Friday, 15 June 2018

लस्ट स्टोरीज़ (A): ‘लव’ से ज्यादा असल और अलग! [4/5]


प्यार की कहानियाँ सदियों से अनगिनत बार कही और सुनाई जाती रही हैं. वासना के हिस्से ऐसे मौके कम ही आये हैं. हालाँकि दोनों में फर्क बस सामाजिक बन्धनों और नैतिकता के सीमित दायरों का ही है. कितना आसान लगता है हमें, या फिर कुछ इस तरह के हालात बना दिए गये हैं हमारे लिए कि प्यार के नाम पर सब कुछ सही लगने लगता है, पाक-साफ़-पवित्र; और वासना का जिक्र आते ही सब का सब गलत, गंदा और अनैतिक. रिश्तों में वासना तो हम अक्सर अपनी सतही समझ से ढूंढ ही लेते हैं, वासना के धरातल पर पनपते कुछ अलग रिश्तों, कुछ अलग कहानियों को समझने-तलाशने की पहल नेटफ्लिक्स की फिल्म लस्ट स्टोरीज़ में दिखाई देती है, जो अपने आप में बेहद अनूठा प्रयास है. ख़ास कर तब, जब ऐसी कहानियों को परदे पर कहने का दारोमदार हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के चार बड़े नामचीन फिल्मकारों (अनुराग कश्यप, जोया अख्तर, दिबाकर बैनर्जी, करण जौहर) के मजबूत और सक्षम कन्धों पर टिका हो.

चार छोटी-छोटी कहानियों से सजी लस्ट स्टोरीज़ अपने नाम की वजह से थोड़ी सनसनीखेज भले ही लगती हो, पर कहानी और किरदार के साथ अपनी संवेदनाओं और सिनेमा के लिए अपनी सशक्त जिम्मेदारियों में खुद को तनिक भी लचर या लाचार नहीं पड़ने देती. अनुराग की कहानी एक महिला प्रोफेसर के अपने ही एक स्टूडेंट के साथ जिस्मानी सम्बन्ध बनाने से शुरू होती है. कालिंदी (राधिका आप्टे) का डर, उसकी नर्वसनेस, तेजस (सैराट के आकाश ठोसर) पर जिस तरह वो अपना अधिकार जमाती है, सब कुछ एक सनक से भरा है. एक हिस्से में तो वो तेजस का बयान तक अपने मोबाइल में रिकॉर्ड करने लगती है, जिसमें तेजस सब कुछ आपसी सहमति से हुआ था की हामी भर रहा है. हालांकि अपने एक से ज्यादा रिश्तों में कालिंदी की तड़प उन दृश्यों में साफ़ होने लगती है, जिनमें वो कैमरे से रूबरू होकर कुछ बेहद अहम् सवाल पुरुषों की तरफ उछालती है. राधिका अपने किरदार के पागलपन में हद डूबी हुई दिखाई देती हैं, पर फिल्म कई बार दोहराव से भी जूझती नज़र आती है, अपने 35 मिनट के तय वक़्त में भी लम्बी होने का एहसास दे जाती है.

सुधा (भूमि पेडणेकर) अजीत (नील भूपलम) के साथ कुछ देर पहले तक बिस्तर में थी. अब फर्श पर पोछा लगा रही है. पोहे की प्लेट और चाय का कप अजीत को दे आई है. अब बर्तन कर रही है. बिस्तर ठीक करते हुए ही दरवाजा बंद होने की आवाज़ आती है. अजीत ऑफिस जा चुका है. सुधा उसी बिस्तर पर निढाल होकर गिर गयी है. जोया अख्तर की इस कहानी में ऊंच-नीच का दुराव बड़ी संजीदगी से पिरोया गया है. सुधा एक काम करने वाली नौकरानी से ज्यादा कुछ नहीं है, उसे भी पता है. अजीत के साथ शारीरिक सम्बन्धों के बावजूद, अपने ही सामने अजीत को लड़की वालों से मिलते-बतियाते देखते और उनके लिए चाय-नमकीन की तैयारी करते वक़्त भी उसे अपनी जगह मालूम है, फिर भी उसकी ख़ामोशी में उसके दबते-घुटते अरमानों और ख्वाहिशों की चीख आप बराबर सुन पाते हैं. भूमि को उनकी रंग-ओ-रंगत की वजह से भले ही आप इस भूमिका में सटीक मान बैठे हों, पर असली दम-ख़म उनकी जबरदस्त अदाकारी में है. गिनती के दो संवाद, पर पूरी फिल्म में क्या दमदार उपस्थिति. इस फिल्म में जोया का सिनेमा भी क्या खूब निखर कर सामने आता है. कैमरे के साथ उनके कुछ दिलचस्प प्रयोग मज़ा और दुगुना कर देते हैं.

दिबाकर बैनर्जी की कहानी एक बीचहाउस पर शाम होते ही गहराने लगती है. रीना (मनीषा कोईराला) साथ ही बिस्तर में है, जब सुधीर (जयदीप अहलावत) को सलमान (संजय कपूर) का फ़ोन आता है. सलमान को लगने लगा है कि उसकी बीवी रीना का कहीं किसी से अफेयर चल रहा है. शादी-शुदा होने का बोझ और बीवी होने से ज्यादा बच्चों की माँ बन कर रह जाने की कसक अब रीना की बर्दाश्त से बाहर है. सलमान को खुल कर सब सच-सच बता देने में ही सबकी भलाई है. वैसे भी तीनों कॉलेज के ज़माने से एक-दूसरे को जानते हैं. शादी से बाहर जाकर अवैध प्रेम-संबंधों और अपने पार्टनर से वफादारी के मुद्दे पर दिबाकर इन अधेड़ उम्र किरदारों के जरिये एक बेहद सुलझी हुई फिल्म पेश करते हैं, जहां एक-दूसरे की जरूरतों को बात-चीत के लहजे में समझने और समझ कर एक माकूल रास्ता तलाशने में सब के सब परिपक्व और समझदार बन कर सामने आते हैं. मनीषा और संजय को नब्बे के दशक में हम बहुत सारी मसाला फिल्मों में नॉन-एक्टर घोषित करते आये हैं, इस एक छोटी फिल्म में दोनों ही उन सारी फिल्मों में अपने किये-कराये पर मखमली चादर डाल देते हैं. जयदीप तो हैं ही बाकमाल.

