Wednesday, 28 December 2016

साल के बेमिसाल...(They Came, They Saw, They Conquered)

ढर्रे को तोड़ना, उस जमीन पर रास्ते तलाशना जहाँ पहले कभी इंसानी पाँव पड़े ही नहीं, अपने ही बनाये मानकों को लांघ कर आगे निकल जाना; बॉलीवुड के लिए कभी आसान नहीं रहा. फिर भी इस पूरे साल, कईयों ने हिम्मत दिखाई और अपनी मौजूदगी का बाकायदा एहसास कराते रहे. ‘पिंक’ अगर औरतों के प्रति मर्दों की सदियों पुरानी सड़ांध भरी मानसिकता को कड़े शब्दों में ‘ना’ कहने, और ‘ना’ का मतलब ‘ना’ ही होने की जोरदार पहल करती है, तो ‘अलीगढ़’ समलैंगिकता के जुड़े ज़ज्बातों को ‘ओछी नैतिकता’ के दुनियावी दलदल से निकाल कर हमारे दिलों और घरों में बाइज्ज़त कायम करने की सफल कोशिश करती है.

हिंदी सिनेमा की भाषा बदल रही है, और इस बात की मिसाल ‘कपूर एंड संस’ से बढ़िया और क्या हो सकती है? पारिवारिक अंतर्कलह हमेशा से हिंदी सिनेमा के रंगीन परदे को लुभाता रहा है. दर्शकों की आँखों में नमी लाकर बॉक्सऑफिस पर पैसे बटोरने का फ़न पुराना और बासी हो चला है, और इस बात की भनक तब लगती है, जब हम ‘कपूर एंड संस’ से मिलना तय करते हैं. यहाँ सब कुछ वैसा ही बेतरतीब है, जैसे अपने घरों में होता है. यहाँ सब जैसे टूटे हुए बैठे हैं या टूट कर बिखरने की कगार पर हैं. मलाल, गुस्सा, शिकवे-शिकायतें और कुढ़न, सबके अन्दर जैसे एक ज्वालामुखी सो रहा है, जब उठेगा, फटेगा तो जाने क्या होगा? यहाँ आने में आपको थोड़ी झिझक जरूर होगी, पर एक बार आ गए तो जाने में भी उतनी ही मुश्किल.

साल 2016 के इन 10 बेमिसाल फिल्मों में कहीं न कहीं आपको पुराना बॉलीवुड नये चोले पहनता हुआ दिखाई देगा. हौसला-अफजाई तो बनती है...शुक्रिया!  


#एयरलिफ्ट #डियर जिंदगी #निल बट्टे सन्नाटा #नीरजा #अलीगढ़ 
#रमन राघव 2.0 #कपूर एंड संस #उड़ता पंजाब #दंगल #पिंक        





AIRLIFT is a nice, well-intended break from loud and fake jingoism in Hindi cinema. The patriotism portrayed here is never too pushy, preached or purposefully painted. No matter how millionth of times you have seen a tricolour being hoisted up from soil to sky, you’re tend to feel the ‘get-up-and-go’ force within you but Raja Menon gives it all a reason, more unadulterated and uncontaminated. 


The merit also lies in casting Akshay Kumar who deliberately decides to underplay his unapologetically self-interested image for a while and gives us a character that’s more human than just feeding off someone’s unchallenged starry ego. He’s not new to the flavor though. BABY and SPECIAL 26 have done quite well for him in the past. AIRLIFT is a greater addition to the list.




‘डियर ज़िन्दगी’ अपने छोटे-छोटे, हलके-फुल्के पलों में बड़े-बड़े फलसफों वाली बातें कहने का जोखिम बखूबी और बेख़ौफ़ उठाती है. डॉक्टर खान जब भी रिश्तों को लेकर ज़िन्दगी का एक नया पहलू काईरा को समझा रहे होते हैं, उनकी इस भूमिका में शाहरुख़ जैसे बड़े कलाकार का होना अपनी अहमियत साफ़ जता जाता है. ये चेहरा जाना-पहचाना है. बीसियों साल से परदे पर प्यार, दोस्ती और ज़िन्दगी की बातें करता आ रहा है, पर इस बार उसकी बातों की दलील पहले से कहीं ज्यादा गहरी है, मजबूत है, कारगर है. 

आलिया जिस तरह भरभरा कर टूटती हैं परदे पर, हिंदी सिनेमा में अपने साथ के तमाम कलाकारों को धकियाते हुए एकदम आगे निकल जाती हैं. फिल्म की खासियतों में से एक ये भी है कि शाहरुख़ जैसा दमदार स्टार होते हुए भी कैमरा और कहानी दोनों आलिया के किरदार से कभी दूर हटते दिखाई नहीं देते.





सपनों के कोई दायरे नहीं हुआ करते. छोटी आँखों में भी बड़े सपने पलते देखे हैं हमने. फेसबुक की दीवारों और अखबारों की परतों के बीच आपको दिल छू लेने वाली ऐसी कई कहानियाँ मिल जायेंगी, जिनमें सपनों की उड़ान ने उम्मीदों का आसमान छोटा कर दिया हो. हालिया मिसालों में वाराणसी के आईएएस (IAS) ऑफिसर गोविन्द जायसवाल का हवाला दिया सकता है, जिनके पिता कभी रिक्शा चलाते थे. 

अश्विनी अय्यर तिवारी की मार्मिक, मजेदार और प्रशंसनीय फिल्म ‘निल बट्टे सन्नाटा’ भी ऐसी ही एक मर्मस्पर्शी कहानी के जरिये आपको जिंदगी के उस हिस्से में ले जाती है, जहां गरीबी सपनों की अमीरी पर हावी होने की कोशिश तो भरपूर करती है पर अंत में जीत हौसलों से लथपथ सपने की ही होती है. 






