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Friday, 28 December 2018

सिम्बा: साल की सबसे वाहियात फिल्म! [0.5/5]


बहन का बलात्कार, माँ की इज्ज़त, बाप के दामन पर लगा बेईमानी और बदनामी का दाग; अस्सी और नब्बे के दशक में हिंदी सिनेमा के नायकों की एक पूरी खेप इस फ़ॉर्मूले की छत्र-छाया में पलती-बढ़ती आई है. ‘त्रिशूल और ‘दीवार के बच्चन जहाँ सिनेमा की मुख्यधारा में ‘गंगा जमुना सरस्वती तक, समीक्षकों से लेकर समर्थकों तक, सबके चहेते बने रहे, बाद के सालों में ‘आदमी और ‘फूल और अंगार’ जैसी फिल्मों के साथ मिथुन ने भी आम जनता में अपनी पैठ काफ़ी मज़बूत की. एक वक़्त तो ऐसा भी गुजरा है कि मिथुन की फिल्मों में बहन का होना ही फिल्म में कम से कम एक बलात्कार के सीन होने की गारंटी समझा जाने लगा था. खैर, कई सालों से रह रह कर ग़लतफ़हमी सी होने लगी थी कि हिंदी सिनेमा अपने उस बजबजाते हुए गंदे-बदबूदार दौर से बाहर निकल आया है, और अब उस तरफ लौटकर दोबारा देखने की हिमाकत भी शायद ही करेगा!

सर पीट लीजिये, क्यूंकि रोहित शेट्टी ने बड़ी बेहयाई से ये कारनामा कर दिखाया है. फ़ॉर्मूला फिल्मों के शहंशाह और नए दौर के ‘मनमोहन देसाई बनने की शेखी में शेट्टी 2018 में, जहां महिला-सशक्तिकरण के प्रचार-प्रसार के लिए सब ऐंड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, बलात्कार जैसे गंभीर मुद्दे को न सिर्फ अपनी फिल्म के टुटपूंजिया नायक को ‘अच्छा साबित करने की कोशिश में खर्च कर देते हैं, बल्कि अपनी कमअक्ली और असंवेदनशील समझ के जरिये (बॉक्स-ऑफिस पर) धन-उगाही के लिए भी ख़ूब निचोड़ते हैं. हालाँकि शेट्टी से उम्मीदें किसी की भी कुछ ज्यादा यूं भी नहीं होती हैं, फिर भी अपने बेवजह के एक्शन और बेवकूफाना स्टंट्स के मायाजाल को छोड़ कर जिस बेशर्मी से वो बलात्कार पर समाज को नैतिक शिक्षा का सबक सिखाने निकल पड़ते हैं, ‘सूप और छलनी’ वाली कहावत याद आ जाती है. पिछली फिल्मों का संज्ञान न भी लें, तो रोहित शेट्टी अपनी इस फिल्म में भी महिलाओं के प्रति शर्मनाक रवैया ज़ाहिर करने से बाज़ नहीं आते, वरना बलात्कार की पीड़िता की हत्या का शोक मनाने बैठे लोगों के बीच नायक से ‘चार दृश्यों और इतने गानों की मेहमान’ नायिका को ‘एक अच्छी सी चाय पिला दो का आदेश दिलवाने का क्या तुक बैठता है? सिर्फ एक, या तो फिल्म के लेखक और निर्देशक हैं ही इतने कमअक्ल या फिर उनका फिल्म में इस्तेमाल ‘फेमिनिस्ट एप्रोच सिर्फ एक ढोंग है और कुछ नहीं?

संग्राम भालेराव (रणवीर सिंह) एक महा-भ्रष्ट पुलिसवाला है, जो पैसे के लिए ही इस महकमे में शामिल हुआ है. अपराधियों (सोनू सूद) के लिए ज़मीन खाली करवाने से लेकर उनके ड्रग्स के कारोबार में आँखें मूँद कर मदद करने तक, भालेराव पैसे के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है. उसके सर पे बिजली तभी गिरती है, जब उसकी मुंहबोली बहन का बलात्कार उसके ही आकाओं द्वारा अंजाम दिया जाता है. रिश्वत को सही ठहराने की दलील में ‘कोई रेप थोड़े ही न किया है का दंभ भरने वाला अचानक ही अपने आसपास की औरतों से बलात्कारियों की संभावित सज़ा पर राय लेने उठ खड़ा होता है. साथ ही, गुंडों को ताबड़तोड़ पीटते हुए ‘वो मेरी बहन थी, वो मेरी बहन थी का मन्त्र भी जपने लगता है. अदालत में पैरवी करते वक़्त भी बलात्कार के भयावह आंकड़ों को पेश करते हुए उसकी मुट्ठियाँ तन जाती हैं, और आप बस यही सोचते रहते हैं कि अगर वो लड़की इस घटिया पुलिस वाले की बहन न होती तो इन आंकड़ों का आज कहाँ अचार बन रहा होता?

