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Friday, 2 March 2018

परी- नॉट अ फेयरीटेल: 'हॉरर' में कहानी की शुरुआत! [3/5]

हिंदी फिल्मों में 'हॉरर' अपने हर दौर में अक्सर किसी एक ख़ास नाम या बैनर के खूंटे से बंध कर रहा है. रामसे ब्रदर्स की भूतिया हवेलियों से रामगोपाल वर्मा के शहरी मकानों और भट्ट कैंप के इन्तेहाई खूबसूरत यूरोपियन मेंशन्स तक; 'हॉरर' के साथ सबने अपने-अपने लैब में जब भी चीर-फाड़ की, फ़ॉर्मूले हमेशा एक से ही रहे. यही वजह है कि '13B', 'एक थी डायन' और हाल-फिलहाल की 'द हाउस नेक्स्ट डोर' जैसी थोड़ी सी भी अलग और नये लिहाज़ की डरावनी फिल्में उम्मीदों का पहाड़ खुद ज्यादा ही बड़ा कर देती हैं. प्रोसित रॉय की 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' ऐसी ही एक हॉरर फिल्म है, जिस पे 'हॉरर' के किसी भी पुराने कारखानों की कोई मोहर या छाप नहीं दिखाई देती. हालाँकि खामियों की फेहरिस्त भी कुछ कम बड़ी नहीं, पर 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' अपने नए अंदाज़ से न सिर्फ आपको डराती है, ज्यादातर वक़्त चौंकाती भी है.

डरावनी फिल्मों में अंधविश्वास, लोक कथाओं और पुरानी मान्याताओं का बोलबाला रहता ही है. ऐसी फिल्मों में, ऐसी फिल्मों से तार्किक या वैज्ञानिक होने की उम्मीद करना अपने आप में एक भुलावे की स्थिति है. प्रोसित भी अपनी पहली फिल्म के तौर पे 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' में दकियानूसी होने से परहेज़ नहीं करते. डराने की मूलभूत जरूरत को पूरा करने के लिए, वक़्त-बेवक्त यहाँ भी बिजलियाँ कड़कती हैं, खिड़कियाँ खड़कती हैं, कंधे पे हाथ रखते ही डरावने चेहरे पलट कर आखों तक चले आते हैं और बैकग्राउंड में एक उदास आवाज़ धीमे-धीमे लोरियां सुनाती रहती है, पर इस बार की कहानी सतही तौर पर दकियानूसी होने के बावजूद, अपने आप में 'और भी' बहुत कुछ कहने की गुंजाईश बाकी रखती है. 

बांग्लादेश के एक ख़ास हिस्से में एक ख़ास नस्ल को मिटाने की मुहीम चल रही है. नहीं, इसका रोहिंग्या मुसलामानों से कोई लेना देना नहीं है. हालाँकि बात जिन्नों की है, और जिन्न भी इसी ख़ास महज़ब में अपनी पैठ ज्यादा रखते हैं. इफरित नाम का एक ख़ास जिन्न है, जो अपनी नस्ल बढ़ाने के लिए औरतों का सहारा लेता है. प्रो. कासिम अली (रजत कपूर) ढूंढ-ढूंढ के ऐसी औरतों का गर्भपात करते-कराते हैं. रुखसाना (अनुष्का शर्मा) ऐसी ही एक नाजायज़ पैदाइश है, जिसे पेरी या परी कहा जाता है. नानी की कहानियों वाली नेकदिल परी नहीं, बल्कि ऐसी जिसकी फ़ितरत ख़ूनी वैम्पायरों जैसी दिल दहलाने वाली हो. बहरहाल, एक एक्सीडेंट में अपनी माँ को खोने के बाद रुखसाना आजकल अरनब (परमब्रत चैटर्जी) के यहाँ पनाह ले रही है. 