आखिरी किश्त करण जौहर के हिस्से है, और शायद सबसे फ़िल्मी भी. कहानी पिछले साल की शुभ मंगल सावधान से बहुत अलग नहीं है. मेघा (कियारा आडवाणी) के लिए बिस्तर पर अपने पति पारस (विक्की कौशल) के साथ सुख के पल गिनती के ही रह जाते हैं (हर बार वो उँगलियों से गिनती रहती है), और उसके पति को कोई अंदाज़ा ही नहीं कि उसकी बीवी का सुख उसके सुख से अलग है, और कहीं ज्यादा है. मनचाही ख़ुशी के लिए बैटरी और रिमोट से चलने वाले खिलौने की दखल के साथ, करण कहानी को रोचक बनाने में ज्यादा उत्तेजित दिखते हैं, कुछ इस हद तक कि अपनी महान पारिवारिक फिल्म कभी ख़ुशी कभी गम के गाने का मज़ाक उड़ाने में भी झिझकते नहीं. विक्की कौशल मजेदार हैं.

आखिर में, लस्ट स्टोरीज़ 2013 में आई अनुराग, ज़ोया, दिबाकर और करण की बॉम्बे टॉकीज वाले प्रयोग की ही अगली कड़ी है. फिल्म इस बार बड़े परदे पर नहीं दिखेगी, और सिर्फ नेटफ्लिक्स पर ही मौजूद रहेगी, इसलिए अपनी सहूलियत से कभी भी और कहीं भी देखने का लुत्फ़ आप उठा सकते हैं. ज़ोया और दिबाकर की कहानियों के बेहतर होने के दावे के साथ ही, एक बात की ज़मानत तो दी ही जा सकती है कि हिंदी सिनेमा के आज में इस तरह की समर्थ, सक्षम और असामान्य कहानियां कहने की कोशिशें कम ही होती हैं, खुद इन चारों फिल्मकारों को भी आप शायद ही इन मुद्दों पर एक बड़ी फिल्म बनाते देख पायें, तब तक एक ही फिल्म में चारों अलग-अलग ज़ायकों का मज़ा लीजिये. लव से ज्यादा मिलेगा, कुछ नया मिलेगा. [4/5]

Friday, 1 June 2018

भावेश जोशी सुपरहीरो : ‘मार्वल’ नहीं, ‘डीसी’ है. देसी है. [3/5]


दुनिया ख़तम नहीं हो रही है. धरती पर दूसरे ग्रहों के आड़े-टेढ़े दिखने वाले एलियंस का अटैक भी नहीं हो रहा. इसीलिये उड़ने, चिपकने, रंग बदलने और तरह-तरह की अजीब-ओ-ग़रीब शक्तियों का रंगीन तमाशा दिखाने वाले सुपरहीरोज़ की जरूरत भी नहीं है. ये भारत है, यहाँ भ्रष्टाचार ही सबसे बड़ा दानव है. सिस्टम का खोखलापन ही वक़्त-बेवक्त लाचार से दिखने वाले आम इंसान को कभी-कभी इतना झकझोर देता है कि उसके लिए किनारे पर खड़े रहकर सब कुछ चुपचाप होते देखते रहना मुश्किल हो जाता है. हिंदी सिनेमा में शहंशाह ही शायद इस तरह की आख़िरी फिल्म रही थी. कृश इस मामले में देसी होते हुए भी अपनी पहचान हॉलीवुड से ही उधार लेता है. विक्रमादित्य मोटवाने की भावेश जोशी सुपरहीरो इन दोनों के बीच अपना एक अलग रास्ता, अपनी एक अलग जगह तलाशती है, जहां सबकुछ हद दर्जे तक अपना है, ज़मीनी है.

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे आन्दोलन में जन लोकपाल बिल की मांग करते लाखों नौजवानों में भावेश जोशी (प्रियांशु पैन्यूली) और सिकंदर खन्ना (हर्षवर्धन कपूर) भी शामिल हैं. करप्शन इज़ शिट, एंड शिट स्टिंक्स जैसे नारों से बढ़कर जब खुद कुछ करने की बारी आती है, तो मुंह पर पेपर-बैग्स पहन कर सोसाइटी का इन्टरनेट ठीक करवाने, पेड़ कटने से बचाने और नो एंट्री में घुसती कारों को रोकने से ज्यादा न कुछ उनके बस का होता है, ना ही वो कोशिश ही करते हैं. यूट्यूब चैनल पर लाइक्स तो मिल रहे हैं, पर धीरे-धीरे दुनिया बदलने का जोश भी ठंडा पड़ता जा रहा है. सिकंदर कोडिंग की नौकरी के सिलसिले में विदेश जाने के लिए पासपोर्ट बनवा आया है, वो भी खुद रिश्वत दे कर. हालाँकि भावेश के लिए अभी भी सब कुछ ख़तम नहीं हुआ है. मुंबई में जड़ों तक पसरे पानी की तस्करी के मामले ने उसमें एक नयी आग फूँक दी है. भावेश जोशी सुपरहीरो किसी एक चेहरे की कहानी नहीं है, बल्कि इस लड़ाई में लगातार उठ खड़े होते एक जज़्बे का किस्सा है.

विक्रमादित्य मोटवाने अपने मुख्य किरदार से फिल्म की शुरुआत में ही साफ़-साफ़ बुलवा देते हैं कि फिल्म मार्वल नहीं, बल्कि डीसी वाले ज़ोन में अपने आपको ज्यादा सुरक्षित महसूस करती है. आमने-सामने के सीधे मुकाबलों में नायक उतनी ही देर टिक पाता है, जितनी देर उसकी कद-काठी का कोई भी आम इंसान लड़ सकता हो. गैजेट्स के नाम पर उसके पास सिर्फ हैंडीकैम, लैपटॉप और एक स्मार्टफ़ोन ही हैं. ज्यादातर लड़ाईयां स्थानीय मुद्दों पर लड़ी जाती हैं, और इंटरनेट पर ही निपट जाती हैं. ज़मीनी झड़पों में चोटों का खामियाज़ा हमेशा नायक को ही उठाना पड़ता है. तीखे आदर्शवाद और तेज़ आक्रोश के साथ भावेश का जुझारूपन, अपने इर्द-गिर्द चीजें न बदल पाने की खीज़ और बावजूद इन सबके हार न मानने की जिद मोटवाने जिस नितांत गहरे और घने तौर पर सामने रखते हैं, कुछ नया देखने का एहसास लगभग लगभग हर वक़्त बना ही रहता है. हालाँकि फिल्म के दूसरे हिस्से में बदलने का जोश बदले की आग में तब्दील जरूर हो जाता है, पर इमोशन्स कमोबेश वैसे ही बने रहते हैं. कुछ बहुत करीने से फिल्माए गये एक्शन दृश्यों में विश्वसनीयता का तड़का उन्हें और भी रोचक-रोमांचक बना देता है.

