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Friday, 15 June 2018

लस्ट स्टोरीज़ (A): ‘लव’ से ज्यादा असल और अलग! [4/5]


प्यार की कहानियाँ सदियों से अनगिनत बार कही और सुनाई जाती रही हैं. वासना के हिस्से ऐसे मौके कम ही आये हैं. हालाँकि दोनों में फर्क बस सामाजिक बन्धनों और नैतिकता के सीमित दायरों का ही है. कितना आसान लगता है हमें, या फिर कुछ इस तरह के हालात बना दिए गये हैं हमारे लिए कि प्यार के नाम पर सब कुछ सही लगने लगता है, पाक-साफ़-पवित्र; और वासना का जिक्र आते ही सब का सब गलत, गंदा और अनैतिक. रिश्तों में वासना तो हम अक्सर अपनी सतही समझ से ढूंढ ही लेते हैं, वासना के धरातल पर पनपते कुछ अलग रिश्तों, कुछ अलग कहानियों को समझने-तलाशने की पहल नेटफ्लिक्स की फिल्म लस्ट स्टोरीज़ में दिखाई देती है, जो अपने आप में बेहद अनूठा प्रयास है. ख़ास कर तब, जब ऐसी कहानियों को परदे पर कहने का दारोमदार हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के चार बड़े नामचीन फिल्मकारों (अनुराग कश्यप, जोया अख्तर, दिबाकर बैनर्जी, करण जौहर) के मजबूत और सक्षम कन्धों पर टिका हो.

चार छोटी-छोटी कहानियों से सजी लस्ट स्टोरीज़ अपने नाम की वजह से थोड़ी सनसनीखेज भले ही लगती हो, पर कहानी और किरदार के साथ अपनी संवेदनाओं और सिनेमा के लिए अपनी सशक्त जिम्मेदारियों में खुद को तनिक भी लचर या लाचार नहीं पड़ने देती. अनुराग की कहानी एक महिला प्रोफेसर के अपने ही एक स्टूडेंट के साथ जिस्मानी सम्बन्ध बनाने से शुरू होती है. कालिंदी (राधिका आप्टे) का डर, उसकी नर्वसनेस, तेजस (सैराट के आकाश ठोसर) पर जिस तरह वो अपना अधिकार जमाती है, सब कुछ एक सनक से भरा है. एक हिस्से में तो वो तेजस का बयान तक अपने मोबाइल में रिकॉर्ड करने लगती है, जिसमें तेजस सब कुछ आपसी सहमति से हुआ था की हामी भर रहा है. हालांकि अपने एक से ज्यादा रिश्तों में कालिंदी की तड़प उन दृश्यों में साफ़ होने लगती है, जिनमें वो कैमरे से रूबरू होकर कुछ बेहद अहम् सवाल पुरुषों की तरफ उछालती है. राधिका अपने किरदार के पागलपन में हद डूबी हुई दिखाई देती हैं, पर फिल्म कई बार दोहराव से भी जूझती नज़र आती है, अपने 35 मिनट के तय वक़्त में भी लम्बी होने का एहसास दे जाती है.

सुधा (भूमि पेडणेकर) अजीत (नील भूपलम) के साथ कुछ देर पहले तक बिस्तर में थी. अब फर्श पर पोछा लगा रही है. पोहे की प्लेट और चाय का कप अजीत को दे आई है. अब बर्तन कर रही है. बिस्तर ठीक करते हुए ही दरवाजा बंद होने की आवाज़ आती है. अजीत ऑफिस जा चुका है. सुधा उसी बिस्तर पर निढाल होकर गिर गयी है. जोया अख्तर की इस कहानी में ऊंच-नीच का दुराव बड़ी संजीदगी से पिरोया गया है. सुधा एक काम करने वाली नौकरानी से ज्यादा कुछ नहीं है, उसे भी पता है. अजीत के साथ शारीरिक सम्बन्धों के बावजूद, अपने ही सामने अजीत को लड़की वालों से मिलते-बतियाते देखते और उनके लिए चाय-नमकीन की तैयारी करते वक़्त भी उसे अपनी जगह मालूम है, फिर भी उसकी ख़ामोशी में उसके दबते-घुटते अरमानों और ख्वाहिशों की चीख आप बराबर सुन पाते हैं. भूमि को उनकी रंग-ओ-रंगत की वजह से भले ही आप इस भूमिका में सटीक मान बैठे हों, पर असली दम-ख़म उनकी जबरदस्त अदाकारी में है. गिनती के दो संवाद, पर पूरी फिल्म में क्या दमदार उपस्थिति. इस फिल्म में जोया का सिनेमा भी क्या खूब निखर कर सामने आता है. कैमरे के साथ उनके कुछ दिलचस्प प्रयोग मज़ा और दुगुना कर देते हैं.