Real-life heroes are way better than the ones we see, create or admire on big screen. They might not look perfectly decked-up all the time, make a grand entry and an even greater exit from the frame in the most overrated slow-motion shots. They might not be so exceptionally skilled to kill every bad man in their way; on the other hand, they might get killed at the end. 

And trust me if they do so, it’s never pre-designed to sympathetically benefit their own image amongst their fans. Real-life heroes also necessarily don’t have to be always a ‘Hero’ to inspire; they can also come in as a bold, fearless, strong-headed and proud 23-year old girl from the next door! Ram Madhvani’s inspirational biopic NEERJA successfully brings us closer to one such hero, most of us wouldn’t have known of if the efforts were not made.



दो-चार-दस गिनती की फिल्में को छोड़ दें तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने समलैंगिकों और समलैंगिकता को जिस बेरुखी, जिस छिछले तरीके से परदे पर अपने मतलब (...और भौंडे मनोरंजन) के लिए इस्तेमाल किया है, उसे साफ़ और पाक करने के लिए कोई एक फिल्म काफी साबित नहीं हो सकती, ये एक शर्मनाक सच है...पर इसी के साथ एक सच और भी है, कोशिशों ने हौसलों का दामन अभी छोड़ा नहीं है. 

हंसल मेहता की बेहद सुलझी हुई, संजीदगी और सादगी से भरी हुई ईमानदार फिल्म ‘अलीगढ़’ ऐसी ही एक बेहतरीन कोशिश है, जो समलैंगिकता को सनसनीखेज बनाकर परोसने की बेहयाई नहीं करती बल्कि उसे ‘निजता के अधिकार’ के साथ मिलाकर एक ऐसा मुहीम छेड़ देती है जिससे बचना-मुंह मोड़ना और अनदेखा कर देना किसी भी संवेदनशील आदमी के लिए आसान नहीं रह जाता!







अपनी नई फिल्म ‘रमन राघव 2.0’ को अनुराग उनकी सबसे ख़तरनाक लव-स्टोरी का दर्जा देते हैं.अनुराग कश्यप और लव-स्टोरी?? इसका सटीक जवाब तो आपको फिल्म के आख़िरी पलों में ही मिलता है, पर अच्छी बात ये है कि ‘बॉम्बे वेलवेट’ की नाकामयाबी ने उन्हें वापस उनके अपने जाने-पहचाने दायरे में ला खड़ा किया है. हालांकि भारतीय सिनेमा में ये दायरा भी उन्हीं की बदौलत इस मुकाम तक पहुंचा है. यहाँ उनका कोई दूसरा सानी नहीं. इस बार भी उनसे कहीं कोई चूक नहीं होती. 

‘रमन राघव 2.0’ अब तक की उनकी सबसे ‘डार्क’ फिल्म बिना किसी झिझक कही जा सकती है. रक्त का रस और गाढ़ा हो चला है. खौफ़ का चेहरा पल-पल मुखौटे बदल रहा है. अँधेरे का साम्राज्य और गहराने लगा है.





It seems Bollywood has learnt its way to deal Indian families in films the way it should be. Chaotic, dramatic, relatable and real! With Shakun Batra’s KAPOOR & SONS (SINCE 1921), even Dharma Productions have come a long way. Forget Karan Johar’s all elite, genteel and heavenly prosperous families melting & merging patently into the equally overwhelming interiors inspired by latest interior design magazines! The characters here, in Shakun’s world, don’t really chew their words before spitting them out. On the contrary, they are loose out in the open to grind each other’s peace unabashedly. 

Backed up by good writing and even better direction skills, KAPOOR & SONS (SINCE 1921) marks the arrival of a totally fascinating and utterly dysfunctional ‘on-screen’ family you would love to see more of it. 



गुलज़ार साब की ‘माचिस’ जैसी कुछेक को अलग रख कर देखें तो पंजाब को हिंदी फिल्मों ने हमेशा मीठी चाशनी में ही लपेट कर परोसा है. दिन में बैसाखी के मेले और रात में लोहड़ी का जश्न, इससे आगे बढ़ने की हिम्मत पंजाबी सिनेमा ने तो कभी-कभी दिखाई भी है पर बॉलीवुड कमोबेश बचता ही रहा है. अब तक. ‘उड़ता पंजाब’ के आने तक. 

पंजाब की जो सपनीली तस्वीर आपने ‘यशराज फिल्म्स’ के चश्मे से देखी थी, अभिषेक चौबे की ‘उड़ता पंजाब’ पहले फ्रेम से ही उस तस्वीर पे चिपके ‘एनआरआई कम्पेटिबल’ चमक को खरोंचने में लग जाती है. सीने पर आतंकवाद का बोझ और पीठ पर ’84 के ज़ख्म उठाये पंजाब को अब हेरोइन, स्मैक और कोकीन की परतों ने ढक लिया है. खुरदुरी, किरकिराती, पपड़ी जमी परतों ने! 







अपने अधूरे सपनों का बोझ अपने बच्चों के नरम-नाज़ुक कन्धों पे डाल देना; हमारे माँ-बाप के लिए कोई नया नहीं है, और ज्यादातर मामलों और मायनों में वाज़िब भी नहीं. सख्ती कब ज्यादती बन जाती है, कोई नहीं बता सकता. धागे भर का ही फर्क है दोनों में. लकीर के इस पार का पिता अक्सर उस पार खड़ा ‘हानिकारक खलनायक’ दिखने लगता है, पर तभी तक, जब तक बच्चों को अपने पिता के सपनों में अपना भविष्य देख पाने की नज़र और समझ पैदा नहीं हो जाती. 

नितेश तिवारी की ‘दंगल’ बड़ी समझदारी से इस टकराव का सामना करती है और इस पेशोपेश से जुड़े हर ज़ज्बात को परदे पर पूरी ईमानदारी से पेश करती है. एक ऐसी फिल्म जो खुद को ही सवालों के घेरे में खड़ा करने से न डरती है, न ही पीछे हटती है. इससे पहले कि आप के ज़ेहन में कुलबुलाहट हो, कोई न कोई किरदार आपके सवालों को अपने अल्फाज़ दे देता है.