हिंदी सिनेमा का एक वर्ग है, जो अपनी सोच का दायरा जाने-अनजाने बढ़ाने से कतराता है. ‘सिम्बा में गिनती के एक या दो दृश्यों को छोड़ दें, तो पूरी फिल्म में कुछ भी ऐसा नहीं है जो आपने बीस-तीस साल पहले ही हिंदी फिल्मों में न देख लिया हो. ‘घटना के वक़्त तो मुलजिम शहर में ही नहीं था’ जैसी दलीलें सुनकर जब भालेराव अदालत में चौंकता है, तो मन करता है कि एक थप्पड़ लगाऊं और पूछूं कि फिर किस बात का बॉलीवुड फैन है, रे, तू?? ऊपर से संवाद भी इतने घिसे-पिटे कि आप खुद ब खुद किरदारों के साथ दोहराते जाएँ. ये वो फिल्म है, जहां लड़की गुंडों के अड्डे पर पहुँच जाती है, और पकड़े जाने पर ‘मैं अभी जाकर पुलिस को सब बता दूँगी अक्षरशः दोहरा देती है. ये वही वाली फिल्म है, जहां बलात्कारियों के इकबालिया बयान के लिए उन्हें बार-बार ‘नामर्द और ‘नपुंसक बोल बोल उकसाया जाता है. और यही वो वाली फिल्म भी है, जहां खलनायक अपने माँ, बीवी, बच्चों के सामने अपने धंधे की बात करने से झिझकता है. तो, अपनी अपनी याददाश्त के हिसाब से फिल्म का नाम चुनिए, और बैठ जाईये मेल कराने.

‘सिम्बा में, पुलिसवालों की बीवियां, बेटियाँ, बहुएं दोपहर के खाने के वक़्त अक्सर टिफिन लेकर थाने में हाज़िर हो जाती हैं, और फिर जिस तरह का हंसी-ठट्ठे से भरपूर घरेलू माहौल जमता है, लगता है जैसे आप अचानक रोहित शेट्टी की फिल्म से निकल कर सूरज बड़जात्या की फिल्मों में दाखिल हो गये हैं. इस एक ग़लतफहमी का सुख उन सब दुखों पर भारी पड़ता है, जहां फिल्म बलात्कार पर प्रवचनों की झड़ी लगा देती है. कभी जज साहिबा के मुंह से, तो कभी अपने महिला सह-कलाकारों के जरिये! अभिनय में, रणवीर की जिस ऊर्जा का अक्सर सब जिक्र करते हैं, भरपूर मात्रा में है. इस आदमी को एक बंद कमरे में रख कर गुपचुप भी शूट कर लो, तो कुछ न कुछ मनोरंजक निकल ही आएगा, लेकिन क्या ये वो फिल्म है जिसमें हमें रणवीर की उस ऊर्जा का जश्न मनाना चाहिए? बिलकुल नहीं.       

आखिर में; एक आजमाया पैमाना बताता हूँ. जिस फिल्म में अश्विनी कल्सेकर की अदाकारी आपको हताश करे, उससे किसी भी तरह का कोई उम्मीद मत रखिये. ‘सिम्बा अपनी मौलिक तेलुगु फिल्म ‘टेम्पर का बहुत कुछ अपनाते हुए भी आखिर का नाटकीयता भरा अंत छोड़ कर अपनी ही एक बेहद साधारण अंत का चुनाव करती है, जिसमें अजय देवगन जैसे स्टार की भूमिका पर ज्यादा दांव खेला गया है. इसे आप रोहित शेट्टी की ‘हिट खोजने की तरफ एक और समझदारी के नजरिये से भी देख सकते हैं. इतना महिमामंडन बहुत है, आज के ज़माने का ‘मनमोहन देसाई’ कह कर मनोरंजन के फ़ॉर्मूले का मखौल मत उड़ाइये! साल की सबसे वाहियात फिल्म!! [0.5/5]   

Wednesday, 25 January 2017

काबिल: ना‘काबिल’-ऐ-बरदाश्त! [2/5]

संजय गुप्ता की ‘काबिल’ देखते वक़्त अक्सर मिथुन चक्रवर्ती और उनकी कुछ बहुत बेहतरीन फिल्मों की याद बरबस आ जाती है. लगता है, जैसे अभी भी मिथुन दा का ज़माना पूरी तरह गया नहीं. ‘आदमी’, ‘जनता की अदालत’, ‘फूल और अंगार’ जैसी फिल्मों को परदे पर धूम मचाते देखते हुए अभी गिन-चुन के सिर्फ 24-25 साल ही तो गुजरे हैं. भ्रष्ट राजनेताओं और उनके तलवे चाटते पुलिस महकमे से तमाम जुल्म-ओ-सितम का बदला लेने के लिए जब मिथुन दा कमर कस के खड़े होते थे, अचानक जैसे बलात्कार की शिकार उनकी बहन अपनी बहन लगने लगती थी, और अर्जुन, गुलशन ग्रोवर, हरीश पटेल जैसे गुंडे अपने ही जानी दुश्मन. सिनेमा की ताक़त ही यही होती है. पर सवाल सिर्फ इतना है कि अगर उन तमाम फिल्मों को घोर लोकप्रियता के बावजूद आज हम ‘बी-ग्रेड सिनेमा’ की श्रेणी में रखते हैं, तो ‘काबिल’ को भी इस काबिल क्यूँ नहीं समझा जाना चाहिए? या फिर शायद हमें इसके लिये 24-25 साल और इंतज़ार करना होगा.

