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Friday, 15 February 2019

गली बॉय: रनवीर ‘आग’, जोया ‘हार्ड’, फिल्म ‘मज़बूत’! (4/5)


ज़िंदगी में जब दुखों का शोर बरदाश्त से बाहर हो जाये, बेबसी बात-बात पर मुंह चिढ़ाये और अपने साथ हो रहे हर सितम-हर गलत के खिलाफ़ आवाज़ उठाने को ज़बान लड़खड़ाये, बेहतर है कि अपने मोबाइल पर अपना पसंदीदा म्यूजिक फुल वॉल्यूम पर लगाईये, कानों में हैडफ़ोन अन्दर तक ठूंसिये, और मुस्कुराते दिखने की कोशिश कीजिये. हालाँकि इससे बदलेगा कुछ नहीं, पर बदलाव की कुलबुलाहट लिए अन्दर धधकती आग को थोड़ी और हवा जरूर मिलेगी. मुराद (रनवीर सिंह) ऐसा ही कर रहा है. उसके अब्बू (विजय राज) उसके लिए छोटी अम्मी ले आये हैं, उसकी खुद की अम्मी (अमृता प्रकाश) के रहते. मुराद के लिए निकाह के गाजे-बाजे का उबलता शोर कानों में इयरफ़ोन डालते ही हिप-हॉप की ठंडी बयार बन जाता है. जोया अख्तर की ‘गली बॉय धारावी की संकरी, बजबजाती गलियों और दड़बों से भी तंग कमरों में घुटते इंसानी चाहतों, अरमानों और सपनों का उदास चेहरा है. बेहतर जिंदगी की आस में कुछ ने हथियार पहले ही डाल दिए हैं, कुछ बच-बचा के निकलने की लगातार तरकीबें लड़ा रहे हैं, और कुछ सही वक़्त और सही जगह के इंतज़ार में राख के भीतर, आग बनके धधक रहे हैं.

मोईन (विजय वर्मा) गाड़ी चुराने निकला है, अपने दो साथियों के साथ. मुराद उनमें से एक है, कहानी का मुख्य पात्र होते हुए भी उसपे आपका ध्यान नहीं जाता. पीछे से आगे आने में अभी उसको वक़्त है. मुराद के इस इंतज़ार में तेज-तर्रार सैफीना (आलिया भट्ट) 9 साल से उसके साथ है. कुछ इस कदर ज़रूरी, मानो वो ना हो तो जिंदगी बिना बचपन की हो के रह जाए. मुराद खुद भी नहीं जानता, कौन सा रास्ता उसे धारावी की गलियों से निकाल कर उसे उसके अपने सपनों के आसमान तक ले जाएगा. कॉलेज के नोटबुक के बीचोबीच लिखी कवितायें उसका गुबार भर हैं, तब तक जब तक रैपर एमसी शेर (सिद्धांत चतुर्वेदी) के रूप में उसकी पहचान अपने आप से नहीं होती.
                                         
हिंदी फिल्मों ने हिप-हॉप और रैप कल्चर को भुनाने और निचोड़ने की होड़ में, उसकी असल बनावट और उसके होने के पीछे के जरूरी मकसद को पेश करने में ख़ासी बेईमानी बरती है. समाज के दबे-कुचले गरीब, असहाय और निचले तबके के गुस्से और अकुलाहट को तेवर भरे अंदाज़ और मज़बूत आवाज़ की शकल में ठीक-ठीक परोसने में ‘गली बॉय की ईमानदारी काबिल-ए-तारीफ़ है. मुराद के लिखे गीतों में गाड़ी में पीछे बैठी मालकिन के आंसू न पोछ पाने की बेबसी भी है, सामाजिक बन्धनों से आज़ाद होने की तड़प भी और हिन्दुस्तान को असली हिप-हॉप से मिलाने का जोश भी. सच्चाई से मैच करने वाले सपने देखने की हिदायत अब्बू का अपना सच है, मुराद तो सपनों से मैच कराने के लिए अपनी सच्चाई तक को बदल देने का दम रखता है.