ऐसे समाज में जहां औरतों को डायन कह कर मार दिया जाता हो, अनचाहे गर्भ को गिराने के लिए इंसानियत गिरा दी जाती हो; प्रोसित डर के बाज़ार को गर्म रखने के लिए ऐसे ही प्रतीकों का सहारा तो बखूबी लेते हैं, पर इनको लेकर किसी तरह की कोई ठोस या गहरी बात कहने में चूक जाते हैं. फिल्म के आखिर तक आते आते, रुखसाना के किरदार के साथ दर्शकों की सहानुभूति बनाने की जोर-आजमाईश में फिल्म थोड़ी भटकती जरूर नज़र आती है, और उलझती भी; लेकिन अपने बेहतर कैमरा-वर्क, खूबसूरत आर्ट-डायरेक्शन और अनदेखे अंदाज़ की वजह से 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' उन पलों में भी एक खूबसूरत फिल्म की तरह पेश आती है, जिन पलों में उसपे डराने का कोई बोझ या दबाव नहीं होता. पर्दों के पीछे सायों का लिपटना और चिपटना क्या ही बेहतर दृश्य है! 

...और अब जिक्र अनुष्का का. फिल्म की सबसे दमदार कड़ी. हिंदी फिल्मों में 'हॉरर' को आसान कमाई और कम खतरे वाला कदम माना जाता है. ऐसे में 'हॉरर' के साथ इस तरह का नया प्रयोग करने के लिए, अनुष्का (फिल्म की निर्माता के तौर पर) को बधाई मिलनी ही चाहिए. रही बात उनके अभिनय की, तो अनुष्का उन दृश्यों में ज्यादा प्रभाव छोड़ती हैं, जिनमें उन्हें संवादों के सहारे नहीं रहना होता. फिल्म में खून-खराबा भी खूब है, पर असल टीस आपको अनुष्का के किरदार के दर्द से ही उठती है. उनकी आँखों की चमक ही कितनी बार आपको सिहरा जाती है. रजत कपूर शानदार रूप से दिल की धडकनें बढ़ाते रहते हैं. परमब्रत 'कहानी' के अपने किरदार के आस-पास ही रह जाते हैं. उतने ही सजीले, शर्मीले और सधे हुए.

आखिर में, 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' डरावनी फिल्मों में कहानी पिरोने की एक कोशिश के तौर पर सराही जानी चाहिए. एक ऐसी फिल्म, जो जेहनी तौर पर थोड़ी और बेहतर, थोड़ी और काबिल हो सकती थी, पर डर के लिए एक कसा हुआ माहौल गढ़ने में जो कहीं से भी चूकती नहीं. [3/5]  

Monday, 30 May 2016

वीरप्पन (A): बोर-प्पन, शोर-प्पन! [1.5/5]

(वीरप्पन देख चुके और देखने जाने वाले दो दर्शकों के बीच की बातचीत का एक अंश)

“सुना है, राम गोपाल वर्मा लौट आये हैं?”
“हाँ, भाई! लौट आये हैं.”
सत्या वाले?”
“कहाँ तुम भी...”
“...तो? कंपनी वाले?”
“मज़ाक न करो”
भूत वाले तो होंगे?”
“....(चुप)”
सरकार?....सरकार राज?”
“(झुंझला कर) अज्ञात वाले हैं. रक्त-चरित्र वाले हैं. आया समझ?”
“(आह भरते हुए)...चलो, आग वाले तो नहीं हैं ना!”

अगर आप भी सिर्फ इसी बात से तसल्ली कर लेने के लिए तैयार बैठे हैं कि चलो, राम गोपाल वर्मा वापस तो गए, ऐसे हाल में उनकी नयी फिल्म ‘वीरप्पन’ आपको ज्यादा निराश नहीं करेगी. आख़िरकार इसमें ऐसा कुछ अलग या अनोखा तो है नहीं, जो आपको झटका दे दे, चौंका दे. वही सब तो है जिसके लिए राम गोपाल वर्मा जाने जाते हैं और जिसके लिए आप उनके, उनकी फिल्मों के मुरीद हैं. किसी एक के कंधे से होते हुए दूसरे के चेहरे पे चढ़ता कैमरा, जिन्हें हम OTS (over the shoulder) शॉट पुकारते हैं, कानफाड़ू बैकग्राउंड म्यूजिक, एक्टिंग के नाम पर आड़े-तिरछे चेहरे बनाना और डायलॉग्स एकदम सतही-सपाट; रामू एक बार फिर अपने (उस) आप को दोहराने में सफल साबित होते हैं, जिसे हममें से कोई भी अब और बर्दाश्त करने के मूड में नहीं दिखता.

