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Friday, 15 March 2019

फ़ोटोग्राफ : उदासी, ख़ामोशी, खालीपन...और मुंबई! (4/5)

उदासी का रिश्ता अलग ही होता है. मुंबई जैसे भीड़ भरे शहर में भी, जहां वक़्त को भी ठहरने का वक़्त नहीं, दो एकदम अनजान उदास लोग एक-दूसरे को जानने-समझने लगे हैं. दोनों की दुनिया ही पूरी तरह अलग है, मगर खालीपन का एक कमरा दोनों ही के हिस्से बराबर आया है. दोनों अपने-अपने बंद कमरों से निकलने को छटपटा रहे हैं. हालाँकि ये छटपटाहट महसूस करने के लिए आपको उनकी लील लेने वाली ख़ामोशी में गहरे उतरने का हौसला और हुनर, दोनों साथ रखना पड़ेगा. अपनी पहली फिल्म ‘द लंचबॉक्स में इंसानी ज़ज्बातों की कुछ ऐसी ही उथलपुथल रितेश बत्रा पहले भी दिखा चुके हैं. उन्हें आता है, ढर्रों पर भागते अनजान किरदारों को धकेल-धकेल कर एक दूसरे के करीब ले आना, उन्हें भाता है. ‘फ़ोटोग्राफ’ का ज़ायका भी कमोबेश वैसा ही है.

मिलोनी (सान्या मल्होत्रा) टॉपर है. उसे चार्टर्ड अकाउंटेंट बनाने के लिए पूरी फैमिली नज़र गड़ाये बैठी है. ऐसी लड़कियों की तस्वीरें अक्सर पासपोर्ट साइज़ की ही बन के रह जाती हैं, कभी किसी फॉर्म पे, कभी किसी आई कार्ड पे और ज्यादा हुआ तो किसी ‘अनुपम सर की कोचिंग क्लास’ के बिलबोर्ड पे. ऐसे में, एक दिन गेटवे ऑफ़ इंडिया पर टहलते हुए मिलोनी पासपोर्ट साइज़ के फोटो से निकल कर पोस्टकार्ड साइज़ में छप जाती है. कैमरे की मेहरबानी कहिये या फोटोग्राफर की वो ‘एक पैसा मुस्कुराईये’ वाली रटी-रटाई गुज़ारिश; मिलोनी को फोटो में अपनी ही शकल अनजान लगने लगती है, पहले से थोड़ी ज्यादा खुश, पहले से थोड़ी ज्यादा ख़ूबसूरत.

रफ़ी (नवाज़ुद्दीन सिद्दिकी) जैसे तमाम फोटोग्राफर आपको गेटवे ऑफ़ इंडिया पर ’पचास (रूपये) में, गेटवे के साथ ताज़ (होटल)’ बेचते नज़र आ जायेंगे, शायद ही आप उनमें से किसी एक के साथ उनके घर तक लौटते हों. रितेश हमें ले जाते हैं, उस एक तंग कमरे में जहां हर कोई अपनी-अपनी आपबीती खुल के बयाँ कर रहा है, यहाँ तक कि कमरे का पंखा भी. रफ़ी को वसीयत में बाप का क़र्ज़ और एक बेबाक बोलने वाली दादी (फारुख जफ़र) नसीब हुई हैं, जिनकी जिद रफ़ी के निकाह पर आ कर बंद घड़ी की सुई जैसे टिक गयी है. टालने के लिए रफ़ी ने शाम की खिंची तस्वीर दादी को पोस्ट कर दी है. मिलोनी अब रफ़ी की ‘नूरी बन गयी है.

‘फ़ोटोग्राफ’ में मुंबई शहर फिल्म का एक अलग से किरदार बन कर सामने आता है, चाहे वो इंसानी शक्ल में घर की नौकरानी (गीतांजलि कुलकर्णी) हो, जिसे चौपाटी पर लिपस्टिक लगाए, बैग लटकाए घूमते देख आप मुश्किल से पहचान पायेंगे या फिर इमारती तौर पर रफ़ी का वो कमरा, जहां चार-चार लोग एक साथ करवट बदल रहे हैं. ‘फ़ोटोग्राफ’ के मिलोनी और रफ़ी ‘द लंचबॉक्स’ के इला और साजन फ़र्नान्डिस से परे नहीं हैं. दोनों की जिंदगियों के टुकड़े मिले-जुले तो हैं, पर जिनके एक होने की उम्मीदें कम ही हैं. मिलोनी बचपन के ‘कैम्पा कोला से बंधी हुई है, तो रफ़ी महीने के आखिर में ‘कुल्फी खाने की आदत के साथ अपने अब्बू की यादों से जुड़ा हुआ. बेहतर है कि दोनों को करीब लाने में बत्रा ज़ज्बातों को कोई नाम देने की जल्दबाजी नहीं दिखाते.