जोया की खिंचाई अक्सर इस बात पर होती रही है कि उनकी कहानियों का संसार अमीरी की चमक का मोहताज़ रहता है, हालाँकि ‘लस्ट स्टोरीज’ के अपने हिस्से वाली कहानी (भूमि पेडणेकर अभिनीत) में उन्होंने इस भ्रम को ख़ूब सलीके से तोड़ा है; फिर भी ‘गली बॉय सच्चे मायनों में उन्हें सिनेमा के जानकारों के साथ-साथ, आम दर्शकों के सामने भी एक नए कलेवर में पेश करती है. गौरतलब है कि जोया मुंबई के सबसे बदहाल इलाके की कहानी कहते वक़्त भी किरदारों के हाल-ओ-हालात, और उनकी जेहनी जद्दो-जेहद पर ज्यादा पैनी नज़र रखती हैं, ना कि ‘अंडरडॉग को ‘स्लमडॉग’ बना कर बेचने की आसान कोशिश.

अभिनय में रनवीर लाजवाब हैं. ‘पद्मावत’ और ‘सिम्बा’ से अलग इस फिल्म में न सिर्फ उनकी चुनौती कमउम्र लगने की थी, बल्कि विपरीत हालातों के आगे सहम सहम कर चलने वाले नौजवान के किरदार में जान फूंकने की भी. लोकल गाइड विदेशी सैलानियों को धारावी के लोगों की जिंदगियों का नज़ारा दिखाने लाया है, मुराद बिना लाग-लपेट, बेफिक्री से वहीँ कोने में अधनंगी हालत में लेटा सब देख रहा है. मुराद की आँखों में नमी हो या चमक, रनवीर उसे आप तक पहुँचाने में कोई कमी-कोई कसर नहीं छोड़ते. आलिया के तो क्या ही कहने! बोलने की शैली से लेकर, शरारत भरी भाव-भंगिमाओं तक; आलिया दिलकश हैं. इन दोनों के साथ, दो और ख़ास अभिनेता जो बड़ी शिद्दत के साथ अपना दमखम दर्ज कराते हैं, वो हैं, मोईन के किरदार में विजय वर्मा और एमसी शेर बने सिद्धांत चतुर्वेदी. विजय उन कलाकारों में से हैं, जिनकी शुरुआत ‘मानसून शूटआउट जैसी फिल्म में तारीफें बटोरने से भले ही हुई हो, हिंदी फिल्मों ने हमेशा उनकी प्रतिभा को कमतर ही आंका है. आप इस फिल्म से पहले उन्हें पहचानते भले ही न रहें हों, इस फिल्म के बाद उन्हें भूलने की गलती नहीं करेंगे. सिद्धांत बेमिसाल अदाकार हैं. कुछ इतने मंजे हुए, सधे हुए कि रनवीर भी कहीं कहीं उनके आगे फीके नज़र आते हैं. बहुत मुमकिन है कि आप उन्हें असल में कोई जाना-माना रैपर मान बैठें. 

आखिर में; ‘गली बॉय अपनी धीमी रफ़्तार के बावजूद, लम्बे सफ़र और कहीं कहीं दोहराव की शिकायतों के बीच, एक बेहतरीन फिल्म है. एक ऐसी मुकम्मल फिल्म जिसका जादू आप पर देर से भी चढ़ेगा, और रहेगा भी देर तक. ‘भोत हार्ड है, ‘मज़बूत है, भाई लोग, और ‘अपना टाइम आएगा जैसे टपोरी संवादों के साथ-साथ, यकीनन सिनेमाघरों से बाहर निकलते वक़्त आप मुराद बन कर रैप करने की असफल कोशिशों में अपने आप को चहकते-चमकते पायेंगे. दर्शकों पर ऐसा असर, आज के दौर में न आसान है, ना ही आम! जोया को बधाई! [4/5]   

Friday, 15 June 2018

लस्ट स्टोरीज़ (A): ‘लव’ से ज्यादा असल और अलग! [4/5]


प्यार की कहानियाँ सदियों से अनगिनत बार कही और सुनाई जाती रही हैं. वासना के हिस्से ऐसे मौके कम ही आये हैं. हालाँकि दोनों में फर्क बस सामाजिक बन्धनों और नैतिकता के सीमित दायरों का ही है. कितना आसान लगता है हमें, या फिर कुछ इस तरह के हालात बना दिए गये हैं हमारे लिए कि प्यार के नाम पर सब कुछ सही लगने लगता है, पाक-साफ़-पवित्र; और वासना का जिक्र आते ही सब का सब गलत, गंदा और अनैतिक. रिश्तों में वासना तो हम अक्सर अपनी सतही समझ से ढूंढ ही लेते हैं, वासना के धरातल पर पनपते कुछ अलग रिश्तों, कुछ अलग कहानियों को समझने-तलाशने की पहल नेटफ्लिक्स की फिल्म लस्ट स्टोरीज़ में दिखाई देती है, जो अपने आप में बेहद अनूठा प्रयास है. ख़ास कर तब, जब ऐसी कहानियों को परदे पर कहने का दारोमदार हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के चार बड़े नामचीन फिल्मकारों (अनुराग कश्यप, जोया अख्तर, दिबाकर बैनर्जी, करण जौहर) के मजबूत और सक्षम कन्धों पर टिका हो.