संजय गुप्ता कोरियाई फिल्मों के मुरीद रहे हैं. गाहे-बगाहे कभी चुरा कर, तो कभी 56 इंची सीने के साथ रीमेक अधिकार खरीद कर उन्हीं फिल्मों को हिंदी में ज्यों का त्यों परोसते रहे हैं. ऐसे में विजय कुमार मिश्रा की तथाकथित ‘ओरिजिनल’ स्क्रिप्ट पर फिल्म बनाने का उनका फैसला ऐतिहासिक माना जाना चाहिए. रोहन भटनागर (हृतिक रोशन) देख नहीं सकता, पर वो सुन सकता है, सूंघ सकता है, स्टूडियो में बिना देखे कार्टून शोज़ की परफेक्ट डबिंग कर सकता है. सुप्रिया (यामी गौतम) भी देख नहीं सकती, पर लिपस्टिक और ऑयलाइनर इस्तेमाल करने में कभी कोई गलती नहीं करती. दोनों एक-दूसरे से बात करते हुए बगल में रखे गमले को एकटक, बिना पलक झपकाए, चौड़ी खुली आँखें से देखते रहते हैं, ताकि आपको उनका ‘न देख पाना’ हमेशा याद रहे. दोनों की हंसती-खेलती जिंदगी में भूचाल तब आता है, जब एक लोकल गुंडा (रोहित रॉय) अपने बाहुबली नेता भाई (रोनित रॉय) की शह पर सुप्रिया का बलात्कार कर देता है. भ्रष्ट सिस्टम के सामने बेबस, लाचार रोहन के पास अपनी बीवी पर हुए अत्याचार का बदला लेने के लिए अब सिर्फ एक ही रास्ता है, कानून अपने हाथ में ले लेना.

बलात्कार जैसा घिनौना और ज्वलंत मुद्दा हो या ‘नेत्रहीनों’ के प्रति सही रवैया रखने-दिखाने की कवायद, ‘काबिल’ निहायत ही उदासीनता का परिचय देती है. फिल्म अपनी ओर से तनिक भी कोशिश नहीं करती कि आप इन दोनों मुद्दों से जुड़ने का साहस दिखाएं. सब कुछ बस आपकी अपनी संवेदनशीलता पर टिका रहता है. कहाँ तो आपको इन दोनों किरदारों के लिए ज़ज्बाती होने की सुविधा मिलनी चाहिए थी, पर होता उल्टा है. ऐसा लगता है जैसे संजय गुप्ता की सारी कवायद सिर्फ इस एक बात में लगी रहती है कि ‘नेत्रहीन’ भी फ़िल्मी नायक-नायिकाओं की तरह हर वक़्त सजे-धजे हो सकते हैं. फिल्म अपने पहले हिस्से में अगर आपको किरदारों से जोड़ने में चूक जाती है, तो भी आपको इंटरवल के बाद ये उम्मीद रहती है कि फिल्म अब रोमांचक होने के साथ-साथ थोड़ी समझदार होने की भी हिम्मत दिखायेगी, पर धीरे-धीरे आपको हृतिक में मिथुन की छवि दिखने लगती है, तो ये रही-सही उम्मीद भी टूटती जाती है.

हृतिक रोशन किरदारों में ढल जाने के लिए जाने जाते हैं, और हालाँकि फिल्म में बस वही हैं जो अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में अव्वल रहते हैं (रोनित रॉय ऐसे दूसरे एकलौते कलाकार हैं), पर फिर भी एक साधारण एक्शन हीरो से ज्यादा कुछ कर गुजरने से बचते फिरते हैं. एक अच्छी कहानी होने के बावजूद, अत्यंत सामान्य स्क्रीनप्ले के साथ उनसे इससे ज्यादा की उम्मीद करनी भी नहीं चाहिए. मराठी कार्पोरेटर की भूमिका में रोनित न सिर्फ भयावह लगे हैं, बल्कि एकदम सधे हुए भी. बोल-चाल हो या हाव-भाव, वो अपने किरदार से तनिक भी अलग-थलग नहीं पड़ते. यामी गौतम खूबसूरत लगने के अलावा कुछ और नहीं करतीं. रोहित रॉय ठीक-ठाक हैं, तो नरेन्द्र झा और गिरीश कुलकर्णी प्रभावी.