उदासी, बेबसी और नाउम्मीदी भले ही हवा में सीलन की तरह पसरी हो, पर बत्रा उस माहौल में भी हंसी के पल ढूंढ ही लेते हैं. एक ऐसी हंसी जो देर तक कचोटती भी है. मौत जैसे गंभीर मामलों वाले दृश्यों में खास तौर पर. रफ़ी के कमरे में किसी ने कभी ख़ुदकुशी कर ली थी, और उसका एहसास कमरे में रहने वाले को तब हुआ था, जब लाश के बोझ से पंखे ने घूमना बंद कर दिया था और कमरे में गर्मी बढ़ गयी थी. पंखा आज भी घिघिया रहा है. रफ़ी ने अपने माँ-बाप को बचपन में ही खो दिया था, दादी से नूरी बनकर मिलते वक़्त, मिलोनी अपने परिवार को भी मस्जिद की दीवार के तले दबा कर मार देती है. उनके दर्द में साझा होने की गरज़ से.

अदाकारी में, नवाज़ जहाँ अपनी जानी-पहचानी दुनिया में पूरे दमखम के साथ लौटते नज़र आते हैं, सान्या अपने अब तक के निभाए सबसे मुश्किल किरदार में पाँव धरती हैं. मिलोनी बेहद कम बोलती है. उसकी ख़ामोशी उससे कहीं ज्यादा बातें करती है. उसकी ज्यादातर जिंदगी उसके परिवार की चुनी हुई है. रफ़ी के साथ बिताये वक़्त ही उसके अपने हैं. ऐसे किरदार में सान्या पूरी शिद्दत से रच-बस जाती हैं. फारुख जफ़र अपनी बेबाक बकबक से गुदगुदाती रहती हैं. उनके उलाहने, उनकी कहानियाँ, अपने पोते रफ़ी को लेकर उनकी शिकायतें सब इतनी ईमानदार हैं कि आपको उनके अदाकारा होने का भरम भी नहीं होता. गीतांजलि कुलकर्णी भी कुछ इतनी ही जबरदस्त हैं. एक नौकरानी के किरदार में, जहाँ कहने-सुनने से ज्यादा फ्रेम में आने-जाने भर का ही स्कोप रह जाता हो, वहाँ भी और गिनती के उन दो-तीन दृश्यों में भी, गीतांजलि अकेली ही मुझे फिल्म दोबारा देखने को उत्साहित करती हैं. उनके हाव-भाव मुझे घंटों बाद भी याद हैं.

आखिर में, ‘फ़ोटोग्राफ एक ऐसी फिल्म है जो आसान नहीं है. घंटों बाद भुलानी भी, और अपने दो घंटे के कम वक़्त में बिना विचलित हुए देखनी भी. फिल्म जहाँ कुछ दृश्यों में अपने आपको दोहराने की गुनाहगार समझी जा सकती है, वहीँ अपनी धीमी रफ़्तार की वजह से लम्बी होने का एहसास भी करा जाती है. बावजूद इसके, आखिर कितनी बार आप इंसानी ज़ज्बातों का कोई ऐसा ताना-बाना देख पाते हैं, जहाँ रिश्तों में ईमानदारी इस हद तक हो कि उसे नाम देने की जरूरत ही न पड़े! [4/5]

Friday, 25 August 2017

बाबूमोशाय बन्दूकबाज़ (A): गैंग्स ऑफ़ यूपी! [3/5]

देसी कट्टेबाज़ों की जो कच्ची-पक्की दुनिया हमने देखी-सुनी है, अनुराग कश्यप, तिग्मांशु धूलिया और विशाल भारद्वाज की फिल्मों के बदौलत ही है. उत्तर प्रदेश और बिहार की उबड़-खाबड़ ज़मीन में कुकुरमुत्ते की तरह उगते, राजनीतिक सत्ता के हाथों कठपुतली की तरह नाचते और अपराध को 'शक्ति' की सीढ़ी बनाकर बात-बात पर खून की होली खेलते किरदारों में 'नायक' खोजने का दम अब तक इन्हीं चंद फ़िल्मकारों ने दिखाया था. कुशान नंदी की 'बाबूमोशाय बन्दूकबाज़' भी परदे पर इन तमाम फ़िल्मकारों और उनकी चर्चित फ़िल्मों का जश्न एक श्रद्धांजलि की तरह पूरी शिद्दत से मनाती है. किरदारों के तेवर, उनका रूखापन, उनकी बेख़ौफ़ ज़बान, कहानी में जिस्मानी प्यार, बेहयाई, बेवफ़ाई और वार-पलटवार की अंधाधुंध रफ़्तार के बीच 'डार्क ह्यूमर' का भरपूर इस्तेमाल; 'बाबूमोशाय बन्दूकबाज़' वो सब कर गुजरती है जिसे आप 'गैंग्स ऑफ़ वास्सेपुर' जैसी फिल्मों में कभी दिल खोल कर, तो कभी दबी जुबान में ही सही, सराह चुके हैं. खून का रंग बस्स उतना गाढ़ा नहीं लगता, कहानी में गहरे जज़्बातों से कहीं ज्यादा 'इरादतन' दांव-पेंच ज्यादा नज़र आते हैं और फिल्म दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश भी नहीं करती. 

