troubled case of wasted opportunity! [2.5/5]