चार छोटी-छोटी कहानियों से सजी लस्ट स्टोरीज़ अपने नाम की वजह से थोड़ी सनसनीखेज भले ही लगती हो, पर कहानी और किरदार के साथ अपनी संवेदनाओं और सिनेमा के लिए अपनी सशक्त जिम्मेदारियों में खुद को तनिक भी लचर या लाचार नहीं पड़ने देती. अनुराग की कहानी एक महिला प्रोफेसर के अपने ही एक स्टूडेंट के साथ जिस्मानी सम्बन्ध बनाने से शुरू होती है. कालिंदी (राधिका आप्टे) का डर, उसकी नर्वसनेस, तेजस (सैराट के आकाश ठोसर) पर जिस तरह वो अपना अधिकार जमाती है, सब कुछ एक सनक से भरा है. एक हिस्से में तो वो तेजस का बयान तक अपने मोबाइल में रिकॉर्ड करने लगती है, जिसमें तेजस सब कुछ आपसी सहमति से हुआ था की हामी भर रहा है. हालांकि अपने एक से ज्यादा रिश्तों में कालिंदी की तड़प उन दृश्यों में साफ़ होने लगती है, जिनमें वो कैमरे से रूबरू होकर कुछ बेहद अहम् सवाल पुरुषों की तरफ उछालती है. राधिका अपने किरदार के पागलपन में हद डूबी हुई दिखाई देती हैं, पर फिल्म कई बार दोहराव से भी जूझती नज़र आती है, अपने 35 मिनट के तय वक़्त में भी लम्बी होने का एहसास दे जाती है.

सुधा (भूमि पेडणेकर) अजीत (नील भूपलम) के साथ कुछ देर पहले तक बिस्तर में थी. अब फर्श पर पोछा लगा रही है. पोहे की प्लेट और चाय का कप अजीत को दे आई है. अब बर्तन कर रही है. बिस्तर ठीक करते हुए ही दरवाजा बंद होने की आवाज़ आती है. अजीत ऑफिस जा चुका है. सुधा उसी बिस्तर पर निढाल होकर गिर गयी है. जोया अख्तर की इस कहानी में ऊंच-नीच का दुराव बड़ी संजीदगी से पिरोया गया है. सुधा एक काम करने वाली नौकरानी से ज्यादा कुछ नहीं है, उसे भी पता है. अजीत के साथ शारीरिक सम्बन्धों के बावजूद, अपने ही सामने अजीत को लड़की वालों से मिलते-बतियाते देखते और उनके लिए चाय-नमकीन की तैयारी करते वक़्त भी उसे अपनी जगह मालूम है, फिर भी उसकी ख़ामोशी में उसके दबते-घुटते अरमानों और ख्वाहिशों की चीख आप बराबर सुन पाते हैं. भूमि को उनकी रंग-ओ-रंगत की वजह से भले ही आप इस भूमिका में सटीक मान बैठे हों, पर असली दम-ख़म उनकी जबरदस्त अदाकारी में है. गिनती के दो संवाद, पर पूरी फिल्म में क्या दमदार उपस्थिति. इस फिल्म में जोया का सिनेमा भी क्या खूब निखर कर सामने आता है. कैमरे के साथ उनके कुछ दिलचस्प प्रयोग मज़ा और दुगुना कर देते हैं.

