Friday, 13 May 2016

अज़हर: वन्स अपॉन अ टाइम इन क्रिकेट [1/5]

शुरुआत में ही, अपने तीन पैराग्राफ लम्बे बयान [Disclaimer] के साथ ‘अज़हर’ विवादों से बचने और कुछ बहुत जरूरी सवालों से मीलों दूर रहने की समझदार कोशिश में दर्शकों पर इतनी शर्तें लाद देती है कि कहना मुश्किल हो जाता है, आप एक जीते-जागते शख्सियत पर बनी एक ईमानदार फिल्म देखने जा रहे हैं या फिर एक पूरी तरह मनगढ़ंत कहानी. फिल्म की विश्वसनीयता, नीयत और सूरत का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि अगर इसका नाम ‘अज़हर’ न होकर ‘जन्नत 3’ या ‘वन्स अपॉन अ टाइम इन क्रिकेट’ भी होता, तो भी फिल्म की सीरत में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखता. आखिर में रहती तो ये इमरान हाशमी की ही फिल्म. आगे बढ़ने से पहले एक Disclaimer मैं भी पढ़ देना चाहता हूं, “आगे की पंक्तियों में ‘अज़हर’ शब्द का इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ फिल्म के शीर्षक और फिल्म के मुख्य किरदार के लिए किया जा रहा है. इसका किसी भी मशहूर क्रिकेटर या पूर्व सांसद से कोई लेना देना नहीं है.” लीजिये, अब मैं भी फिल्म की राह पर पूरी तरह स्वच्छंद और स्वतंत्र हूँ, कुछ भी उल-जलूल लिखने-कहने के लिए!

99वें टेस्ट मैच में शानदार प्रदर्शन के बाद, अज़हर [इमरान हाशमी] अब अपने नानूजान [कुलभूषण खरबंदा] के सपने से सिर्फ एक मैच और दूर है, जब उसे मैच-फिक्सिंग के इल्ज़ाम में क्रिकेट खेलने से बैन कर दिया जाता है. इस फिल्म वाले अज़हर को भारतीय क्रिकेट टीम के सबसे कामयाब कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन के रूप में देखने की गलती करने की आपको पूरी छूट है, हालाँकि मुझे ये दोनों [परदे का अज़हर और असलियत के अज़हरुद्दीन] वो दो जुड़वाँ भाई लगते हैं जिनका आपस में कुछ भी मिलता नहीं. न शकल, न हाव-भाव! 

हाँ, फिल्म की कुछ घटनाएं और किरदार जरूर आपको इस भूल-भुलैय्ये में उलझाये रखते हैं कि आप एक सच्ची कहानी देख रहे हैं. मसलन, अज़हर के साथ ड्रेसिंग रूम शेयर करते मनोज प्रभाकर [करणवीर शर्मा], नवजोत सिंह सिद्धू [मंजोत सिंह], रवि शास्त्री [गौतम गुलाटी], कपिल देव [वरुण वडोला] और अज़हर की जिंदगी में खासा दखल रखने वाली 90 के दशक की खूबसूरत बॉलीवुड एक्ट्रेस संगीता बिजलानी [नरगिस फाखरी]. इन सबमें अगर कोई अपने किरदार के बहुत करीब तक पहुँच पाने में कामयाब हुआ है तो वो हैं सिर्फ नरगिस. उनका और संगीता बिजलानी दोनों का ही एक्टिंग से कभी कोई सरोकार रहा नहीं.  

हालाँकि ‘अज़हर’ सनसनीखेज बने रहने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देती, पर दिक्कत वहां मुंह बाये खड़ी हो जाती है जब फिल्म ईमानदारी से कहानी कहने की बजाय अज़हर को ‘हीरो’, ‘बेक़सूर’ और ‘बेचारा’ बनाने और बताने की जी-तोड़ कोशिश आप पर थोपने लगती है. रोमांच और रोमांस का तड़का जिस सस्ते, हलके और ठन्डे तरीके से फिल्म में परोसा जाता है, आप मोहम्मद अज़हरुद्दीन [फिल्म वाला नहीं, असली वाला] से सिर्फ हमदर्दी ही जता पाते हैं. ‘देश’, ‘मुल्क’ और ‘कौम’ जैसे भारी-भरकम शब्दों के बार-बार खोखले इस्तेमाल से अगर आप बच भी जाएँ, तो ‘सच ये, सच वो’ का जुमला आपका दम घोंटने के लिए काफी है. रजत अरोरा के दोयम दर्जे के संवाद सिर्फ शब्दों की हेरा-फेरी तक ही अपना जादू चला पाते हैं. उनके मायने ढूँढने की गलती कीजियेगा भी मत.

