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Friday, 2 September 2016

अकीरा: मानसिक अत्याचार! [1/5]

आर मुरुगदास की नई फिल्म ‘अकीरा’ की शुरुआत एक सूफी कहावत से होती है. “कुदरत भी आपके उसी गुण का बार बार इम्तिहान लेती है, जो आपके अन्दर सबसे ज्यादा है”. ये बात मुझ जैसे फिल्म समीक्षकों पर एकदम सटीक बैठती है. शुक्रवार-दर-शुक्रवार खराब फिल्मों को झेलने का जिस तरह का और जितना जोखिम हम उठा रहे होते हैं, उतनी ही बेदर्दी से ख़राब फिल्मों का ज़खीरा अगले हफ्ते फिर हमारी तरफ रुख कर लेता है. इन्तेहा तब हो जाती है, जब ऐसी फिल्मों का तूफ़ान गुज़र जाने के बाद भी, उनके बारे में लिखते वक़्त हमें उस मंज़र को दोबारा याद करना पड़ता है. खैर, ये तो अपनी ही चुनी राह है, तो शिकायत क्यूँ?

अकीरा’ देखने-सुनने से आपको महिलाओं के सशक्तिकरण के हक में आवाज़ उठाने वाली एक अलग फिल्म ज़रूर लग रही होगी, और लगती भी है खासकर फिल्म के पहले 10 मिनट में, जब महिलाओं पर होने वाले ‘एसिड अटैक’ जैसे घिनौने अपराधों का सहारा लेकर फिल्म लड़कियों को आत्म-रक्षा के लिए तैयार रहने की सीख देती है. पर, जल्द ही ये सारा माहौल बदलने लगता है और पूरे का पूरा ध्यान गिनती के चार भ्रष्ट पुलिस वालों के खिलाफ एक तेज़-तर्रार लड़की के संघर्ष पर केन्द्रित हो जाता है. गोविन्द राणे [अनुराग कश्यप] की अगुवाई में चार पुलिसवाले एक एक्सीडेंट के दौरान क्षतिग्रस्त कार की डिग्गी से करोड़ो रूपये उड़ा लेते हैं. गोविन्द के जुल्मों से आजिज़ एक सेक्स-वर्कर गोविन्द के इस इकबालिया बयान की विडियो बना लेती है, पर उसका फायदा उठाने से पहले ही विडियो कैमरा एक कैफ़े से चोरी हो जाता है. शक कुछ स्टूडेंट्स पर जाता है, जो पास के ही हॉस्टल में रहते हैं. उसी हॉस्टल की एक स्टूडेंट है अकीरा [सोनाक्षी सिन्हा], निडर, लड़ाकू और दबंग.

अकीरा’ एक दोयम दर्जे की राइटिंग की शिकार फिल्म है, जहां थ्रिलर के नाम पर कुछ भी उल-जलूल पेश किया जाता है, और जिसकी भनक आपको बहुत पहले ही लग जाती है. एक तरफ तो जहां फिल्म अकीरा के बेख़ौफ़ किरदार के साथ कुछ नया पेश करने का ज़ज्बा दिखाती है, वहीँ पुराने ढर्रे की कहानी और कहानी कहने के तरीके में नयापन न ढूंढ पाने की वजह से बहुत ही आलसी और थकी हुई नज़र आती है. ये वो फिल्म है जो सत्तर या अस्सी के दशक से अब तक कोमा में थी, और जहां अब भी दुश्मनों से निपटने के लिए उन्हें ‘पागलखाने’ भेज दिया जाता है. यहाँ मानसिक रोगियों को ‘पागल’ दिखाने और बोलने में किसी को कोई गुरेज़ या झिझक नहीं होती. यहाँ अब भी हर मनोरोगी का इलाज़ बिजली के झटके और इंजेक्शन ही होते हैं. फिल्म एक हिस्से में बालाजी टेलीफिल्म के धारावाहिकों से भी प्रेरित लगती है, जब नए ज़माने की बहू अपनी सास को पहली बार देखती है और दौड़ कर उसके पैरों के पास से बच्चे के खिलौने उठाने लगती है. सास को लगता है, वो पैर छूने आई थी. बेटे के चेहरे पर कोई भाव नहीं हैं.

