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Friday, 23 June 2017

ट्यूबलाइट: यकीनन...ख़राब फिल्म-खराब एक्टिंग! [1.5/5]

'ट्यूबलाइट' के होने की वजह मेरे हिसाब से 'बजरंगी भाईजान' की कामयाबी में ही तलाशी गयी होगी. चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने कबीर खान के हाथ अब एक ऐसा अमोघ फार्मूला लग गया था, जिसमें बॉक्स-ऑफिस पर सिक्कों की खनक पैदा करने की हैसियत तो थी ही, आलोचकों और समीक्षकों का मुंह बंद कराने की ताकत और जुड़ गयी. एक सीधी-सादी दिल छू लेने वाली कहानी, थोड़ा सा 'बॉर्डर-प्रेम' का पॉलिटिकल तड़का, चुटकी भर 'बीइंग ह्यूमन' का वैश्विक सन्देश और साफ़ दिल रखने की तख्ती हाथों में लेकर घूमते एक बेपरवाह 'भाईजान'. 'ट्यूबलाइट' बड़े अच्छे तरीके और आसानी से इसी ढर्रे, इसी तैयार सांचे में फिट हो जाती है, पर जब आग में तप कर बाहर आती है तो नतीज़ा कुछ और ही होता है. मिट्टी ही सही नहीं हो, तो ईटें भी कमज़ोर ही निकलती हैं. 

कुमाऊँ के एक छोटे से गाँव में गांधीजी कहकर गये, "यकीन से कुछ भी हासिल किया जा सकता है". ट्यूबलाइट की तरह, देर से दिमाग की बत्ती जलने वाले लक्ष्मण (सलमान खान) की सुई इस 'यकीन' पर आके कुछ ऐसे अटक गयी कि सालों बाद 1962 के भारत-चीन युद्ध में लापता भाई (सोहेल खान) की वापसी के लिए भी, लक्ष्मण उसी 'यकीन' की तरफ टकटकी लगाये देख रहा है. कबीर खान कहानी की इस ठीक-ठाक नींव को मज़बूत करने में थकाऊ धीमी गति और पकाऊ भाषणों से इतना वक़्त खपाते हैं कि फिल्म का वो ज़रूरी पैग़ाम देने में देर हो जाती है, जहां चीनी मूल के भारतीय माँ-बेटे लीलिंग और गुओ (ज़ू ज़ू और माटिन रे तंगु) को गांववाले चीनी समझकर नस्ली भेदभाव दिखाने लगते हैं. लक्ष्मण खुद गुओ को 'गू' कहकर बुलाता है, और एक दृश्य में तो गुओ को 'भारत माता की जय' बोल कर हिन्दुस्तानी होने का सबूत देने को भी कहता है. आज के दौर में, जब सेना के जुझारूपन और हर किसी के 'देशभक्त' होने, न होने की पिपिहरी पूरे देश में जोरों से बज रही है, कबीर खान भारतीय सेना के एक अधिकारी (यशपाल शर्मा) से युद्ध-विरोधी बातें कहलवाने की हिम्मत तो जरूर दिखाते हैं, लेकिन सब कुछ बेदम, बनावटी और बेअसर!

फिल्म में बहुत कुछ बेढंगा और वाहियात है, जो आपको लगातार परेशान करता रहता है. कुमाऊँ का यह गाँव फिल्मी सेट लगने-दिखने की हद से बाहर जा ही नहीं पाता. फिल्मों में 80 के दशक के गाँव और वही 25-50 चेहरे, जो हर जगह भीड़ का हिस्सा बनकर चौराहे पर डटे रहते थे, बेबस याद आ जाते हैं. कैलेंडर पर '62 भले ही चल रहा हो, गाँववालों की बातचीत के लहजे में 'चाइना', 'ज़िप', 'गैप' और तमाम अंग्रेज़ी के शब्द बड़ी बेशर्मी से कानों में सुनाई देते रहते हैं. फिर आती हैं मशहूर चीनी अभिनेत्री ज़ू ज़ू. मुझे कोई वजह समझ नहीं आती कि उनकी जगह कोई दूसरी (नार्थ-ईस्ट की) भारतीय अभिनेत्री क्यूँ नहीं हो सकती थी? जैसे उनके बेटे की भूमिका में माटिन रे तंगु अरुणाचल प्रदेश से ही हैं. 'मैरी कॉम' में प्रियंका चोपड़ा की कास्टिंग जैसी ही कुछ भयानक गलती है ये. 