‘अज़हर’ एक निहायत ही डरपोक किस्म की नाकाबिल फिल्म है जो सिर्फ उन बातों को चुनती है, जिनके कहने-सुनने में किसी तरह का कोई अन्तर्विरोध पैदा न हो. एक बहुत ही हलकी फिल्म जो अपने ‘हीरो’ के साथ कहीं से भी कोई न्याय नहीं करती! फिल्म में बुकी से पैसे लेकर भी अच्छा खेल जाने पर अज़हर की सफाई सुनिए, “मैंने पैसे रख लिए ताकि तुम किसी और खिलाड़ी तक पहुँच न सको...तुम्हारे पैसे वापस भिजवा रहा हूँ’. अब अपनी कहानी में तो सब खुद ही हीरो होते हैं, इसमें नया क्या है? बस्स, इस कहानी में दम नहीं! [1/5]                

Friday, 6 May 2016

ट्रैफिक: बैठे रहिये, बाजपेयी हैं ना! [3/5]

दिवंगत राजेश पिल्लै की मलयालम सुपरहिट थ्रिलर ‘ट्रैफिक’ का हिंदी रीमेक आपको थिएटर की कुर्सी से बांधे रखने के लिए गिने-चुने विकल्प ही सामने रखता है, जिनमें से एक तो है फिल्म की हद इमोशनल स्टोरीलाइन, और मनोज बाजपेयी का बेहद सटीक, संजीदा और समर्पित अभिनय. तकनीकी दृष्टि से फिल्म के कमज़ोर पल हों या कथानक को रोमांचक बनाये रखने के लिए नाटकीयता भरे उतार-चढ़ाव, मनोज बड़ी मुस्तैदी, ख़ामोशी और शिद्दत से ड्राइविंग सीट पर बैठे-बैठे पूरी फिल्म को अकेले खींच ले जाते हैं. हालाँकि अच्छे और नामचीन अभिनेताओं की एक पूरी जमात आपको इस फिल्म का हिस्सा बनते दिखाई देती है, पर एक मनोज ही हैं जिनसे, जिनके अभिनय से और जिनकी कोशिशों से आप लगातार जुड़े रहते हैं...हमेशा!

सच्ची घटनाओं को आधार बना कर, ‘ट्रैफिक’ मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत एक ऐसी दिलचस्प और रोमांचक कहानी आप तक पहुंचाती है, जहां जिंदगी तमाम मुश्किलों और मायूसियों के बावज़ूद आखिर में जीत ही जाती है. कभी न हार मानने वाले इसी इंसानी जज़्बे को सलाम करती है ‘ट्रैफिक’! फिल्मस्टार देव कपूर (प्रोसेनजीत चटर्जी] की बेटी को पुणे में जल्द से जल्द हार्ट ट्रांसप्लांट की दरकार है. पता चला है कि मुंबई के एक अस्पताल में एक ऐसा ‘पॉसिबल डोनर’ है जिसके जिंदा रहने की उम्मीद अब लगभग दम तोड़ चुकी है. माँ-बाप (किटू गिडवानी और सचिन खेड़ेकर) अपने बेटे को ‘दी बेस्ट गुडबाई गिफ्ट’ देने का मन बना चुके हैं पर मुंबई से पुणे तक १६० किलोमीटर की दूरी को ढाई घंटे में पूरा करने का बीड़ा कौन उठाये? ट्रैफिक हवलदार रामदास गोडबोले (मनोज बाजपेयी) के लिए ये सिर्फ ड्यूटी बजाने का मौका नहीं है. मिशन पर जाने से पहले वो अपनी बीवी से कहता है, “पता नहीं कर पायेगा या नहीं, पर घूसखोर का लांछन लेके नहीं जीना”.