अंत में, ‘काबिल’ हृतिक के काबिल कन्धों पर टिके होने बावजूद एक इतनी आम फिल्म है, जो न ही आपको इमोशनली जोड़े रखने में कामयाब होती है, न ही इतनी स्मार्ट कि आप अपनी सीट से अंत तक चिपके रहें. मिथुन दा साइकिल की आड़ में छुपकर दुश्मनों की गोलीबारी से बचते रहें? चलता है, पर दुश्मन की थाह पाने के लिए हृतिक पूरे फ्लोर पर चिप्स और पॉपकोर्न बिखेर कर अँधेरे में दुश्मन का इंतज़ार करें? नहीं चलता, बॉस! आप तो कोरियाई ‘रीमेक’ ही बनाओ...ओरिजिनल के नाम पर हमें बस और मत बनाओ! [2/5]          

Friday, 22 July 2016

कबाली: सुपर-साइज़ बोरियत!! [1/5]

मैं ‘कबाली’ देखने आया हूँ. हिंदी में. मुंबई में. परदे पर सुपरस्टार रजनीकांत की एंट्री हो चुकी है. कैदियों की पोशाक में किताब पढ़ते हुए, अपनी कोठरी से निकलते हुए और बाकी के एक-दो कैदियों से हाथ मिलाते हुए उनका चेहरा, उनके हाव-भाव की एक झलक मिल चुकी है, पर अभी तक सिनेमाहाल में मौजूद उनके प्रशंसकों में किसी तरह का वो अकल्पनीय उत्साह देखने को नहीं मिला. रुकिए, रुकिए! थोड़ी हलचल हो रही है. रजनी सर ब्लेजर डाल रहे हैं. काले चश्मे आँखों पर चढ़ने लगे हैं, अब ये पूरी फिल्म में वहीँ रहने वाले हैं. रजनी सर ने स्लो-मोशन में कैमरे की ओर बढ़ना शुरू कर दिया है. इंतज़ार ख़तम! सीटियाँ, तालियाँ भीड़ की आवाज़ बन गयी हैं. मैं अपने आस-पास देख रहा हूँ. परदे से आती चकमक रौशनी में नहाये चेहरे जाने-पहचाने लग रहे हैं. ‘भाई’ को ‘भाई’ बनाना हो या रवि किशन को ‘भोजपुरिया सुपरस्टार’, यही चेहरे काम आते रहे हैं. कुछ को मैंने संत-समागम जैसी जगहों पर भी नोटिस किया है.

खैर, स्टारडम का जलवा यहाँ तक तो ठीक था. ढाई घंटे की फिल्म में ऐसे चार या पांच मौके भी आ जाएँ तो ज्यादा शिकायत नहीं होगी. पर ‘कबाली’ शायद आपके सब्र का इम्तिहान लेने के लिए ही बनायी गयी है. फिल्म-स्कूलों में सिनेमा पढ़ रहे किसी भी एक रंगरूट को अगर चार ठीक-ठाक ‘गैंगस्टर’ फिल्में दिखा कर एक वैसी ही फिल्म लिखने को कह दिया जाए तो शायद ‘कबाली’ से ज्यादा बेहतर स्क्रिप्ट सामने आ जाए. हैरत होती है कि ये वही साल है जब मलयालम में राजीव रवि की ‘कम्माटीपादम’ जैसी बेहतरीन गैंगस्टर फिल्में भी बन रही हैं. ‘कबाली’ की सबसे ख़ास बात अगर फिल्म में रजनी सर का होना है तो फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी भी वही हैं. कुछ जबरदस्त डायलाग-बाजी के सीन, पंद्रह-बीस स्लो-मोशन वाक्स और स्टाइलिश ड्रेसिंग के अलावा स्क्रिप्ट उन्हें ज्यादा कुछ कर गुजरने की छूट देता ही नहीं.

गैंग-लीडर और ‘पढ़ा-लिखा गुंडा’ कबाली [रजनीकांत] 25 साल से मलेशिया की जेल में बंद है. उसकी गर्भवती बीवी को उसके दुश्मनों ने मार दिया है. बदले की आग में कबाली ने भी चाइनीज़ माफ़िया और अपने ही गैंग के कुछ गद्दारों के खिलाफ जंग छेड़ दी है. साथ ही, वो एक ‘बीइंग ह्यूमन’ जैसा एन जी ओ भी चलाता है, जो ड्रग्स और दूसरे गैंग्स में काम करने वाले नौजवानों को सुधार कर अपने गैंग में ‘रिप्लेसमेंट’ की सुविधा भी देता है. पूरी फिल्म में आप सर धुनते रह जायेंगे पर ये जान पाना आपके बस की बात नहीं कि आखिर कबाली का गैंग ऐसा क्या करता है जो दूसरे गैंग्स से अलग है?

