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Friday, 3 August 2018

मुल्क: ‘इस्लामोफ़ोबिया’ से ग्रस्त हैं? आज ही देखें. [3.5/5]


तेज़-तर्रार पुलिस ऑफिसर दानिश जावेद (रजत कपूर) शहर के मुस्लिम-बहुल इलाके में छिपे एक आतंकवादी को मार गिराने की नीयत से अपनी टीम के साथ आगे बढ़ रहा है. साथ ही, मुस्लिमों की आबादी पर तंज कस रहा है, “इतने बच्चे क्यूँ पैदा कर लेते हो?”. उसी रौ में बहते हुए एक सिपाही बोल पड़ता है, “अरे, साहब! इन लोगों का ऐसा ही रहता है.”, ये भूलते हुए कि उसके ‘साहब’ खुद भी एक मुसलमान हैं. ऐसे ही एक पूर्वाग्रह से ग्रस्त दानिश खुद भी है, जब बात आतंकवाद को मुस्लिमों से जोड़ कर देखने की आती है. अनुभव सिन्हा की ‘मुल्क’ देश में बढ़ते धार्मिक उन्माद, साम्प्रदायिकता और आम जन के मन में पल-बढ़ रहे पूर्वाग्रहों, कुतार्किक अवधारणाओं और आपसी भेदभाव को कटघरे में खड़े करते हुए, कुछ बेहद जरूरी और कड़े सवाल सामने रखती है. हालाँकि अपनी बनावट में फिल्म थोड़ी पुराने ज़माने और ढर्रे की जरूर जान पड़ती है, पर ‘मुल्क’ अपनी बात जोरदार तरीके से कहने में ना ही कमज़ोर पड़ती है, ना ही डरती-सहमती है.

कैसे साबित करेंगे आप, अपने मुल्क के प्रति अपनी वफ़ादारी? खास तौर पर, जब आपका नाम मुराद अली (ऋषि कपूर) हो, या फिर बिलाल अली (मनोज पाहवा), जिसका बेटा शाहिद (प्रतीक स्मिता बब्बर) आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त पाया गया है. कैसे साबित करेंगे कि 1927 में बना मुराद-मंजिल आपका घर नहीं, देश-विरोधी गतिविधियों का ‘अड्डा’ है? ...और ये और भी मुश्किल हो जाता है, जब आप की देशभक्ति पर सवाल उठाने वालों की आँखों पर पहले से ही ‘धर्म-विरोधी’ काला चश्मा चढ़ा हो. ‘हम’ ऐसे हैं और ‘वो’ ऐसे; अलगाव की इस गन्दी राजनीति का हिस्सा धीरे-धीरे ही सही हम सब बनते जा रहे हैं. ‘मुल्क’ कम से कम हमें झकझोर कर जगाने की कोशिश तो करती ही है.

‘मुल्क’ अपने पहले हिस्से में बहुत सारा वक़्त बनारस की जानी-पहचानी गलियों में धार्मिक सहिष्णुता के ठहाके लगाने में बिताती है, जहां वकील मुराद अली अपनी 65वीं सालगिरह पर परिवार और दोस्तों के लिए खुद मटन-कोरमा बना रहे हैं. पड़ोसियों में शामिल घोर शाकाहारी मित्र भी कबाब चख रहे हैं, हालाँकि आप अच्छी तरह जानते हैं कि ये सारा सेट-अप जल्द ही टूटने वाला है और तनाव का माहौल पलक झपकते ही सारे रिश्ते चकनाचूर कर जाएगा. ‘हम’ और ‘वो’ की न दिखने वाली खाई जल्द दिखाई भी देगी, साथ ही और गहरी भी होती जायेगी. पाकिस्तान भेजने की पेशकश दीवारों पे इश्तेहार की तरह छपेगी और माता के जागरण का लाऊडस्पीकर जानबूझकर मुराद-मंजिल की ओर ही मोड़ दिया जाएगा.

एक लिहाज़ से पुराने ढर्रे का ये ड्रामा फिल्म के हक में ही काम करता है, क्यूंकि दूसरे हिस्से में आप को कोर्ट की उस अहम कार्यवाही का गवाह बनना है, जहां किरदारों के आरोप-प्रत्यारोप के बीच अक्सर आप खुद को, इन तमाम सवालों पर अपनी सोच के साथ कटघरे में खड़ा पायेंगे. मुराद अली की बहू (तापसी पन्नू) का नाम लेने में खुद जज साब (कुमुद मिश्रा) एक बार को अचकचा जाते हैं, ‘मोहम्मद आरती’ या ‘आरती मोहम्मद’? हिन्दू है, और मुराद अली की वकील भी. सरकारी वकील संतोष आनंद (आशुतोष राणा) जनमानस को संतुष्ट और खुश करने वाली मुस्लिम-विरोधी दलीलों से खेलना ख़ूब अच्छी तरह जानता है. उकसाने, भड़काने और तालियाँ बटोरने में माहिर है.