दिबाकर बैनर्जी की कहानी एक बीचहाउस पर शाम होते ही गहराने लगती है. रीना (मनीषा कोईराला) साथ ही बिस्तर में है, जब सुधीर (जयदीप अहलावत) को सलमान (संजय कपूर) का फ़ोन आता है. सलमान को लगने लगा है कि उसकी बीवी रीना का कहीं किसी से अफेयर चल रहा है. शादी-शुदा होने का बोझ और बीवी होने से ज्यादा बच्चों की माँ बन कर रह जाने की कसक अब रीना की बर्दाश्त से बाहर है. सलमान को खुल कर सब सच-सच बता देने में ही सबकी भलाई है. वैसे भी तीनों कॉलेज के ज़माने से एक-दूसरे को जानते हैं. शादी से बाहर जाकर अवैध प्रेम-संबंधों और अपने पार्टनर से वफादारी के मुद्दे पर दिबाकर इन अधेड़ उम्र किरदारों के जरिये एक बेहद सुलझी हुई फिल्म पेश करते हैं, जहां एक-दूसरे की जरूरतों को बात-चीत के लहजे में समझने और समझ कर एक माकूल रास्ता तलाशने में सब के सब परिपक्व और समझदार बन कर सामने आते हैं. मनीषा और संजय को नब्बे के दशक में हम बहुत सारी मसाला फिल्मों में नॉन-एक्टर घोषित करते आये हैं, इस एक छोटी फिल्म में दोनों ही उन सारी फिल्मों में अपने किये-कराये पर मखमली चादर डाल देते हैं. जयदीप तो हैं ही बाकमाल.

आखिरी किश्त करण जौहर के हिस्से है, और शायद सबसे फ़िल्मी भी. कहानी पिछले साल की शुभ मंगल सावधान से बहुत अलग नहीं है. मेघा (कियारा आडवाणी) के लिए बिस्तर पर अपने पति पारस (विक्की कौशल) के साथ सुख के पल गिनती के ही रह जाते हैं (हर बार वो उँगलियों से गिनती रहती है), और उसके पति को कोई अंदाज़ा ही नहीं कि उसकी बीवी का सुख उसके सुख से अलग है, और कहीं ज्यादा है. मनचाही ख़ुशी के लिए बैटरी और रिमोट से चलने वाले खिलौने की दखल के साथ, करण कहानी को रोचक बनाने में ज्यादा उत्तेजित दिखते हैं, कुछ इस हद तक कि अपनी महान पारिवारिक फिल्म कभी ख़ुशी कभी गम के गाने का मज़ाक उड़ाने में भी झिझकते नहीं. विक्की कौशल मजेदार हैं.

आखिर में, लस्ट स्टोरीज़ 2013 में आई अनुराग, ज़ोया, दिबाकर और करण की बॉम्बे टॉकीज वाले प्रयोग की ही अगली कड़ी है. फिल्म इस बार बड़े परदे पर नहीं दिखेगी, और सिर्फ नेटफ्लिक्स पर ही मौजूद रहेगी, इसलिए अपनी सहूलियत से कभी भी और कहीं भी देखने का लुत्फ़ आप उठा सकते हैं. ज़ोया और दिबाकर की कहानियों के बेहतर होने के दावे के साथ ही, एक बात की ज़मानत तो दी ही जा सकती है कि हिंदी सिनेमा के आज में इस तरह की समर्थ, सक्षम और असामान्य कहानियां कहने की कोशिशें कम ही होती हैं, खुद इन चारों फिल्मकारों को भी आप शायद ही इन मुद्दों पर एक बड़ी फिल्म बनाते देख पायें, तब तक एक ही फिल्म में चारों अलग-अलग ज़ायकों का मज़ा लीजिये. लव से ज्यादा मिलेगा, कुछ नया मिलेगा. [4/5]

Friday, 11 May 2018

राज़ी: सिनेमाई देशभक्ति अपने सही अनुपात में! [3.5/5]