बाबू (नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी) मौत का 'पोस्टमैन' है. कभी दीदी (दिव्या दत्ता) तो कभी दूबे (अनिल जॉर्ज) से पैसे लेकर लोगों का क़त्ल करता है. हद दर्जे का मर्द आदमी है. बेगैरत और पक्का हरामी. फुलवा (बिदिता बाग़) के साथ उसकी आसान जिंदगी में थोड़ी हलचल तब होती है, जब अपने ही एक जबरदस्त फैन बांके (जतिन गोस्वामी) के साथ उसकी होड़ लगती है कि दिये गये 3 चेहरों में से कौन कितने ज्यादा मारेगा? बाबू के लिए उसकी इज्ज़त, उसका नाम दांव पर है जबकि बांके के लिए एक मौका, अपने आप को अपने गुरु की नज़र में काबिल साबित करने का. मगर इन सब में बहुत कुछ और भी है, जो प्याज के छिलकों की तरह धीरे-धीरे उतरता रहता है. 

गालियाँ देने में मर्दों को टक्कर देने वाली लोकल पॉलिटिशियन दीदी हो, या अपनी ही बीवी को दूसरे मर्द से तेल-मालिश करवाते देखने का रसिया दूबे; 'बाबूमोशाय बन्दूकबाज़' रंगीन किरदारों से भरी पड़ी है. लोकल थाने का इंस्पेक्टर (भगवान तिवारी) बेटी की चाह में 6-7 बेटे पैदा कर चुका है. फ़ोन पर लोगों के नंबर गालियों के नाम से रखता है. बीच शूटआउट के बीच बीवी का फ़ोन लेना नहीं भूलता, और फ़ोन रखने से पहले 'आया, तो ले आऊँगा' कहना. इस एक किरदार में ही आपको इतनी रंगीनियत मिलती है, कि परदे पर हर बार आते ही आप चौकन्ने हो जाते हैं. फिल्म का 'डार्क ह्यूमर' गज़ब है. आखिर के एक सीन में, एक महिला किरदार बियाबान में अपनी मौत का इंतज़ार कर रही है, और घर पर उसका बूढ़ा ससुर उसे खोजते हुए चिल्ला रहा है, "कहाँ मर गयी?". 

नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की अदाकारी और इस तरह की भूमिकाओं में उनकी पूरी पकड़ होने के अलावा, फिल्म अपनी ज़मीन से जुड़े रहने की कोशिश में उभर कर सामने आती है. मोटरसाइकिल पर एक पुलिसवाला आ रहा है, मगर पीछे बैठा हुआ. चलाने वाला एक 12-14 साल का लड़का है. बाबू जब 'काम' पर नहीं होता है, खेतों के बीचोंबीच बने अपने घर के बाहर-भीतर लुंगी और शर्ट में घूम रहा होता है. हालाँकि फिल्म पर 'गैंग्स ऑफ़ वास्सेपुर' की छाप इस कदर है कि हर वक़्त आप दोनों फिल्मों के दृश्य मिला कर देखने में ही उलझे रहते हैं. चाहे वो हाथापाई, गुत्थमगुत्थी के रीयलिस्टिक फाइट-सीन हों, या 'तार बिजली से पतले हमारे पिया' की तर्ज़ पर टिन के कनस्तर बजाते-गाते लोकगीत की बनावट.   

आखिर में; 'बाबूमोशाय बन्दूकबाज़' लव, सेक्स और धोखा के तमाम प्रसंगों के बीच ठेठ मर्द किरदारों की कहानी में पैरवी भले ही करता हो, अंत तक आते-आते सशक्त और चालाक औरतें ही फिल्म पर हावी रहती हैं. इनमें से ज्यादातर किरदार और प्रसंग फिल्म की कहानी में रहस्य का विषय हैं, इसलिए यहाँ विस्तार से लिखना थोड़ी ज्यादती होगी. 'बाबूमोशाय बन्दूकबाज़' में बहुत कुछ मनोरंजक है, बहुत कुछ 'गैंग्स ऑफ़ वास्सेपुर' जैसा. हाँ, बेहतर होता अगर थोड़ी गहराई भी होती, और थोड़ी बहुत अलग 'अपने' जैसी. [3/5]     

Wednesday, 25 January 2017

रईस: सत्तर का सिनेमा+नब्बे का शाहरुख़= मसालेदार मनोरंजन [3/5]