मुख्य किरदारों के तौर पर ऋषि कपूर और तापसी पन्नू की अच्छी अदाकारी के साथ, फिल्म में उनकी मौजूदगी भले ही ज्यादा वक़्त के लिए हो, पर अपनी छोटी सी भूमिका में ही आपको मन भर द्रवित कर देते हैं अभिनेता मनोज पाहवा. फिल्म के आधे हिस्से तक तो लगता है, मानो पूरी की पूरी फिल्म उनकी ही हो, उनपे ही हो. बड़े भाई मुराद अली के सामने अपनी गलतियां बयान करते वक़्त, पुलिस स्टेशन में ज्यादतियां सहते वक़्त, शाम की दावत के लिए 10 किलो और मटन को लेकर भाई से मोल-भाव करते वक़्त, मनोज अपने पूरे शबाब पर होते हैं. रजत कपूर, कुमुद मिश्रा और आशुतोष राणा अपने किरदारों के साथ बखूबी इन्साफ करते हैं. राणा अपनी भाषाशैली के दम पर एक अति-राष्ट्रवादी वकील की भूमिका में आपकी नफरत हासिल करने में खासे कामयाब रहते हैं.

अंत में, ‘मुल्क’ के जरिये अनुभव सिन्हा आतंकवाद, साम्प्रदायिकता और असहिष्णुता जैसे मुद्दों पर खुल कर बोलते हैं. कुछ इस बेबाकी से कि फिल्म के आखिर में निर्णय सुनाते वक़्त जज साब की आवाज़ में उनकी अपनी बेचैनी, तल्खी और विचारधारा साफ़ सुनाई देती है. मुराद अली को सलाह देते वक़्त जज साब कहते हैं, “अगली बार कोई अगर आपको आपकी दाढ़ी के लिए सवालों के घेरे में खड़ा करे, तो उन्हें चुप कराने के लिए भारत के संविधान का पहला ही पन्ना ज़ेरॉक्स करा कर रख लीजिये, काफी है.” अगर आप भी ‘इस्लामोफ़ोबिया’ जैसी बीमारी से ग्रस्त हैं, तो आपको ‘मुल्क’ हफ्ते में कम से कम दो बार देखनी चाहिए. दवा थोड़ी महंगी जरूर है, पर घोर असरदार!  

Friday, 2 March 2018

परी- नॉट अ फेयरीटेल: 'हॉरर' में कहानी की शुरुआत! [3/5]

हिंदी फिल्मों में 'हॉरर' अपने हर दौर में अक्सर किसी एक ख़ास नाम या बैनर के खूंटे से बंध कर रहा है. रामसे ब्रदर्स की भूतिया हवेलियों से रामगोपाल वर्मा के शहरी मकानों और भट्ट कैंप के इन्तेहाई खूबसूरत यूरोपियन मेंशन्स तक; 'हॉरर' के साथ सबने अपने-अपने लैब में जब भी चीर-फाड़ की, फ़ॉर्मूले हमेशा एक से ही रहे. यही वजह है कि '13B', 'एक थी डायन' और हाल-फिलहाल की 'द हाउस नेक्स्ट डोर' जैसी थोड़ी सी भी अलग और नये लिहाज़ की डरावनी फिल्में उम्मीदों का पहाड़ खुद ज्यादा ही बड़ा कर देती हैं. प्रोसित रॉय की 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' ऐसी ही एक हॉरर फिल्म है, जिस पे 'हॉरर' के किसी भी पुराने कारखानों की कोई मोहर या छाप नहीं दिखाई देती. हालाँकि खामियों की फेहरिस्त भी कुछ कम बड़ी नहीं, पर 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' अपने नए अंदाज़ से न सिर्फ आपको डराती है, ज्यादातर वक़्त चौंकाती भी है.

डरावनी फिल्मों में अंधविश्वास, लोक कथाओं और पुरानी मान्याताओं का बोलबाला रहता ही है. ऐसी फिल्मों में, ऐसी फिल्मों से तार्किक या वैज्ञानिक होने की उम्मीद करना अपने आप में एक भुलावे की स्थिति है. प्रोसित भी अपनी पहली फिल्म के तौर पे 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' में दकियानूसी होने से परहेज़ नहीं करते. डराने की मूलभूत जरूरत को पूरा करने के लिए, वक़्त-बेवक्त यहाँ भी बिजलियाँ कड़कती हैं, खिड़कियाँ खड़कती हैं, कंधे पे हाथ रखते ही डरावने चेहरे पलट कर आखों तक चले आते हैं और बैकग्राउंड में एक उदास आवाज़ धीमे-धीमे लोरियां सुनाती रहती है, पर इस बार की कहानी सतही तौर पर दकियानूसी होने के बावजूद, अपने आप में 'और भी' बहुत कुछ कहने की गुंजाईश बाकी रखती है. 