हमारे यहाँ लड़कियों को ‘करैक्टर-सर्टिफिकेट’ देने में कोई पीछे नहीं रहना चाहता. सब अपनी-अपनी सोच के साथ राय बना लेने में माहिर हैं, और वक़्त पड़ने पर अपने फायदे के लिए उनका इस्तेमाल करने से भी चूकते नहीं. मर्दों की यौन-कुंठा इस कदर प्रबल हो चली है कि उन्हें लड़कियों/औरतों के छोटे-छोटे हाव-भाव भी ‘सेक्सुअल हिंट’ की तरह नज़र आने लगते हैं. ब्रा-स्ट्रैप दिख जाना, बात करते-करते हाथ लगा देना, कमर का टैटू और पेट पे ‘पिएर्सिंग’; कुछ भी और सब कुछ बस एक ‘हिंट’ है. ‘ना’ का यहाँ कोई मतलब नहीं है. 

‘पिंक’ बड़ी बेबाकी से और पूरी ईमानदारी से महिलाओं के प्रति मर्दों के इस घिनौने रवैये को कटघरे में खड़ी करती है. हालांकि फिल्म की कहानी दिल्ली और दिल्ली के आस-पास ही डरी-सहमी घूमती रहती है, पर ये सिर्फ देश के उसी एक ख़ास हिस्से की कहानी भी नहीं है. इस फिल्म की खासियत ही शायद यही है कि इसकी हद और ज़द में सब बेरोक-टोक चले आते हैं.






किरदार मिलते हैं...(Canvas doesn’t matter, Strokes do)

छोटी-छोटी फिल्मों में बड़ी भूमिकाएं हों या बड़ी-बड़ी फिल्मों में छोटा सा रोल; कुछ ख़ास लोग अपने अभिनय की धार कभी कुंद नहीं पड़ने देते. ‘सहायक अभिनेता’ के ठप्पे के नीचे अक्सर फिल्म के सबसे दमदार अभिनेता दबे पड़े मिलते हैं. फिल्म जब ठंडी पड़ने लगती, इनका दिख भर जाना अलाव सी गर्माहट दे जाता है. अपने किरदार के चटख रंगों से बेरंग फिल्मों को परदे पर एक बार फिर जिंदा करने का हुनर बखूबी आता है इन्हें. हर फिल्म आपके साथ थिएटर से घर तक चली आये, मुमकिन नहीं, पर इन किरदारों को झटक के हटा पाना अपने ज़ेहन से इतना आसान भी नहीं.

साल 2016 में इन 15 अभिनेताओं ने अपनी कमाल की अदाकारी से न सिर्फ अपने लिए तालियाँ बटोरी हैं, बल्कि आपको पूरी तरह अचंभित भी किया है. ‘लाल रंग’ में औरतों की तरह बोलने वाले औघड़ की भूमिका में कुमार सौरभ हों, या ‘नीरजा’ में पागलपन की हद पार कर जाने वाले आतंकवादी बने जिम सरभ! कौन भूल सकता है ‘सुल्तान’ में सलमान खान के उस दोस्त (अनंत विधात शर्मा) को, जिसे अच्छी एक्टिंग के उम्मीद में हम फिल्म के बीचोंबीच ढूँढने लगते थे, या फिर ‘फोबिया’ की उस बातूनी टॉमबॉय (यशस्विनी दायमा) को!! हरेक को, और सभी को बड़ा वाला ‘थैंक यू’...!     

# रिया शुक्ला, निल बट्टे सन्नाटा में
# सिद्धांत बहल, जुगनी में
# प्रतीक बब्बर, अमरीका में
# सुरवीन चावला, पार्च्ड में
# प्रियांशु पेंयुली, रॉक ऑन 2 में
# पूरब कोहली, एयरलिफ्ट में
# कुमार सौरभ, लाल रंग में
# कीर्ति कुल्हारी, पिंक में
# सिकंदर खेर, तेरे बिन लादेन-डेड ऑर अलाइव में
# अनंत विधात शर्मा, सुल्तान में
# साक्षी तंवर, दंगल में
# मानव विज, उड़ता पंजाब में
# अमृता सुभाष, रमन राघव 2.0 में
# जिम सरभ, नीरजा में
# यशस्विनी दायमा, फोबिया में    


Tuesday, 27 December 2016

देखन में छोटन लगें...! (Small in Size, Big on Content)

साल 2016 जाने को है. वक़्त है, एक बार फिर मुड़ कर देखने का. हर शुक्रवार भाग-भाग कर फिल्में देखना और उनके बारे में लिखने का सारा जोश-ओ-खरोश एक बार फिर समेट कर कागज़ पर उड़ेलना है. साल की बेहतरीन फिल्मों को एक और बार इज्ज़त बक्शने की बारी आ गयी है...पहल करता हूँ उन 10 फिल्मों से, जो देखने में ज़रूर छोटी लगी होंगीं, कभी नए कलाकारों की वजह से तो कभी ख़बरों और अख़बारों में कम सुर्खियाँ बटोर पाने की वजह से, पर इन सभी ने अपनी-अपनी अलग-अलग खूबियों से सिनेमाहाल तक जाने का मेरा फैसला ग़लत साबित नहीं होने दिया. बहुत बहुत शुक्रिया...


#ज़ुबान #जुगनी #साला खड़ूस #अमरीका #बुधिया सिंह- बोर्न टू रन #लाल रंग #वेटिंग #धनक #पार्च्ड #चौरंगा





पहली बार निर्देशन की बागडोर सँभालते मोज़ेज सिंह की ‘ज़ुबान’ एक ऐसे नौजवान की कहानी है, जो अपने सपनों के लिए किसी भी हद तक जा सकता है पर, एक दिन जब उसके चाहतों की दुनिया उसके क़दमों में बिछी दिखाई देती है, उसे एहसास होता है इस पूरे सफ़र में उसने अपनी पहचान ही खो दी है, अपनी जुबान ही खो दी है.