अकीरा’ दर्शक के तौर पर आपकी मानसिक क्षमता को कमतर आंकने का दुस्साहस बार-बार करती है. हर छोटी से छोटी बात को तसल्ली से बयान करने में इतना उलझी रहती है कि अपने ढाई घंटे के पूरे वक़्त में ज्यादातर बेमतलब और वाहियात ही लगती है. फिल्म के चंद गिने-चुने मजेदार पल अनुराग कश्यप को देखते हुए बीतते हैं, जहां उनका मजे ले-लेकर अभिनय करना, उनके किरदार के कमीनेपन पर भारी पड़ता रहता है. आखिर के दृश्य में, ये बावलापन और भी बढ़ कर गुदगुदाता है. ईमानदार और चौकस गर्भवती पुलिस अफसर की भूमिका में कोंकना सेन शर्मा पूरी फिल्म में अलग-थलग सी पड़ी रहती हैं. उनका फिल्म में आना-जाना बड़ी बेतरतीबी से होता है. सोनाक्षी अपनी पिछली फिल्मों से अलग यहाँ पूरी शिद्दत से अपने किरदार में ढली रहने की कोशिश करती हैं. एक्शन दृश्यों में उनका आत्मविश्वास और खुल के सामने आता है.

अंत में, ‘अकीरा’ नारी-शक्ति की जिन उम्मीदों की दुहाई देती है, उन्हें तोड़ने और मिट्टी में मिलाने का सुख भी अपने हिस्से ही रखती है. अकीरा की सारी लड़ाई अपने अस्तित्व तक ही सीमित रख कर, वो भी एक ऐसे घटनाक्रम के ज़रिये जहां उसकी मौजूदगी में न कोई वाजिब वजह हो, न कोई संवेदनशील उद्देश्य, फिल्म अपने औसतपन से ऊपर उठने की कोशिश भी नहीं करती. और नीचे गिराने में रही सही कसर पूरी कर देता है, फिल्म का बहुत ही ठंडा, हल्का और लचीला स्क्रीनप्ले. इसे देखना खुद पर एक मानसिक अत्याचार से कम नहीं! [1/5]      

Monday, 30 May 2016

वीरप्पन (A): बोर-प्पन, शोर-प्पन! [1.5/5]

(वीरप्पन देख चुके और देखने जाने वाले दो दर्शकों के बीच की बातचीत का एक अंश)

“सुना है, राम गोपाल वर्मा लौट आये हैं?”
“हाँ, भाई! लौट आये हैं.”
सत्या वाले?”
“कहाँ तुम भी...”
“...तो? कंपनी वाले?”
“मज़ाक न करो”
भूत वाले तो होंगे?”
“....(चुप)”
सरकार?....सरकार राज?”
“(झुंझला कर) अज्ञात वाले हैं. रक्त-चरित्र वाले हैं. आया समझ?”
“(आह भरते हुए)...चलो, आग वाले तो नहीं हैं ना!”

अगर आप भी सिर्फ इसी बात से तसल्ली कर लेने के लिए तैयार बैठे हैं कि चलो, राम गोपाल वर्मा वापस तो गए, ऐसे हाल में उनकी नयी फिल्म ‘वीरप्पन’ आपको ज्यादा निराश नहीं करेगी. आख़िरकार इसमें ऐसा कुछ अलग या अनोखा तो है नहीं, जो आपको झटका दे दे, चौंका दे. वही सब तो है जिसके लिए राम गोपाल वर्मा जाने जाते हैं और जिसके लिए आप उनके, उनकी फिल्मों के मुरीद हैं. किसी एक के कंधे से होते हुए दूसरे के चेहरे पे चढ़ता कैमरा, जिन्हें हम OTS (over the shoulder) शॉट पुकारते हैं, कानफाड़ू बैकग्राउंड म्यूजिक, एक्टिंग के नाम पर आड़े-तिरछे चेहरे बनाना और डायलॉग्स एकदम सतही-सपाट; रामू एक बार फिर अपने (उस) आप को दोहराने में सफल साबित होते हैं, जिसे हममें से कोई भी अब और बर्दाश्त करने के मूड में नहीं दिखता.