सिकंदर की भूमिका में औसत कद-काठी वाले हर्षवर्धन का चुनाव, जहां एक स्तर पर उनके किरदार से पूरी तरह मेल खाता है, भीड़ में खो जाने और सुपर हीरो बनने की सबसे कम संभावनाओं के तौर पर सटीक लगता है; वहीँ उस किरदार के ज़ज्बाती उतार-चढ़ाव के सफ़र में उनका कमतर अभिनय फिल्म को नुक्सान भी बहुत पहुंचाता है. कभी-कभी लगता है, काश राजकुमार राव जैसा कद्दावर अदाकार कुछ पलों के लिए आता और सब कुछ संभाल लेता. प्रियांशु पेन्यूली से कोई शिकायत नहीं रहती. फिल्म के पहले हिस्से की कामयाबी काफी हद तक उनके ही मज़बूत कन्धों पर टिकी होती है. दूसरे हिस्से में मोटवाने या तो एक्शन दृश्यों का सहारा लेते दिखाई देते हैं, या फिर तेरे चुम्मे में च्यवनप्राश है जैसे आइटम नंबर में व्यस्त हो जाते हैं.  

155 मिनट के लम्बे वक़्त में, भावेश जोशी सुपरहीरो कई बार लड़खड़ाती है, लंगड़ाती है, मगर अंत तक आते-आते फिल्म के नायक की तरह ही आत्मविश्वास से कुछ इस कदर लबरेज हो जाती है, मानो अंत नहीं, इसे एक नयी शुरुआत समझी जानी चाहिए. भावेश जोशी के परदे पर वापस लौटने की संभावनाओं को एक माकूल ज़मीन देने में तो जरूर फिल्म सफल हो जाती है, पर खुद में एक मुकम्मल फिल्म का दर्ज़ा हासिल करने कहीं न कहीं चूक जाती है. भावेश लौटे, तभी भावेश जोशी सुपर हीरो को उसकी तयशुदा मंजिल हासिल होगी! [3/5]  

Friday, 11 May 2018

राज़ी: सिनेमाई देशभक्ति अपने सही अनुपात में! [3.5/5]


देशभक्ति और राष्ट्रीयता के नाम पर पिछले कुछेक सालों से हिंदी सिनेमा में एक नए दम्भी, आत्ममुग्ध और स्वप्रायोजित देशप्रेम का चलन धड़ल्ले से देखने को मिल रहा था. नायक जहां सिस्टम पर प्रहार करते हुए भी पुलिस की वर्दी या टेबल पर रखे तिरंगे की शान में कोई आंच नहीं आने देता (बाग़ी 2), परदे पर जितना बड़ा तिरंगा, फिल्म का नायक भी तकरीबन उसी अनुपात में स्व-सत्यापित देशभक्त. और अगर नायक द्वारा देश की शान में कशीदे पढ़े जाने वाले भारी-भरकम संवाद चबा-चबा कर बोले जा रहे हों, फिर तो बॉक्स-ऑफिस सफलता भी ज्यादा दूर नहीं. मेघना गुलज़ार की राज़ी इस अतिवादी देशप्रेम के फलते-फूलते-फैलते सिनेमाई फ़ॉर्मूले को कुछ इस मजबूती और ठोस तरीके से नकारने का बीड़ा उठाती है कि भारत-पाकिस्तान के बीच झूलती कहानी  होने के बावजूद परदे पर एक बार भी तिरंगे तक को किसी भी अनुपात में दिखाने की पहल नहीं करती. यहाँ तक कि वतन के आगे कुछ नहीं, खुद भी नहीं जैसे वजनी संवाद का ज़िक्र भी आपको तालियाँ पीटने के लिए उकसाता या बरगलाता नहीं, बल्कि आपको ज़ज्बाती तौर पर किरदारों को समझने और उनके जेहनी हाल-ओ-हालात से वाकिफ होने में ज्यादा मददगार साबित होता है.

1971 का नाज़ुक वक़्त है. कम से कम भारत-पाकिस्तान के लिए तो है ही. कश्मीरी नागरिक हिदायत खान साब (रजित कपूर) के ताल्लुक सरहद पार भी काफी गहरे हैं. पुराने दोस्त पाकिस्तानी ब्रिगेडियर सईद (शिशिर शर्मा) को गाहे-बगाहे खुफ़िया जानकारियाँ पहुंचाते रहते हैं, पर असलियत में उनकी वफादारी हिन्दुस्तानी इंटेलीजेंस एजेंसी की तरफ ही है. इस बार के दौरे से लौटते वक़्त एक अजीब-ओ-गरीब फैसला कर आये हैं, अपनी 20-साला बेटी सेहमत का निकाह ब्रिगेडियर साब के छोटे साहबज़ादे इक़बाल (विक्की कौशल) से. वतन महफूज़ रखने के लिए उन्हें अपने वालिद से रवायत में मिली ये ज़िम्मेदारी अब वसीयत में सेहमत तक पहुँच चुकी है. पड़ोसी मुल्क में इंटेलीजेंस अफसर खालिद मीर (जयदीप अहलावत) की कड़ी ट्रेनिंग शायद ही सेहमत के काम आये, तब जबकि कदम-कदम पर उसे ऐसे फैसले लेने पड़ रहे हों, जिनकी वो इकलौती जिम्मेवार है, और जो उसके दिल-ओ-दिमाग़ के लिए उलझन का सबब. फिल्म का सबसे आखिरी संवाद कहानी को बड़ी सादगी से मुकम्मल कर जाता है, “...कुछ कैज़ुअल्टीज़ ऑफ़ वॉर जिंदा रह जाते हैं.