‘ज़ुबान’ में सब कुछ अच्छा है, ऐसा नहीं है. कहानी की पकड़ अक्सर आप पर बनती-छूटती रहती है. फिल्म की रफ़्तार भी कुछ इस तरह की है कि आप इसे एक ‘स्लो’ फिल्म कहने से गुरेज नहीं करते, पर इन सबके बावजूद ‘ज़ुबान’ एक आम फिल्म नहीं है, एक आसान फिल्म नहीं है. 








A simple, unpretentious and wide-eyed country boy is trying to be apologetic to the girl he’s been with all night under the same sheet. Local liquor brand can be held responsible but the girl is taken aback, “Sorry? What for?” “For everything”, the boy is in deep guilt. “Not for everything. Say sorry only for why you left me alone there.” The girl is definitely more independent, free and open, and emotionally less complicated. So is Shefali Bhushan’s JUGNI. It likes to have its own sense of rhythm with melodies that induce extreme likeness and energy in you to match up with the beats life throws at you.






SAALA KHADOOS charms you with the uninhibited, wild and fresh performance by Ritika Singh, a professional boxer before making her first attempt at acting. Her free-spirited, loud-mouthed and all moody role-play is efficiently delightful. 


Madhavan gives SAALA KHADOOS everything it demands from him. He looks every bit of a full-grown ex-boxer with all the attitude, arrogance and aggression in him, hitting the right cord. One of his highly approving works!









प्रशांत नायर की ‘अमरीका’ उत्तर भारतीय गाँवों की आकांक्षाओं, आशाओं और अपेक्षाओं पर भावनात्मक चोट है. कहानी वर्तमान की नहीं है पर वर्तमान से परे भी नहीं है. बड़ा बेटा [प्रतीक बब्बर] अमेरिका चला गया है. माँ को लगता है सारा सुख, सारा भविष्य अमेरिका में ही है. चिट्ठियों से ही पूरे गाँव को बेटे और अमेरिका के बारे में नई-नई बातों का पता चलता है. घटनाएं तब एक तगड़ा मोड़ लेती हैं जब पिता की मृत्यु के बाद छोटे बेटे [‘लाइफ ऑफ़ पाई’ के सूरज शर्मा] को छुपी हुई सच्चाइयों का पता चलता है. साथ ही कुछ सवाल, जिनके जवाब सिर्फ अमेरिका जा कर पता चल सकते हैं. 

‘अमरीका’ एक बहुत ही करीने से बनाई गयी फिल्म है, जहां कुछ भी, और मैं बहुत सोच समझ के कह रहा हूँ, कुछ भी बेतरतीब या बेढंगा नहीं है.





इस फिल्म में ‘आगे क्या होगा’ वाला रोमांच कम है, मैच के आख़िरी पलों में गोल दाग कर या छक्का मार कर टीम जिताने वाला हीरो भी कोई नहीं है, और ना ही फिल्म की सफलता के लिए ‘देशभक्ति’ का बनावटी छौंका लगाकर आपके अन्दर के ‘भारतीय’ को जबरदस्ती का झकझोरने की कोशिश. 

‘बुधिया सिंह- बॉर्न टू रन’ फार्मूले से अलग एक ऐसी ‘स्पोर्ट्स’ फिल्म है, जो सिर्फ सतही तौर पर खेल से जुड़े रोमांच को भुनाने की कोशिश नहीं करती, बल्कि उसके पीछे की मेहनत-मशक्कत, लगन और मुश्किलातों को सच्चे मायनों में आपके सामने उसकी असली ही शकल-ओ-सूरत में पेश करती है.









LAAL RANG is a good thriller that may not pump your heartbeat up in the usual way most of bollywood thrillers do. It also might not give you much of a pulsating action to cheer, and it definitely would not pitch obligatory twists & turns in the plot but even then, the firm writing has enough to make it an enjoyably unlike experience. 

Syed Ahmad Afzal makes sure it takes its own course of time to grow on the viewers. He never looks in hurry when establishing scenes or while making the shift from one to another.



अनु मेनन की ‘वेटिंग’ ज़िन्दगी और मौत के बीच के खालीपन से जूझते दो ऐसे अनजान लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है जिनमें कहने-सुनने-देखने में कुछ भी एक जैसा नहीं है, पर एक पीड़ा, एक व्यथा, एक दुविधा है जो दोनों को एक दूसरे से बांधे रखती है. 

प्रोफ़ेसर शिव धीर-गंभीर और शांत हैं, जबकि तारा अपनी झुंझलाहट-अपना गुस्सा दिखाने में कोई शर्म-लिहाज़ नहीं रखती. तारा को मलाल है कि ट्विटर पर उसके पांच हज़ार फ़ॉलोवर्स में से आज उसके पास-उसके साथ कोई भी नहीं, जबकि प्रोफ़ेसर को अंदाज़ा ही नहीं ट्विटर क्या बला है? इसके बावज़ूद, अपने अपनों को खो देने का डर कहिये या फिर वापस पा लेने की उम्मीद, दोनों एक-दूसरे से न सिर्फ जुड़े रहते हैं, अपना असर भी एक-दूसरे पर छोड़ने लगे हैं.







एक सच की दुनिया है जो हमारे आस-पास चारों तरफ पसरी है, और एक दुनिया है जैसी हम अपने लिये तलाशते हैं, जिसके होने में हम यकीन करना चाहते हैं. अपने देश के साथ भी ऐसा ही कुछ कनेक्शन है हमारा. एक, जैसी हम देखना चाहते हैं, मानना चाहते हैं और दूसरा जो वाकई में है. 