...पर फिल्म में एक पॉइंट पर आकर आपको ये सारी शिकायतें बहुत छोटी लगने लगती हैं, जब आप फिल्म के मुख्य कलाकार सलमान खान को एक के बाद एक हर दृश्य में अभिनय के नाम पर कुछ भी आढ़े-टेढ़े चेहरे बनाते हुए देखते हैं. कबीर उनके किरदार को परदे पर रोते हुए पेश करने में ज्यादा मेहनत दिखाते हैं, पर हमें रोना आता है तो सिर्फ सलमान की अभिनय में नाकाम कोशिशों से. फिल्म में सलमान अपने यकीन से पहाड़ भी हिला देते हैं, ऐसा ही कोई यकीन उन्हें अपने अभिनय में भी दिखाना चाहिए. कभी-कभी ही सही. मोहम्मद जीशान अय्यूब जैसे मंजे कलाकार के लिए फिल्म में बहुत कुछ करने को नहीं है, पर एक दृश्य में जब वो सलमान के किरदार को थप्पड़ जड़ रहे होते हैं, लगता है सलमान को जैसे सज़ा मिल रही हो, अच्छी एक्टिंग न करने की, उससे जो शायद फ़िल्म में सबसे अच्छी कर रहा हो. सोहेल खान बड़ी समझदारी से फिल्म में आते-जाते रहते हैं, तो उनसे न तो ज्यादा उम्मीदें बनती हैं, न ही शिकायतें. शाहरुख एक दृश्य में आते तो हैं, पर उनसे भी किसी करिश्मे की कोई आस नहीं जगती.    

आखिर में; 'ट्यूबलाइट' में कबीर खान अपने 'बजरंगी भाईजान' वाले फ़ॉर्मूले को बॉक्स-ऑफिस पर दोबारा भुनाने की कोशिश करते हैं, पर ठीक वैसे ही औंधे मुंह गिरते हैं, जैसे 'एक था टाइगर' के बाद 'फैंटम'. रही बात यकीन की, तो मुझे यकीन है कि भाई एक दिन एक्टिंग करनी सीख ही जायेंगे, तब तक के लिए भेजते रहिये 'ईदी'...और बिजली में कटौती, रौशनी में बढौती के लिए अपनाईये एलईडी! [1.5/5]        

Friday, 9 September 2016

फ्रीकी अली: नवाज़ का ‘कॉमेडी सर्कस’! [2/5]

लेखक-निर्देशक सोहेल खान ने भारतीय टेलीविज़न पर कॉमेडी शोज में जज की भूमिका निभाते हुए अपना काफी वक़्त हँसते-खेलते बिताया है. उनकी नई फिल्म ‘फ्रीकी अली’ को अगर अच्छी तरह बयान करना हो तो उन्हीं कॉमेडी शोज का जिक्र लाजिमी हो जाता है. फिल्म न ही उन तमाम एपिसोड्स से कमतर है, न ही उनसे बेहतर. हां, नवाजुद्दीन सिद्दीकी को मुख्य किरदार के तौर पर फिल्म में ले लेना ज़रूर फिल्म को एक मज़बूत कन्धा दे देता है. कम से कम अब फिल्म के हर फ्रेम में एक ऐसा टैलेंट तो है, जिसे फिल्म भले ही उसकी शख्सियत-मुताबिक तवज्जो न दे पर जो खुद अपने आप को कभी निराश नहीं करता. संवादों में व्यंग परोसने की अपनी लगातार कोशिश के साथ, ‘फ्रीकी अली’ मनगढ़ंत सी लगने वाली, चलताऊ कहानी के बावजूद आप को अपने ठीक 2 घंटे की समय-अवधि में कम से कम उकताहट और उबासी तो महसूस नहीं ही होने देती.