1975 में; सलीम-जावेद की ‘दीवार’ जनवरी महीने के ठीक इसी हफ्ते सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई थी. 42 साल बाद, राहुल ढोलकिया की ‘रईस’ अगर इतिहास दोहरा नहीं रही, तो कम से कम ‘दीवार’ के साथ हिंदी फिल्मों में नायक के बदलते हाव-भाव और ताव को एक बार फिर उसी जोश-ओ-जूनून से परदे पर जिंदा करने की कोशिश तो पूरी शिद्दत से करती ही है. फिल्म का टाइटल-डिजाईन हो, कहानी के जाने-पहचाने उतार-चढ़ाव हों, नायक के तौर-तरीके, सिस्टम के साथ उसकी उठा-पटक या फिर फिल्म के निर्माण में फरहान अख्तर (जावेद साब के बेटे) की बेहद ख़ास भूमिका; ‘रईस’ में कुछ भी इत्तेफ़ाक नहीं लगता. ‘रईस’ हिंदी फ़िल्म इतिहास के सबसे बाग़ी और जोशीले ’70 के दशक का जश्न कुछ इस ज़ोर-शोर से मनाती है, लगता है जैसे सिनेमा का मौजूदा पर्दा भी 70mm की तरह ही फैलने-खुलने लगा है.

दीवार’ अगर मुंबई अंडरवर्ल्ड के सबसे नामी तस्कर हाजी मस्तान की जिंदगी से अपनी कहानी चुनती है, तो ‘रईस’ गुजरात के अवैध शराब माफिया अब्दुल लतीफ़ के किस्सों के आस-पास ही अपनी जमीन तलाशती है. हालाँकि दोनों ही फिल्में विवादों से बचने के लिए ‘काल्पनिक’ होने की सुविधा का भरपूर लाभ उठाती हैं. गुजरात में शराब पर पाबन्दी है, और ‘पाबन्दी ही बग़ावत की शुरुआत होती है’. कोई धंधा छोटा नहीं होता और धंधे से बड़ा कोई धर्म नहीं. इसी फलसफे पर चलते-चलते, रईस हुसैन (शाहरुख़ खान) शराब की तस्करी के धंधे में आज सबसे बड़ा नाम है. कानून अब तक तो उसकी जेब में ही था, पर जब से ये कड़क और ईमानदार अफसर मजमूदार (नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी) आया है, माहौल में गर्मी थोड़ी बढ़ गयी है. मजमूदार रईस की गर्दन तक पहुँचने का कोई भी मौका छोड़ना नहीं चाहता, पर रईस हर बार अपने ‘बनिए के दिमाग और मियाँ भाई की डेरिंग’ के इस्तेमाल से बचता-बचाता आ रहा है. चूहे-बिल्ली की इस दौड़ में यूँ तो किसी की भी चाल, कोई भी दांव इतना रोमांचक नहीं होता कि आप जोश-ओ-ख़रोश में सीट से ही उछल पड़ें, पर दोनों किरदारों की कभी ढीली न पड़ने वाली अकड़, लाजवाब एक्शन और वजनदार संवादों के जरिये हर बार आपको लुभाती रहती है.

रईस’ का रेट्रो लुक फिल्म की साधारण कहानी पर किसी भी पल भारी पड़ता है. जमीन से उठकर अंडरवर्ल्ड सरगना बनने का सफ़र, और फिर गरीबों का मसीहा बनकर राजनीति में उतरने का दांव; फिल्म की कहानी में ऐसे उतार-चढ़ाव कम ही हैं, जो आपने देखे-सुने न हों. इतना ही नहीं, ठहरी हुई शुरुआत और सुलझे हुए अंत के दरमियान, फिल्म कुछ इस रफ़्तार से भागने लगती है कि आपके लिए ‘क्या छोड़ें-क्या पकड़ें’ वाली दुविधा पैदा हो जाती है. फिल्म ’70 के दशक में जाने के उतावलेपन में गुजरे ज़माने की खामियों को भी उसी बेसब्री से अपना लेती है, जितनी शिद्दत से उस दौर की काबिल-ऐ-तारीफ़ अच्छाइयां. नायिका (माहिरा खान) को बड़ी समझदारी और सहूलियत से कहानी में किसी खूबसूरत ‘प्रॉप’ की तरह लाया और ले जाया जाता है. गाने के दौरान ही शादियाँ हो जाती हैं, गाने के दौरान ही बच्चे भी और गानों की आड़ में ही दुश्मनों का सफाया!