सच्ची घटनाओं और हरिंदर एस. सिक्का की किताब कालिंग सेहमत पर बनी राज़ी में मेघना गुलज़ार भारत-पाकिस्तान के बीच के 71 के तनाव को बढ़ा-चढ़ा कर रोमांचक बनाने की बजाय सरहद के दोनों तरफ के किरदारों के ज़ज्बाती उतार-चढ़ाव को कुरेदने में ज्यादा वक़्त बिताती हैं. कुछ इस नरमी और समझदारी से कि किरदारों का इन्सानीपन उनसे पल भर के लिए भी अलग न हो. फेफड़ों में ट्यूमर झेल रहे हिदायत खान की ब्रिगेडियर सईद से की गयी सुनियोजित गुज़ारिश भी दो दोस्तों की गुफ्तगू से ज्यादा कुछ और नहीं लगती. डाइनिंग टेबल पर सेहमत के सामने ही भारत के खिलाफ मंसूबे रचे जा रहे हैं, इक़बाल अकेले में माफ़ी मांग रहा होता है, “घर वाले भूल जाते हैं, हिंदुस्तान तुम्हारा वतन है. हालाँकि फिल्म के दूसरे हिस्से में घटनायें कुछ इस रफ़्तार से एक के बाद एक घटती चली जाती हैं, कि अगर फिल्म सत्य घटनाओं पर आधारित होने का बोर्ड नहीं लेकर घूमती होती, तो आपको कम विश्वसनीय लगती.

उर्दू की चाशनी में लिपटे गुलज़ार साब के संवादों को परदे पर काफी अरसे बाद जगह मिली है. ...जिंदगी के कश शायद कुछ ज्यादा ही लम्बे खींच लिए मैंने हो या खालिद मीर के सेहमत की शादी के मसअले पर उसकी माँ (सोनी राजदान) की राय जानने के सवाल पर हिदायत खान की बेबाकी वो चाहती हैं कि आप खा कर जाएँ जैसे दिलचस्प और समझदार प्रयोग फिल्म को अलग ही रंग दे जाते हैं. ये भी अनूठा ही है कि फिल्म का सबसे दमदार गाना ऐ वतन, मेरे वतन पाकिस्तान में स्कूली बच्चों द्वारा पाकिस्तान के लोगों के लिए गाया जा रहा हो, पर उसकी हर लाइन हिन्दुस्तानी होने के तौर पर आपका रोम-रोम रोमांचित कर रही हो. फिल्म में खुफ़िया एजेंट्स के साथ संवाद स्थापित करने के लिए फिल्म में बार-बार कोड-वर्ड्स में बात होती है, जो कई बार बेहद बनावटी या जानबूझ कर मजाकिया बनाया गया लगता है. मसलन, बिल्ली को ठण्ड लग गयी. गर्म कपड़े भेजो’, बिल्ली को बाहर ले जाओ, गर्म कपड़ों से कुछ नहीं होगा’, छत टपक रही थी, मरम्मत हो गयी है. किताब पढ़ चुके लोग इस पर ज्यादा खुल कर राय दे पायेंगे.

राज़ी की सफलता में आलिया भट्ट की बाकमाल अदाकारी की हिस्सेदारी काफी बड़ी है. लिंगभेद के चक्कर में न पड़ें, तो फिल्म का नायक वहीँ हैं. महज़ 25 साल की उमर में इस तरह का परिपक्व अभिनय बेहद कम अभिनेताओं के हिस्से आया होगा. ये उनके किरदार की मासूमियत और उनके खुद के बारीक अभिनय का नतीजा ही है कि आप दर्शक के तौर पर, खुफ़िया गतिविधियों में हर वक़्त उनकी सलामती के लिए फिक्रमंद महसूस करते हैं. परदे पर उनका रोना कहीं न कहीं आपको भी द्रवित कर जाता है, खास कर दो अलग-अलग दृश्यों में. खालिद मीर के सामने सबसे आखिर में, और अपने शौहर इक़बाल के सामने पहली बार खुल कर सामने आने के वक़्त. इस एक दृश्य में विक्की कौशल भी परदे पर पूरी तरह छा जाते हैं. अब तक आप उन्हें महज़ एक जहीन शौहर के रूप में सराह रहे थे, जो बीवी के हिन्दुस्तानी क्लासिकल संगीत की पसंद को पूरी अहमियत और वाजिब जगह देता है, मगर इस दृश्य में तो वो जैसे फट पड़ते हैं. अपना सब कुछ झोंक देने की चाह में. सफल रहते हैं.

आखिर में; राज़ी देशप्रेम पर बनने वाली हालिया तमाम फिल्मों में सबसे समझदार, सुलझी हुई और बेहद ज़ज्बाती फिल्म है, जहां बेवजह की डायलागबाज़ी नहीं, नायकों की फालतू की तुनकमिजाजी नहीं, सरकारों के एजेंडे से मेल-जोल रखने वाली सिनेमाई साज़िश नहीं...है तो बस परदे पर कही, सुनी, देखे जाने लायक एक अच्छी कहानी और उस कहानी में देशभक्ति, अपने सही अनुपात में. [3.5/5]               

Friday, 4 May 2018

ओमार्ता (A): राजकुमार राव के अभिनय में एक और तमगा! [3.5/5]


सिनेमाई खलनायकों में अक्सर हमें मानवीय संवेदनाएं ढूँढने की आदत है. उनके अतीत में सेंध लगाकर जानने की कोशिश कि आखिर वो जैसे हैं, वैसे क्यूँ हैं? समाज या फिर सिस्टम से चोट खाए, बदले की आग में सब कुछ जला देने की सनक लिए ऐसे ढेर सारे एंटी-हीरोज को हमने सालों तक सर बिठाया है. और फिर आते हैं कुछ वो क्रूर, निर्दयी लेकिन रंग-बिरंगे, अजीब-ओ-गरीब खलनायक (मोगैम्बो, सर जूडा, शाकाल) जिनका पागलपन एकदम समझ से परे है. दुनिया पर कब्ज़ा करने की सनक में अंधे, अलग ही किस्म के हंसोड़ विलेन. हंसल मेहता की ओमार्ता का नायक भी खलनायक ही है, असल जिंदगी का है, पर इन दोनों किस्मों के खलनायकों से बिलकुल अलग. उसका अड्डा किसी काली पहाड़ी के पीछे की गुफा नहीं है. उसका पहनावा किसी सर्कस के रिंगमास्टर की याद नहीं दिलाता. किसी ने उसके माँ-बाप की हत्या बचपन में उसकी आँखों के सामने नहीं की थी. उसकी जमीन भी किसी साहूकार के हाथों बंधक नहीं पड़ी. पर फिर भी उसकी सनक, उसका पागलपन, उसका शैतानी दिमाग आपकी हड्डियों तक को कंपा देने में कहीं से भी कम नहीं पड़ता.