दिबाकर बैनर्जी की कहानी एक बीचहाउस पर शाम होते ही गहराने लगती है. रीना (मनीषा कोईराला) साथ ही बिस्तर में है, जब सुधीर (जयदीप अहलावत) को सलमान (संजय कपूर) का फ़ोन आता है. सलमान को लगने लगा है कि उसकी बीवी रीना का कहीं किसी से अफेयर चल रहा है. शादी-शुदा होने का बोझ और बीवी होने से ज्यादा बच्चों की माँ बन कर रह जाने की कसक अब रीना की बर्दाश्त से बाहर है. सलमान को खुल कर सब सच-सच बता देने में ही सबकी भलाई है. वैसे भी तीनों कॉलेज के ज़माने से एक-दूसरे को जानते हैं. शादी से बाहर जाकर अवैध प्रेम-संबंधों और अपने पार्टनर से वफादारी के मुद्दे पर दिबाकर इन अधेड़ उम्र किरदारों के जरिये एक बेहद सुलझी हुई फिल्म पेश करते हैं, जहां एक-दूसरे की जरूरतों को बात-चीत के लहजे में समझने और समझ कर एक माकूल रास्ता तलाशने में सब के सब परिपक्व और समझदार बन कर सामने आते हैं. मनीषा और संजय को नब्बे के दशक में हम बहुत सारी मसाला फिल्मों में नॉन-एक्टर घोषित करते आये हैं, इस एक छोटी फिल्म में दोनों ही उन सारी फिल्मों में अपने किये-कराये पर मखमली चादर डाल देते हैं. जयदीप तो हैं ही बाकमाल.

आखिरी किश्त करण जौहर के हिस्से है, और शायद सबसे फ़िल्मी भी. कहानी पिछले साल की शुभ मंगल सावधान से बहुत अलग नहीं है. मेघा (कियारा आडवाणी) के लिए बिस्तर पर अपने पति पारस (विक्की कौशल) के साथ सुख के पल गिनती के ही रह जाते हैं (हर बार वो उँगलियों से गिनती रहती है), और उसके पति को कोई अंदाज़ा ही नहीं कि उसकी बीवी का सुख उसके सुख से अलग है, और कहीं ज्यादा है. मनचाही ख़ुशी के लिए बैटरी और रिमोट से चलने वाले खिलौने की दखल के साथ, करण कहानी को रोचक बनाने में ज्यादा उत्तेजित दिखते हैं, कुछ इस हद तक कि अपनी महान पारिवारिक फिल्म कभी ख़ुशी कभी गम के गाने का मज़ाक उड़ाने में भी झिझकते नहीं. विक्की कौशल मजेदार हैं.

आखिर में, लस्ट स्टोरीज़ 2013 में आई अनुराग, ज़ोया, दिबाकर और करण की बॉम्बे टॉकीज वाले प्रयोग की ही अगली कड़ी है. फिल्म इस बार बड़े परदे पर नहीं दिखेगी, और सिर्फ नेटफ्लिक्स पर ही मौजूद रहेगी, इसलिए अपनी सहूलियत से कभी भी और कहीं भी देखने का लुत्फ़ आप उठा सकते हैं. ज़ोया और दिबाकर की कहानियों के बेहतर होने के दावे के साथ ही, एक बात की ज़मानत तो दी ही जा सकती है कि हिंदी सिनेमा के आज में इस तरह की समर्थ, सक्षम और असामान्य कहानियां कहने की कोशिशें कम ही होती हैं, खुद इन चारों फिल्मकारों को भी आप शायद ही इन मुद्दों पर एक बड़ी फिल्म बनाते देख पायें, तब तक एक ही फिल्म में चारों अलग-अलग ज़ायकों का मज़ा लीजिये. लव से ज्यादा मिलेगा, कुछ नया मिलेगा. [4/5]

Friday, 5 June 2015

DIL DHADAKNE DO: Parents, O Parents! A long family affair! [3.5/5]

An ideal family is a myth. Issues like gender discrimination, forceful implementations of the patriarchy power, constant manipulations over fake morality, compromises for the sake of saving relationships and a flair of hypocrisy even in the most sober looking character do lie in every family. It’s only a matter of time to experience what will surface and when. A dysfunctional family as they call it is nothing but an elaborated term for any family out in this world. Zoya Akhtar's DIL DHADAKNE DO offers you a chance for a paid visit to one of these 'dysfunctional' families.

Anil Kapoor plays the ‘self-made’ millionaire Mehra, who’s celebrating his 30th marriage anniversary with Mrs. Mehra [Shefali Shah] on a cruise. The daughter Mehra [Priyanka Chopra] losing her surname now to her husband’s after marriage is irked with the invitation-card not carrying her name as a family-member. The son Mehra [Ranveer Singh] is trying his hard to fit in his father’s shoes. Along with some close friends and relatives, Mehras are out on loose on the cruise. Everything looks perfectly planned, well-designed, glossy, shiny and desirable until the real issues within the family start melting down all the plastics on the most beautiful looking faces on earth. The daughter Mehra wants to move in life and is now asking for a divorce. The son Mehra is blackmailed emotionally to marry the daughter of one of the possible business partners. The catch for the son Mehra is a private jet he finds his true love in. Parents, O parents!