‘स्टारडम’ के पीछे दुम हिलाती फिल्मों से हम कितने पक और थक गए हैं, इसकी सबसे ताज़ा मिसाल है ‘रईस’. भले ही औसत दर्जे की कहानी के साथ ही सही, पर परदे पर शाहरुख़ की शानदार शख्सियत को एक जानदार किरदार के तौर पर पेश करने की पहल भर से ही ‘रईस’ अपने नंबर बखूबी बटोर लेती है. पहले ‘फैन’, फिर ‘डियर जिंदगी’ और अब ‘रईस’; शाहरुख़ किसी नौसिखिये की तरह परदे पर अपनी एक बनी-बनाई ‘इमेज’ को तोड़ कर नये सांचे में ढलने की खूब कोशिश कर रहे हैं. ये आज के लिए भी अच्छा है और आने वाले कल के लिए भी. नवाज़ुद्दीन बेख़ौफ़ हवा की तरह हैं, बहते हैं तो देखते भी नहीं कि आगे कौन है, क्या है? परदे पर वो हीरो की तरह स्लो-मोशन में भले ही एंट्री न लेते हों, मार-धाड़ भी न के बराबर ही करते हैं, फिर भी तालियाँ उनके हिस्से में जैसे पहले से ही लिख-लिखा के आई हों. मोहम्मद जीशान अय्यूब पूरी मुस्तैदी से फिल्म के सबसे ठन्डे फ्रेम को भी अपनी अदाकारी से गर्म रखते हैं, चाहे फिर उनके पास देने को ‘रिएक्शन’ के चंद ‘एक्सप्रेशंस’ ही क्यूँ न हों.

आखिर में, राहुल ढोलकिया भले ही तमाम राजनीतिक सन्दर्भों (मुंबई ब्लास्ट, हिन्दू-मुस्लिम दंगे, गोधरा-कांड) को इशारों-इशारों में पिरो कर फिल्म को एक माकूल जमीन देने की कोशिश करते हों, ‘रईस’ रहती तो एक मसाला फिल्म ही है, जिसके लिये मनोरंजन का बहुत कुछ दारोमदार सत्तर के दशक के सिनेमा और नब्बे के दशक के शाहरुख़ पर टिका दिखाई देता है. अब इससे खतरनाक मेल और क्या होगा? [3/5] 

Friday, 9 September 2016

फ्रीकी अली: नवाज़ का ‘कॉमेडी सर्कस’! [2/5]

लेखक-निर्देशक सोहेल खान ने भारतीय टेलीविज़न पर कॉमेडी शोज में जज की भूमिका निभाते हुए अपना काफी वक़्त हँसते-खेलते बिताया है. उनकी नई फिल्म ‘फ्रीकी अली’ को अगर अच्छी तरह बयान करना हो तो उन्हीं कॉमेडी शोज का जिक्र लाजिमी हो जाता है. फिल्म न ही उन तमाम एपिसोड्स से कमतर है, न ही उनसे बेहतर. हां, नवाजुद्दीन सिद्दीकी को मुख्य किरदार के तौर पर फिल्म में ले लेना ज़रूर फिल्म को एक मज़बूत कन्धा दे देता है. कम से कम अब फिल्म के हर फ्रेम में एक ऐसा टैलेंट तो है, जिसे फिल्म भले ही उसकी शख्सियत-मुताबिक तवज्जो न दे पर जो खुद अपने आप को कभी निराश नहीं करता. संवादों में व्यंग परोसने की अपनी लगातार कोशिश के साथ, ‘फ्रीकी अली’ मनगढ़ंत सी लगने वाली, चलताऊ कहानी के बावजूद आप को अपने ठीक 2 घंटे की समय-अवधि में कम से कम उकताहट और उबासी तो महसूस नहीं ही होने देती.

अली ‘फ्रीकी’ क्यूँ है? इसका जवाब तो मुश्किल है पर अपनी गली की क्रिकेट टीम का ‘पिंचहिटर’ अली [नवाज़ुद्दीन] पैसे कमाने के लिए हर तरह की नौकरी-कारोबार आजमा चुका है. हफ्तावसूली उसका एकदम नया वाला पैंतरा है. एक दिन इसी सिलसिले में गलती से उसे ‘गोल्फ’ खेलने का मौका मिलता है. क्रिकेट के अनुभवों से लैस अली जल्द ही गोल्फ की दुनिया में मशहूर हो जाता है. अब उसके और उसके सपनों के बीच बस एक ही अड़चन है, अपनी अमीरी का रौब झाड़ने वाला ‘गोल्फ चैंपियन’ विक्रम सिंह राठौर [जस अरोरा, गुड़ नाल इश्क मिठा वाले]. विक्रम उसे नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ता और अली उन मौकों को उतनी ही आसानी से उसके खिलाफ इस्तेमाल कर लेता है.