फिल्म पहले हिस्से में कई बार अपनी ढीली पकड़ और सुस्त निर्देशन से आपको निराश करती है, खास कर जब किरदार एक-एक कर आपके सामने बड़ी जल्दी-जल्दी में परोस दिए जाते हैं. फिल्म को तेज़ रफ़्तार देने के लिए, घटनाओं को घड़ी की टिक-टिक के बीच बाँट कर दिखाने का चलन भी बहुत घिसा पिटा लगता है. हालाँकि इंटरवल आपको हल्का सा असहज महसूस कराने में कामयाब होता है. दूसरे हिस्से में फिल्म जैसे एकाएक सोते हुए जग जाती है और बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ने लगती है, पर फिर ड्रामा के नाम पर जिस तरह के उतार-चढ़ाव शामिल होने लगते हैं, उनमें गढ़े होने की बू दूर से ही नज़र आने लगती है. ऐसा लगता है मानो जिंदगी की ये दौड़ अब कोई सस्ती सी विडियो गेम बन कर रह गई है, जहाँ मुश्किलें जानबूझ के हर मोड़ पे और बड़ी होती जा रही हैं. मलयालम फिल्मों में वैसे भी ये कोई नया चलन नहीं.

पियूष मिश्रा जैसे वजनी नामों के बाद भी ‘ट्रैफिक’ के संवाद उतने ही फीके और उबाऊ हैं, जितने उसके नामचीन कलाकारों के बंधे-बंधे बासी अभिनय. प्रोसेनजीत दा का किरदार जाने-अनजाने अनिल कपूर के इतना इर्द-गिर्द बुना गया है कि उससे बाहर उन्हें देख पाना मुश्किल हो जाता है. दिव्या दत्ता, किटू गिडवानी, जिम्मी शेरगिल, सचिन खेड़ेकर, परमब्रता चटर्जी  सभी को हम पहले भी इस खूंटे से बंधे देख चुके हैं. सब अपने घेरे अच्छी तरह पहचानते हैं और उसे तोड़ने की पहल से बचते नज़र आते हैं.

इतने सब के बाद भी, ‘ट्रैफिक’ अपने जिंदा जज़्बे, सच्ची कहानी के तमगे, कुछेक गिनती के ही सही सचमुच के रोमांचक पलों और मनोज बाजपेयी के मजबूत कन्धों के सहारे एक अच्छी फिल्म कहलाने की खुशकिस्मती हासिल कर लेती है. मनोज मिसाल हैं, संवाद अभिनय का एक अभिन्न अंग है, मात्र एक अभिन्न अंग...पूरे का पूरा अभिनय नहीं. देखिये, अगर उनके जरिये अभिनय के बाकी रंग भी देखने हों! देखिये, अगर एक थ्रिलर देखनी हो जिसमें दिल हो, एकदम जिंदा ‘धक-धक’ धड़कता हुआ! [3/5] 

Friday, 29 April 2016

सैराट (मराठी): ऊंच-नीच के बीच! [4.5/5]

‘सैराट’ देखते वक़्त एक गलती हम सभी कर बैठते हैं. राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता लेखक-निर्देशक नागराज पोपटराव मंजुले को एक ऐसे सामान्य फिल्म-निर्देशक की तरह देखने की गलती, जो सामाजिक मसलों पर चोट करती अपनी पहली जोरदार फिल्म (फैंड्री) के बाद अब एक आम सी रोमांटिक फिल्म को बड़े कैनवास पर पटक कर ‘क्लासेस टू मासेस’ का सफ़र पूरा करना चाहता है. हमारा गलती करना वाज़िब भी है, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में ऐसी मिसालें बहुतायत में मौजूद हैं. पर ‘सैराट’ और ‘सैराट’ के साथ मंजुले जिस तरह आपको चौंकाते हैं, आप दहल जाते हैं. आपके अन्दर एक ऐसा भूचाल आ जाता है, जिसकी थिरकन फिल्म देखने के बहुत बाद तक वैसी ही तरोताज़ा रहती है.