राम गोपाल वर्मा जिस शिद्दत से जुर्म की कालिख में लिपे-पुते चेहरों में अपने नायक ढूंढते रहते हैं, कुख्यात चन्दन तस्कर वीरप्पन ऐसा लगता है जैसे उन्हीं के लिए गढ़ा गया हो. एक ऐसा जीवंत किरदार जो खूंखार हो, वहशी हो, निर्मम हो और जिसका हिंसा के साथ एक पागलपन वाला रिश्ता हो, राम गोपाल वर्मा के लिए कोई और दूसरा इससे बेहतर ढूंढ पाना मुश्किल था. बेहतर होता, रामू इसे महज़ अपना ‘कमबैक’ न मान कर थोड़ा और महत्वाकांक्षी हो पाते. वीरप्पन की रोबदार मूंछों वाली छवि को परदे पर उतार भर लेने की कामयाबी से ही रामू इतने उत्साहित लगने लगते हैं कि उसके किरदार की बर्बरता को उकेरना भूल ही जाते हैं. एक-दो दृश्यों को छोड़ दें, तो पूरी फिल्म में वीरप्पन के खौफ से ज्यादा गोलियों का शोर आपको अधिक विचलित करता है. अपने आपराधिक जीवनकाल में वीरप्पन ने तकरीबन सौ पुलिसवालों की हत्या की थी, राम गोपाल वर्मा फिल्म में इस गिनती का पीछा करते थकते नहीं, मानो वीरप्पन के वीरप्पन बनने में इसी एक अदद गिनती का हाथ रहा हो.

अभिनेता संदीप भारद्वाज का हूबहू वीरप्पन की तरह दिखना और लगना अगर वीरप्पन फिल्म का सबसे कामयाब पहलू है, तो सचिन जोशी [पुलिस वाले की भूमिका में] का ठंडा अभिनय सबसे कमज़ोर. उसके ऊपर पूरी फिल्म में उन्हीं की आवाज़ के साथ कहानी का आगे बढ़ना; आप को पता चल गया होगा असली मुजरिम कौन है? वैसे फिल्म अगर कहीं आपको सचमुच बाँधने की कोशिश करती है तो वो है वीरप्पन की पत्नी लक्ष्मी का ट्रैक. स्पेशल टास्क फ़ोर्स अपने ही एक अधिकारी की विधवा पत्नी [लीज़ा रे] को लक्ष्मी [उषा जाधव] के करीब ले जाती है, जहां पूरी कहानी दोनों के इर्द-गिर्द घूमने लगती है. यहाँ भी उषा जाधव तो अपने अभिनय में सधी और संपन्न नज़र आती हैं, पर लीज़ा के लिए अभी भी अभिनय उतना ही मुश्किल लगता है जितना उनका साफ़ तरह से हिंदी बोल पाना. वो नर्गिस फाखरी की याद दिलाती हैं, अजीब अजीब तरह के चेहरे बनाती हैं, जैसे वो किसी फिल्म का नहीं, बालाजी टेलीफिल्म्स के सास-बहू सीरियल्स का एक ऐसा किरदार हों जो बैकग्राउंड में बोलना ज्यादा पसंद करता हो और बात-बात पर गर्दन टेढ़ी करके आँखें छोटी-बड़ी करता रहता हो.