एडम सैंडलर की ‘हैप्पी गिलमोर’ से प्रभावित होकर लिखी गयी, ‘फ्रीकी अली’ की कहानी को मजेदार बनाने के लिए सोहेल खान अपने पुराने ‘हेलो ब्रदर’ ढर्रे का ही सहारा लेते हैं, जहां कहानी के मुख्य किरदार एक अलग ट्रैक पर भटक रहे हैं और दूसरे ट्रैक पर मजाकिया किरदार फिल्म के बीच बीच में आ कर, छोटे छोटे ‘गैग्स एंड गिग्स’ के साथ आपको हंसाने की कोशिश करते हैं. कॉमेडी का ये वो ‘खान’-दान है, जहां हँसी के लिए बूढों, बच्चों और औरतों को गरियाया जाता है, लतियाया जाता है और ऐसा करते वक़्त तनिक शिकन और शर्म भी चेहरे पर आने नहीं दिया जाता. ताज्जुब होता है कि करोड़ों की ये फिल्म उसी छत के नीचे सोची और लिखी गयी है, जहां हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के महानतम लेखकों में से एक अभी भी पूरी तरह सक्षम और सक्रिय है. सोहेल खान बार-बार अपने ‘जोक्स’ को दुहराते रहते हैं, किरदारों को कार्टून बना कर पेश करते हैं और ड्रामा के नाम पर कुछ भी ख़ास परोस पाने में असफल रहते हैं. संवाद और नवाज़ दो ही हैं जो हर बार एक-दूसरे के साथ घुल-मिल कर सोहेल के ‘मजाकिया’ दिवालियेपन को परदे पर नंगा होने से बचा लेते हैं.

कहने को तो यहाँ बहुत कुछ है. एक हट्टा-कट्टा गुंडा जिसकी समझ बच्चे से भी कम है [निकेतन धीर], एक चालाक बूढ़ा आदमी जिसे दुनिया की हर चीज़ याद है पर अपने पैसे और प्रॉपर्टी नहीं, एक माँ जो अपने बेटे के लिए ‘उसके पास माँ है’ की दुहाई देते हुए एक गैंगस्टर से भी भिड़ जाती है [सीमा विश्वास], पर जब अभिनय बात आती है सिर्फ नवाज़ आपको लुभाने में कामयाब रहते हैं. उनके साथी की भूमिका में अरबाज़ बेचारे से लगते हैं, जिन्हें सिर्फ इस लिए फिल्म में लिया गया है क्यूंकि वो ‘खान’दान से हैं. जस अरोरा गुर्राते ज्यादा सुनाई देते हैं. एमी जैक्सन कितनी ईमानदार कोशिश करती होंगी अपने परफॉरमेंस में, इसका अंदाजा आपको इसी बात से हो जाता है कि अक्सर अपनी लाइनें बोलते वक़्त उनके होंठ ही आपस में मिलने से इनकार कर देते हैं. एक दृश्य में जैकी श्रॉफ बस अपने बदनाम ‘मऊशी’ वीडियो क्लिप की ही याद दिलाने परदे पर आ जाते हैं.

अंत में; ‘फ्रीकी अली’ एक बहुत ही सामान्य सी, हलकी-फुलकी फिल्म है, जो दो घंटे के कम वक़्त में भी अपने आप को कई बार दोहराती रहती है. ऐसा लगता है जैसे आप टीवी पर ‘कॉमेडी सर्कस’ का कोई महा-एपिसोड देख रहे हैं, जहां कोई कपिल-कृष्णा-सुदेश नहीं हैं. हैं तो बस नवाज़! सन्डे को टीवी पर आये तो ज़रूर देखियेगा! [2/5]          

Friday, 24 June 2016

रमन राघव 2.0 (A) : कालिख़ से भी काली, कश्यप की दुनिया! [4/5]

जोड़ियां आसमानों में बनती हैं. अकेले हम अधूरे हैं और हमें पूरा करने वाला भी दुनिया में कहीं न कहीं अधूरा-अधूरा घूम रहा है, तब तक जब तक दोनों मिल नहीं जाते. कई बार हम उसे ग़लत जगह तलाशने में लगे रहते हैं, और कई बार एक झटके में ही वो सामने दिख जाता है. फिल्मों में पहली नज़र का प्यार अगर आपको लगता है कुछ ख़ास बड़े नामों की ही बपौती है? तो आप को बड़ी बुरी तरह ग़लत साबित करते हैं अनुराग कश्यप. अपनी नई फिल्म ‘रमन राघव 2.0’ को अनुराग उनकी सबसे ख़तरनाक लव-स्टोरी का दर्जा देते हैं.

अनुराग कश्यप और लव-स्टोरी?? इसका सटीक जवाब तो आपको फिल्म के आख़िरी पलों में ही मिलता है, पर अच्छी बात ये है कि ‘बॉम्बे वेलवेट’ की नाकामयाबी ने उन्हें वापस उनके अपने जाने-पहचाने दायरे में ला खड़ा किया है. हालांकि भारतीय सिनेमा में ये दायरा भी उन्हीं की बदौलत इस मुकाम तक पहुंचा है. यहाँ उनका कोई दूसरा सानी नहीं. इस बार भी उनसे कहीं कोई चूक नहीं होती. ‘रमन राघव 2.0’ अब तक की उनकी सबसे ‘डार्क’ फिल्म बिना किसी झिझक कही जा सकती है. रक्त का रस और गाढ़ा हो चला है. खौफ़ का चेहरा पल-पल मुखौटे बदल रहा है. अँधेरे का साम्राज्य और गहराने लगा है.