परश्या [आकाश ठोसर] का दिल आर्ची [रिंकू राजगुरु] पर लट्टू है. खो-खो खेलते हुए आर्ची से जो एक बार आँखें चिपकीं तो पता चला दिल का मौसम उधर भी खुशगवार ही है. कुछ छंटे-छंटाये पर ईमानदार दोस्तों के बीच तय रहा, परश्या लव लैटर लिखेगा. आर्ची भी कोई ऐसी-वैसी लड़की नहीं, बुलेट भी चला लेती है और ट्रैक्टर भी. फिर जो एक बार मुहब्बत परवान चढ़ने लगा तो किसे होश रहता, आर्ची ऊँची जाति की है और परश्या नीची जाति का. हालाँकि मंजुले बार-बार अपने किरदारों और प्रतीकों से आपको चेताते रहते हैं पर जब परदे पर इश्क़ नदी किनारे की ठंडी हवा सा बह रहा हो, शाम को ढलते सूरज के साथ सिंदूरी हो रहा हो, किसी कमअक्ल को ही जाति-पांति के टंटों में दिलचस्पी जागेगी.

बहरहाल, बहुत सारी उठा-पटक, जोर-आजमाईश और घर से भागने के बाद परश्या और आर्ची अब हैदराबाद की एक गरीब बस्ती में अपना आशियाना बसाने की कोशिश कर रहे हैं. ‘तुम काम पर जाना, मैं खाना बनाकर तुम्हारा इंतज़ार करूंगी’ वाली चमकीली बातें सच हो रही हैं, पर उनकी चमक अब धुंधली पड़ चुकी है. मंजुले अब अपना रंग बदल रहे हैं. एक गाढ़ापन गहराने लगा है. बहुत कुछ वैसा ही हो रहा है जैसा आपने ‘साथिया’ या ‘क़यामत से क़यामत तक’ में देखा-महसूस किया हो, पर फिर से आपको चौंकन्ना कर दूं, आप नागराज पोपटराव मंजुले को कम आंकने की गलती कर रहे हैं. मंजुले अब वो कहने वाले हैं, जिसके लिए पिछले ढाई घंटे से वो सिर्फ आपको तैयार कर रहे थे. और उसे कहने के लिए उन्हें अजय-अतुल के शानदार म्यूजिक का भी सहारा लेने की जरूरत नहीं.

‘सैराट’ जहां एक तरफ नौजवान दिलों की धड़कन का मधुर संगीत है, इश्किया सपनों का खुला आसमान है, वहीँ सामाजिक कुरीतियों और जातिगत संघर्ष का घिनौना मैदान भी है. मंजुले की खासियत ये है कि वे उन्ही जगहों से आते हैं, जहां की वो बात करते हैं. ऐसे में, फिल्म के किरदारों और उनके बीच बनते-पनपते पलों से जुड़ाव महसूस करना आपके लिए कतई आसान हो जाता है. तमाम प्रमुख कलाकारों के साथ आकाश ठोसर और रिंकू राजगुरु भी पहली बार कैमरे के सामने आने का हौसला दिखाते हैं. मंजुले भी उनकी अभिनय-कला को पूरी तरह खोल कर परोस देने की कोई जल्दी नहीं दिखाते और पूरा वक़्त देते हैं.   

अंत में, ‘सैराट’ एक लम्बी फिल्म जरूर है (170 मिनट की) पर इस का असर आपके दिल-ओ-दिमाग पर काफी देर तक रहने वाला है. बचपन की दोस्ती, दोस्तों का प्यार और पहले-पहले इश्क का बुखार स्लो-मोशन शॉट्स में बहुत मजेदार लगने वाला है, पर सिनेमा सिर्फ इतना ही तो नहीं. मंजुले का सिनेमा सिर्फ इतना ही नहीं. जब तक तोड़ेंगे नहीं, तब तक छोड़ेंगे नहीं. साल की सबसे ‘चौंका देने वाली’ फिल्म! [4.5/5]       

BAAGHI: Rebel with a Cause to Irritate! [1.5/5]

Change is constant but not for Indian Railways. In 1955, Sunil Dutt starrer RAILWAY PLATEFORM became an eyewitness to passengers of every kind being stranded at a deserted railway station for 24 hours when their train gets delayed due to some natural calamity. Decades later, it strikes again. This time, in Sabbir Khan’s BAAGHI! The train stops at a local station and declines to move ahead before the girl meets the boy, both show off their moves in a rain-dance, the villain gets introduced and even the lovebirds gets separated then and there to wrap up the chapter. All I can say is that things if not moving really hurt; be it the Indian railways or an emotionless story. BAAGHI is a romantic action-entertainer that irritates you more with regular romance, repetitive action and regrettable comedy track.