देशभक्ति और राष्ट्रीयता के नाम पर पिछले कुछेक सालों से हिंदी सिनेमा में एक नए दम्भी, आत्ममुग्ध और स्वप्रायोजित देशप्रेम का चलन धड़ल्ले से देखने को मिल रहा था. नायक जहां सिस्टम पर प्रहार करते हुए भी पुलिस की वर्दी या टेबल पर रखे तिरंगे की शान में कोई आंच नहीं आने देता (बाग़ी 2), परदे पर जितना बड़ा तिरंगा, फिल्म का नायक भी तकरीबन उसी अनुपात में स्व-सत्यापित देशभक्त. और अगर नायक द्वारा देश की शान में कशीदे पढ़े जाने वाले भारी-भरकम संवाद चबा-चबा कर बोले जा रहे हों, फिर तो बॉक्स-ऑफिस सफलता भी ज्यादा दूर नहीं. मेघना गुलज़ार की राज़ी इस अतिवादी देशप्रेम के फलते-फूलते-फैलते सिनेमाई फ़ॉर्मूले को कुछ इस मजबूती और ठोस तरीके से नकारने का बीड़ा उठाती है कि भारत-पाकिस्तान के बीच झूलती कहानी  होने के बावजूद परदे पर एक बार भी तिरंगे तक को किसी भी अनुपात में दिखाने की पहल नहीं करती. यहाँ तक कि वतन के आगे कुछ नहीं, खुद भी नहीं जैसे वजनी संवाद का ज़िक्र भी आपको तालियाँ पीटने के लिए उकसाता या बरगलाता नहीं, बल्कि आपको ज़ज्बाती तौर पर किरदारों को समझने और उनके जेहनी हाल-ओ-हालात से वाकिफ होने में ज्यादा मददगार साबित होता है.

1971 का नाज़ुक वक़्त है. कम से कम भारत-पाकिस्तान के लिए तो है ही. कश्मीरी नागरिक हिदायत खान साब (रजित कपूर) के ताल्लुक सरहद पार भी काफी गहरे हैं. पुराने दोस्त पाकिस्तानी ब्रिगेडियर सईद (शिशिर शर्मा) को गाहे-बगाहे खुफ़िया जानकारियाँ पहुंचाते रहते हैं, पर असलियत में उनकी वफादारी हिन्दुस्तानी इंटेलीजेंस एजेंसी की तरफ ही है. इस बार के दौरे से लौटते वक़्त एक अजीब-ओ-गरीब फैसला कर आये हैं, अपनी 20-साला बेटी सेहमत का निकाह ब्रिगेडियर साब के छोटे साहबज़ादे इक़बाल (विक्की कौशल) से. वतन महफूज़ रखने के लिए उन्हें अपने वालिद से रवायत में मिली ये ज़िम्मेदारी अब वसीयत में सेहमत तक पहुँच चुकी है. पड़ोसी मुल्क में इंटेलीजेंस अफसर खालिद मीर (जयदीप अहलावत) की कड़ी ट्रेनिंग शायद ही सेहमत के काम आये, तब जबकि कदम-कदम पर उसे ऐसे फैसले लेने पड़ रहे हों, जिनकी वो इकलौती जिम्मेवार है, और जो उसके दिल-ओ-दिमाग़ के लिए उलझन का सबब. फिल्म का सबसे आखिरी संवाद कहानी को बड़ी सादगी से मुकम्मल कर जाता है, “...कुछ कैज़ुअल्टीज़ ऑफ़ वॉर जिंदा रह जाते हैं.

सच्ची घटनाओं और हरिंदर एस. सिक्का की किताब कालिंग सेहमत पर बनी राज़ी में मेघना गुलज़ार भारत-पाकिस्तान के बीच के 71 के तनाव को बढ़ा-चढ़ा कर रोमांचक बनाने की बजाय सरहद के दोनों तरफ के किरदारों के ज़ज्बाती उतार-चढ़ाव को कुरेदने में ज्यादा वक़्त बिताती हैं. कुछ इस नरमी और समझदारी से कि किरदारों का इन्सानीपन उनसे पल भर के लिए भी अलग न हो. फेफड़ों में ट्यूमर झेल रहे हिदायत खान की ब्रिगेडियर सईद से की गयी सुनियोजित गुज़ारिश भी दो दोस्तों की गुफ्तगू से ज्यादा कुछ और नहीं लगती. डाइनिंग टेबल पर सेहमत के सामने ही भारत के खिलाफ मंसूबे रचे जा रहे हैं, इक़बाल अकेले में माफ़ी मांग रहा होता है, “घर वाले भूल जाते हैं, हिंदुस्तान तुम्हारा वतन है. हालाँकि फिल्म के दूसरे हिस्से में घटनायें कुछ इस रफ़्तार से एक के बाद एक घटती चली जाती हैं, कि अगर फिल्म सत्य घटनाओं पर आधारित होने का बोर्ड नहीं लेकर घूमती होती, तो आपको कम विश्वसनीय लगती.