नागेश कुकूनूर की ‘धनक’ हमारी परिकल्पना और सच्चाई की इन्हीं दो दुनियाओं के बीचोंबीच कहीं बसी है. अगर आप अच्छे हैं, दिल के सच्चे हैं तो आपके साथ बुरा कैसे हो सकता है? परीकथाओं में अक्सर इस तरह के मनोबल बढ़ाने और नेकी की राह पर चलते रहने के लिए हिम्मत बंधाने वाली उक्तियाँ आपने भी पढ़ी या सुनी होंगी. ‘धनक’ किसी एक प्यारी और मजेदार परी-कथा जैसी ही है, जिसमें बहुत सारे अच्छे लोग हैं और जो बुरे भी हैं वो सदियों पुराने, जाने-पहचाने जैसे हमेशा कोसते रहने वाली ‘डायन’ चाची और बच्चे उठाने वाला दुष्ट गिरोह.





हाव-भाव और ताव में लीना यादव की ‘पार्च्ड’ पिछले साल रिलीज़ हुई पैन नलिन की ‘एंग्री इंडियन गॉडेसेज’ से बहुत कुछ मिलती-जुलती है, और अपने रंग-रूप में केतन मेहता की ‘मिर्च मसाला’ जैसी तमाम भारतीय सिनेमा के मील के पत्थरों से भी. जाहिर है, इस तरह का ‘पहले बहुत कुछ देख लेने’ की ऐंठ आप में भी उठेगी, पर जिस तरह की बेबाकी, दिलेरी और दबंगई ‘पार्च्ड’ दिखाने की हिमाकत करती है, वो कुछ अलग ही है. 

यहाँ ‘आय ऍम व्हाट आय ऍम’ का जुमला बेडरूम के झगड़ों और कॉफ़ी-टेबल पर होने वाली अनबन में सिर्फ जीत भर जाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता. ‘पार्च्ड’ अपने किरदारों को उनके तय मुकाम तक छोड़ आने तक की पूरी लड़ाई का हिस्सा बन कर एक ऐसा सफ़रनामा पेश करती है, जो हमारी ‘घर-ऑफिस, ऑफिस-घर’ की रट्टामार जिन्दगी से अलग तो है, पर बहुत दूर और अनछुई नहीं.






जातिगत विसंगतियों के दुष्प्रभाव, छूत-अछूत के लाग-लपेट और धर्म के नाम पर विकलांग मानसिकता का परिचय देते भारतीय समाज को हमने पहले भी श्याम बेनेगल और गोविन्द निहलाणी के सिनेमा में तार-तार होते देखा है. ‘चौरंगा’ भी काफी हद तक इसी दायरे में फैलती-सिमटती दिखाई देती है, इसीलिए एक मूल प्रश्न बार-बार दिमाग में कौंधता रहता है. ‘क्या कुछ भी नहीं बदला है?’ 

उत्तर फिल्म ख़तम होने के तुरंत बाद कुछ सरकारी तथ्यों के परदे पर उभरने के साथ ही मिलने शुरू हो जाते हैं. सच में, कुछ भी नहीं बदला है. और अगर नहीं बदला है तो सिर्फ सिनेमा में बदलाव दिखा देने भर से क्या सचमुच बदलाव आ जायेगा? ‘चौरंगा’ की पृष्ठभूमि, ‘चौरंगा’ के कथानक और ‘चौरंगा’ के पात्रों से पुराने होने की गंध भले ही आती हो, पर ‘चौरंगा’ के प्रासंगिकता की चमक पर कहीं कोई धूल जमी दिखाई नहीं देती. ‘चौरंगा’ एक सार्थक कोशिश है भारतीय समाज के उस एक वर्ग को टटोलने में, जिसे हम शहरी चकाचौंध के लिए कहीं अँधेरे में छोड़ आये हैं.  


Friday, 23 December 2016

दंगल: साल की सबसे ‘धाकड़’ फिल्म! [5/5]

अपने अधूरे सपनों का बोझ अपने बच्चों के नरम-नाज़ुक कन्धों पे डाल देना; हमारे माँ-बाप के लिए कोई नया नहीं है, और ज्यादातर मामलों और मायनों में वाज़िब भी नहीं. सख्ती कब ज्यादती बन जाती है, कोई नहीं बता सकता. धागे भर का ही फर्क है दोनों में. लकीर के इस पार का पिता अक्सर उस पार खड़ा ‘हानिकारक खलनायक’ दिखने लगता है, पर तभी तक, जब तक बच्चों को अपने पिता के सपनों में अपना भविष्य देख पाने की नज़र और समझ पैदा नहीं हो जाती. नितेश तिवारी की ‘दंगल’ बड़ी समझदारी से इस टकराव का सामना करती है और इस पेशोपेश से जुड़े हर ज़ज्बात को परदे पर पूरी ईमानदारी से पेश करती है. एक ऐसी फिल्म जो खुद को ही सवालों के घेरे में खड़ा करने से न डरती है, न ही पीछे हटती है. इससे पहले कि आप के ज़ेहन में कुलबुलाहट हो, कोई न कोई किरदार आपके सवालों को अपने अल्फाज़ दे देता है.

महावीर सिंह फोगाट (आमिर खान) किसी अलग सांचे में ढला पिता नहीं है. ऐसे पिता, जिनके मुंह से ‘शाब्बास’ सुनने के लिए बच्चों के कान तरस जाएँ, हमारे आस-पास बहुतेरे हैं. ऐसे पिता, जिनके भारी-भरकम सपनों को पीठ पर लादे बच्चे अंधाधुंध भाग रहे हों, हम सबने देखे हैं. कभी अपने पिता में, तो कभी बगल वाले शर्मा जी में. महावीर सिंह फोगाट को अगर कुछ अलग करता है, तो वो है उसकी जिद, उसका जूनून और परिस्थितियों से सीखने, सीख कर समझने और समझ कर संभलने का लचीलापन, जो उसके हठी किरदार में एक रोचक और रोमांचक विरोधाभास पैदा करता है. कुश्ती में मेडल लाने का सपना सिर्फ एक बेटा ही पूरा कर सकता है, फोगाट इस चाह में चार बेटियों का पिता बन चुका है. ऐसे में, एक दिन जब उसे एहसास होता है कि मेडल बेटियाँ भी ला सकती हैं, तो अपनी बच्चियों गीता (ज़ायरा वसीम) और बबिता (सुहानी भटनागर) को अखाड़े तक लाने में कोई ढील नहीं बरतता.       