फिल्म का स्क्रीनप्ले इतना बचकाना और वाहियात है कि कभी कभी आपको लगता है आप रजनीकांत की नहीं, हिंदी की कोई बी-ग्रेड एक्शन फिल्म देख रहे हैं. इंटरवल के बाद के 20-25 मिनट सबसे मुश्किल गुजरते हैं जब कबाली को पता चलता है कि सालों पहले मर चुकी उसकी बीवी अभी भी जिंदा है और वो उससे मिलने जाता है. ये वो 20-25 मिनट हैं जब फिल्म फिल्म नहीं रह कर, टीवी के सास-बहू के सीरियल्स का कोई उबाऊ एपिसोड बन जाता है. फिल्म में गोलियों से छलनी होने के बाद भी कोई जिंदा बच गया हो, ये सिर्फ एक या दो बार नहीं होता. बल्कि इतना आम हो जाता है कि जब अस्पताल में एक बुरी तरह घायल गैंग मेम्बर को राधिका आप्टे दिलासा देती हैं, “तुम्हें कुछ नहीं होगा’, आपका मन करता है आप खुद उसका गला घोंट दें और कहें, “रजनी सर का समझ आता है. इसको कैसे कुछ नहीं होगा?” लॉजिक को किसी फिल्म में इतनी बार दम तोड़ते मैंने शायद किसी मिथुन चक्रवर्ती की फिल्म में ही देखा होगा.

कबाली’ में एक ही बात है जो कहीं से भी अटपटी नहीं लगती, और वो है रजनी सर का ‘प्रेजेंट’ और ‘रेट्रो’ दोनों लुक. परदे पर उनका करिश्मा अभी कहीं से भी कम नहीं हुआ है, जरूरत थी बस एक अदद स्मार्ट स्क्रिप्ट की और बेहतर निर्देशन की. आखिर कितनी देर आप बस यूँही किसी को निहारते, घूरते रह सकते हैं? ढाई घंटे तक?? बिलकुल नहीं! [1/5]   

Saturday, 31 January 2015

HAWAIZAADA: Get some air! [1.5/5]

As defined on the ‘know-it-all’ Wikipedia online page; coffee table books are an oversized art & literature piece, positioned best in the shelf to inspire conversation. Subject matter is predominantly non-fiction and pictorial. Nothing changes if you dare to compare the same with debutante writer-director Vibhu Puri’s highly ambitious HAWAIZAADA. Both can make you mesmerized with their picture-perfect, magnanimously shot visuals in its in-detailed presentation but that’s it. There is hardly any room for content there. So, keep flipping the pages till you find the levels of your enthusiasm fading down to minimum. And then, leave it for another. These days, they have plenty in stores for you.

Despite having great possibility of being a well-intentioned period drama-cum-thrilling biopic, HAWAIZAADA offers nothing but plain air sure more than what you buy in your favorite wafer pack at the shop around the corner. Before Wright Brothers could go beyond imagination and invent an airplane, there was an enthusiastic Indian named Shivkar Bapuji Talpade who deserved all the respects for being the real pioneer. A plot fascinating enough for a motion picture, no second thoughts on that! But then you have to see what Vibhu does with that further.

Take inspirations from Sanjay Leela Bhansali’s extravagant Victorian era-inspired hugely unbelievable sets; make your leading character as dynamic, animated and charming as if he’s not from a historic background but out of a fairytale and then put plenty of gloss in everything that comes in your way. It has been a confirmed Midas touch for Bhansali’s fictional outings. Vibhu, one of his worthy successors tries the same with a biopic and fails miserably. You are left in constant doubts as to appreciate the efforts of such gigantic talents of the industry or to mourn the opportunity getting wasted on such large scale.

Rajesh Khanna says in Hrishikesh Mukherjee’s ANAND, “Yeh duniya ek ranmanch hai, jahaanpanaah…aur hum sab iski kathputliyaan” (The world is a big stage, my lord…and we all are nothing but the puppets). I have never seen a biopic so theatrical that you just want to remove the disclaimer and enjoy it as a fictional drama. This Bombay of 1895 never looked so decked up. Shastry [Played by Mithun Chakraborty] as a cranky scientist lives in a dumped ship on the shore and it is barely any lesser than a well-established museum.

On the performances, Ayushmann Khurrana charms with his trademark flirtatious looks and killing smile. I hoped to see the compliments like ‘Awww, how cute he is!’ getting up the next level with ‘Wow, how good he acts!’ but looks like I have to wait a little more. Pallavi Sharda of BESHARAM fame is better than her last. Mithun repeats himself but doesn’t fail at all. For the rests, it’s the child actor Naman Jain and Jameel Khan who show some kind of believability to their characters.

Having said that, HAWAIZAADA does have some of the most impressive efforts on the set-designing & writing front [dialogues & lyrics never fall short of expectations] but the completely off-track romance, bumpy screenplay, lack of much-needed realistic approach and the overtly dramatic Broadway like production-style make it a droning, dull and monotonous watch. [1.5/5]             

Friday, 8 August 2014

ENTERTAINMENT: A new low in entertainment! Lackluster comedy of absurdity!! [1.5/5]

Do not judge a book by its cover and a film by its title, especially if it stars Akshay Kumar. Writer duo Sajid-Farhad’s first outing in direction ENTERTAINMENT sees a new low in the promised territory. With humor largely based on word-play one liners, plot that hardly believes in being logical and performances having tough time to justify even calling them one; it is just another slap-stick, mindless & lackluster comedy of absurdity Akshay Kumar is known to be a master of in recent past. Of course, a lovely addition of a cute dog in the plot is something new & unusual from his rests but that’s it.