Zoya Akhtar with Reema Kagti presents to you a gorgeous looking family you might wish to have in your next life but with the short and sour problems chances are you’re already facing in this very life. Who haven’t been preached all his life hearing the same-old struggle-story of his father from the horse’s mouth? Do mothers ever fail in ‘baby-ing’ the son even if he’s started dating hot babes? And then, there is this epic scheming side of the parents who are alive only to see their sons/daughters getting married. The best part is the Zoya-Reema duo doesn’t try to sink you in the murkiness of the situations but saves you with the quirk in dialogues and a flashy wit in the nature of the characters. Despite a certain kind of dreariness in the plot and the slacken off duration, film manages to keep you smiling for the most parts.

With a picturesque star-cast that looks like coming to a special edition magazine cover photo-shoot, DIL DHADKANE DO never actually has a dull frame. Even the brigade of supporting actors like Divya Seth Shah, Parmeet Sethi, Vandana Sajnani, Ridhima Sud, Vikrant Massey and Manoj Pahwa charmingly finds its place to rise and shine. Also Farhan, Priyanka, Rahul Bose and Anushka are branded names to come up with performances you can’t crib about but eventually DIL DHADAKNE DO finds its acting-giants in Anil Kapoor, Ranveer Singh and Shefali Shah. All of these three names have rediscovered themselves in their own way. Anil Kapoor’s performance as a suave, money-driven, self-centered, crude, controlling and calculative patriarch is terrific. Ranveer Singh surprises as well. Probably for the first time, he has brought something called subtly in his performance and it’s totally rewarding. Move over his ‘ever ready’ charged up energy assurance, here is an actor a lot more yet to be explored. Shefali Shah is brilliant and makes you wonder why Bollywood hasn’t given her yet what she deserves. Well done, Ma’am!

To conclude, DIL DHADAKNE DO suffers two major slip-ups. One being the length of the film of course and the other is the narration given by none other than Aamir Khan lending his voice to the younger Mehra of the family; a dog! Yes, you heard it right.  Now, this can be an ‘Aww’ moment for puppy-loving beauties but for the film, it does throw a fit of boredom on you. Watch out for some real ‘surprising’ performances and dialogue-driven humor! [3.5/5]

Sunday, 5 May 2013

BOMBAY TALKIES : Cinema has given you a lot, now its time to return the favor! [4/5]

On the day when Indian cinema is celebrating its glorious centenary; I still remember how I, in my pre-teens, used to run after movie promotional rickshaws every time they showed up in my village, just in hope to get a movie poster someday. Memories are still fresh when my craze for the dynamic Kajol landed me in celebrating her birthdays and posting articles and photographs of her in a secret diary [I still have it :)] and trust me, there are numerous other examples of hardcore fascination towards Indian cinema that run in our veins secretly but passionately.

Karan-Zoya-Dibakar-Anurag’s BOMBAY TALKIES is one of loveliest short film bouquet that takes us through how Cinema or for that matter Bollywood has become an integral part of our lives. So, you see Karan Johar effectively pushing his boundaries as a filmmaker and walking around the dark galore of homosexuality where two people [played immaculately by Randeep Hooda & Saquib Saleem] bond over their common taste & love for bollywood music…SENSITIVE-BOLD-CONFIDENT! 

Zoya Akhtar decides to tell a dreamy story of a teenage boy [All praises for Naman Jain- the child actor] who idolizes Katrina Kaif as shiela and has now discovered his passion for being a dancer like her, rather than enrolling for masculine sports i.e. soccer…ENGROSSING! 

Dibakar Banerji presents Nawazuddin in a story originally written by Satyajit Ray, for a power-packed performance as a small time theatre-artist who is quite a failure in real world but seeks a new glossy story in reel world to bring rewarding smile on his bedridden daughter…MOVING-HEARTFELT-IMPRESSIVE. 

Anurag Kashyap’s short is definitely the most entertaining of the lot. A common man from Allahabad struggles to meet his cinema-idol Amitabh Bachchan just to fulfill his father’s sort of unusual last wish…HILARIOUS & LIKEABLE! 

This ode to cinema works for its finesse for the craft that gives you first rate performances, brilliance of writing, flawless screenplay & the most importantly its exhaustive realistic approach to stay honest to each segment and subject. Not all the stories are unheard before but the sincerity in execution demands a must watch in theaters. This is not strictly experimental for classes, this is not formula based for masses…but a rare for all cinema lovers. Cinema has given you a lot, now its time to return the favor! [4/5]