फिल्म के दूसरे हिस्से में ‘दंगल’ कई परतों में खुलती है. गीता (फ़ातिमा सना शेख) को राष्ट्रीय खेल अकादमी में एक उजड्ड कोच (गिरीश कुलकर्णी) के भरोसे छोड़कर लौटते बाप की उलझन हो, शाहरुख़ की फिल्म और गोलगप्पों के बीच कुश्ती के नए तौर-तरीकों से पनपा गीता का नया आत्म-विश्वास हो या बबिता (सान्या मल्होत्रा) के साथ उसके वैचारिक मतभेद; बाप-बेटियों के इस ज़ज्बाती गुत्थम-गुत्थी से अलग हटकर देखें, तो कुश्ती को एक खेल के रूप में परदे पर प्रस्तुत करने वाली बेशक ‘दंगल’ सबसे भरोसेमंद फिल्म है. कुश्ती के गूढ़ दांव-पेंच यहाँ जिस रोमांचक तरीके से दिखाए और समझाए जाते हैं, उनका मकसद किरदारों या उन्हें निभाने वाले कलाकारों को परदे पर बढ़ा-चढ़ा कर ‘नायक’ की तरह पेश करना कतई नहीं रहता, बल्कि उन खालिस पलों में सिर्फ कुश्ती ही निखर कर सामने आती है. फिल्म का टाइटल सीक्वेंस भी इसी सोच की बुनियाद पुख्ता करता है, जहां असली दुनिया के असली पहलवान कैमरे के सामने खड़े आपकी आँखों में एकटक झांकते दिखाई देते हैं.

‘दंगल’ एक कलाकार के तौर पर आमिर खान की सबसे अच्छी फिल्म है. अपने स्टारडम को हाशिये पर रखकर किरदार तक ही सीमित रहने का हुनर उनसे अच्छा शायद ही किसी और ‘स्टार’ को आता हो. बात सिर्फ वजन घटा-बढ़ा कर प्रयोग करने की नहीं है, फिल्म के तमाम जरूरी हिस्सों और दृश्यों में केंद्र-बिंदु बने रहने का लोभ-संवरण कर पाना, हर किसी के बस की बात नहीं. अपनी पहली ही फिल्म में गीता और बबिता के किरदारों में ज़ायरा, सुहानी, फ़ातिमा और सान्या चारों ही आपको लुभाने, हंसाने, रुलाने और इमोशनली जोड़े रखने में कामयाब रहती हैं. फिल्म में अगर किसी का होना बहुत चौंकाता है, तो वो हैं साक्षी तंवर. साक्षी भले ही फिल्म में कैमरे का पसंदीदा चेहरा न रही हों, (आप उन्हें अक्सर बैकग्राउंड में ही देखते हैं) पर फिल्म की रंगीनियत में उनसे ज्यादा घुला-मिला, रचा-बसा शायद ही कोई और दिखता है. अपारशक्ति खुराना प्रभावित करते हैं, इस हद तक कि जैसे इसी रोल के लिए बने हों.

आखिर में, ‘दंगल’ कमियों से परे न होते हुए भी (फिल्म का सोचा-समझा अंत थोड़ा असहज करता है) एक ऐसी मुकम्मल फिल्म है, जो मनोरंजन का दामन छोड़े बगैर अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों की बागडोर पूरी मुस्तैदी से अपने हाथ रखती है. सच्चे किरदारों की सच्ची कहानियाँ परदे पर कहनी हों, तो ‘दंगल’ बॉलीवुड के लिए बाइबिल से कम नहीं. साल की सबसे ‘धाकड़’ फिल्म! देखने जाईये, अभी जाईये, पूरे खानदान के साथ जाईये! [5/5]                  

Friday, 9 December 2016

बेफिक्रे: आदित्य चोपड़ा की ‘हमशकल्स’! [1/5]

21 साल, 1 महीना और 20 दिन लग गये आदित्य चोपड़ा साब को, दर्शकों और मुझ जैसे पागल प्रशंसकों के दिल-ओ-दिमाग में ये शक़ पैदा करने में कि ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ उन्होंने बनाई थी या उनसे बस बन गयी थी. एक ‘खराब, बेहद खराब’ फिल्म से किसी को सूली पे चढ़ा देना ग़लत है, पर कसौटी पर कसे जाने की बारी आती है तो रहम की उम्मीद कम से कम इसलिये तो मत ही कीजिये क्यूँकि इंडस्ट्री में आपकी साख काफ़ी मज़बूत है. ‘बेफिक्रे’ हालाँकि एक रोमांटिक-कॉमेडी होने के दावे तो बड़े ज़ोर-शोर से करती है, मगर इसमें रोमांस और कॉमेडी का तड़का बस नाम भर का ही है. असलियत में ‘बेफिक्रे’ अपने-आप में ही हैरान-परेशान एक ऐसी फिल्म है, जो जाना कहीं और चाहती है, पर पहुँचती कहीं और.