राम गोपाल वर्मा जिस शिद्दत से जुर्म की कालिख में लिपे-पुते चेहरों में अपने नायक ढूंढते रहते हैं, कुख्यात चन्दन तस्कर वीरप्पन ऐसा लगता है जैसे उन्हीं के लिए गढ़ा गया हो. एक ऐसा जीवंत किरदार जो खूंखार हो, वहशी हो, निर्मम हो और जिसका हिंसा के साथ एक पागलपन वाला रिश्ता हो, राम गोपाल वर्मा के लिए कोई और दूसरा इससे बेहतर ढूंढ पाना मुश्किल था. बेहतर होता, रामू इसे महज़ अपना ‘कमबैक’ न मान कर थोड़ा और महत्वाकांक्षी हो पाते. वीरप्पन की रोबदार मूंछों वाली छवि को परदे पर उतार भर लेने की कामयाबी से ही रामू इतने उत्साहित लगने लगते हैं कि उसके किरदार की बर्बरता को उकेरना भूल ही जाते हैं. एक-दो दृश्यों को छोड़ दें, तो पूरी फिल्म में वीरप्पन के खौफ से ज्यादा गोलियों का शोर आपको अधिक विचलित करता है. अपने आपराधिक जीवनकाल में वीरप्पन ने तकरीबन सौ पुलिसवालों की हत्या की थी, राम गोपाल वर्मा फिल्म में इस गिनती का पीछा करते थकते नहीं, मानो वीरप्पन के वीरप्पन बनने में इसी एक अदद गिनती का हाथ रहा हो.

अभिनेता संदीप भारद्वाज का हूबहू वीरप्पन की तरह दिखना और लगना अगर वीरप्पन फिल्म का सबसे कामयाब पहलू है, तो सचिन जोशी [पुलिस वाले की भूमिका में] का ठंडा अभिनय सबसे कमज़ोर. उसके ऊपर पूरी फिल्म में उन्हीं की आवाज़ के साथ कहानी का आगे बढ़ना; आप को पता चल गया होगा असली मुजरिम कौन है? वैसे फिल्म अगर कहीं आपको सचमुच बाँधने की कोशिश करती है तो वो है वीरप्पन की पत्नी लक्ष्मी का ट्रैक. स्पेशल टास्क फ़ोर्स अपने ही एक अधिकारी की विधवा पत्नी [लीज़ा रे] को लक्ष्मी [उषा जाधव] के करीब ले जाती है, जहां पूरी कहानी दोनों के इर्द-गिर्द घूमने लगती है. यहाँ भी उषा जाधव तो अपने अभिनय में सधी और संपन्न नज़र आती हैं, पर लीज़ा के लिए अभी भी अभिनय उतना ही मुश्किल लगता है जितना उनका साफ़ तरह से हिंदी बोल पाना. वो नर्गिस फाखरी की याद दिलाती हैं, अजीब अजीब तरह के चेहरे बनाती हैं, जैसे वो किसी फिल्म का नहीं, बालाजी टेलीफिल्म्स के सास-बहू सीरियल्स का एक ऐसा किरदार हों जो बैकग्राउंड में बोलना ज्यादा पसंद करता हो और बात-बात पर गर्दन टेढ़ी करके आँखें छोटी-बड़ी करता रहता हो.