अली ‘फ्रीकी’ क्यूँ है? इसका जवाब तो मुश्किल है पर अपनी गली की क्रिकेट टीम का ‘पिंचहिटर’ अली [नवाज़ुद्दीन] पैसे कमाने के लिए हर तरह की नौकरी-कारोबार आजमा चुका है. हफ्तावसूली उसका एकदम नया वाला पैंतरा है. एक दिन इसी सिलसिले में गलती से उसे ‘गोल्फ’ खेलने का मौका मिलता है. क्रिकेट के अनुभवों से लैस अली जल्द ही गोल्फ की दुनिया में मशहूर हो जाता है. अब उसके और उसके सपनों के बीच बस एक ही अड़चन है, अपनी अमीरी का रौब झाड़ने वाला ‘गोल्फ चैंपियन’ विक्रम सिंह राठौर [जस अरोरा, गुड़ नाल इश्क मिठा वाले]. विक्रम उसे नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ता और अली उन मौकों को उतनी ही आसानी से उसके खिलाफ इस्तेमाल कर लेता है.

एडम सैंडलर की ‘हैप्पी गिलमोर’ से प्रभावित होकर लिखी गयी, ‘फ्रीकी अली’ की कहानी को मजेदार बनाने के लिए सोहेल खान अपने पुराने ‘हेलो ब्रदर’ ढर्रे का ही सहारा लेते हैं, जहां कहानी के मुख्य किरदार एक अलग ट्रैक पर भटक रहे हैं और दूसरे ट्रैक पर मजाकिया किरदार फिल्म के बीच बीच में आ कर, छोटे छोटे ‘गैग्स एंड गिग्स’ के साथ आपको हंसाने की कोशिश करते हैं. कॉमेडी का ये वो ‘खान’-दान है, जहां हँसी के लिए बूढों, बच्चों और औरतों को गरियाया जाता है, लतियाया जाता है और ऐसा करते वक़्त तनिक शिकन और शर्म भी चेहरे पर आने नहीं दिया जाता. ताज्जुब होता है कि करोड़ों की ये फिल्म उसी छत के नीचे सोची और लिखी गयी है, जहां हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के महानतम लेखकों में से एक अभी भी पूरी तरह सक्षम और सक्रिय है. सोहेल खान बार-बार अपने ‘जोक्स’ को दुहराते रहते हैं, किरदारों को कार्टून बना कर पेश करते हैं और ड्रामा के नाम पर कुछ भी ख़ास परोस पाने में असफल रहते हैं. संवाद और नवाज़ दो ही हैं जो हर बार एक-दूसरे के साथ घुल-मिल कर सोहेल के ‘मजाकिया’ दिवालियेपन को परदे पर नंगा होने से बचा लेते हैं.

कहने को तो यहाँ बहुत कुछ है. एक हट्टा-कट्टा गुंडा जिसकी समझ बच्चे से भी कम है [निकेतन धीर], एक चालाक बूढ़ा आदमी जिसे दुनिया की हर चीज़ याद है पर अपने पैसे और प्रॉपर्टी नहीं, एक माँ जो अपने बेटे के लिए ‘उसके पास माँ है’ की दुहाई देते हुए एक गैंगस्टर से भी भिड़ जाती है [सीमा विश्वास], पर जब अभिनय बात आती है सिर्फ नवाज़ आपको लुभाने में कामयाब रहते हैं. उनके साथी की भूमिका में अरबाज़ बेचारे से लगते हैं, जिन्हें सिर्फ इस लिए फिल्म में लिया गया है क्यूंकि वो ‘खान’दान से हैं. जस अरोरा गुर्राते ज्यादा सुनाई देते हैं. एमी जैक्सन कितनी ईमानदार कोशिश करती होंगी अपने परफॉरमेंस में, इसका अंदाजा आपको इसी बात से हो जाता है कि अक्सर अपनी लाइनें बोलते वक़्त उनके होंठ ही आपस में मिलने से इनकार कर देते हैं. एक दृश्य में जैकी श्रॉफ बस अपने बदनाम ‘मऊशी’ वीडियो क्लिप की ही याद दिलाने परदे पर आ जाते हैं.