फिल्म पेरिस में रची-बसी है, पर फ्रांस के नाम पर ‘फ्रेंच किस’ और वहाँ के लोगों में ‘सेक्स’ के प्रति खुलापन का भरपूर शोषण करती है, और कई मायनों में उसका माखौल भी उड़ाती है. माँ-बाप इंडियन हैं, पर शाईरा (वाणी कपूर) फ्रेंच. कैलेंडर के पन्नों की तरह बॉयफ्रेंड बदलती है. धरम (रनवीर सिंह) दिल्ली से आया है, पेरिस के एक क्लब में स्टैंड-अप कॉमेडियन बनने. मुलाक़ात के चंद ‘रातों’ बाद ही, दोनों तय कर लेते हैं कि कभी एक-दूसरे को ‘आय लव यू’ नहीं बोलेंगे. और फिर वही हिंदी सिनेमा की उठा-पटक, जो अंत तक पहुँचते-पहुँचते दोनों को ‘आय लव यू’ बोलना सिखा ही देती है. इस पूरे वक़्त में वो सब बातें होती हैं, जो परदे पर आप पहले भी हज़ारों बार देख और झेल चुके हैं. लिव-इन के बाद ब्रेक-अप, ब्रेक-अप के बाद पैच-अप इस शर्त के साथ कि अब हम सिर्फ दोस्त रहेंगे, फिर एक नए किरदार का आना, माँ के पराठों के साथ ‘असली प्यार’ की घुट्टी और अंत में, साजिद खान की फिल्मों की तरह चर्च में शादी के मौके पर सारे किरदारों का पागलों की तरह एक-दूसरे पर टूट पड़ना.

‘बेफिक्रे’ का हर एक पल फिल्ममेकर के तौर पर आदित्य चोपड़ा के दिमागी दिवालियेपन से आपको रूबरू कराता है. कुछ नया पेश करने की भागादौड़ी में कभी तो चोपड़ा साब अपनी खुद की ही मास्टरपीस ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ के दृश्यों के साथ छेड़छाड़ करते दिखाई देते हैं, तो कभी फिल्म के तयशुदा मुकाम तक पहुँचने के लिए अपने समकालीन फिल्मकारों के हथकंडे अपनाने से भी परहेज नहीं करते. एक वक़्त था, जब परदे पे कलाकार ‘किस’ करने के लिये एक दूसरे की ओर बढ़ते थे तो फूलों वाली ‘स्लाइड’ आगे आ जाती थी, ‘बेफिक्रे’ में बेवजह के गाने उस ‘स्लाइड’ की जगह ले लेते हैं.

फिल्म में रनवीर एक स्टैंड-अप कॉमेडियन बने हैं, मगर जिस तरह का थकाऊ ‘कॉमिक सेट’ वो परदे पर पेश कर रहे होते हैं, मुझे ताज्जुब होता है कि क्या फिल्म से जुड़े किसी भी भलेमानस ने यूट्यूब पर ही सही, डैनियल फर्नांडिस, सौरभ पन्त, केनी सेबेस्टियन जैसों को कभी देखा या सुना नहीं होगा? अपने भटके हुए किरदारों के साथ, फिल्म कई बार ‘घर के ना घाट के’ जैसे मुहावरों की भेंट चढ़ जाती है. शाईरा नए ज़माने की लड़की है. 40 से ज्यादा बॉयफ्रेंड्स बना चुकी है. ‘लिव-इन’ में जाने से पहले अपने माँ-बाप को ‘बताती’ है, पूछती नहीं, पर जब सच्चे प्यार की बात हो तो माँ के पराठों की ओर भागती है. धरम खुद तो अपनी रातें रंगीन करने में कोई झिझक नहीं दिखाता, पर जब सामने बैठी लड़की कहती है, “मैं अपने बॉयफ्रेंड को जलाने के लिए तुम्हारे रात बिताना चाहती हूँ’, तो उसकी आँखें चौड़ी होने लगती हैं. पेरिस में जा के ‘समलैंगिकता’ का मज़ाक उड़ाने वाले नौजवान आजकल के कैसे हो सकते हैं, खास कर वो जो ‘सेक्स’ को ही अपनी आज़ादी का पैमाना बना चुके हों?

‘बेफिक्रे’ में ऐसे मौके बार-बार आते हैं, जब मेरा परदे से मुंह मोड़ लेने को जी करने लगता है. मैं सर झुका कर अँधेरे में इधर-उधर देखने लगता हूँ, पर ऐसा उन बेधड़क ‘किस सीन्स’ के वजह से नहीं होता, बल्कि परदे पर वाहियात के दृश्यों, नीरस डायलॉग्स और ‘नेचुरल एक्टिंग’ के नाम पर चल रही बेवकूफियों से ऊब कर होता है. कभी-कभी रनवीर के पीले दांतों से भी. अच्छे डांस मूव्स और खूबसूरत सिनेमेटोग्राफी के अलावा, अनय का किरदार निभा रहे अभिनेता का काम ही थोड़ा बहुत सुकून भरा है. वरना तो, ‘बेफिक्रे’ आदित्य चोपड़ा की ‘हमशकल्स’ या ‘वेलकम’ कहे जाने लायक ही है. मुझे डर है, कहीं मेरी इस बात से साजिद खान या अनीस बज्मी बुरा न मान जाएं! [1/5]

Friday, 2 December 2016

कहानी 2- दुर्गा रानी सिंह : तैयार रहिये, ‘नहीं’ चौंकने के लिए! [2/5]

‘बिद्या’ लौट आई है. ‘बागची’ नहीं, इस बार ‘सिन्हा’ बन कर. बाकी का सारा सेट-अप तकरीबन वैसा ही है. हाँ, दर्शक के तौर पर आप और हम कुछ ज्यादा ही सजग और सचेत हो गए हैं. ‘कहानी’ में मिस बागची की छलावे वाली कहानी से पहले ही ठगे जा चुके हैं, तो इस बार खुद को तैयार रखे बैठे हैं कि कुछ न कुछ तो होगा ही. परदे पर जो कुछ बड़ी आसानी से शरबत कहकर पिलाया जा रहा है, ज़रूर उसमें कोई कड़वी दवाई मिलाई गयी होगी. चौकाने से पहले चौकन्ना कर देना; सुजॉय घोष की ‘कहानी 2: दुर्गा रानी सिंह’ कम से कम इस मामले में तो पूरे नंबर हासिल कर ही लेती है. पर कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती, लेखक-निर्देशक घोष बाबू के लिए चुनौती अब और कड़ी हो चली है. ठगे जाने के लिए जो पहले से ही तैयार बैठे हैं, उन्हें एक जबरदस्त झटका देने का दो ही तरीका हो सकता था, पहले वाले से अबकी बार कुछ बहुत बड़ा किया जाये या फिर कुछ भी न किया जाये! अफ़सोस, सुजॉय घोष सबसे आसान तरीके के साथ समझौता करना मंज़ूर कर लेते हैं. हालांकि, इसे समझते-समझते आपका काफी वक़्त गुज़र जाता है.  