पुरानी दिल्ली के एक छोटे से मकान में 4 विदेशियों को बंधक रखा गया है. पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश आतंकवादी अहमद उमर सईद शेख़ (राजकुमार राव) का शायद पहला ही मिशन है ये. उमर पकड़ा जाता है. बोस्निया में उसके अपने भाइयों पर हो रहे ज़ुल्म के चलते उसने अपने लिए ज़ेहाद का रास्ता चुना है. उसे छुडाने के लिए कंधहार में इंडियन एयरलाइन्स का जहाज़ तक अगवा कर लिया गया है. ये उमर ही है, जिसके तार आगे चलकर अमेरिका में 9/11 अटैक और वॉल स्ट्रीट जर्नल के पत्रकार डेनियल पर्ल की निर्मम हत्या से जुड़े. मुंबई में 26/11 हमले के वक़्त, इसी शैतानी दिमाग ने भारत और पाकिस्तान को अलग-अलग फ़ोन करके युद्ध की स्थिति तक ला खड़ा किया था. धार्मिक उन्माद किस तरह पढ़े-लिखे जहीन दिमाग नौजवानों को हैवानियत की हद तक ला फेंकता है, ओमार्ता इसका बेहद करीबी और एकदम सटीक तस्वीर पेश करती है. वो भी असलियत के एकदम आसपास रहते हुए.

किसी खोजी रिपोर्ट या काबिल डाक्यूमेंट्री ड्रामा की तर्ज़ पर बनी ओमार्ता एक डार्क क्राइम थ्रिलर है, जहां निर्देशक हंसल मेहता आपके रोंगटे खड़े करने के लिए अख़बारों की असल सुर्ख़ियों, समाचारों के फुटेज और रूह कंपा देने वाली भयावह तस्वीरों का बेझिझक और बेख़ौफ़ इस्तेमाल करते हैं. ये तब और भी जरूरी लगने लगता है, जब हंसल उमर सईद शेख़ के आतंकवादी बनने की तरफ बढ़ने की आग को किसी और इमोशनल ईंधन से भड़काने की कोई होशियारी नहीं दिखाते, और तब भी जब उसके वहशियाना शख्सीयत को उधेड़ कर सामने रख देना चाहते हैं. अनुज राकेश धवन की बाकमाल सिनेमेटोग्राफी के साथ, हंसल फिल्म के दृश्यों को पूरी तरह आप पर ज़ाहिर होने देने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाते. यहाँ तक कि फिल्म के सबसे नाटकीय दृश्य (डेनियल पर्ल की हत्या) में भी आपको सब कुछ होते हुए साफ़-साफ़ नहीं दिखता, कैमरा उमर के चेहरे तक ही सीमित रहता है, पर घृणा, डर और दर्द से आपका दिल बैठा देने में नाकाम नहीं होता. इससे भयावह कुछ हिंदी सिनेमा में कम ही देखा है मैंने.

ओमार्ता राजकुमार राव के कद्दावर अभिनय में एक और तमगा है. जिस ख़ामोशी और ठहराव से वो उमर के किरदार में दाखिल होते हैं, और फिर वक़्त-बेवक्त उसके गुस्से, उसकी सनक और उसकी नफरत को बराबर मात्रा में नाप-जोख के परदे पर निकालते हैं, देखने लायक है. चेहरे पर कोई पछतावा नहीं, दिल में कोई मलाल नहीं, और वो हलकी सी शैतानी मुस्कराहट (रावण का अट्टहास नहीं); राजकुमार राव का यह किरदार हालिया खलनायकों की लिस्ट में बड़ी आसानी से, बहुत वक़्त तक याद रखा जाने लायक है. अगर याद हो, शाहिद में हंसल ने जेल के दृश्य में शाहिद आज़मी (राजकुमार राव) की मुलाक़ात कुछेक दृश्यों में उमर सईद शेख़ (तब, प्रबल पंजाबी) से कराई थी. अपने भाइयों पर हो रहे जुल्म से लड़ने के लिए दोनों अलग-अलग रास्ते चुनते हैं. इसे महज़ एक रोचक तत्थ्य मानने से हटकर देखें, तो हंसल इस तरह इस्लामिक आतंकवाद और धार्मिक भेदभाव के सन्दर्भ में अपना घेरा पूरा कर लेते हैं.  
             
हम अल्लाह के बन्दे हैं’, अल्लाह हमारे साथ है’, जैसे घिसे-पिटे संवादों से भरे दो-चार मौलानाओं की दकियानूसी और फ़िल्मी बर्गालाहट भरे दृश्यों को नज़रंदाज़ कर दें, तो किसी आतंकवादी की एकलौती बायोपिक होने के साथ-साथ ओमार्ता एक जरूरी और बेहद मुश्किल फिल्म है, देखने के लिए भी और बनाने के तौर पर भी. फिल्म किसी तरह का कोई सन्देश देने की या फिर एक मुकम्मल अंत देने की जिद से बचती है, इसलिए और भी सच्ची लगती है. [3.5/5]

Friday, 20 April 2018

बियॉन्ड द क्लाउड्स: मजीदी के सिनेमा पर बॉलीवुड के बादल! [2.5/5]