आखिर में सिर्फ इतना ही, राम गोपाल वर्मा की वीरप्पन शोर बहुत करती है, कहती बहुत कम. रामू अगर बॉलीवुड में इसे अपनी वापसी का जरिया मान रहे हों, तो मैं कहूँगा आपको अभी भी कुछ दिन और एकांतवास में रहना चाहिए. मेरा इंतज़ार अभी ख़तम नहीं हुआ. “मेरे राम गोपाल वर्मा आयेंगे! ज़रूर आयेंगे!!” कब? पूछिए मत! [1.5/5] 

Friday, 12 September 2014

CREATURE (3D): ‘Khooni Darinda' by Vikram ‘Ramsay’ of 2014! [1.5/5]

There is a monster on loose in the forests of Himachal Pradesh. Allegedly it is a ‘BrahmRakshasa’ described well in Hindu Mythology as half man-half animal breed cursed by Lord Brahma and to kill it, one should have weapons dipped in the ashes of Peepal tree leaves but wait, it doesn’t work and as Rakesh Bedi gets amazed in the famous Kaayam Choorna TV Commercial, the lead protagonist admits, “Ispe toh inn goliyon ka bhi asar nahin”. Thank God, there is a Plan B mentioned somewhere! Now, we have bullets soaked in the holy water of a famous Hindu Sacred temple, that too on the most auspicious day of the year!

This is not a sleazy story in 90’s ‘Manohar Kahaaniyaan’. This is not a Ramsay Brothers B-grade horror. This is a Vikram Bhatt film labeled as ‘India’s first creature film’ and shamefully seeing light of the day in 2014. Bollywood should get a round of applause for coming so far in all these years! Silliness can be fun; absurdity sometimes does produce entertainment of some kind but so much of regressive approach! Someone somewhere definitely needs a serious therapy and in this case, my sympathies are with the makers.

CREATURE (3D) has Bipasha Basu, playing a hotelier with a past and pills to fight anxiety and the way she acts, you can make out from a mile ago that her medical condition is all made up to show her breathing heavily (…titillating for some, irritating for most) and with all the intensity. She has done masters in the same from of course the ‘Bhatt school of Horror’. You should learn from her how to start or end a conversation with a terrible vocal act of exhaling or inhaling. And if that was not enough, we have Imran Abbas Naqvi supposedly a TV star in Pakistan. Watching him acting in a ‘one expression’ mode is like paying tribute to all the John Abrahams of Bollywood. Why would you need to go out of this country to find such waste? We haven’t done with producing at our own yet.

Now let’s get back to the primary cause for what the film has eventually been made. The 10-feet tall, Hulk-mates-dinosaur, man-eating monster created in highly potent visual graphics machines. No doubt, Bollywood has never seen anything like it before. And seriously, I don’t have any issues with how well it is made or just not but in the genre of horror, there is a certain rule. You can never unleash your force of horror wide-open in daylight to just show off how efficient you were at the execution level. It’s just a week before Priyanka Chopra advised in MARY KOM, “kisi ko itna bhi mat darao, ki darr hi khatam ho jaaye”. There comes a time when you only look at it and ask to yourself, “what the hell is this?”…for the creature and the film also!

With inert songs modeled on Bhatt Camps earlier hits (‘Mehboob ki’ song of Imran’s intro is actually influenced by ‘Saanso ki jaroorat’ from AASHIQUI), terribly average dialogues and an exhaustingly irritating climax, this is a film that doesn’t deserve your attention, money or time. Vikram Bhatt was once a progeny of Mahesh Bhatt School of cinema. He is now creating one of his own, parallel to Ram Gopal Verma’s and Sajid Khan’s! You can ignore him…and the film! [1.5/5] 

Friday, 13 December 2013

JACKPOT: Poker faced entertainment! Promises everything, offers nothing! [.5/5]

Earlier in the film; when being questioned by a sluggish, lethargically slow-spoken cop played by the theatrical Makrand Deshpande, Naseeruddin Shah is seen with the name of Ram Gopal Varma on the board in the backdrop, I sink in my deep confusion if that was done in good gesture to show a great respect to the filmmaker or it was just a pun intended because this baffling camel sits neither of the sides.