A vague mash-up of Telugu movie VARSHAM and the Indonesian path-breaking action thriller THE RAID: REDEMPTION; BAAGHI solely rests upon the all muscular, flexible and flashy shoulders of Tiger Shroff. Though limited in his talents on/for screen, Tiger is the only best thing happened to the film, apart from some of the magical visuals from southern India captured by ace-cinematographer Binod Pradhan.

BAAGHI has its own share of futility in romance and action both. Ronny [Tiger Shroff] falls in love with Siya [Shraddha Kapoor] instantly after watching her in a one-sided conversation with clouds. She loves rain, you know. And apparently whenever they meet, it starts raining. Who would not fall for such a phenomenal guy at such times when people in nation are dying while waiting for the rain? God must be really romantic, and carelessly crazy. Meanwhile, the villain also seems to have an eye for the girl loving rain. Raghav [Sudheer Babu] does everything in the villain’s textbook to get the girl, from killing his own father to kidnapping the girl and making various attempts to eliminate the boy.

Sabbir Khan makes an interesting and quite effective addition to the film in form of Kalaripayattu- a traditional martial art from Kerala. Till the time the film revolves around the institution Ronny has been placed in to learn the art, it never actually sees a dull moment but soon, Sabbir runs out of ideas and starts focusing on the tiring traditional concept of romance with all the dialoguebaazi and action. You can imagine the maker’s vision behind making this film when the opening credit roll reads ‘Chartered Accountant’ & ‘Financial Advisor’ slides way before the creative minds could get a mention.

Tiger gives it all when it comes to using his muscular strength, balance and will-power much-needed for some brilliantly choreographed action sequences but his trouble in moving facial muscles takes out all the empathy the boy earns for himself. Shraddha Kapoor too gets a few ass-kicking action-scenes on her part to impress. Sudheer Babu despite his effortless martial art moves, looks more like a slightly better version of Sachiin Joshi [Who?? Exactly]. Sunil Grover and Sanjai Mishra are a complete waste of talents. Sunil though gives you some quick chills as a scheming father to Shraddha’s character. Kalaripayattu Guru Grandmaster Shifu Shaurya Bhardwaj makes a fiery appearance on screen.

To sum up, BAAGHI comes out as a stale reproduction of 80’s/90’s idea of romance. A leech and lewd father ready to exploit his own daughter for financial profits, a powerful villain who stops at nothing and an obviously emotional hero who manages to rise up from the dust and hits back when the villain pushes him hard emotionally by disclosing the last hidden secret, “I killed him, you fool”! Good luck to you, if it suits your idea of entertainment! [1.5/5]

Friday, 22 April 2016

LAAL RANG: Randeep Owns it, Nails it, Kills it! [3/5]

The boy is on his first date. He is leaving after dropping the girl at her hostel. He recalls something, returns to her and hands over a greeting card written ‘I Love You’ in blood all over it. The girl loses her calm, “Where have you cut yourself?” The boy throws a swayed smile, “Don’t worry, I haven’t.”Syed Ahmad Afzal’s crime-thriller LAAL RANG in the very same way has blood all over it in almost every frame; either they talk about it or they play with it but still, it never gets bloody except for one particular slackly done scene. In fact, LAAL RANG turns out to be a serenely invested, edgily engaging thriller with a good set of dark humor and at least one towering performance under the name, Randeep Hooda.