बांग्लादेश के एक ख़ास हिस्से में एक ख़ास नस्ल को मिटाने की मुहीम चल रही है. नहीं, इसका रोहिंग्या मुसलामानों से कोई लेना देना नहीं है. हालाँकि बात जिन्नों की है, और जिन्न भी इसी ख़ास महज़ब में अपनी पैठ ज्यादा रखते हैं. इफरित नाम का एक ख़ास जिन्न है, जो अपनी नस्ल बढ़ाने के लिए औरतों का सहारा लेता है. प्रो. कासिम अली (रजत कपूर) ढूंढ-ढूंढ के ऐसी औरतों का गर्भपात करते-कराते हैं. रुखसाना (अनुष्का शर्मा) ऐसी ही एक नाजायज़ पैदाइश है, जिसे पेरी या परी कहा जाता है. नानी की कहानियों वाली नेकदिल परी नहीं, बल्कि ऐसी जिसकी फ़ितरत ख़ूनी वैम्पायरों जैसी दिल दहलाने वाली हो. बहरहाल, एक एक्सीडेंट में अपनी माँ को खोने के बाद रुखसाना आजकल अरनब (परमब्रत चैटर्जी) के यहाँ पनाह ले रही है. 

ऐसे समाज में जहां औरतों को डायन कह कर मार दिया जाता हो, अनचाहे गर्भ को गिराने के लिए इंसानियत गिरा दी जाती हो; प्रोसित डर के बाज़ार को गर्म रखने के लिए ऐसे ही प्रतीकों का सहारा तो बखूबी लेते हैं, पर इनको लेकर किसी तरह की कोई ठोस या गहरी बात कहने में चूक जाते हैं. फिल्म के आखिर तक आते आते, रुखसाना के किरदार के साथ दर्शकों की सहानुभूति बनाने की जोर-आजमाईश में फिल्म थोड़ी भटकती जरूर नज़र आती है, और उलझती भी; लेकिन अपने बेहतर कैमरा-वर्क, खूबसूरत आर्ट-डायरेक्शन और अनदेखे अंदाज़ की वजह से 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' उन पलों में भी एक खूबसूरत फिल्म की तरह पेश आती है, जिन पलों में उसपे डराने का कोई बोझ या दबाव नहीं होता. पर्दों के पीछे सायों का लिपटना और चिपटना क्या ही बेहतर दृश्य है! 

...और अब जिक्र अनुष्का का. फिल्म की सबसे दमदार कड़ी. हिंदी फिल्मों में 'हॉरर' को आसान कमाई और कम खतरे वाला कदम माना जाता है. ऐसे में 'हॉरर' के साथ इस तरह का नया प्रयोग करने के लिए, अनुष्का (फिल्म की निर्माता के तौर पर) को बधाई मिलनी ही चाहिए. रही बात उनके अभिनय की, तो अनुष्का उन दृश्यों में ज्यादा प्रभाव छोड़ती हैं, जिनमें उन्हें संवादों के सहारे नहीं रहना होता. फिल्म में खून-खराबा भी खूब है, पर असल टीस आपको अनुष्का के किरदार के दर्द से ही उठती है. उनकी आँखों की चमक ही कितनी बार आपको सिहरा जाती है. रजत कपूर शानदार रूप से दिल की धडकनें बढ़ाते रहते हैं. परमब्रत 'कहानी' के अपने किरदार के आस-पास ही रह जाते हैं. उतने ही सजीले, शर्मीले और सधे हुए.

आखिर में, 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' डरावनी फिल्मों में कहानी पिरोने की एक कोशिश के तौर पर सराही जानी चाहिए. एक ऐसी फिल्म, जो जेहनी तौर पर थोड़ी और बेहतर, थोड़ी और काबिल हो सकती थी, पर डर के लिए एक कसा हुआ माहौल गढ़ने में जो कहीं से भी चूकती नहीं. [3/5]  

Friday, 7 April 2017

मुक्ति-भवन: दर्शन-चिंतन और मनोरंजन का बेहतरीन मेल-मिलाप! [4.5/5]

जो बनारस के करीब हैं, या बनारस जिनके दिल के करीब है, वो इस अनुभव की पुष्टि खुले दिल से करेंगे कि मृत्यु को लेकर जितना जंजाल, जितना हो-हल्ला, जितना झमेला, जितना ऊल-जलूल हौव्वा हमने अपने दिमाग में पाल रक्खा है; बनारस किसी कारगर दवा की तरह एक ही ख़ुराक में सब हर लेता है. मृत्यु को मात्र एक प्रक्रिया मानकर, शांत-चित्त से देखने और जीने का गुर सीखना हो, तो नाव पर बैठकर बनारस के घाटों को बस एकटक निहारते रहिये. शुभाशीष भूटियानी की ‘मुक्ति-भवन’ कुछ ऐसा ही दुर्लभ, गहन, पर रोचक अनुभव परदे पर पेश करती है, जहां मौत की अवधारणा जिन्दगी के आम उतार-चढ़ाव से कहीं ज्यादा शांत और मनोरंजक लगती है.