The comedy con thriller ‘JACKPOT’ marks a long-awaited comeback of Kaizad Gustad- a filmmaker who, despite giving ‘Dud of the Decade’ BOOM, had shown great promises as a new-wave filmmaker [of then, at least] with his violently witty BOMBAY BOYS well before the ‘Anurag Kashyap Phenomenon’ came in to the scene. Sadly, JACKPOT disappoints at all fronts. It misses the magical touch of Gustad that used to bring the underworld in light in the most ‘unexplored before’ maniac manner. It also fails to impress with an amateurish approach in film-making.

Set in the mysteriously drugged nature of Goa, 4 con artists [Sachin Joshi & Sunny Leone plays two of them] induce a 250 Cr land-deal to the owner of the biggest casino in the city [played by Naseeruddin Shah in his weirdly ‘rope like hair strings’ getup] but in order to get things in process, they also must win the yearly poker game of 5 Cr Jackpot organized on Shah’s cruiser. They get succeeded but not the way it was planned. Now, the jackpot money is missing and everyone involved believes others are done with it. Does it not sound familiar with most of the con films? Well, even that can be overlooked if the screenplay takes the lead and provides breathtaking twists and turns to let loose your thinking horses all the time.

In the countable-on-fingers merits if I think hard, there is an impressive opening credits inspired by 007 Bond movie title sequences. Though it creates only some false conjecture to what it may come to you in next 90 minutes, it is a well-thought, nicely done part. I also can not agree more on that the duration was defiantly a big & decisive pro for me. Cinematography is strictly ok. Some one-liners are witty and remind you of the Kaizad Gustad of late 90’s but I don’t see reasons for what songs were doing in the midst of this entire supposedly crisp thriller.

For the performances, I would say you are looking for wrong thing at the wrong place. Sachin Joshi is probably the worst looking hero in recent times. He impressed most with his action sequences in AZAAN but here he depresses everyone with his unkempt, messy look and equally bad dialogue delivery [He doesn’t even bother to lip-sync the song he’s performing in]. And to top it all, he is the one who narrates the story for the most part. God bless the viewers! Sunny Leone doesn’t disappoint much as she does what she does best…and I am not talking about acting. Naseeruddin Shah repeats himself. We have seen him before in such avatar. Why he needs to opt for such scripts is unconvincing.

Overall; if this is the comeback, I would like to see Gustad resting in peace wherever he was till now. This JACKPOT makes you feel loser at the end and is something that no one wants to win. Boredom is what you get out of this poker faced entertainment! [.5/5] 

Friday, 8 November 2013

SATYA 2: Another disastrous contribution to Indian cinema…with love from Ram Gopal Varma! [1/5]

No matter what cast, creed & category you belong, you must have encountered people mostly clad in crisp ironed formals & with great vocal skills; who sure have a ‘never heard before’ plan to secure your happy life, a profitable concept to put your money in for a humongous guaranteed return or even a ‘work from home’ chain-business to join for an easy & quick solution to all your worries. Who hasn’t met a salesman before, with pamphlets & booklets to handover you on your regular bus-stand, at market place & where not?

In similar manner, we see the leading man of SATYA 2- Ram Gopal Varma’s another disastrous contribution to Indian cinema, selling off a promising concept of forming a new underworld ‘company’ that would believe in not showing off its powers but in planting its roots all over undercover to extract more in a safer way. The only problem here is, the plan may sound convincing at first but has no concrete ground to proceed further and sadly, the way it gets described and explained is nothing but an irritating- infuriating blabber all the way. As a result, you have no choice left but to snatch the pamphlet, roll it and start looking for the nearest and first dustbin to throw it away like we do with the most such plans.