Sounding like a film funded and supported by Maneka Gandhi- the famous animal rights activist, ENTERTAINMENT sets a new benchmark in bromance with Akshay Kumar bonding with a rich & wealthy dog smart enough to read books and acts accordingly to defend itself. In a very much Bollywood fashion, Akhil Lokhande [Played by Khiladi Kumar] comes to know of his real father being a Diamond King in Bangkok but till the time he could reach to claim his dead father’s 3000 Cr Empire, a dog named Entertainment has been given all of it in his last will. Rest is how this loyal friend of man wins hearts and after several failed attempts of Akhil trying to kill the dog, the both bonds like any other melodramatic affiliation Bollywood could come up the best.

Sajid-Farhad being a successful duo of writers with more than a couple of 100-Cr films in their kitty, film starts off good with jokes flowing all over; mostly mouthed by TV comic star Krushna playing a partner-in-crime to Akshay. His one-liners that include names of Bollywood actors twisted & linked with the sentences he speaks succeed in tickling you at most but after a point; you don’t really care for him as the mindless plot has already given you much numbness to feel any sensation. Get a flavor of it here so that even you don’t like to buy the tickets, you can have a hint of it…‘I Rajni-can’t believe this’, ‘lag gaya na tujhe A-shock Kumar’, ‘kahaan ja reha hai sonakshi Seen-ha taan ke’ and so on. You may also see it as his extended ‘comedy circus’ act.

ENTERTAINMENT slips off from its track to entertain soon after the intermission when story gets zoomed in to Prakash Raj and Sonu Sood playing Karan-Arjun, overtly emotional villainous brothers with memories of mother holding them together on the lines of Rakhi Gulzar’s character in KARAN ARJUN. Akshay gets into fight mode and then comes the typical Bollywood climax in the hospital where patient is declared dead but punching him hard on the chest in state of rejection could bring him back in life. Medical science has certainly contributed a lot in our happy endings!

Film also doesn’t leave anyone barred from making fun of their caste, colour & creed. So Johny Lever playing the legal advisor named Habibullah constantly faces wrong pronunciations of his name including ‘Gorilla’ ‘Lulla’ and what not! You can hear an ‘azaan’ like sound in the background whenever he’s hurt. At last, it is nothing but a directionless shot to force the ill-shaped meaning of ‘Entertainment’ i.e. hitting the 100 Cr mark anyhow, by any means. As Krushna’s Character would speak, “Iss film se entertainment ki Aasha Parekh ki, toh aapke dimaag ki Anupam Kher nahin’! [1.5/5]    

Friday, 25 July 2014

KICK: Have faith in God aka Salman & you might enjoy him taking you for a ride! [2/5]

Many describe most of the mass-entertainers a ‘paisa-vasool’ film. I really want to know what this reckless term is all about. Does a ‘dhaansu’ entry of the hero pay you back a 50 rupee note? How much a Nargis Fakhri item number is worth of, accordingly? And how to evaluate all those silly fight sequences and an emotional backup to the story to justify all the ridiculous actions our hero does?? I am still trying to locate my ‘paisa’ spent on Sajid Nadiadwala’s KICK in my wallet, if it’s come back! No, it’s not there yet! My ‘Paisa’ is not ‘Vasool-ed’.

Getting into direction with a Salman Khan film is one of the wisest decisions Sajid would ever have made. The man who knows it all [Sajid being the most celebrated Film producer] meets the man who does it all [Salman is known for that] and the outcome is all set to break records on box-office but not without testing your patience and questioning your intelligence. The man in question here is nothing but God to his fans. Everything he does on screen robotically becomes believable and justifiable. Otherwise, who would have the guts to propose a name like ‘Devi’ to a character played by Salman Khan? (No offence to women out there!)

So, he’s a good-hearted guy who endorses alcohol ferociously and gets offended by the idea of being a ‘Ghar Jamai’ though he has nothing to be proud of except, of course a good ‘being human’ heart. Wow, how manly he is! Only thing he seeks from life is a kind of adrenalin rush and he can really go far for that. Even stealing from the riches becomes one of the mediums to achieve one such kick. Reminds of DHOOM 3? Why not, it is a distant cousin to that in many aspects. Replacing one accented leading lady with the other irksome victim of same disorder could be one.

KICK also suffers from a bunch of ironies. One that leaves you in splits is when Devi [the Salman Khan] is repeatedly called a ‘headache’, ‘torture’ and ‘unjhelable’ by none other than his girlfriend. Was she referring to the film? I hope so. In one of the last scenes, Salman is seen dancing on ‘Saat Samundar Paar’ from VISHWATMA. This is undeniably the sweetest and cutest tribute to Divya Bharti from his husband Sajid but the irony doesn’t find a place to hide that the yesteryear actress’s suspicious death has drinking habits as allegedly one of the main causes and this whole sequence encourages drinking like there’s no one watching. Awful! 