आखिर में सिर्फ इतना ही, राम गोपाल वर्मा की वीरप्पन शोर बहुत करती है, कहती बहुत कम. रामू अगर बॉलीवुड में इसे अपनी वापसी का जरिया मान रहे हों, तो मैं कहूँगा आपको अभी भी कुछ दिन और एकांतवास में रहना चाहिए. मेरा इंतज़ार अभी ख़तम नहीं हुआ. “मेरे राम गोपाल वर्मा आयेंगे! ज़रूर आयेंगे!!” कब? पूछिए मत! [1.5/5] 

Friday, 13 May 2016

अज़हर: वन्स अपॉन अ टाइम इन क्रिकेट [1/5]

शुरुआत में ही, अपने तीन पैराग्राफ लम्बे बयान [Disclaimer] के साथ ‘अज़हर’ विवादों से बचने और कुछ बहुत जरूरी सवालों से मीलों दूर रहने की समझदार कोशिश में दर्शकों पर इतनी शर्तें लाद देती है कि कहना मुश्किल हो जाता है, आप एक जीते-जागते शख्सियत पर बनी एक ईमानदार फिल्म देखने जा रहे हैं या फिर एक पूरी तरह मनगढ़ंत कहानी. फिल्म की विश्वसनीयता, नीयत और सूरत का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि अगर इसका नाम ‘अज़हर’ न होकर ‘जन्नत 3’ या ‘वन्स अपॉन टाइम इन क्रिकेट’ भी होता, तो भी फिल्म की सीरत में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखता. आखिर में रहती तो ये इमरान हाशमी की ही फिल्म. आगे बढ़ने से पहले एक Disclaimer मैं भी पढ़ देना चाहता हूं, “आगे की पंक्तियों में ‘अज़हर’ शब्द का इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ फिल्म के शीर्षक और फिल्म के मुख्य किरदार के लिए किया जा रहा है. इसका किसी भी मशहूर क्रिकेटर या पूर्व सांसद से कोई लेना देना नहीं है.” लीजिये, अब मैं भी फिल्म की राह पर पूरी तरह स्वच्छंद और स्वतंत्र हूँ, कुछ भी उल-जलूल लिखने-कहने के लिए!

99वें टेस्ट मैच में शानदार प्रदर्शन के बाद, अज़हर [इमरान हाशमी] अब अपने नानूजान [कुलभूषण खरबंदा] के सपने से सिर्फ एक मैच और दूर है, जब उसे मैच-फिक्सिंग के इल्ज़ाम में क्रिकेट खेलने से बैन कर दिया जाता है. इस फिल्म वाले अज़हर को भारतीय क्रिकेट टीम के सबसे कामयाब कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन के रूप में देखने की गलती करने की आपको पूरी छूट है, हालाँकि मुझे ये दोनों [परदे का अज़हर और असलियत के अज़हरुद्दीन] वो दो जुड़वाँ भाई लगते हैं जिनका आपस में कुछ भी मिलता नहीं. न शकल, न हाव-भाव! 

हाँ, फिल्म की कुछ घटनाएं और किरदार जरूर आपको इस भूल-भुलैय्ये में उलझाये रखते हैं कि आप एक सच्ची कहानी देख रहे हैं. मसलन, अज़हर के साथ ड्रेसिंग रूम शेयर करते मनोज प्रभाकर [करणवीर शर्मा], नवजोत सिंह सिद्धू [मंजोत सिंह], रवि शास्त्री [गौतम गुलाटी], कपिल देव [वरुण वडोला] और अज़हर की जिंदगी में खासा दखल रखने वाली 90 के दशक की खूबसूरत बॉलीवुड एक्ट्रेस संगीता बिजलानी [नरगिस फाखरी]. इन सबमें अगर कोई अपने किरदार के बहुत करीब तक पहुँच पाने में कामयाब हुआ है तो वो हैं सिर्फ नरगिस. उनका और संगीता बिजलानी दोनों का ही एक्टिंग से कभी कोई सरोकार रहा नहीं.  