उर्दू की चाशनी में लिपटे गुलज़ार साब के संवादों को परदे पर काफी अरसे बाद जगह मिली है. ...जिंदगी के कश शायद कुछ ज्यादा ही लम्बे खींच लिए मैंने हो या खालिद मीर के सेहमत की शादी के मसअले पर उसकी माँ (सोनी राजदान) की राय जानने के सवाल पर हिदायत खान की बेबाकी वो चाहती हैं कि आप खा कर जाएँ जैसे दिलचस्प और समझदार प्रयोग फिल्म को अलग ही रंग दे जाते हैं. ये भी अनूठा ही है कि फिल्म का सबसे दमदार गाना ऐ वतन, मेरे वतन पाकिस्तान में स्कूली बच्चों द्वारा पाकिस्तान के लोगों के लिए गाया जा रहा हो, पर उसकी हर लाइन हिन्दुस्तानी होने के तौर पर आपका रोम-रोम रोमांचित कर रही हो. फिल्म में खुफ़िया एजेंट्स के साथ संवाद स्थापित करने के लिए फिल्म में बार-बार कोड-वर्ड्स में बात होती है, जो कई बार बेहद बनावटी या जानबूझ कर मजाकिया बनाया गया लगता है. मसलन, बिल्ली को ठण्ड लग गयी. गर्म कपड़े भेजो’, बिल्ली को बाहर ले जाओ, गर्म कपड़ों से कुछ नहीं होगा’, छत टपक रही थी, मरम्मत हो गयी है. किताब पढ़ चुके लोग इस पर ज्यादा खुल कर राय दे पायेंगे.

राज़ी की सफलता में आलिया भट्ट की बाकमाल अदाकारी की हिस्सेदारी काफी बड़ी है. लिंगभेद के चक्कर में न पड़ें, तो फिल्म का नायक वहीँ हैं. महज़ 25 साल की उमर में इस तरह का परिपक्व अभिनय बेहद कम अभिनेताओं के हिस्से आया होगा. ये उनके किरदार की मासूमियत और उनके खुद के बारीक अभिनय का नतीजा ही है कि आप दर्शक के तौर पर, खुफ़िया गतिविधियों में हर वक़्त उनकी सलामती के लिए फिक्रमंद महसूस करते हैं. परदे पर उनका रोना कहीं न कहीं आपको भी द्रवित कर जाता है, खास कर दो अलग-अलग दृश्यों में. खालिद मीर के सामने सबसे आखिर में, और अपने शौहर इक़बाल के सामने पहली बार खुल कर सामने आने के वक़्त. इस एक दृश्य में विक्की कौशल भी परदे पर पूरी तरह छा जाते हैं. अब तक आप उन्हें महज़ एक जहीन शौहर के रूप में सराह रहे थे, जो बीवी के हिन्दुस्तानी क्लासिकल संगीत की पसंद को पूरी अहमियत और वाजिब जगह देता है, मगर इस दृश्य में तो वो जैसे फट पड़ते हैं. अपना सब कुछ झोंक देने की चाह में. सफल रहते हैं.

आखिर में; राज़ी देशप्रेम पर बनने वाली हालिया तमाम फिल्मों में सबसे समझदार, सुलझी हुई और बेहद ज़ज्बाती फिल्म है, जहां बेवजह की डायलागबाज़ी नहीं, नायकों की फालतू की तुनकमिजाजी नहीं, सरकारों के एजेंडे से मेल-जोल रखने वाली सिनेमाई साज़िश नहीं...है तो बस परदे पर कही, सुनी, देखे जाने लायक एक अच्छी कहानी और उस कहानी में देशभक्ति, अपने सही अनुपात में. [3.5/5]               

Wednesday, 25 January 2017

रईस: सत्तर का सिनेमा+नब्बे का शाहरुख़= मसालेदार मनोरंजन [3/5]