On the performance meter, it’s Randeep Hooda who brings in the most controlled performance. For making himself confidently able to stand against someone like Salman in a film designed for Salman, Hooda deserves it. The most annoying of the lot is Nawazuddin Siddiqui. His weirdly wicked act of a villainous laugh is so old-fashioned and maddening to hear one after another. As for as Salman is concerned, he is hardly concerned about it! As a true ardent fan, we should not look for logics in whatever he does like after so much criminal cases against him, he’s seen wearing a police uniform at the end; to make it loud and clear that, “Do not try understanding me!” Well, I dare not! And you better not if going for it! [2/5] 

Friday, 25 April 2014

KAANCHI: Average mash-up of uninspiring Events! The old Ghai is missed! [2/5]

It is said that once Charlie Chaplin entered a Chaplin look-alike contest and came second in impersonating himself, now that’s an excellent example of compliment for the artist. But if the showman Subhash Ghai wants to make a Subhash Ghai film and ends up making it look like some hardcore fanmade job, it doesn’t leave much scope for any admiration. His latest KAANCHI is a strictly average mash-up of uninspiring events lifted and borrowed mostly from his own works in the past.

KAANCHI tells us about a simple, straightforward and bold girl from some remote village in Uttarakhand [Ghai’s new discovery Mishty], who doesn’t think twice before standing up against the injustice. When a corrupt politician [Mithun Chakraborty] and a rich businessman [Rishi Kapoor in a Malya inspired character], the brothers-cum-partners in crime join hands to grab an illegal land-deal, Kaanchi’s love-interest Binda [PYAAR KA PUNCHNAMA fame Kartik Tiwari] takes the torch to bring them out in the light. Meanwhile, the infatuated son and worthy successor of the evil forces has lusty intentions towards Kaanchi. The fate has worst for her in its kitty but it’s the undying determination that makes her constantly move forward in this fight against injustice.

With a strong likeness of TAAL and PARDES in visual representation and the happening of the events in the film, there is hardly any scene that is not seen before on screen. It is clearly evident that Ghai still lives and breathes in the same world he was in 10-15 years back. No signs of evolution registered! The sights of villagers singing and dancing in chorus on a big community ground having tricolors in their hands are so so done to death. There is no escape for you from watching our leading lady seducing the villain to acquire some important information kept in a micro SD card and if that doesn’t prove to be the cause of death of your interest in the film, you will have to witness another baddie kidnapping family members of the other side. Am I in 2014 or transported in 70’s Bollywood??

On the performances, the new find Mishti looks fresh and a stunning treat for camera lenses and viewer’s eyes. About acting, all I can say is she’s confident but a long way to gain other’s in her. Kartik impresses in his comparatively shorter role. Rishi Kapoor and Mithun Da do it with ease, since that come with the experience they have but their roles will not be much of an unforgettable experience. If anyone who really gets into the skin of the character, it is Chandan Roy Sanyal as a corrupt cop-turned-good helping soul to Kaanchi. He brings life to every frame he’s in.   

Talking about a Subhash Ghai Film and not mentioning its music? Now, that’s another shame. Ridiculous lyrics [one goes like, “Tu mushtanda tu sexy, tu chalti phirti taxi"], lackluster tunes and a totally average album!! I wish you could watch the weirdest medley of the year titled as ‘Kambal ke neeche’ where Mahima Chaudhary makes a special appearance! It’s hard to sit through such idiocy in times where we intent to talk about changing times and still go back to old formulas for safe way of entertainment.

To put this in short, KAANCHI is a 2 hour 30 min long missing report where we see all our hopes to find glimpse of the Subhash Ghai style of filmmaking die sooner or later! Disappointing!! [2/5]   

Friday, 14 February 2014

GUNDAY: Drama drives a bumpy ride! Story thrown to back seat!! [2.5/5]

If 70’s hit box-office formula, exploited mercilessly later in 90’s, of macho-giri, hero-panthi & solid dialogue-baazi could still guarantee an out-sized rage in entertainment, YashRaj film’s GUNDAY would have easily been a winner all the way but what it misses out in translation is the unforeseen elements in the plot. So, GUNDAY- the saga of love, friendship & betrayal remains limited and disappoints for the most part.

In a GANGS OF WASSEYPUR-ish docudrama style of narration, Irrfan playing a confident cop takes us back in 1971’s Bangladesh where 2 young guns are forced to flee and find a shelter in Calcutta only to rise as the second most famous [infamous would do the justice] craze after the monumental Howrah Bridge. These so-called ‘local Robinhoods’ & the biggest goons of their times [Ranveer playing Bikram and Arjun being Bala] are into every illegal business in the list. So far so good, but then the next chain of events is not very tricky to track down when both fall in ‘sachche wala pyaar’ with the same girl [Priyanka Chopra sizzles as a cabaret dancer]. Film gets derailed from being a hardcore anti-hero film to bring down the dysfunctional system to a typical romantic triangle with an outdated pinch of betrayal and misunderstandings coming in the way of friendship and love.