मुंबई के रेडलाइट इलाके की एक इमारत है. छोटे-छोटे कमरों से भरे गलियारे में जिस्मों के मोल-भाव चल रहे हैं. एक माँ अपने क्लाइंट के साथ कमरे में दाखिल होती है, एक छोटी बच्ची कमरे से निकल कर चुपचाप दीवार से लग कर खड़ी हो जाती है. उसे कुछ समझाने, बताने या कहने की अब जरूरत भी नहीं पड़ती. स्लमडॉग मिलियनेयर को आये 10 साल बीत चुके हैं, और सलाम बॉम्बे तो 30 साल पहले आई थी. मुंबई की इन बदनाम, तंग गलियों में तंगहाल जिंदगियों के हालात, हो सकता है अब भी बहुत ज्यादा न बदले हों, मगर जब माज़िद मजीदी जैसे वाहिद और काबिल फ़िल्मकार आज भी परदे पर अपनी कहानी कहने के लिए, उन्हीं मशहूर फिल्मों के उन्हीं चिर-परिचित दृश्यों की परिपाटी का सहारा लेते हैं, सवालों से कहीं ज्यादा बढ़कर मायूसी होती है. क्या मुंबई शहर की, शहर के इस सबसे निचले-गंदले हिस्से की पूरी समझ मजीदी साब को फिल्मों से ही उधार में मिली है? या फिर उनकी यह कोशिश महज़ किसी ख़ास बकेट-लिस्ट का एक पड़ाव भर है?

ईरानी फ़िल्मकार माज़िद मजीदी पारिवारिक रिश्तों में आत्मीयता खोजने के लिए सीधी-सरल और मासूमियत भरी कहानियों के लिए जाने जाते हैं. लापरवाही से छोटी बहन ज़ाहरा के जूते गंवाने के बाद, नए जूतों के लिए नयी-नयी तिकड़में लगाता अली तो याद ही होगा (चिल्ड्रेन ऑफ़ हेवन)? बियॉन्ड द क्लाउड्स भी ऐसे ही एक भाई-बहन की कहानी है. हालांकि मासूमियत तो छोडिये, उनके बीच के ज़ज्बात भी बहुत रह-रह कर, बुझे-बुझे ही आप तक पहुँचते हैं. आमिर (ईशान खट्टर) ड्रग्स के धंधे में है. तारा (मालविका मोहनन) धोबी घाट पर कपड़े इस्तरी करती है. एक रोज, तारा पर गन्दी नज़र रखने वाले अक्षी (गौतम घोष) पर तारा हमला कर देती है, और अब वो जेल में है, तब तक जब तक अक्षी ठीक होकर बयान देने की हालत में न आ जाए. एक बड़ा हाथ मारकर लाइफ राकेट करने की बेचैनी के बीच, अब आमिर अक्षी और उसके परिवार की देखरेख में फंसा है.

मुंबई में फ्लेमिंगो देखा है कभी? हर साल आते हैं कच्छ से उड़कर. बियॉन्ड द क्लाउड्स भी ईरान से उड़कर आया लगता है. हालाँकि मुंबई का लगने की जद्द-ओ-जहद में बनावटीपन कुछ ज्यादा ही  हावी हो जाता है. ईशान खट्टर का सांवलापन पहले फ्रेम से आखिरी फ्रेम तक पहुँचते-पहुँचते किसी फेयरनेस क्रीम के शेडकार्ड जैसे नतीजे दिखाने लगता है. फिल्म में हर बदनसीब औरत किसी न किसी बेवड़े से परेशान होकर जिंदगी के इस तकलीफ़देह मुकाम तक पहुंची है. माँ-बाप का न होना बड़ी सहूलियत से कार-एक्सीडेंट के मत्थे चढ़ जाता है. और फिल्म में सबसे गैर-जिम्मेदाराना भागेदारी तो विशाल भारद्वाज के हिस्से आती है, जिन्होंने फिल्म के हिंदी संवाद लिखे हैं. उनकी किसी एक ट्रांसलेटर से ज्यादा की भूमिका कभी नज़र ही नहीं आती. विशाल की कलम से सिर्फ रूखे-सूखे शब्द ही निकलते हैं, उनमें किसी किस्म का कोई भाव, कोई ख़ास लहजा, किसी तरह का कोई जायका दिखाई ही नहीं देता. रहमान साब के बाद, अगर इस फिल्म में औसत काम के लिए किसी के पैसे कटने चाहिए तो विशाल भारद्वाज के.

मरा हुआ हाथी भी सवा लाख का होता है. मजीदी साब अपने सिनेमा की झलक जरूर दिखाते हैं, कई बार तो भड़ास के तौर पर भी. इसी कड़ी में, परछाईयों के साथ उनके प्रयोग एक-दो बार नहीं, फिल्म में बार-बार सामने आते हैं. आमिर की अक्षी के परिवार (एक बूढी माँ और दो नाबालिग़ बेटियों) के साथ के रिश्तों में वो ईमानदारी, वो मासूमियत, वो सहजता, वो गर्माहट पूरी कामयाबी से आपको छू जाती है, जिसके लिए मजीदी साब को आप हमेशा से चाहते आये हैं. मगर पूरी फिल्म में ऐसे मौके गिनती के हैं, बेहद कम हैं. ईशान और मालविका दोनों अपने-अपने अभिनय में घोर संभावनायें और मज़बूत करते हैं.   

बियॉन्ड द क्लाउड्स के आखिरी पलों में उम्रकैद झेल रही एक माँ का बच्चा चाँद देखने की जिद कर रहा है. जेल में ही पैदा और पला-बढ़ा होने की वजह से उसने कभी चाँद देखा ही नहीं है. माज़िद मजीदी का सिनेमा बस इक इसी पल में सांस लेता सुनाई देता है, बस एक इतने में ही पूरी फिल्म से ज्यादा मुकम्मल लगता है. बाकी के वक़्त तो आप बस एक हिंदी फिल्म देख रहे थे. मुंबई में बनी, मुंबई पे बनी, एक शुद्ध हिंदी (विशाल भारद्वाज की बदौलत) की फिल्म! [2.5/5]             

Friday, 13 April 2018

अक्टूबर: एक उदास कविता और साल की सबसे अच्छी फिल्म! [5/5]