अंत में; ‘फ्रीकी अली’ एक बहुत ही सामान्य सी, हलकी-फुलकी फिल्म है, जो दो घंटे के कम वक़्त में भी अपने आप को कई बार दोहराती रहती है. ऐसा लगता है जैसे आप टीवी पर ‘कॉमेडी सर्कस’ का कोई महा-एपिसोड देख रहे हैं, जहां कोई कपिल-कृष्णा-सुदेश नहीं हैं. हैं तो बस नवाज़! सन्डे को टीवी पर आये तो ज़रूर देखियेगा! [2/5]          

Friday, 24 January 2014

JAI HO: Prabhu Dheva-meets-Sooraj Barjatya! Being SUPER human-sans-common sense!! [2/5]

Do not dare to complain. You had seen it coming. Didn’t the character of Salman Khan warn you in the promos itself that “Aam Aadmi ek sota hua Sher hai, ungli mat kar…jag gaya toh cheer-phaad dega”? Only problem is that the film in question JAI HO decides to take the same salient statement in a very literal sense and not in what it actually intended to be.

So, this ‘Aam Aadmi’ stands nowhere near the classification of a common man, projected & presented well in recent Delhi state elections. But this common man played by the mass hysteria Salman Khan, largely called as ‘Bhai’ does have an overcrowded family with mother & sister ready to participate wholeheartedly in the proceedings as soft targets of evil forces…and whenever that happens, ‘Bhai’ takes a drastic transformation from ‘Being human’ to ‘Being SUPER human’ with the immense power of an incredible hulk like creature who roars loud to deafen your ears, nails his teeth deep in the veins of his enemies and even goes shirtless to make his fans go wild and frenzy over his gigantic stature.

An official remake of Chiranjeevi Starrer Telugu blockbuster ‘STALIN’, again a inspired version of Hollywood drama PAY IT FORWARD, Sohail Khan’s JAI HO [earlier titled as MENTAL] is a film good at heart because of the social message it carries to help out at least three people instead just saying a ‘thank you’ in return of anyone’s help but turns sore, cliché & tiresome with the route it takes to communicate the same. When it is good, it is as sugary as Sooraj Barjatya’s heavily traditional family entertainers. When it is bad, it is as unendurable as Prabhu Dheva’s mindless action-thrillers. Avid movie-watchers can vouch for the both being a non-entertainer.  

And then the regular dosage of absolutely inane & offensive jokes! Calling names like ‘Chhota Chooha’ when our leading lady sees a bathing kid without clothes and to make it equal, the kid calling her ‘Pinky’ as, in one of her odd days, she somehow authenticates wearing pink colour undergarments, if this is the height of efforts to make us laugh, I refuse and retaliate to be entertained. Trust me; soon you’ll hear these terms in your zone and Mr. Khan will not be there to protect you with his own fans.

JAI HO is one such film where actors on screen for lesser time look less exasperating than others, to earn comparatively less disapproval and more regards for their ‘short & sweet’ performances. You see so much of known faces in every character on screen that if I put their full names in written here, a 1-page review would need at least 20-odd pages of a coffee-table book to fit in and that in case when their performances don’t bring much to say.

Tabu makes a comeback sort and is good to see but definitely deserves better writing support to match her skills. Nadira Babbar is known for her excellence in theatre but as the mother, she only earns yawns here. Pathetic is the word. Daisy Shah doesn’t get much to appreciate than her dancing skills in the introduction scene. One powerhouse of talent is the Child Artist Naman Jain. See his confidence in comic timings to believe.

And now the man himself! Well, Salman is Salman. No one plays him better than he himself. He does things he believes in. His self-indulgence shows on screen and that is what his fans love to watch. Who am I to come between the God and his die-hard followers? All I can say to rest my case is that JAI HO is a confused platter of spicy southern curries with extra-mild Jain recipes. Better avoid ordering! [2/5]