हालाँकि ‘अज़हर’ सनसनीखेज बने रहने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देती, पर दिक्कत वहां मुंह बाये खड़ी हो जाती है जब फिल्म ईमानदारी से कहानी कहने की बजाय अज़हर को ‘हीरो’, ‘बेक़सूर’ और ‘बेचारा’ बनाने और बताने की जी-तोड़ कोशिश आप पर थोपने लगती है. रोमांच और रोमांस का तड़का जिस सस्ते, हलके और ठन्डे तरीके से फिल्म में परोसा जाता है, आप मोहम्मद अज़हरुद्दीन [फिल्म वाला नहीं, असली वाला] से सिर्फ हमदर्दी ही जता पाते हैं. ‘देश’, ‘मुल्क’ और ‘कौम’ जैसे भारी-भरकम शब्दों के बार-बार खोखले इस्तेमाल से अगर आप बच भी जाएँ, तो ‘सच ये, सच वो’ का जुमला आपका दम घोंटने के लिए काफी है. रजत अरोरा के दोयम दर्जे के संवाद सिर्फ शब्दों की हेरा-फेरी तक ही अपना जादू चला पाते हैं. उनके मायने ढूँढने की गलती कीजियेगा भी मत.

अज़हर’ एक निहायत ही डरपोक किस्म की नाकाबिल फिल्म है जो सिर्फ उन बातों को चुनती है, जिनके कहने-सुनने में किसी तरह का कोई अन्तर्विरोध पैदा न हो. एक बहुत ही हलकी फिल्म जो अपने ‘हीरो’ के साथ कहीं से भी कोई न्याय नहीं करती! फिल्म में बुकी से पैसे लेकर भी अच्छा खेल जाने पर अज़हर की सफाई सुनिए, “मैंने पैसे रख लिए ताकि तुम किसी और खिलाड़ी तक पहुँच न सको...तुम्हारे पैसे वापस भिजवा रहा हूँ’. अब अपनी कहानी में तो सब खुद ही हीरो होते हैं, इसमें नया क्या है? बस्स, इस कहानी में दम नहीं! [1/5]                

Friday, 12 June 2015

HAMARI ADHURI KAHANI: A sob-sob dated story! [1.5/5]

Despite being screamed at, threatened and controlled by her egoist, rough and aggressive husband, an Indian wife can’t gather enough guts to throw away her ‘Mangalsutra’. As the matter of fact, she tries to shut her ears melodramatically with both the hands when is suggested for the same from an old lady happened to be her own mother-in-law. And when the unwanted husband makes an unexpected visit in last 5 years, she doesn’t mind giving him a warm welcome with all the comforts he can wish for. And, if overwhelmed by someone’s goodwill for her miserable life, she can easily entitle him ‘God’. And, she cries all the time. Well, this is not an overview on the condition of women in prehistoric India. This is Mohit Suri’s regressively depressing and awfully hopeless film HAMARI ADHURI KAHANI written by one of the most ‘ahead of his times’ filmmakers in India, Mr Mahesh Bhatt.

Vasudha [Vidya Balan] is a single mother working as a florist in an established hotel and waiting for her gone husband Hari [Rajkumar Rao] - a prime suspect in a terrorist-act. Impressed by her dedication at work, her new boss Aarav [Emran Hashmi] offers her a better job opportunity but soon, falls in love with the lady. He loves to help the needy. And he has a very convincing justification too, for his compassion; as if no man on this earth can show empathy towards any woman around without having a proper, emotional and dramatic back-story. Aarav’s mother too has been a single-parent for the most of her life.