शिउली (बनिता संधू) कोमा में है. फिर से सब कुछ ठीक होने की उम्मीद धुंधली पड़ती जा रही है. आईसीयू में उसके सामने खड़ा दानिश (वरुण धवन) बेपरवाह बोले जा रहा है, “कोई जल्दी नहीं. जिंदगी चलाने के लिए कुछ दिन मशीनों का सहारा ले लो. मेरी भी बाइक ख़राब हो जाती है, मैं धक्का देता हूँ न. वेंटीलेटर भी तो एक धक्का ही है. दानिश की इस उम्मीद का कोई सिरा नहीं है, वो जिस समन्दर में जिंदगी की सुनहली मछली ढूँढने उतरा है, उसकी तलहटी भी अपने आप में एक आसमान ही है. उदासी, खालीपन और अधूरेपन का आसमान. शिउली उसके साथ ही काम करती थी, मगर जान-पहचान बस नाम की. अब अगर कुछ उसे शिउली तक खींच लाया है तो सिर्फ एक सवाल, जो शिउली ने अपने साथ हुए हादसे से बिलकुल पहले पूछा था, डैन (दानिश) कहाँ है?”  

शूजित सरकार की अक्टूबर परदे पर एक ऐसी ज़ज्बाती कविता है, जिसमें बहे जाने का अपना ही एक अलग मज़ा है. एक ऐसी कविता जिसमें दो दिल तो हैं, पर जो प्रेम-कहानियों के पुराने धागों से बंधे होने या बंधने की परवाह बिलकुल नहीं करते. जिंदगी तब नहीं चल रही होती, जब आपको लगता है, चल रही है. जिंदगी चलना तब शुरू करती है, तब अचानक ही एक ठहराव आपके ठीक सामने आ जाता है. उदासी भी खूबसूरत हो सकती है, खालीपन भी आपसे घंटों बातें कर सकता है और किसी की आंखों की पुतलियों के दायें-बायें होने भर से आपका दिल भर जाये, अक्टूबर बड़ी संजीदगी, पूरे ठहराव और बहुत तबियत से ये कर दिखाती है.

दानिश दिल्ली के एक फाइव-स्टार होटल में स्टाफ के तौर पर अपना डिप्लोमा पूरा कर रहा है. बोलता बहुत है, जिद्दी है, लोगों से उलझता रहता है. जिंदगी चल रही है, मगर उसका कहीं कुछ नहीं चल रहा. आपकी मण्डली का वो दोस्त, जो बेवजह अस्पताल की रिसेप्शनिस्ट से डॉक्टरों का टाइम-टेबल पूछने लग जाये, अपनी जनरल नॉलेज के लिए. जूही चतुर्वेदी अपने अनूठे किरदारों की बारीकियों के लिए जानी जाती हैं, वो बारीकियां जो आम सिनेमा के लिहाज़ से जरूरी भले ना लगती हों, पर जिनका होना और जिनके होने को देख पाने की ललक और रोमांच एक चौकन्ने दर्शक के तौर पर हमेशा आपको आकर्षित करती है. मसलन, वो एक दृश्य जहां दानिश अस्पताल में पोछा लगते वक़्त, सबको पैर ऊपर करके बैठने की सलाह दे रहा है.

अक्टूबर जूही चतुर्वेदी के निडर लेखन, शूजित सरकार के काबिल निर्देशन और वरुण धवन के सहज, सरल और सजीव अभिनय का मिला-जुला इत्र है, जो फिल्म ख़तम होने के बाद तक आपको महकता रहेगा, महकाता रहेगा. बॉक्स-ऑफिस पर सौ करोड़ करने की दौड़ चल रही हो, और ऐसे आप सिनेमा के लिए अक्टूबर जैसा कुछ बेहद खुशबूदार, खूबसूरत और ख़ास लिख रहे हों, किसी बड़े मजे-मंजाये फिल्म-लेखक के लिए भी इतनी हिम्मत जुटाना हिंदी सिनेमा में आसान नहीं है. ऐसा होते हुए भी हमने कम ही देखा है. जूही चतुर्वेदी इस नक्षत्र का एकलौता ऐसा सितारा हैं. शूजित दिल्ली की गलियों का संकरापन पहले ही नाप चुके हैं, इस बार उनका कैनवस होटल और हॉस्पिटल तक ही सिमट कर रह गया है, फिर भी अविक मुखोपाध्याय के कमाल कैमरावर्क से वो हर फ्रेम में एक नया रंग ढूंढ ही लेते हैं.

वरुण को दानिश बनते देखना बेहद सुकून भरा है. यकीन मानिए, जुड़वा 2 की शिकायतें आपको याद भी नहीं आतीं. रंग बदलना, ढंग बदलना और अपने किरदार में तह तक उतरते चले जाना; ताज्जुब नहीं, वरुण अभिनय-प्रयोगों में अपने समकालीन अभिनेताओं से काफी आगे निकल गये हैं. बनिता प्रभावशाली हैं. फिल्म के सह-कलाकार भी उतने ही मज़बूत हैं, खास तौर पर शिउली की माँ की भूमिका में जानी-मानी एनिमेटर/फिल्ममेकर गीतांजली राव. हिंदी सिनेमा में धीर-गंभीर माओं की जगह घटती जा रही है, राव अच्छा विकल्प बन सकती हैं.

आखिर में, अक्टूबर आसान फिल्म नहीं है. मगर एक ऐसी मुकम्मल फिल्म, जो अपनी तरफ से एक नयी पहल करने, एक नया बदलाव रचने में कहीं कोई भूल नहीं करती. सिनेमा से आप बहुत कुछ उम्मीद करते हैं, अक्टूबर आपसे उम्मीद रखती है. फूलों के बगीचे में टहलना हो, तो अपने जॉगिंग वाले जूते बाहर उतार कर आईये. नंगे तलवों में ओस की ठंडक ज्यादा महसूस होती है. साल की सबसे अच्छी फिल्म! [5/5]

Friday, 6 April 2018

ब्लैकमेल: ब्लैक कॉमेडी या ब्लैक ट्रेजेडी! [1.5/5]