रात का सन्नाटा खाली सड़कों से होता हुआ सोती संकरी गलियों तक फैला है. रेडियो पर गाना चल रहा है. पीले बल्बों की रौशनी पुराने मकानों को और पुराना बना रही है, और रहस्यमयी भी. ये कोलकाता नहीं है, पर ये भी बंगाल ही है. बिद्या सिन्हा (विद्या बालन) अपनी 14 साल की बेटी मिनी (तुनिषा शर्मा) को इलाज़ के लिए अमेरिका ले जाना चाहती है. मिनी व्हीलचेयर पर है और चल नहीं सकती. रोजाना की ही तरह, एक शाम जब बिद्या ऑफिस से घर लौटती है, मिनी को किसी ने अगवा कर लिया है. मिनी को बचाने के लिए बिद्या को कोलकाता जाना होगा, पर उससे पहले ही उसका एक्सीडेंट हो जाता है और अब वो कोमा में है. तफ्सीस में इंस्पेक्टर इन्द्रजीत सिंह (अर्जुन रामपाल) के हाथ एक डायरी लगती है. फिल्म अब फ्लैशबैक में है और डायरी के जरिये आपको कहानी सुना रही हैं, दुर्गा रानी सिंह (विद्या बालन), जो खुद हत्या और किडनैपिंग की आरोपी है.  

‘कहानी’ और ‘कहानी 2’ के बीच इसी साल सुजॉय घोष की ‘तीन’ भी आ चुकी है. हास्यास्पद है कि अपने क्राइम-थ्रिलर होने की फितरत और कोलकाता में बसे होने आदत दोनों की वजह से, कोरियाई फिल्म का रीमेक होने के बावजूद, ‘तीन’ पूरी तरह ‘कहानी’ श्रृंखला की ही फिल्म लगी थी. जबकि ‘कहानी 2’ अपने डार्क सब्जेक्ट (बाल यौन शोषण) और कहानी में कुछेक बहुत ठेठ घुमावदार मोड़ों की वजह से एक कोरियाई फिल्म ज्यादा लगती है. फिल्म का पहला हिस्सा जिस तरह परत-दर-परत आपको दुर्गा रानी सिंह की पिछली ज़िन्दगी और 6 साल की मिनी के यौन-शोषण से जुड़े राज़ का खुलासा करती है, वो न ही बहुत गूढ़ रहस्य लगते हैं और न ही किसी दूसरे बड़े राज़ के छुपे होने का अंदेशा कराते हैं. हाँ, फिल्म में जिस संजीदगी और सफाई से बाल यौन शोषण की बात की गयी है, वो बेहद जरूरी और काबिल-ऐ-तारीफ़ है. 6 साल की मिनी को उसके ‘चाचू’ (जुगल हंसराज) ही इधर-उधर छूते हैं, पर किसी बड़े से वो ये बात करने में कैसे सहज हो? वो भी जब दुर्गा उसके स्कूल में काम करने वाली एक औरत हो, कोई अपनी सगी नहीं.

सुजॉय घोष पूरी कोशिश करते हैं कि ‘कहानी 2’ आपको ‘कहानी’ जैसी ही लगे, इसीलिए यहाँ भी एक नौजवान पुलिसवाला है, बॉब बिस्वास की तर्ज़ पर एक मजेदार सुपारी-किलर (इस बार एक लड़की) है, विद्या बालन हैं, और कहने को ही सही, पर एक ऐसा क्लाइमेक्स है जो फिल्म के बारे में आपकी अब तक की समझ को झुठला दे. हालाँकि, ये अंत वो आसान अंत है, जो आप चाहते तो काफी पहले से देख पाते, पर आप इतना आसान कुछ देखना ही नहीं चाहते थे. ‘कहानी’ का अंत आप चाह कर भी नहीं देख पाते. विद्या अपने ‘डी-ग्लैम’ अवतार को बखूबी अपने अभिनय का सबसे मज़बूत पक्ष बना लेती हैं. अरुण (तोता रॉय चौधरी) के साथ उनके दृश्य उनके अभिनय की एकरसता को तोड़ने में कामयाब दिखते हैं. अर्जुन रामपाल से कोई ख़ास शिकायत नहीं होती, हालांकि ‘कहानी’ के परम्ब्रता चटर्जी जैसे चेहरे अर्जुन की जगह ज्यादा सटीक कास्टिंग होते. जुगल हंसराज ने काफी दिनों बाद निराश किया.

आखिर में; ‘कहानी 2’ एक अच्छी फिल्म हो सकती थी, और कई मायनों में है भी...जहां तक इसके विषय-वस्तु (चाइल्ड एब्यूज) की संजीदगी और अहमियत का सवाल है, पर इसे ‘कहानी’ जैसा जामा पहना कर क्राइम-सस्पेंस थ्रिलर के तौर पर पेश करने की कोशिश और कवायद एक अलग तरह की उम्मीद जगा देते हैं, जिसे छू पाना इस फिल्म के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है. देखिये, पर तैयार रहिये...‘नहीं’ चौंकने के लिए! [2/5]