अनुराग शुरुआत में ही साफ़ कर देते हैं, फिल्म 60 के दशक में रूह कंपा देने वाले सनकी सीरियल किलर रमन राघव की कहानी बिलकुल नहीं है. हाँ, कहानी पर उस पुराने रमन राघव की परछाईं हमेशा ज़रूर मंडराती रहती है पर 2015 के आस-पास के कथाकाल में अब रमन और राघव दो अलग किरदारों में बंट जाते हैं. पिछले ढाई साल में 9 क़त्ल हुए हैं. रमन्ना [नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी] ने खुद को पुलिस के सामने पेश कर इकबालिया बयान में जुर्म कबूल भी कर लिया है, पर उसकी ऊटपटांग बातों और हद औसत हुलिये पर ना तो एसीपी राघवन [विक्की कौशल] को यकीन है ना ही दूसरे पुलिसवालों को. हालाँकि दर्शक के तौर पर आपके मन में रमन्ना को लेकर कोई संदेह नहीं रहता. असली रमन राघव वायरलेस पर भगवान से सीधे-सीधे बात करने का दम भरता था. अपना रमन्ना खुद को भगवान का ‘सीसीटीवी कैमरा’ मानता है और दोनों हाथों से हवाई दूरबीन बनाकर अपने शिकार को अपनी लोमड़ी वाली कंचई आँखों से देखता रहता है. मारना उसके लिए ‘खाना खाने और हगने’ जैसा ही है. रोजमर्रा का काम.

राघवन एक अलग तरह का जानवर है. बहुत कुछ हमारी ही तरह. पुरुष अहंवाद में लिपटाया, नारी-विरोधी और नशे में सर तक डूबा हुआ. सड़ रही लाशों के बीच क्राइम-सीन पर भी नाक में पाउडर उड़ेलता, बिस्तर पर ‘कंडोम’ न पहनने वाला आम मर्द, जिसे नशे के चलते अपने ढीली पड़ती मर्दानगी के ऊपर किये गए ठहाके अन्दर तक भेद जाते हैं. राघवन सोता नहीं. कभी नहीं. राघवन को तलाश है रमन की और मज़े की बात है कि रमन को भी राघवन उतना ही चाहिए, जितना सिगरेट के लिए माचिस. पकड़म-पकड़ाई के इस खेल में अँधेरा जब छंटता है तो उजाला नहीं होता, बल्कि अन्दर से एक और अँधेरा आपको निगलने के लिये बढ़ लेता है. पहले वाले से कहीं ज्यादा काला, घुप्प और डरावना.

मुंबई की झुग्गी-झोपड़ियों के बीच अनुराग एक ऐसी दुनिया खोज लेते हैं, जो आपका देखा-सुना-जाना तो लगता है पर एक अनजाने रहस्य की तरह आपके सामने परत-दर-परत खुलता भी रहता है. विचलित कर देने वाली हत्याओं के वक़्त, अनुराग डर, खौफ़ और सनक का एक ऐसा मिला-जुला माहौल बनाते हैं कि आप उसमें अन्दर धंसते चले जाते हैं. कैमरा इस बार खून में नहा जाता हो, ऐसा शायद ही कभी होता है (मैं शिकायत कत्तई नहीं कर रहा) पर जिस तसल्ली से अनुराग पहले रमन्ना के हाव-भाव पर नज़रें गड़ाये रहते हैं और बाद में उन खौफज़दा चेहरों पर, आप सहम कर अपनी सीटों में दुबक जाते हैं या फिर आँखें फेर लेते हैं. फिल्म में औरतों के किरदार से आप कमोबेश नाखुश ही लौटते हैं. डरी-सहमी, घुटने टेक देने वाली अपने ही भाई से यौन-पीड़ित बहन हो या तीन-तीन गर्भपातों से गुजर चुकी गर्लफ्रेंड, यहाँ आपको कुछ बहुत मज़बूत नहीं दिखने वाला.

अभिनय में जूनून देखना हो तो ‘रमन राघव 2.0’ में सिद्दीकी को देखिये. हालाँकि उनमें ‘बदलापुर’ के ‘लायिक’ की झलक देखने को ज़रूर मिलती है, पर इस बार उनका पागलपन सारी हदें पार कर देता है. हैरत में डालते हैं आपको ‘मसान’ के विक्की कौशल. अपनी तीसरी ही फिल्म में उन्हें इस तरह का जटिल किरदार इतनी बखूबी निभाते देखना हैरतंगेज़ अनुभव है. अमृता सुभाष जबरदस्त हैं. अपने एक अदद सीन में ही वो आपको अन्दर तक झकझोर जाती हैं.