Setting a story in 70’s-80’s brings plenty of interesting nuances in the plot to rejoice. Rajesh Khanna is mentioned as a superstar girls fall for, for more than once. Mithun da’s dance moves are hard to ignore in choreography. Bappi Lahiri’s voice is prominently used to catch the bong-connection. The colors and characters also smell rustic & next-door [One specific character can’t stop himself addressing his bloodthirsty rival as ‘dada’]. Obviously the direction is on the right track but obviousness in plot kills the grandness of GUNDAY. Why to borrow [Copy-paste] from storylines that are done-to-death? I don’t have any clue and I guess the thinking tanks behind this would also not have a justification.

Film if manages to hold your attention, despite being tad lengthy by at least 15-20 minutes, the credit goes to its production value which makes it a grandeur explosion of drama on screen, the performances mainly of Irrfan who is regular but delightfully charming with some of the cheesiest lines and an attitude that becomes skin to the character and last but not the least the high-voltage drama. Whatever happens here happens in a slow-motion technique. Everyone appears from a hazy-foggy-smoky background. Punches hit the chiseled body in high-speed. In the rest, Ranveer outshines with a good performance. Arjun impresses but not without showing limitations as an actor. Priyanka does it the way she’s known to.

Overall, Ali Abbas Jafar’s glorification of anti-heroes ends up in a lengthy bumpy ride that is enjoyable in parts, grand in looks but definitely not worthy enough to be a descendant of bygone era’s masala/mass entertainers. Watch it if your idea to celebrate Valentine’s Day is nothing else but to see two shirtless men fighting for one girl. [2.5/5]  

Wednesday, 16 October 2013

BOSS: Another milestone in senseless action-comedy aimed to touch 100 Cr mark! [2/5]

First rejoinder:

I don’t recall when was the last time I wanted to cheer for the villain beating the hero to his guts out till I sensed myself ready to whistle for Ronit Roy in his final collision with Akshay Kumar in Anthony D’Souza’s BOSS. Reasons could range from my fondness for the prior [Thanks to Motwane’s UDAAN] to his completely black yet the most consistent performance in the film or it could also be my ‘controlled till now’ patience blasting and demanding nothing but someone from the cast taking a stand and whipping-thrashing & battering the character of Akshay Kumar for all the mindless action he does in the film. For me, the performance of DCP Ayushman Thakur played by Ronit Roy is my takeaway from the film! Rest is forgettable!

What is it?
Exactly. What was it? at the most, plot could be described best as a distant relative of all the recent mindless potboilers including Akshay Kumar’s own Rowdy Rathore, Khiladi 786 and hundreds of late 80’s Dharmendra/Mithun chakraborty popular action entertainers. No wonder, in the similar manner you see the hero being introduced as ‘in & as’ format only after 30 odd minutes in the film followed by opening titles in another 10-12 mins after.

Surya- the black sheep in the family of ‘adarshwadi Masterji’ of Banares [played by Mithun Chakraborty], is now in safe but dirty hands of Crime-syndicate Tauji of Haryana [Danny Dangzopa]. 15 years later, Surya [the one & only Akshay Kumar] emerges into a self-loved transporter who bashes up all the goons to save poor villagers but ironically also wears the hat of a money-driven contract killer. In one alike situation, he’s given instructions to kill none other than his younger brother. Shockingly, father also doesn’t have much option left than dragging his abandoned son into this with his powers to save the kid and thus starts the final journey to a picture-perfect happy ending sans my favorite villainous brother of the bride J

How is it?
Films like BOSS are made to run on the star-power, so it is all the way an Akshay Kumar film. You don’t really have to use your mental muscles to imagine in what manner the action, jokes or for that matter even the songs would shape up. Performances are loud, regular and totally in sync with the likings of its targeted audience. Only exception is Ronit Roy as the cold-blooded, merciless, power-driven lawman of his own set of laws. In one scene, when Akshay the Boss is seen jogging/jumping on the trucks [mind you, it’s not the regular track but a chain of trucks] while his first face-off to Ronit- the DCP, you can easily make a distinction between their intensity in the performance! At 2 hour 30 min long duration, it serves you ‘baasi’ ingredients in the name of entertainment.

Who should go?
Watch it if you are an Akshay Kumar fan. Watch it if you already have learnt the lyrics of the ‘yo yo honey singh’ songs in the film by heart. Watch it if Mithun Chakraborty was your first super-hero in Bollywood. Watch it if your mind-heart-soul still adore late 80’s formula action thrillers.

Who should stay away?
If you think Bollywood is changed! If you think entertainment doesn’t have to be formulaic! If you love Indie Cinema more than regular releases! If you believe cinema is a sensitive art form! If you still are reading my review!


Final outcome:
A Presentation of ‘Cape of Good Films’ [really??] Anthony D’Souza’s BOSS is another milestone in senseless action-comedy aimed to touch 100 Cr mark. I don’t see any hurdle in that because as the character of Akshay kumar would have said in his Haryanvi, if asked “apne ko kya hai, apne ko toh bass paisa bahana hai”! [2/5]