1975 में; सलीम-जावेद की ‘दीवार’ जनवरी महीने के ठीक इसी हफ्ते सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई थी. 42 साल बाद, राहुल ढोलकिया की ‘रईस’ अगर इतिहास दोहरा नहीं रही, तो कम से कम ‘दीवार’ के साथ हिंदी फिल्मों में नायक के बदलते हाव-भाव और ताव को एक बार फिर उसी जोश-ओ-जूनून से परदे पर जिंदा करने की कोशिश तो पूरी शिद्दत से करती ही है. फिल्म का टाइटल-डिजाईन हो, कहानी के जाने-पहचाने उतार-चढ़ाव हों, नायक के तौर-तरीके, सिस्टम के साथ उसकी उठा-पटक या फिर फिल्म के निर्माण में फरहान अख्तर (जावेद साब के बेटे) की बेहद ख़ास भूमिका; ‘रईस’ में कुछ भी इत्तेफ़ाक नहीं लगता. ‘रईस’ हिंदी फ़िल्म इतिहास के सबसे बाग़ी और जोशीले ’70 के दशक का जश्न कुछ इस ज़ोर-शोर से मनाती है, लगता है जैसे सिनेमा का मौजूदा पर्दा भी 70mm की तरह ही फैलने-खुलने लगा है.

दीवार’ अगर मुंबई अंडरवर्ल्ड के सबसे नामी तस्कर हाजी मस्तान की जिंदगी से अपनी कहानी चुनती है, तो ‘रईस’ गुजरात के अवैध शराब माफिया अब्दुल लतीफ़ के किस्सों के आस-पास ही अपनी जमीन तलाशती है. हालाँकि दोनों ही फिल्में विवादों से बचने के लिए ‘काल्पनिक’ होने की सुविधा का भरपूर लाभ उठाती हैं. गुजरात में शराब पर पाबन्दी है, और ‘पाबन्दी ही बग़ावत की शुरुआत होती है’. कोई धंधा छोटा नहीं होता और धंधे से बड़ा कोई धर्म नहीं. इसी फलसफे पर चलते-चलते, रईस हुसैन (शाहरुख़ खान) शराब की तस्करी के धंधे में आज सबसे बड़ा नाम है. कानून अब तक तो उसकी जेब में ही था, पर जब से ये कड़क और ईमानदार अफसर मजमूदार (नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी) आया है, माहौल में गर्मी थोड़ी बढ़ गयी है. मजमूदार रईस की गर्दन तक पहुँचने का कोई भी मौका छोड़ना नहीं चाहता, पर रईस हर बार अपने ‘बनिए के दिमाग और मियाँ भाई की डेरिंग’ के इस्तेमाल से बचता-बचाता आ रहा है. चूहे-बिल्ली की इस दौड़ में यूँ तो किसी की भी चाल, कोई भी दांव इतना रोमांचक नहीं होता कि आप जोश-ओ-ख़रोश में सीट से ही उछल पड़ें, पर दोनों किरदारों की कभी ढीली न पड़ने वाली अकड़, लाजवाब एक्शन और वजनदार संवादों के जरिये हर बार आपको लुभाती रहती है.

रईस’ का रेट्रो लुक फिल्म की साधारण कहानी पर किसी भी पल भारी पड़ता है. जमीन से उठकर अंडरवर्ल्ड सरगना बनने का सफ़र, और फिर गरीबों का मसीहा बनकर राजनीति में उतरने का दांव; फिल्म की कहानी में ऐसे उतार-चढ़ाव कम ही हैं, जो आपने देखे-सुने न हों. इतना ही नहीं, ठहरी हुई शुरुआत और सुलझे हुए अंत के दरमियान, फिल्म कुछ इस रफ़्तार से भागने लगती है कि आपके लिए ‘क्या छोड़ें-क्या पकड़ें’ वाली दुविधा पैदा हो जाती है. फिल्म ’70 के दशक में जाने के उतावलेपन में गुजरे ज़माने की खामियों को भी उसी बेसब्री से अपना लेती है, जितनी शिद्दत से उस दौर की काबिल-ऐ-तारीफ़ अच्छाइयां. नायिका (माहिरा खान) को बड़ी समझदारी और सहूलियत से कहानी में किसी खूबसूरत ‘प्रॉप’ की तरह लाया और ले जाया जाता है. गाने के दौरान ही शादियाँ हो जाती हैं, गाने के दौरान ही बच्चे भी और गानों की आड़ में ही दुश्मनों का सफाया!