Hari returns. Incidentally, he is innocent and is framed. The Indian wife has turned now in a ‘Savitri’ mode to save her husband’s life. Meanwhile, the crying has been accelerated in fourth gear. The lover has to sacrifice all to play the kind-hearted matchmaker between two poor souls. Poor not because of their misfortune but the bad regressive writing! I bet, pick any old Hindi film of 60’s titled on its main female lead and it will have more liberal, sympathetic and progressive plot than this. If the plot doesn’t engage you at all, dialogues also don’t do any better. Everyone seems to be in the race to mouth lines soaked in grave philosophy about life, marriage, man-woman relationship and what not. It’s exactly like listening to Bhatt Saab’s dreadful life-lessons at any social-forum. Melodrama is another abysmal addition that creates an unbearable situation equivalent to any Balaji TV soaps. The background score actually travels the same crescendo once when Hari gets violent over Vasudha’s love confession.  

HAMARI ADHURI KAHANI has three bankable actors in its kitty. Emran Hashmi being the crowd-puller tries his luck as a serious performer here. He took it in a literal sense, I fear. Still, he is not unbearable at all but Vidya is. She constantly posses as either the most unfortunate girl on earth or the most undeserving for all the good things life has to offer her. In both conditions, one thing remains same and unvarying; the crying. Rajkumar Rao is good. His portrayal of a sadistic, male-chauvinist and solipsist husband could have more shades but the length hardly allows him to open the wings. Narendra Jha (of HAIDER fame) reminds me of Irrfan Khan getting wasted in his earlier acting-sting in Bhatt camp. Actor of such caliber deserves more and better.

Overall, Mohit Suri’s HAMARI ADHURI KAHANI is meant to have intent to get you sunk in deep, dead world of an uncompleted-unfinished love saga but turns out to be a sob-sob dated story where nothing makes a connect, neither the pain nor the love. I know a couple of single-mothers who don’t need to put fake cards on her son’s birthday gifts in the name of separated fathers; they are the fathers. Appreciate them if you get a chance! [1.5/5]

Friday, 27 June 2014

EK VILLAIN: An intense love-story or unintentionally funny thriller? [2/5]

Negative attracts. Villains get most of the claps. Well, mostly. So in case, if you make it to resist yourself from falling over your current heartthrobs on screen; Shraddha Kapoor riding high on AASHIQUI 2’s success and the cute-faced, no-nonsense and impressively the most sincere looking student of Kjo’s school Sidharth Malhotra respectively for boys & girls; you have also on board one of the most deliciously mystified villain played by Riteish Deshmukh. A perfect casting, quite enticing in this case is a fool-proof strategy to bring big numbers in theatres and at the box-office both. Half battle is won.  

Now, let’s have some crisp, meaty, tense, on the edge plot that could have the audience seated for longer than interval at least. Plot? Really? Aren’t we asking for much, especially in Bollywood? But why to worry if there are plenty of inspirations floating all over the cinema-world! And the team chooses South Korean revenge thriller I SAW THE DEVIL.  With added melodic music that includes an item number too, anyone would have predicted ages before going on the floor that the film will be a success in all respects. It looks. It sounds. It appears but sadly and only on paper. It’s time to face some reality. Mohit Suri’s EK VILLAIN is a mishmash of a love-story that tries hard to be intense and an unintentional revenge drama that thrills only at one occasion or two.

Ethically, there is not much to unravel in the plot as it being a suspense thriller, though you can easily predict it from a mile away. So, let’s stick to the characters and not the major events. Shraddha Kapoor plays Ayesha- a girl in high spirits with her bucket-list of dreamy wishes like watching peacocks dancing in the ‘first’ rain of the season, catching a butterfly and you can go on & on with a wide-eyed expression of ‘How romantic!’ on your face. She also loves to talk in a manner tried & tested well before by all prominent Bollywood heroines from Hema Malini in ‘SHOLAY’ to Asin in ‘GHAZNI’. She comes last in the list of ‘who performed well’.