अंत में, ‘रमन राघव 2.0’ सिर्फ एक आम क्राइम थ्रिलर नहीं है. फिल्म उन अनुराग कश्यप की वापसी दर्ज कराती है जिन्हें लीक पर चलना आता ही नहीं. हिंदी सिनेमा के सदियों पुराने घेरे तोड़ने में जो बहुत उतावले भी दिखते हैं और कभी-कभी बहुत बनावटी भी, पर हैं दो-टूक. सनकी रमन्ना कहता है ना, “मैं आड़ में नहीं मारता. वर्दी की, धर्म की, इंसानियत की खाल के पीछे छुपकर नहीं मारता.” ठीक वैसे ही. [4/5]        

Friday, 21 August 2015

MANJHI- THE MOUNTAIN MAN: The ‘Man at Work’ Nawazuddin nails it! [3.5/5]

The term ‘Incredible India’ can never be classified to only its breathtakingly colorful places of cultural or natural heritage; or even to the very fact that despite being stung by corruption, crime and constricted behavioral social and over-emotional issues, it is still very much on its feet. In fact, the other and the most significant characteristic of our nation have always been the legends of implausible efforts turning the impossible into the possible. The courageous case of Dashrath Manjhi of Bihar is most likely the most inspiring saga of undying spirit, nerve-wracking guts, survival against all odds and the triumph of true love in modern India. Ketan Mehta’s MANJHI- THE MOUNTAIN MAN is a visual documentation of Manjhi’s arduous 22-year long struggle to bring a considerable change in the society he’s been rooted in. But in the stricture of a Bollywood film that also craves for approval of the entertainment-seekers! A win some, lose some situation!

Dashrath Manjhi [Nawazuddin] is an angry young man traumatized by his beloved wife’s unfortunate accidental death and tormented by the haunting memories of good old times spent with her. Describing the pain better in his own words, Manjhi states in the film, “Kuch bhulaye nahin bhoolta. Fillum si ghus gayi hai humar khopadiya mein, kabhi bhi kahin se shuru ho jaati hai…aage-peechhe, peechhe-aage’. The same vouches for another reference to the film’s back & fourth narrative. The remedy lies in the revenge. Manjhi must fight the evil; in this particular case, a mammoth, invincible and insensitive mountain. The true love needs to pass the test and the only way out is, “Don’t stop till it’s over.” And thus, begins the wrestle between the two taking 22 years to reach a climax in favor of the most unbeatable spirit of a helpless looking man with just a hammer and a chisel in his hands.

Ketan Mehta is blessed with an eagle eye to look out for inspirational real-life stories from the past [SARDAR, MANGAL PANDEY- THE RISING, RANG RASIYA] but this time, his luck takes a giant leap in terms of finding Dashrath Manjhi in Nawazuddin’s chameleon-beating talent of owning a character so much that it could blur all the lines in between the two. The film gets off-track more than a couple of times when Ketan decides to provide some half-hearted, easy, filmy and feeble elements of desperate entertainment values [His buffoonery act on the first encounter with his would-be wife, for instance] but don’t lose your faith in Nawazuddin as he constantly manages to surprise you with his unimpeachable acting skills. If watching him romance with one of the most sizzling actresses of today’s times Radhika Apte is delightful, then his monologues with the mountain are simply worth-whistling. You can’t afford to miss any of the expressions he wears on his face so responsibly. His performance can only be expressed better in his own words on screen, “Shaandar! Jabardast!! Zindabad!!!”

Radhika Apte as Manjhi’s wife is here again to win some serious accolades. Though she misses a shot or two while perfecting the pitch and parlance of a rural-tribal inhabitant, she is in good form. Tigmanshu Dhulia repeats his GANGS OF WASSEYPUR role as the mean & malevolent Mukhiya of the village. Late Asharaf-ul-Haque as Manjhi’s Father is pitch-perfect. This is probably the best and the lengthiest role of his lifetime. Heartbreakingly, he couldn’t be here to enjoy the praise. Prashant Narayanan does his bit good in first part but later, returns only to kill it with a typecast transformation. Deepa Sahi surprises in her one and only appearance. Music is one big letdown. They try hard to sound authentically connected to the pace and the place but sadly, never reach the mark of satisfaction.

MANJHI- THE MOUNTAIN MAN is undeniably Ketan Mehta’s one of the bests; mostly because of two individuals. In Dashrath Manjhi, he finds an extraordinary hero who never surrenders to anything in his road to deliverance. And an excellent player of unswerving performance in his screen version Nawazuddin! Had it been less theatrical and more profound in its nature, MANJHI- THE MOUNTAIN MAN would have been definitely the best film of the year. The task is not completed but you’ll love the MAN at work! [3.5/5]