बाबूजी (ललित बहल) को एक ही सपना बार-बार दिखाई देने लगा है. उनकी मानें, तो अब उनके (पहले बनारस, और फिर मर कर ऊपर) जाने का वक़्त आ गया है. हालाँकि उनकी बहू (गीतांजली कुलकर्णी) को ये सब बस घूमने-फिरने के चोंचले लगते हैं. इन सब में बेटे राजीव (आदिल हुसैन) की मुश्किलें बढ़ गयी हैं. बाबूजी के साथ बनारस के मुक्ति-भवन में रहना पड़ेगा, जहां बाबूजी जैसे और भी लोग हैं जो मोक्ष-प्राप्ति के लिए बनारस में ही अपनी मृत्यु की राह जोह रहे हैं. विमलाजी (नवनिन्द्र बहल) को तो 18 साल हो गये, हर 15 दिन बाद नाम बदल कर मुक्ति-भवन में ही टिकी हैं. राजीव को शायद इतना इंतज़ार न करना पड़े, मुक्ति-भवन के कर्ता-धर्ता मिश्राजी (अनिल रस्तोगी) देख कर ही बता देते हैं कि किसका वक़्त नज़दीक है?

शुभाशीष भूटियानी फिल्म के यथार्थवादी कथानक को पूरी तरह तवज्जो देते हुए, बनारस में होते हुए भी अति-लोकप्रिय दृश्यों और अति-प्रचलित प्रतीकों के जरिये बनारस को परदे पर दोहराने से बचते हैं. उनका बनारस छोटे-छोटे सीलन भरे कमरों, तंग गलियों, संकरी सीढ़ियों और खुली छतों के किनारों से गंगा को ताकने तक ही खुद को सीमित रखता है. यहाँ तक कि उनका कैमरा गंगा-आरती जैसे मनोरम, दैविक और दर्शनीय पलों के वक़्त भी अपने जमीनी किरदारों के हाव-भाव पर ही ज्यादा केन्द्रित रहता है. शुभाशीष अपने हलके-फुल्के व्यंग्य और खालिस असली किरदारों के साथ सिनेमा और वास्तविक जिन्दगी का फर्क सा ही मिटा देते हैं. मौत के इंतज़ार में बेटा सोते हुए बाप की सांस टटोल रहा है, और बाप है कि मृत्यु-शैय्या पर लेटे-लेटे भी भजन-मंडली को सुर में गाने की सलाह दे रहा है. बुजुर्ग बाप और अधेड़ उम्र के बेटे के बीच की ख़ामोशी भी बहुत बार बहुत कुछ बोलती सुनाई देती है. विमलाजी जब बाबूजी से कहती हैं, “मुझे जलन होती, अगर आप यहाँ आये इतनी जल्दी मर जाते” तो अचानक मौत जैसे एक ही साथ बहुत हलकी और गहरी दोनों लगने लगती है. ऐसे ही एक मार्मिक पल में, घिसे-पिटे, खानापूर्ति के लिए अख़बार में छपवाए गए शोक-संदेशों से ऊब कर, ‘मुक्ति-भवन’ के सारे बूढ़े-बुजुर्ग अपनी-अपनी मृत्यु का शोक-संदेह खुद ही लिखने बैठ जाते हैं.

‘मुक्ति-भवन’ अदाकारी में एक अध्याय की तरह देखा जाना चाहिए. आदिल हुसैन की अकुलाहट, उकताहट और सकुचाहट उनकी आँखों की गहराई से निकलती है, और आपको अन्दर तक छू जाती है. कितनी ही बार उनका चेहरा पूरे स्क्रीन पर बिना कुछ कहे, पूरी तसल्ली के साथ अपनी बेचैनी बयाँ कर जाता है. बनारस की गलियों और घाटों पर भटकते हुए बड़ी तल्लीनता और सजगता से आदिल एक नामचीन कलाकार से आगे बढ़कर, महज़ एक चेहरा, एक किरदार बन भीड़ में खो जाते हैं. ललित बहल के अभिनय में ठहराव फिल्म की रफ़्तार से पूरी तरह कदम मिला कर चलती है. नवनिन्द्र और अनिल रस्तोगी अपने अपने हिस्सों को इतनी सुगमता से जीते हैं कि उन्हें परदे पर बार-बार देखने की तलब होने लगती है. गीतांजलि कुलकर्णी और उनकी बेटी की भूमिका में पलोमी घोष कम वक़्त के लिए ही सही, पर परदे पर अपने सधी अदाकारी से प्रभावित करने में सफल रहती हैं.

आखिर में; ‘मुक्ति-भवन’ जीवन-मृत्यु के घोर-चिंतन और रिश्तों की पेचीदगी को बड़ी परिपक्वता और पूरी संजीदगी से कुछ इस तरह परदे पर जिंदा करती है, कि आप जिंदगी से कहीं ज्यादा मौत के फ़लसफ़े का आनंद लेने में मग्न रहते हैं. फिल्म में मिश्राजी बिना बात राजीव को मशवरा देते हैं, “आप पान खाया कीजिये!”, ‘मुक्ति-भवन’ के लिए मैं भी कुछ ऐसा ही कहूँगा, “देख आईये! कुछ बातों के लिये वजहें खोजने की जरूरत नहीं. कुछ बातों को वजहों की दरकार नहीं.” सिनेमाई परदे पर जीवन-मृत्यु को लेकर दर्शन-चिंतन और मनोरंजन का इतना सटीक मेल-मिलाप पिछली बार रजत कपूर की ‘आँखों-देखी’ में ही दिखा था. [4.5/5]  