‘स्टारडम’ के पीछे दुम हिलाती फिल्मों से हम कितने पक और थक गए हैं, इसकी सबसे ताज़ा मिसाल है ‘रईस’. भले ही औसत दर्जे की कहानी के साथ ही सही, पर परदे पर शाहरुख़ की शानदार शख्सियत को एक जानदार किरदार के तौर पर पेश करने की पहल भर से ही ‘रईस’ अपने नंबर बखूबी बटोर लेती है. पहले ‘फैन’, फिर ‘डियर जिंदगी’ और अब ‘रईस’; शाहरुख़ किसी नौसिखिये की तरह परदे पर अपनी एक बनी-बनाई ‘इमेज’ को तोड़ कर नये सांचे में ढलने की खूब कोशिश कर रहे हैं. ये आज के लिए भी अच्छा है और आने वाले कल के लिए भी. नवाज़ुद्दीन बेख़ौफ़ हवा की तरह हैं, बहते हैं तो देखते भी नहीं कि आगे कौन है, क्या है? परदे पर वो हीरो की तरह स्लो-मोशन में भले ही एंट्री न लेते हों, मार-धाड़ भी न के बराबर ही करते हैं, फिर भी तालियाँ उनके हिस्से में जैसे पहले से ही लिख-लिखा के आई हों. मोहम्मद जीशान अय्यूब पूरी मुस्तैदी से फिल्म के सबसे ठन्डे फ्रेम को भी अपनी अदाकारी से गर्म रखते हैं, चाहे फिर उनके पास देने को ‘रिएक्शन’ के चंद ‘एक्सप्रेशंस’ ही क्यूँ न हों.

आखिर में, राहुल ढोलकिया भले ही तमाम राजनीतिक सन्दर्भों (मुंबई ब्लास्ट, हिन्दू-मुस्लिम दंगे, गोधरा-कांड) को इशारों-इशारों में पिरो कर फिल्म को एक माकूल जमीन देने की कोशिश करते हों, ‘रईस’ रहती तो एक मसाला फिल्म ही है, जिसके लिये मनोरंजन का बहुत कुछ दारोमदार सत्तर के दशक के सिनेमा और नब्बे के दशक के शाहरुख़ पर टिका दिखाई देता है. अब इससे खतरनाक मेल और क्या होगा? [3/5] 

Saturday, 19 September 2015

‘मेरठिया गैंगस्टर्स’: हम किसी से कम नहीं, पर कहानी में दम नहीं! [2.5/5]

‘गैंगस्टर’ सुनते ही मुंबई के ‘भाई लोग’ बिना इजाज़त लिए जेहन में खलबली मचाने लगते हैं. ‘सत्या’ के भीखू म्हात्रे से लेकर ‘वास्तव’ के रग्घू तक, बॉलीवुड हमेशा से इन टपोरियों-मवालियों और पंटर लोगों में अपनी कहानी के हीरो ढूंढता रहा है. जीशान क़ादरी इस चलन को तोड़ने की, या यूँ कहें तो एक नया चेहरा देने की कोशिश करते हैं. उनकी फिल्म ‘मेरठिया गैंगस्टर्स’, जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, उत्तर प्रदेश के मेरठ और दिल्ली से सटे नोएडा के आस-पास के इलाकों को ही अपना गढ़ बनाती है. यहाँ बाप की कम पेंशन और मिडल-क्लास का रोना रोने वाले टपोरी नहीं होते. यहाँ होते हैं यूनिवर्सिटी हॉस्टल में कुर्सी-टेबल की तरह सालों से जमे हुए मुंहफट-अक्खड़-लड़ाकू ‘लौंडे’! यहाँ जो कुछ नहीं कर रहे होते, वो ‘लॉ’ कर रहे होते हैं. जल्दी और ज्यादा पैसे कमाने के लिए, कैरियर के नाम पर जिनके सामने दो ही आसान तरीके नज़र आते हैं, एक तो रियल इस्टेट का बिज़नेस और दूसरा ‘अगवाई’ यानी ‘किडनैपिंग’. जीशान अपनी पहली फिल्म में किरदारों के हाव-भाव, चाल-चलन और बोली पर तो अच्छी-खासी पकड़ बनाते दिखते हैं, पर फिल्म को बांधे रखने वाली एक अच्छी और मज़बूत कहानी की कमी उनके इस सराहनीय प्रयास को खोखला कर देती है.