Syed Ahmad Afzal throws us in Haryana of a fascinating era where Yamaha RX100 used to be the class not many can afford. There rises Shankar (Randeep Hooda), an over-aged diploma student in local medical college of Karnal! He’s the kind every girl disgusts and every boy admires. The son of a government peon, Rajesh (Akshay Oberoi) too has no immunity to fall for swaggy Shankar’s persuasive power-display.  Shankar is a pro in the illegal blood-selling racket. His supplies come from the Bihar migrants in Karnal working as the rickshaw-pullers. A small token of money and they will lie down for you to suck the blood out. Considering Shankar’s influential connections in the system, it is nothing but an easy money territory Rajesh starts building his own mansion of dreams upon it, with Poonam (Piaa Bajpai). Things derail when one of the donors dies after excessive blood loss.

LAAL RANG has an interesting plot most of today’s Hindi films lack at the first place to start with. Syed Ahmad Afzal makes sure it takes its own course of time to grow on the viewers. He never looks in hurry when establishing scenes or while making the shift from one to another. Not many filmmakers believe in doing so when Syed actually does it, you feel more relaxed but evenly more anxious about the part of plot yet to be revealed. Another big merit film possesses is its lingo. Be it the conversational dialogues between its real-looking characters or the lyrics of the album used all of it as background songs; LAAL RANG entices you with its unapologetically raw, rusty, ruthless yet delicious Haryanvi language.

Film also carries a brigade of fascinating characters on screen. There is a fakir interestingly talking in a women’s voice. A subordinate of Shankar is fondly named as ‘Dracula’ as he deals in maximum transfer of blood. In the chart of performances, LAAL RANG solely belongs to the devoted portrayal of Shankar by Randeep Hooda. Being a Haryanvi himself, he fabulously adopts the lingo and the attitude in its right place. See him flaunting his powers in sunny days or trashing it all when his girlfriend breaks up with him; and you’ll see the range he is capable of pulling it off as a confident actor. This could be a plate of starters before you’ll enjoy and respect him more in SARBJIT in coming few weeks. Akshay Oberoi acts well but his all chalky appearance often creates a sense of disbelief in his performance.

Overall, LAAL RANG is a good thriller that may not pump your heartbeat up in the usual way most of bollywood thrillers do. It also might not give you much of a pulsating action to cheer, and it definitely would not pitch obligatory twists & turns in the plot but even then, the firm writing has enough to make it an enjoyably unlike experience. [3/5]

निल बट्टे सन्नाटा: जिंदगी-कहानी-सिनेमा! [4/5]

सपनों के कोई दायरे नहीं हुआ करते. छोटी आँखों में भी बड़े सपने पलते देखे हैं हमने. फेसबुक की दीवारों और अखबारों की परतों के बीच आपको दिल छू लेने वाली ऐसी कई कहानियाँ मिल जायेंगी, जिनमें सपनों की उड़ान ने उम्मीदों का आसमान छोटा कर दिया हो. हालिया मिसालों में वाराणसी के आईएएस (IAS) ऑफिसर गोविन्द जायसवाल का हवाला दिया सकता है, जिनके पिता कभी रिक्शा चलाते थे. अश्विनी अय्यर तिवारी की मार्मिक, मजेदार और प्रशंसनीय फिल्म ‘निल बट्टे सन्नाटा’ भी ऐसी ही एक मर्मस्पर्शी कहानी के जरिये आपको जिंदगी के उस हिस्से में ले जाती है, जहां गरीबी सपनों की अमीरी पर हावी होने की कोशिश तो भरपूर करती है पर अंत में जीत हौसलों से लथपथ सपने की ही होती है.

घरों, जूते की फैक्ट्री और मसाले की दुकानों पर काम करने वाली चंदा (स्वरा भास्कर) एक रात जब थक कर सोने से पहले अपनी 15 साल की बेटी अप्पू (रिया शुक्ला) से पूछती है कि वो बड़ी होकर क्या बनेगी? अप्पू खरी-खरी कह देती है, “मैं बाई बनूंगी. बाई की बेटी बाई ही तो बनेगी.” चंदा बहस में जीत नहीं सकती. 10वीं के बाद अप्पू को पढ़ाने के लिए पैसे कहाँ हैं चंदा के पास? वैसे भी, अप्पू मैथ्स में ‘निल बट्टा सन्नाटा’ है, मतलब ज़ीरो. पैसे तो बाद की बात हैं, पर इस मैथ्स का क्या करें? चंदा तो खुद मैट्रिक फ़ेल है. डॉ. दीवान (रत्ना पाठक शाह) के पास एक उपाय है. चंदा भी अप्पू का स्कूल ज्वाइन कर ले, खुद भी पढ़े और अप्पू की भी मदद करे. बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए माँ-बाप क्या कुछ नहीं करते, पर हम बच्चे कितना समझ पाते हैं? अप्पू के पास तो कोई सपना ही नहीं है, और चंदा के पास अप्पू से बड़ा कोई सपना नहीं!