Friday, 27 May 2016

वेटिंग (A): नसीर-कल्कि का अभिनय ही काफी है! [3/5]

अस्पताल के ‘वेटिंग रूम’ में खाली कैनवस जैसी बेदाग़-बेरंग दीवार पे टंगी घड़ी में सिर्फ छोटी-बड़ी दो सुईयां ही नज़र आ रही हैं. सही, सटीक और तय वक़्त जानने के लिए घंटों की गिनती और उनके बीच के मिनटों के फ़ासले जैसे किसी ने रबर से मिटा दिए हों. यहाँ इनकी कोई ख़ास जरूरत भी नहीं है. जब इंतज़ार का रास्ता लम्बा हो तो घंटे-मिनट-सेकंड वाले छोटे-छोटे मील के पत्थरों को नज़रअंदाज़ करना ही पड़ता है. कुछ ने इस फ़लसफ़े को अच्छी तरह समझ लिया है, जैसे प्रोफेसर शिव नटराज [नसीर साब] जिनकी पत्नी पिछले आठ महीनों से कोमा में हैं. तारा देशपांडे [कल्की] के लिए अभी थोड़ा मुश्किल है. शादी को अभी 6 महीने ही हुए थे और आज तारा का पति [अर्जुन माथुर] एक रोड-एक्सीडेंट के चलते आईसीयू में भर्ती है. दुःख को झेलने-सहने और समझने के अलग-अलग पड़ाव होते हैं, प्रोफेसर अगर आख़िरी पड़ाव पर हैं तो तारा के लिए अभी शुरुआत ही है.

अनु मेनन की ‘वेटिंग’ ज़िन्दगी और मौत के बीच के खालीपन से जूझते दो ऐसे अनजान लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है जिनमें कहने-सुनने-देखने में कुछ भी एक जैसा नहीं है, पर एक पीड़ा, एक व्यथा, एक दुविधा है जो दोनों को एक दूसरे से बांधे रखती है. प्रोफ़ेसर शिव धीर-गंभीर और शांत हैं, जबकि तारा अपनी झुंझलाहट-अपना गुस्सा दिखाने में कोई शर्म-लिहाज़ नहीं रखती. तारा को मलाल है कि ट्विटर पर उसके पांच हज़ार फ़ॉलोवर्स में से आज उसके पास-उसके साथ कोई भी नहीं, जबकि प्रोफ़ेसर को अंदाज़ा ही नहीं ट्विटर क्या बला है? इसके बावज़ूद, अपने अपनों को खो देने का डर कहिये या फिर वापस पा लेने की उम्मीद, दोनों एक-दूसरे से न सिर्फ जुड़े रहते हैं, अपना असर भी एक-दूसरे पर छोड़ने लगे हैं. ‘नम्यो हो रेंगे क्यों’ का जाप करने वाली तारा कभी खुद को नास्तिक कहलाना पसंद करती थी, कौन मानेगा? वहीँ प्रोफ़ेसर को आज ‘एफ़-वर्ड’ कहने में भी कोई दिक्कत पेश नहीं आती.

‘वेटिंग’ बड़ी ईमानदारी से और बहुत ही इमोशनल तरीके से इन दो किरदारों के साथ आपको ज़िन्दगी के बहुत करीब लेकर जाती है. हालाँकि अस्पताल जैसा नीरस-उदास और बेबस माहौल हो तो फिल्म के भी उसी सांचे में ढल जाने का डर हमेशा बना रहता है, पर अतिका चौहान के मजेदार संवाद हमेशा इस नीरसता को तोड़ने में कामयाब रहते हैं. फिल्म जहां एक तरफ बड़ी संजीदगी से आपको लगातार ज़िन्दगी और मौत से जुड़े कुछ अहम् सवालों के आस-पास खींचती रहती है, दूसरी ओर वो इस कोशिश में भी लगी रहती है कि आपका दिल नम रहे, चेहरे पर मुस्कराहट बराबर बनी रहे और आप बड़ी तसल्ली से तकरीबन सौ मिनट की इस फिल्म का पूरा लुत्फ़ लें.

अभिनय में नसीर साब और कल्कि एक दूसरे को पूरी तरह कम्पलीट और कॉम्प्लीमेंट करते नज़र आते हैं. नसीर साब के साथ एक ख़ास सीन में, जहां दोनों एक-दूसरे पर बरबस बरस रहे होते हैं, कल्कि अपनी एक  अलग छाप छोड़ने में सफल रहती हैं. नसीर साब के तो कहने ही क्या! मतलबी से दिखने वाले डॉक्टर की भूमिका में रजत कपूर, बनावटी दोस्त की भूमिका में रत्नाबली भट्टाचार्जी और बेबाक, दो-टूक सहकर्मी बने राजीव रविन्द्रनाथन जंचते हैं.