“एक पति अपनी बीवी को सरप्राइज करने के लिए जल्दी घर पहुँच जाता है. बेडरूम में क्या देखता है कि उसकी पत्नी किसी और आदमी के साथ बिस्तर पे सो रही है. उसके बाद पता है, पति क्या करता है?”.... “पति उस आदमी को ब्लैकमेल करने लगता है”. अभिनय देव की ‘ब्लैकमेल’ में फिल्म का ये मजेदार प्लॉट गिन के तीन बार अलग-अलग मौकों पर सुनाया जाता है. फिल्म की शुरुआत में पहली बार जब नायक खुद इसे ज़ोक के तौर पर सुनाता है, उसके दोस्त को जानने में तनिक देर नहीं लगती कि वो अपनी ही बात कर रहा है. ‘ट्रेजेडी में कॉमेडी’ की एक अच्छी पहल, एक अच्छी उम्मीद यहाँ तक तो साफ दिखाई दे रही है, पर अंत तक आते-आते फिल्म का यही प्लॉट जब पूरी संजीदगी के साथ बयान के तौर पर पुलिस के सामने रखा जाता है, वर्दी वाला साहब बिफर पड़ता है, “क्या बी-ग्रेड फिल्म की कहानी सुना रहा है?” एक मुस्तैद दर्शक होने के नाते, आपका भी रुख और रवैय्या अब फिल्म को लेकर ऐसा ही कुछ बनने लगा है.

देव (इरफ़ान खान) की शादीशुदा जिंदगी परफेक्ट नहीं है. ऑफिस में देर रात तक रुक कर वक़्त काटता है, और फिर घर जाने से पहले किसी भी डेस्क से किसी भी लड़की की फोटो लेकर चुपचाप ऑफिस के बाथरूम में घुस जाता है. एक रात सरप्राइज देने के चक्कर में जब उसे पता चलता है कि उसकी बीवी रीना (कीर्ति कुल्हारी) का किसी अमीर आदमी रंजीत (अरुणोदय सिंह) से चक्कर चल रहा है, वो अपनी मुश्किलें मिटाने के लिए उसे ब्लैकमेल करने का प्लान बनाता है. आसान लगने वाला ये प्लान तब और पेचीदा हो जाता है, जब सब अपनी-अपनी जान बचाने और पैसों के लिए एक-दूसरे को ही ब्लैकमेल करने लगते हैं. पति प्रेमी को, प्रेमी पत्नी को, पत्नी पति को, पति के साथ काम करने वाली एक राजदार पति को, यहाँ तक कि एक डिटेक्टिव भी.        

ब्लैक कॉमेडी बता कर खुद को पेश करने वाली ‘ब्लैकमेल’ एक उबाऊ चक्करघिन्नी से कम नहीं लगती. कुछ ऐसे जैसे आपकी कार इंडिया गेट के गोल-गोल चक्कर काट रही है, और बाहर निकलने वाला सही ‘कट’ आपको मिल ही नहीं रहा. वरना जिस फिल्म में इरफ़ान खान जैसा समझदार, काबिल और खूबसूरत अदाकार फिल्म की हर कमी को अपने कंधे पर उठा कर दौड़ पूरी करने का माद्दा रखता हो, वहां अज़ब और अजीब किरदारों और कहानी में ढेर सारे बेवजह के घुमावदार मोड़ों की जरूरत ही क्या बचती है? ‘ब्लैकमेल’ एक चालाक फिल्म होने के बजाय, तिकड़मी होना ज्यादा पसंद करती है. इसीलिए टॉयलेट पेपर बनाने वाली कंपनी के मालिक के किरदार में ओमी वैद्य अपने वाहियात और उजड्ड प्रयोगों से आपको बोर करने के लिए बार-बार फिल्म की अच्छी-भली कहानी में सेंध लगाने आ जाते हैं. देव के दोस्त के किरदार में प्रद्युमन सिंह मल्ल तो इतनी झुंझलाहट पैदा करते हैं कि एक वक़्त के बाद उन्हें देखने तक का मन नहीं करता. यकीन ही नहीं होता, ‘तेरे बिन लादेन’ में इसी कलाकार ने कभी हँसते-हँसते लोटपोट भी किया था. शराब में डूबी दिव्या दत्ता और प्राइवेट डिटेक्टिव की भूमिका में गजराज राव थोड़े ठीक लगते हैं.

‘ब्लैकमेल’ अभिनय देव की अपनी ही फिल्म ‘डेल्ही बेली’ जैसा दिखने, लगने और बनने की कोशिश भर में ही दम तोड़ देती है. ब्लैक कॉमेडी के नाम पर एडल्ट लगना या एडल्ट लगने को ही ब्लैक कॉमेडी बना कर पेश करने में ‘ब्लैकमेल’ उलझी रहती है. देव अपनी पहचान छुपाने के लिए जब एक पेपर बैग का सहारा लेता है, ब्रांड एक लड़कियों के अंडरगारमेंट का है. नाकारा रंजीत जब भी अपने अमीर ससुर के सामने हाथ बांधे खड़ा होता है, डाइनिंग टेबल पर बैठी उसकी सास कभी संतरे छिल रही होती है, तो कभी अंडे. इशारा रंजीत के (?) की तरफ है. हालाँकि कुछेक दृश्य इनसे अलग और बेहतर भी हैं, जैसे फ्रिज में रखी लाश के सामने बैठ कर फ़ोन पर उसकी सलामती के बारे में बात करना, पर गिनती में बेहद कम.

आखिर में, अभिनय देव ‘ब्लैकमेल’ के जरिये एक ऐसी सुस्त और थकाऊ फिल्म सामने रखते हैं, जहां अतरंगी किरदारों को बेवजह फिल्म की सीधी-सपाट कहानी में शामिल किया जाता है, और फिर बड़ी सहूलियत से फिल्म से गंदगी की तरह उन्हें साफ़ करने के लिए एक के बाद एक खून-खराबे के जरिये हटा दिया जाता है. बेहतर होता, अगर फिल्म अपने मुख्य कलाकार इरफ़ान खान की अभिनय क्षमता पर ज्यादा भरोसा दिखा पाती! सैफ अली खान की भूमिका वाली ‘कालाकांडी’ अपनी कहानी में इससे कहीं बेहतर फिल्म कही जा सकती है, जबकि उसे भी यादगार फिल्म मान लेने की भूल कतई नहीं करनी चाहिए. [1.5/5]