अश्विनी अय्यर तिवारी अपनी पहली ही फिल्म में साफ़ कर देती हैं कि सिनेमा कहानी कहने का एक सशक्त माध्यम है, कहानी जिसका कहा जाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उसका सही ढंग से कहा जाना. आगरा की तंगहाल बस्तियां हों या सरकारी स्कूलों का वही जाना-पहचाना बेढंगापन; तिवारी बड़ी खूबी से फिल्म को सच्चाई के बिलकुल करीब तक रखने में कामयाब रही हैं. उनके किरदार भी अपनी जड़ों से एक बार भी उखड़ते दिखाई नहीं देते. चंदा गुस्से में होती है तो अपनी बेटी को भी गाली देने से झिझकती नहीं.

अभिनय की दृष्टि से ‘निल बट्टे सन्नाटा’ एक जोरदार और जबरदस्त फिल्म है. स्वरा भास्कर एक पल को भी चन्दा से अलग नहीं दिखतीं. बेटी की हताशा में बेबस, गरीबी से जूझती, सपनों को जिंदा रखने में दौड़ती-भागती एक अकेली माँ का सारा खालीपन उनकी आँखों में हमेशा तैरता रहता है, ऐसा शायद ही कभी होता है कि वो पूरी तरह टूट जाएँ स्क्रीन पर, फिर भी आपकी आँखों को भिगोने में वो हर बार कामयाब होती हैं. अपनी पहली फिल्म में ही रिया एक मंजी हुई कलाकार की तरह आपको चौंका देती हैं, और इन दोनों के बीच फिल्म के सबसे मजेदार दृश्यों में नज़र आते हैं पंकज त्रिपाठी! अक्खड़, अकड़ू और निहायत ही अनुशासित मैथ्स टीचर की भूमिका में त्रिपाठी आपको अपने किसी न किसी पुराने टीचर की याद दिला ही देंगे.

अंत में; ‘निल बट्टे सन्नाटा’ सिनेमा के उस क्लासिक नियम की जोर-शोर से पैरवी करती है, जहां फिल्म के बड़ी होने से कहीं ज्यादा ‘कहानी’ का बड़ा होना मायने रखता है. फ़िल्म के एक दृश्य में चंदा कहती भी है, “कृष 3 नहीं है, जिंदगी है जिंदगी”. और जिंदगी से ज्यादा दिलचस्प, जिंदगी से ज्यादा जज्बाती, जिंदगी से ज्यादा सच्ची कहानी और क्या होगी! [4/5] 

Friday, 15 April 2016

फ़ैन: अभिनय हावी, फिल्म हवा!! [3/5]

कुछ भी तो नया नहीं है. बस शाहरुख़ खान साब वापस लौट आये हैं. ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ और ‘हैप्पी न्यू ईयर’ वाले उबाऊ शाहरुख़ नहीं, ‘बाज़ीगर’ और ‘डर’ वाले प्रयोगधर्मी शाहरुख़! एक लंबे अरसे से जहां उनकी सारी मेहनत-मशक्कत अपने स्टारडम की चकाचौंध से अपनी और कुछ अपने ही लोगों की औसत दर्जे की फिल्मों को बॉक्स-ऑफिस पर सफल साबित करने में जाया जा रही थी, इस बार काफी हद तक अपने दोनों किरदारों को परदे पर जिंदा रखने और जिंदा दिखाने की कोशिशों में ज्यादा कामयाब होती नज़र आती है. मनीष शर्मा की ‘फ़ैन’ शाहरुख़ के उस बेजोड़ ललक, लगन और अभिनय के प्रति लगाव को हवा देती है, बॉलीवुड की बादशाहत हासिल करने में जिसने एक बड़ी भूमिका निभाई है. शाहरुख़ बेझिझक इस मौके का पूरा फायदा उठाते हैं. पर अफ़सोस, एक फिल्म के तौर पर ‘फ़ैन’ अपनी छाप छोड़ने में उतनी शिद्दत नहीं दिखा पाती.