सिनेमा बदल रहा है. सिनेमा से ‘अति’ विलुप्त होता जा रहा है. अनु मेनन की ‘वेटिंग’ भी इसी अहम् बदलाव का एक हिस्सा है. (इस तरह की) फिल्मों में नाटकीयता के लिए अब शायद ही कहीं कोई जगह बची है. कथानक से अब बेमतलब के ज़ज्बाती रंग हटने लगे हैं. जिसे जो कहना है, उसी लहजे से कह रहा है जिसमें उस किरदार की पैठ हो. तैयार रहिये, कई बार ये आपको विचलित भी कर सकता है. [3/5]

Friday, 18 March 2016

KAPOOR & SONS (SINCE 1921): Perfectly Imperfect! [3.5/5]

It seems Bollywood has learnt its way to deal Indian families in films the way it should be. Chaotic, dramatic, relatable and real! With Shakun Batra’s KAPOOR & SONS (SINCE 1921), even Dharma Productions have come a long way. Forget Karan Johar’s all elite, genteel and heavenly prosperous families melting & merging patently into the equally overwhelming interiors inspired by latest interior design magazines! The characters here, in Shakun’s world, don’t really chew their words before spitting them out. On the contrary, they are loose out in the open to grind each other’s peace unabashedly. Backed up by good writing and even better direction skills, KAPOOR & SONS (SINCE 1921) marks the arrival of a totally fascinating and utterly dysfunctional ‘on-screen’ family you would love to see more of it.

In a picture-perfect locality of Coonoor, a 90-year old grandfather [Rishi Kapoor in his prosthetic best], out of boredom, is practicing his forthcoming event of death. The rest of the family hardly pays any attention to his gimmicks, until one severe heart attack takes its course of action sincerely. The grandsons are flying down from abroad. The family reunites but there’s nothing what it looks from the outside. Everyone in the family has something to hide, lie and complain about. The husband [Rajat Kapoor] has financial crisis eating his head. The wife [Ratna Pathak] suspects him of adultery. The elder son [Fawad Khan] is a successful novelist carrying unbearable mass of being his parent’s perfect son. The younger one [Siddharth Malhotra] accuses them for not being equally warm to him. And then, there is an inevitable chaos of inter-personal issues in the family that declines to settle down.

Shakun Batra scores most of his marks in the first half only where he introduces the all messed-up characters in the family one by one in a particular scene. Shakun gives us many delightful moments in the rest of the film but this one single scene never loses its impact on you. He hits the right note almost every time there is a conflict in waiting to take over the drama. Unfortunately, the comic elements don’t make you feel as satisfying. Shakun tries roughly everything from some ‘below the belt’ gags performed comfortably by the actors to some harmless yet discouraging ‘potty’ jokes. The plot dealing with real human behavior especially in the relationship of the brothers keeps you hooked till the very end. Siddharth playing the younger one sees Fawad- the elder one as his competition but the moments in which they share their warmth in the relationship are enough to celebrate. The writing constantly works against falling into the pit of predictability, despite some melodramatic approach towards the climax.

Alia Bhatt brings with her a certain kind of energy, innocence, humor and vivacity in spirit of the film. She excels in her introduction scene while playing almost herself and in one emotional sequence which is a complete letdown by comfortable writing but has Alia as a winner. Rishi Kapoor’s shameless, blatant and brash grandfather act is one of the most enjoyable. Ratna Pathak and Rajat Kapoor are a worthy addition to the cast providing a solid support throughout the film. Siddharth and Fawad both look incredibly charming on screen but Fawad steals the show with his strong hold in the moments where he has to express and expose his soul.

At the end, KAPOOR & SONS (SINCE 1921) is a family saga very distinct and dissimilar from Karan Johar’s typical design of Indian families. It’s not perfect. It’s not ideal but it’s real and relatable in its guts and will. I wish Shakun had finished it in same zeal and madness he had taken the start. Even then, it’s like one of those joint family photographs where not everyone is at his best but still, you would like to keep it with you. [3.5/5]    

Thursday, 30 July 2015

DRISHYAM: The hunt for a good thriller ends here! A remake? So what?? [3.5/5]

A remake should be judged by the merits its predecessor had seized in and the flaws of its own while recreating something that has already been positioned as a yardstick; not once, not twice but successively four times in a row. For that matter, DRISHYAM directed by Nishikant Kamat manages to maintain the legacy of providing one of the most satisfying thrillers in recent Bollywood. The road ahead is full of unanticipated twists and turns but you won’t feel shaky as the grip is mostly airtight and the ride is pretty much smooth in terms of staying honest to the subject. DRISHYAM, despite a few slack strokes of imperfections in various fields remains a desirable thriller for the most in its 2 hour 43 minutes long duration; and that’s an achievement in itself.

Vijay Salgaonkar [Ajay Devgn] is an almost illiterate middle-class family man with a questionably ‘decked-up all the time’ wife [Shriya Sharan, a complete misfit] and two lovely daughters by his side. Running a local cable network for his living, Salgaonkar is a street-smart fellow who loves to learn from the movies he watches at his office in leisure. One dark night, his family accidentally falls for a crime that could lead them all to the pit of death but a good family man would never let that happen. He has to stand like an immovable wall between his family and the law-enforcement powers stage-managed by a strict officer and a desperate mother [the terrific Tabu]. Rest is the cat-mouse chase between the two, packed with some real nail-biting moments of anxiety, twists of terrific nature and an extended climax that is more rewarding than the whole film.