In execution of one of these silliest wishes, she seeks help of a cold-blooded murderous henchman Guru, played by yours truly Sidharth wearing a grumpy look on face from the acting rulebook. What happens next? Any guesses? No, he doesn’t kill the girl. No, the girl doesn’t kill him for what he’s done but they both fall in love. I bet you haven’t had it in your weirdest dream. Enters Riteish playing Rakesh, a simple-sober-soft spoken regular guy who doesn’t want much in life but to be a hero for his son and wife! With a nagging, beating & harassing wife [played by Aamna Sharif], it is quite an impossible task. So, the constantly piling anger, frustration and rage arouse the violent streak in the guy. How the three cross each other’s path is better left unspoken.

At best, EK VILLAIN is a melodramatic average Bollywood thriller with predictably ridiculous storyline that barely imposes any sense of emotional connect to any of the characters. They are loud screaming hard to make themselves noticed. The twists and turns are some relief in order to infuse some excitement. In one of scenes, Kamaal Rashid Khan of ‘DESHDROHI’ is seen justifying domestic violence on women as a part of common middle-class men’s stress-release process. If a writer could come up with such character on screen that too without giving him a proper lesson at the end, I mourn the death of sensibility in such creative area of work. Even my anger is piling up for obvious reasons! Let’s end it here and here! [2/5]

Friday, 28 February 2014

SHAADI KE SIDE-EFFECTS: Hilarious in parts, dramatic second half loses the fun, pun & pace! [2.5/5]

The latest being, “this country election has only bachelors contesting against each other e.g. Narendra Modi, Rahul Gandhi, Mamta, Mayawati, Jayalalitha as only a bachelor is destined to change the fate of country otherwise married people can’t even change a TV Channel at their own”, jokes on marriages are the most tried and tested in any social gathering. Comforting-consolatory for married ones, cheering-encouraging for bachelors! Saket Chaudhary’s SHAADI KE SIDE EFFECTS tries to associate, formulate and encash the very same momentary bits of joy in a full-fledged drama on screen. No wonder, it turns out to be hilarious in parts but after a point, too stretched and unidirectional to recall as a full-on entertainer. An average romantic comedy with perhaps more funny one-liners to count on!

Vidya Balan playing Trisha and Farhan Playing Siddharth Roy [Interestingly, the namesake of Vidya’s real life husband] are a happy couple always trying their best to excite-ignite their marriage life with a certain formula in which they both act like strangers on holiday and keep flirting with each other as much as they could. It works but only till they are not into their parenthood. First, Trisha’s shifting focus from hubby to baby, then expectations to become the best father in the world, Sid is forced to lead a secret parallel life to keep the young carefree Siddharth in him alive.

SHAADI KE SIDE EFFECTS is freshly comic in its first part where humor often comes with funny situations Sid is put in. Though only from man’s standpoint, film does well with observatory analysis of changes in man-wife relationship after having baby. The sleepless nights, sexless life, exhausting baby-sitting sessions, everything just leaves you in splits. Things go overboard when the humor is outdone with the emotional drama to make and meet a justified end to all this.

A romantic comedy with lengthened 2 hours 25 minutes of duration with strictly avoidable song sequences is saved here only by Farhan Akhtar’s dedicated performance. As the irritated, infuriated, neglected, sidelined, unsure, self-indulgent, frustrated Sid, Farhan looks his part well. His charm as a sincere actor is maintained. Vidya Balan has nothing very prominent to show-off since the narrative is male-oriented but she succeeds in playing a dominant, overprotective and sometimes catty wife. A good hand at writing and delicious cameos made by Ram Kapoor, stand-up comic artist Vir Das and Ila Arun are also listing as points in favor of the film. Ram Kapoor as the aspirational father, reliable husband and a well-settled family man is absolutely flawless and perfect to the part. Vir Das continues to live up to his image. Ila Arun is a surprise.