दिल्ली की तंग गलियों में एक छोटे से मोहल्ले का हीरो है, गौरव! फिल्मस्टार आर्यन खन्ना का हमशकल और फ़ैन. लोग उसे ‘जूनियर आर्यन खन्ना’ बुलाते हैं और वो आर्यन खन्ना को ‘सीनियर’! मासूमियत का आलम ये है कि उसे लगता है मुंबई पहुँचने पर आर्यन उसे पलकों पर बिठा लेगा, पर अपना फिल्मस्टार तो उसे अपनी जिंदगी के 5 मिनट देने से भी मुंह मोड़ लेता है. एक-दो बेवजह के रोमांचक एक्शन दृश्यों को छोड़ दें तो यहाँ तक की फिल्म आपको पूरी तरह अपने गिरफ्त में जकड़े रखती है, पर इसके तुरंत बाद जब वाहियात और उल-जलूल की नाटकीयता का दौर शुरू होता है तो आपके पास भी एक वक़्त बाद फिल्म के ख़तम होने का इंतज़ार करने के अलावा बहुत कुछ करने को नहीं रह जाता.

‘फ़ैन’ को आप बड़ी आसानी से ‘प्री-इंटरवल’ और ‘पोस्ट-इंटरवल’ में बांट कर देख सकते हैं. दोनों एक-दूसरे से उतने ही अलग-थलग दिखाई देते हैं जितना आर्यन और उसका डुप्लीकेट गौरव. फिल्म के पहले हिस्से में हबीब फैसल साब की राइटिंग आपको दिल्ली के मिडिल-क्लास तबके के आस-पास ही भटकने की इजाज़त देती है. और इसीलिए इस हिस्से से आपका जुड़ाव जबरदस्ती का नहीं लगता. गौरव साइबर कैफे चलाता है, ठीक उसी तरह के सेटअप में जैसे ‘दम लगाके हईशा’ में आयुष्मान कैसेट की दूकान. हैरत तब होती है जब फिल्मस्टार को उसकी जगह दिखाने और उसके अहम को सबक सिखाने की पूरी भाग-दौड़ में दिल्ली का मिडिल-क्लास नौजवान विदेशों में एक मंजे हुए कॉन-आर्टिस्ट की तरह अपनी सनक भरी हरकतें अंजाम देने लगता है. आपका लगाव अब जमीनी किरदारों से हटकर भारी-भरकम एक्शन दृश्यों की सफाई पर टिक गया है. जबरदस्त शुरुआत के बाद, ‘फ़ैन’ अब अंततः एक औसत फिल्म बने रहने की ओर तेज़ी से लुढ़कने लगी है.

फिल्म के कमज़ोर पक्षों में शामिल हैं, फिल्म की लम्बाई, बेवजह का ड्रामा, ठूंसा हुआ एक्शन और लचर स्क्रीनप्ले, खास तौर पर इंटरवल के बाद! इसके बावजूद, ‘फ़ैन’ देखने का अगर आप कोई भी बहाना ढूंढ रहे हों तो वो शाहरुख़ का अभिनय ही हो सकता है. हालाँकि हॉलीवुड एक्सपर्ट्स का मेक-अप दोनों किरदारों को बखूबी एक-दूसरे से अलग नज़र आने में मदद करता है, पर शाहरुख़ जिस संजीदगी से दोनों किरदारों को परदे पर जीते हैं, आप हैरान हुए बिना नहीं रह पाते. सुपरस्टार आर्यन का जिद्दी अक्खडपन, गौरव का डराने वाला पागलपन और इनके बीच लगातार रंग बदलते शाहरुख़, इसी की कमी तो अब तक खल रही थी, शाहरुख़ के चाहने वालों को भी और उनके आलोचकों को भी! [3/5]