DRISHYAM’s biggest force is in Jeethu Joseph’s taut writing. A story that has all the emotional strings attached to the thrills of the undying efforts of covering up the patches of a perfect crime! A screenplay that doesn’t leave much to complain about and a couple of seasoned performances to top it all! The first part takes its own time to set things up in their designed places. This is the part where you also feel crabby and argumentative about the casting of its lead. The innocence and honesty Mohanlal carried of a middle-aged middle-class family-guy in its first and original Malayalam version are often missed here by large margin. No doubt, Ajay brings a certain kind of intensity in his performance but the vulnerability of an illiterate small-time cable-operator is something that he lacks big time. The camerawork by the latest talk-of the-town Avinash Arun is soothing, pleasing and sometimes, old-school too when needed. (Is ‘the boys diving in the water’ his trademark shot? His last 3 films KILLA, MASAAN & now DRISHYAM give it a strong word).

And then, Tabu enters into the frame and the screen suddenly starts breathing its life. She, as the strong-headed, rough and dictatorial police official and as the exposed mother fighting with the loss of his son, beautifully gets into the skin of the character. She undoubtedly is the most charming thing about the film. In rest, Shriya disappoints manly with her irrationally ‘out of the place’ look. Rajat Kapoor shines in the crowd. Kamat as the director hardly throws anything new which wasn’t in the previous versions. But then, we can term this as the ‘blessing in disguise’ in favor of the film’s honesty intact.

Finally, the dearth of a good thriller in Bollywood has been filled with DRISHYAM. So what if the plot/story/screenplay has been adopted four more times before? Engaging, gripping, entertaining and emotionally charged up! Watch it, especially if you haven’t seen any of the previous versions! [My personal favorite is Mohanlal starrer in Malayalam] [3.5/5]         

Sunday, 23 November 2014

Trailer- review of ‪ X- PAST IS PRESENT‬ : All for one and One for All!

Past is present. You are what you have been at all the assorted stages in your life. Each one has contributed and transited some of it to shape up your present. Not only the eventful accomplishments but abortive relationships too! And if it is not just one or two but 10 to be exact, consider yourself a layered project fascinating enough for everyone to experience.

‘X- Past is present’ brings 11 gifted film-enthusiasts at same platform to tell one heaven of a story meant to have their distinguished style representing various illustrious genres in film-making in the most promising manner. A noted filmmaker [Rajat Kapoor of ANKHON DEKHI] meets a mystifying beauty that incidentally makes him revisit the days of vividly practiced past with his 10 ex-girlfriends.

The official trailer sees the girl in present [Aditi Chengappa] trying to shake up and extort reminiscent images from filmmaker’s past and we get introduced to his girlfriends in close-cuts. From the suave & sophisticated Gabriella Schmidt to enigmatic Parno Mitra, Bidita Bag, Neha Mahajan, Richa Shukla, Rii Sen, Piaa Bajpai, unrestrained Radhika Apte, overpowering Huma Qureshi, sensuous Swara Bhaskar and the adolescent Pooja Ruparel of DDLJ (…that makes it 11??).

The dramatic streaks in characters and in the visual treatment on their parts sure forecast an experimental stroke for niche and an engaging flick for the rest. Also coming from the fact that each chapter goes to a different director with a fresh new yet synced approach, ‘X- Past is present’ is inventive enough for an artistic effort to hold your attention but if it is not enough for you, here is the most interesting lot of filmmakers joining in to guarantee. The credit reads Q- the man behind the radical, experimental and unapologetically erotic GANDU, notable film-reviewer and journalist Pratim D. Gupta, Sonam Kapoor starrer AISHA fame Rajshree Ojha, Sudhish Kamat of the impressive GOOD NIGHT GOOD MORNING, Sandeep Mohan, Nalan Kumarsamy, Hemant Gaba, Anu Menon, Abhinav Tiwari, Suparn Verma and the dynamic film-critic Raja Sen .

All said and done, there is a lot to unravel and unlearn about in the plot and in the final product but at the moment of time, ‘X- Past is present’ is a potential innovator to make Indian Cinema proud on any global platform. I hope and wish it breaks all the barriers and refuses to be in the guarded shields of established norms in film-making.

https://www.youtube.com/watch?v=GxpEKLcbltY&feature=youtu.be

Friday, 21 March 2014

आँखों देखी : एक साफ़-सुथरी, सच्ची, ईमानदार और बेहद अच्छी फ़िल्म! [4/5]