Allegedly a sequel to 1998’s path breathing underworld movie SATYA of great team work (Anurag Kashyap, Gulzar, Vishal Bhardwaj), SATYA 2 unashamedly doesn’t show any connection to its prequel. In fact, it is as bad to SATYA as RGV’s AAG was to ‘SHOLAY’. The irony is both the films are in name of one filmmaker and no one can really blame or thrash out the other for being so offensive. We all have been waiting for the real RGV to come out soon but at this point of time, I would like to believe in a quite filmy situation where the real Ram Gopal Varma of RANGEELA, RAAT, BHOOT, SATYA, KAUN is now captured in somewhere and his place is now taken over by his ‘humshakal’ who’s ready to devastate all the respect as a filmmaker he had earned from left, right & centre (Trust me, this is more entertaining plot than the most of RGV’s recent failures J)

Unlike the character sensitively underplayed by J D Chakrvarthy in 1998’s hit, the new Satya in town [played by a newcomer credited as Puneet Singh Ratn for Hindi Version and as Sarwanand in Telugu] is insipid, bland & boring, mainly because of the writing. The writing is too lethargic to create sense. Imagine a narrative voice-over with pure Hindi words like ‘utpann, sarvnaash, chintan’, and in times when there is a song to be thrown in, it goes like “…and they went to Kashmir for honeymoon”. Song is over. & now it says, “…and after the honeymoon, they came back to Mumbai”. What an explanation! And who says Bollywood doesn’t show logics!!

On serious note, time has come when we should console & comfort the cinema lovers in us with a ‘hard to accept’ realization that there was a filmmaker who inevitably desired and derived us through his many prominent artworks for a potential change in Indian cinema but is now lost somewhere in the undercurrents of his own mutinous nature! 

SATYA 2 is not Ram Gopal Varma’s worst but sure a forgettable & shoddy work of substandard that kills all my hopes to see him rise & shine again! Stay Away! [1/5]

Friday, 6 September 2013

ZANJEER : Get yourself chained if you can’t hold your urge to watch but stay away! [0.5/5]

I know it is a bit exaggerated reaction but can we propose a cinema ACT or a regulation kind of thing in bollywood so that filmmakers like Ram Gopal Verma gets a ban […for shorter span at least] on making films further, after committing horrendous  crime of remaking old bollywood classics? But wait! He’s not alone there on the top […of the worsts] to enjoy all the beatings, Apoorva Lakhia joins him with his rare gem ZANJEER- a so-called official remake of 70’s Amitabh Bachchan starrer game-changer of same name! It is so disgusting that even calling it a film would mean immense disrespect to cinema.

Where the old classic, directed by Prakash Mehra was packed with good music, powerful performances, solid punches in the writing, a totally engaging story-line and possibly the need of the hour to represent anger of the youth, reciprocating in a blasting yet controlled aggressive manner to better the society,  Lakhia’s tribute goes wrong on all aspects. Neither it tries to entertain nor does it create the need to tell something or the other to its audiences. It merely looks like someone had an itch to satisfy his ‘though not found any traces of’ creative cells. It is a first in long time where everyone competes with each other not to offer their best but the worst.

Southern superstar Ram Charan plays ACP Vijay Khanna who in particular, can be seen wearing formals in day/on duty and a police uniform while being at home with his girl. That can also be cleared in explanatory debate but what about those couple of stiffed expressions on his face for most parts? Then, there is this ‘raghupati raaghav rajaram’ tune in the background whenever he decides to take a walk from the scene in slow-motion. Priyanka Chopra looks disinterested and takes her part so much for granted as if she has come for a picnic. Prakash Raj as the stylishly all docked up villain Teja bores with his one-dimensional comical portrayals of bad guys in recent. He doesn't offer anything new and that is a serious concern. Mahi Gill as Mona Darling irritates. Sanjay Dutt finds himself in shoes of Pran saab as Sher Khan but consoles with his looks only. In an added subplot, Atul Kulkarni plays an honest journalist with investigative instinct, loosely based on the real life crime journo J. Dey, murdered in suspicious circumstances.    

Overall, it is a sloppy-shoddy-shaky attempt that can only be dumped down as a trash. Watching it could make you feel like torturing yourself for all the sins you have been doing all these years. Some films accidentally entertain you with a certain level of absurdity and overtly self-indulgence; this doesn't even reach there to bring some relief. The worst of the year! Get yourself chained if you can’t hold your urge to watch but stay away at any cost! [0.5/5]