मेरठ के ६ बेरोजगार [जयदीप अहलावत, आकाश दहिया, शादाब कमल, वंश भारद्वाज़, चन्द्रचूड़ राय और जतिन सरना] छोटी-मोटी छिनैती में तो पहले भी शरीक रहे हैं, पर जब नौकरी दिलाने वाली एक कंपनी के झांसे में आकर ठगे जाते हैं तो जाने-अनजाने फिरौती के धंधे में भी बोहनी कर बैठते हैं. फिर तो पीछे मुड़ के क्या देखना? हालात उस वक़्त रंग बदलने लगते हैं, जब उनकी उड़ान कुछ ज्यादा जल्दी ही आसमान छूने के ख्वाब देखने लगती है. लाखों की फिरौती अब करोड़ों में बदल गयी है और इन सब के बीच है एक पागल पुलिसवाला [मुकुल देव], जो अपने ऊपर वालों को भी दो-टूक सुनाने का कोई मौका नहीं छोड़ता.

‘मेरठिया गैंगस्टर्स’ में अगर कुछ है, जो इसे देखने लायक बनाता है तो वो हैं इसके किरदार. कहानी हालाँकि अपना असर बिलकुल नहीं छोडती, किरदार ही हैं जो आप तक रह जाते हैं. उनकी आम बोल-चाल का लहज़ा, उनके तेवर, उनका अख्खड़पन! फिल्म के एक दृश्य में गैंग का एक मेम्बर संजय फ़ोरेनर [अपने मेहंदी रंगे बालों की वजह से उसे ये नाम मिला है] अपने ही दोस्तों से खुद को गोली मरवाने की जिद पकडे बैठा है, क्यूंकि लड़की के बाप ने उसके खिलाफ़ पुलिस केस दर्ज करा दिया है, पर गैंग का लीडर टीवी पे क्रिकेट वर्ल्ड कप का मैच छोड़ना नहीं चाहता. और अंत में जब घटना को अंजाम देना है, तयशुदा गैंग-मेंबर उसे .22 की कम नुकसान पहुंचाने वाली बुलेट के बदले 303 की जानलेवा गोली दाग आता है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश का झूठा पुरुष अहंवाद भी इन सब में कहीं-कहीं साफ़ झलकता है. अपने लीडर को उसकी प्रेमिका के नाखूनों पे रंग लगाते हुए देखना, गैंग में सबके लिए आसान नहीं होता. फिल्म के संवाद कहीं भी, एक पल के लिए भी किरदारों से छूटते दिखाई नहीं देते.

जीशान डायरेक्शन के अपने इस पहले प्रयास में कैमरे और अभिनेताओं के साथ कई सफल प्रयोगों के साथ प्रभावित करते हैं. मसलन, दोपहर से लेके रात तक चलने वाले एक शूटआउट सीन में उन्होंने गाने और स्टॉप-मोशन तकनीक का बखूबी इस्तेमाल किया है. इसी तरह फिल्म की शुरुआत में कॉलेज कैंटीन के और अंत में जेल के अन्दर के दृश्यों में वन-शॉट सीन का प्रयोग भी सराहनीय है. जयदीप [‘गैंग्स ऑफ़ वास्सेपुर’ के शाहिद खान] और आकाश [तनु वेड्स मनु रिटर्न्स] उम्दा हैं. शादाब कमल [‘बी ए पास’] निराश करते हैं. संजय मिश्रा, मुकुल देव, ब्रजेन्द्र काला ठीक-ठाक हैं.

अंत में; ‘मेरठिया गैंगस्टर्स’ की कहानी में जीशान की वो धार कहीं दिखाई नहीं देती जिसकी उम्मीद उन्होंने ‘गैंग्स ऑफ़ वास्सेपुर’ से जगाई थी पर एक नए उभरते डायरेक्टर के रूप में वो पूरी तरह असफल भी नहीं होते. मजेदार किरदार और उन्हें आत्मसात करते अभिनेता, इस फिल्म को काफी हद तक देखने लायक बनाये रखते हैं. फिल्म ख़तम होने के बाद भी ख़तम नहीं होती, और इसे वापस लौटने का एक इशारा भी समझा जा सकता है. इन किरदारों को एक बार और परदे पर देखने में मुझे तनिक हर्ज़ न होगा, अगर इस बार एक अच्छी-दमदार कहानी भी हाथ लग जाए! [2.5/5]