सीधे-सरल-सहज, उम्र के आखिरी पड़ाव की तरफ बढ़ते बाऊजी [संजय मिश्रा] जब एक दिन तय करते हैं कि अब वो किसी भी ऐसी बात पर विश्वास नहीं करेंगे जिसका अनुभव उन्होंने खुद न किया हो, तो हालाँकि इसके पीछे उनके अपने तर्क मौजूद हैं, एक बवाल सा मच जाता है उनके चारों तरफ। झगड़ालू तो नहीं पर लगातार कोसते रहने वाली पत्नी [सीमा पाहवा] के लिए जहां ये स्वांग उनके सठिया जाने का संकेत है, पड़ोसी-मित्र इसे मनोरंजन और बैठकी का खेल बना लेते हैं। 'होगा' और 'है' की यह उथल-पुथल चलती रहती है, जब बाऊजी के छोटे भाई [रजत कपूर] अपने परिवार के साथ अलग होने का निर्णय ले लेते हैं। खिन्न-छिन्न और नाराज़ बाऊजी ऐसे में एक दिन मौन धारण कर लेते हैं। न बोलकर आत्म-मंथन, चिंतन और ज्ञानार्जन बख़ूबी होता है।

अगर कथानक सुनकर तनिक भी लगे कि यह फ़िल्म काफी सीरियस टाइप की है तो किसी भुलावे मत रहियेगा। 'आखों देखी' एक बेहद ही मनोरंजक फ़िल्म है जिसके किरदार बहुत ही मज़ेदार, सच्चे और असलियत के बिलकुल करीब दिखते हैं। पुरानी दिल्ली के तंग गलियों में दरार पालते मकानों की अँधेरी सीढ़ियों से होकर अपने हिस्से के छोटे से आँगन में खुलती यह फ़िल्म अपने बोल-चाल, हाव-भाव, तौर-तरीके से एक अपनापन भर देती है आपके अंदर। यहाँ रिश्तों में मन-मुटाव तो है पर दूरियां बिलकुल नहीं और इमोशंस तो कहने ही क्या! यहाँ बच्चे जब नाराज़ होकर खाना छोड़ देते हैं, बाप लाड़ दिखाकर मना लेता है। अलग रहने वाला भाई, बड़े भाई के घर आने पर बीवी को याद दिलाना नहीं भूलता कि भैया कप में नहीं गिलास में चाय पीना पसंद करते हैं। लगता है पुराने ज़माने की बात है पर यही है जो हम कहीं छोड़े आये थे। 

संजय मिश्रा इस फ़िल्म के महज़ एक किरदार नहीं हैं, पूरी की पूरी फ़िल्म उन्ही से निकलती है और उन्ही में जा मिलती है। फ़िल्म संजय मिश्रा के लिए बनी हो न बनी हो, संजय मिश्रा इस फ़िल्म के लिए ही बने हैं। दोनों को अलग करना-अलग रखना नामुमकिन। उन्हें स्क्रीन पर 'दो नैना तिहारे मतवारे' गाते देखना एक ऐसा अनुभव है जो आसानी से भुलाया न जाएगा। सीमा पाहवा को जो जानते हैं उन्हें पता है किरदारों को सीमा जी कितनी ख़ूबसूरती से आत्मसात कर लेती हैं। अफ़सोस, उन जैसी अदाकारा को हम परदे पे कम ही देख पाते हैं। रजत कपूर भी अपनी सधी हुई एक्टिंग से छाप छोड़ने में कोई कसर नहीं रखते, पर उनकी असली धार उनके निर्देशन में है जो कहीं भी, और जोर देकर कहूंगा कहीं भी फ़िल्म को कमज़ोर नहीं पढ़ने देती। छोटी-छोटी पर बेहद मज़ेदार भूमिकाओं में नमित दास, मनु ऋषि चड्ढा, ब्रजेन्द्र काला निराश नहीं करते।

आख़िरकार एक ऐसी फ़िल्म जो सिर्फ कहने या गिनने के लिए भारतीय नहीं है, बल्कि पूरी तरह भारत के मध्यमवर्गीय समाज में रची-बसी, फलती-फूलती, सिसकती-सुबकती, हंसती-किलकती नज़र आती है। आख़िरकार एक ऐसी फ़िल्म जिसमें नाटकीयता नाम मात्र की भी नहीं और सच्चाई हर पात्र, हर संवाद, हर दृश्य के जरिये चमकती-महकती रहती है। आख़िरकार एक ऐसी फ़िल्म जो सिनेमा के सही मायने न सिर्फ खुद समझती है, आपको भली-भांति समझाने में भी कामयाबी हासिल करती है। हालाँकि रजत कपूर की 'आँखों देखी' आम लोगों की बीच उठती-बैठती, सांस लेती, बात करती ज़रूर है, पर एक आम फ़िल्म बिलकुल भी नहीं है, कम से कम उसके लिए जो सिनेमा को जानता हो-ज़िंदगी को पहचानता हो।

यकीन नहीं होता, साल के शुरुआत में ही इस तरह की एक साफ़-सुथरी, सच्ची, ईमानदार और बेहद अच्छी फ़िल्म! 'आँखों देखी' को न देखने का मुझे तो कोई भी तर्क, कोई भी कारण समझ नहीं आता। कमोबेश ये हमारे यहाँ की 'नेबरास्का' है, उससे अच्छी नहीं तो उससे कम भी नहीं। देखिएगा ज़रूर! [4/5]