Despite being loudly insensitive about kids [In one exaggerated sequence, Sid forgets to take care of his kid-daughter for a soccer match on TV] and women at all stages, SHAADI KE SIDE EFFECTS produces good laugh but not without forcing you to look at your wrist-watch more than once as when it all will be over. Film’s climax too is very filmy, unsound and forcefully liberal. Overall, marriage is an institution where everyone has his own degree of masters. I am not sure how many will associate to this experience but this one is more like ‘Baby Ke Side-Effects’! Cute & sweet are just a word, after a point! Pun intended! [2.5/5]                                     

Thursday, 15 August 2013

ONCE UPON Ay TIME IN MUMBAAI DOBAARA: Stay away from this ‘all talk-no action’ bogus entertainer! [1.5/5]

Glamorizing evil and bad is not a new recipe to success in Bollywood. It has done wonders in past for superstars like Shah Rukh Khan & Sanjay Dutt but gambling totally on the same doesn’t solve the purpose unless you have a solid story line, fool-proof fail-safe screenplay and if not mightier than the bad, sure equally influential character of good merits who can rise from the downhill and surprise you in the final combat of good & bad […the best example I could remember is Aamir & Sharat Saxena’s final face-off in Ghulam], sadly and in the most disappointing way, Milan Lutharia’s ONCE UPON Ay TIME IN MUMBAAI DOBAARA lacks all except the style quotient.

First and foremost, where the prequel to same […Ajay Devgn-Emran Hashmi starrer OUATIM] was partly based on true incidents, taking cues from life & times of Haji Mustan and the momentous rise of Dawood on the map of Mumbai underworld, this sequel slips off conveniently into a fictional love-triangle. Akshaye Kumar gets into the shoes of Shoaib [played earlier by Emraan Hashmi] to create the most-stylish, charming yet menace bad guy that manages to take away all the claps & whistles with his presence on screen. He is the uncrowned man behind all the illegal businesses including cricket match-fixing. He gets what he wants by all means, be it the lady sitting on his next in the stadium. He literally can buy you an award that you aren’t even nominated for. Sonakshi Sinha plays a starlet […on the similar lines of yesteryear’s sex-siren Mandakini] who dreams to achieve big but not at the cost of everything. Imran Khan is a side-kick to Shoaib who unlike his mentor-cum-idol-cum-boss, thinks from heart rather than going with decisions that mind suggests. Rest you can guess, as it is a Bollywood love-triangle!

Of the crew, Rajat Aroraa- the man who penned the success-story of OUATIM and THE DIRTY PICTURE carries forward his trademark writing with punches possibly in every line. So, this 2 hour 40 min long power play of the good, the bad and the beauty is filled with cheesy one liners like ‘naam bata diya toh meri pehchaan bura maan jaayegi’ ‘itne saalon mein Mumbai badal gayi thi, kumkum se kimi kaatkar ho gayi thi’ ‘doodh mein jisne pehle nimbu nichoda, paneer uska’. Honestly, some really work. Most don’t. But that is not the one flaw that makes it an unbearable watch. Storyline that takes off with a power packed establishment of Shoaib’s character in the first half, looses its grip soon after introducing the love-angle and later when melodrama takes over the charge. Boredom is guaranteed in those precious minutes. Imran is sure a misfit as a tapori- mumbaiya. Sonakshi looks great in most but I would like to keep my lips sealed if asked about her performance.

There’s a scene where Imran teaches Sonakshi how to speak English and mistakenly he translates her intermediate [10+2] education as ‘Intercourse’, now if you find it a reason to chuckle or laugh, I suggest you go see some psychiatrist as soon as you finish it reading…and shockingly that sad joke goes on and one for like 3-4 scenes. To add up, I don’t why everyone including Sonali Bendre who makes an appearance in an insignificant- half baked subplot pronounces ‘Shoaib’ as ‘shoheb’. Sounds disgusting…really!

& for the makers and the director, I would like to suggest that, “agar aap aisi hi betuki bakwaas filmein banaate rahenge, audience ek na ek din jaroor bura maan jaayegi”! Overall, this sequel of high expectations sweats out to encash the success of the prequel but just finishes as an ‘all talk-no action’ bogus entertainer! Stay away!! [1.5/5]