Tuesday, 27 December 2016

देखन में छोटन लगें...! (Small in Size, Big on Content)

साल 2016 जाने को है. वक़्त है, एक बार फिर मुड़ कर देखने का. हर शुक्रवार भाग-भाग कर फिल्में देखना और उनके बारे में लिखने का सारा जोश-ओ-खरोश एक बार फिर समेट कर कागज़ पर उड़ेलना है. साल की बेहतरीन फिल्मों को एक और बार इज्ज़त बक्शने की बारी आ गयी है...पहल करता हूँ उन 10 फिल्मों से, जो देखने में ज़रूर छोटी लगी होंगीं, कभी नए कलाकारों की वजह से तो कभी ख़बरों और अख़बारों में कम सुर्खियाँ बटोर पाने की वजह से, पर इन सभी ने अपनी-अपनी अलग-अलग खूबियों से सिनेमाहाल तक जाने का मेरा फैसला ग़लत साबित नहीं होने दिया. बहुत बहुत शुक्रिया...


#ज़ुबान #जुगनी #साला खड़ूस #अमरीका #बुधिया सिंह- बोर्न टू रन #लाल रंग #वेटिंग #धनक #पार्च्ड #चौरंगा





पहली बार निर्देशन की बागडोर सँभालते मोज़ेज सिंह की ‘ज़ुबान’ एक ऐसे नौजवान की कहानी है, जो अपने सपनों के लिए किसी भी हद तक जा सकता है पर, एक दिन जब उसके चाहतों की दुनिया उसके क़दमों में बिछी दिखाई देती है, उसे एहसास होता है इस पूरे सफ़र में उसने अपनी पहचान ही खो दी है, अपनी जुबान ही खो दी है.

ज़ुबान’ में सब कुछ अच्छा हैऐसा नहीं है. कहानी की पकड़ अक्सर आप पर बनती-छूटती रहती है. फिल्म की रफ़्तार भी कुछ इस तरह की है कि आप इसे एक ‘स्लो’ फिल्म कहने से गुरेज नहीं करतेपर इन सबके बावजूद ‘ज़ुबान’ एक आम फिल्म नहीं हैएक आसान फिल्म नहीं है. 








A simple, unpretentious and wide-eyed country boy is trying to be apologetic to the girl he’s been with all night under the same sheet. Local liquor brand can be held responsible but the girl is taken aback, “Sorry? What for?” “For everything”, the boy is in deep guilt. “Not for everything. Say sorry only for why you left me alone there.” The girl is definitely more independent, free and open, and emotionally less complicated. So is Shefali Bhushan’s JUGNI. It likes to have its own sense of rhythm with melodies that induce extreme likeness and energy in you to match up with the beats life throws at you.






SAALA KHADOOS charms you with the uninhibited, wild and fresh performance by Ritika Singh, a professional boxer before making her first attempt at acting. Her free-spirited, loud-mouthed and all moody role-play is efficiently delightful. 


Madhavan gives SAALA KHADOOS everything it demands from him. He looks every bit of a full-grown ex-boxer with all the attitude, arrogance and aggression in him, hitting the right cord. One of his highly approving works!









प्रशांत नायर की ‘अमरीका’ उत्तर भारतीय गाँवों की आकांक्षाओंआशाओं और अपेक्षाओं पर भावनात्मक चोट है. कहानी वर्तमान की नहीं है पर वर्तमान से परे भी नहीं है. बड़ा बेटा [प्रतीक बब्बर] अमेरिका चला गया है. माँ को लगता है सारा सुखसारा भविष्य अमेरिका में ही है. चिट्ठियों से ही पूरे गाँव को बेटे और अमेरिका के बारे में नई-नई बातों का पता चलता है. घटनाएं तब एक तगड़ा मोड़ लेती हैं जब पिता की मृत्यु के बाद छोटे बेटे [‘लाइफ ऑफ़ पाई’ के सूरज शर्मा] को छुपी हुई सच्चाइयों का पता चलता है. साथ ही कुछ सवालजिनके जवाब सिर्फ अमेरिका जा कर पता चल सकते हैं. 

‘अमरीका’ एक बहुत ही करीने से बनाई गयी फिल्म हैजहां कुछ भीऔर मैं बहुत सोच समझ के कह रहा हूँकुछ भी बेतरतीब या बेढंगा नहीं है.





इस फिल्म में ‘आगे क्या होगा’ वाला रोमांच कम है, मैच के आख़िरी पलों में गोल दाग कर या छक्का मार कर टीम जिताने वाला हीरो भी कोई नहीं है, और ना ही फिल्म की सफलता के लिए ‘देशभक्ति’ का बनावटी छौंका लगाकर आपके अन्दर के ‘भारतीय’ को जबरदस्ती का झकझोरने की कोशिश. 

बुधिया सिंह- बॉर्न टू रन’ फार्मूले से अलग एक ऐसी ‘स्पोर्ट्स’ फिल्म है, जो सिर्फ सतही तौर पर खेल से जुड़े रोमांच को भुनाने की कोशिश नहीं करती, बल्कि उसके पीछे की मेहनत-मशक्कत, लगन और मुश्किलातों को सच्चे मायनों में आपके सामने उसकी असली ही शकल-ओ-सूरत में पेश करती है.









LAAL RANG is a good thriller that may not pump your heartbeat up in the usual way most of bollywood thrillers do. It also might not give you much of a pulsating action to cheer, and it definitely would not pitch obligatory twists & turns in the plot but even then, the firm writing has enough to make it an enjoyably unlike experience. 

Syed Ahmad Afzal makes sure it takes its own course of time to grow on the viewers. He never looks in hurry when establishing scenes or while making the shift from one to another.



अनु मेनन की ‘वेटिंग’ ज़िन्दगी और मौत के बीच के खालीपन से जूझते दो ऐसे अनजान लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है जिनमें कहने-सुनने-देखने में कुछ भी एक जैसा नहीं है, पर एक पीड़ा, एक व्यथा, एक दुविधा है जो दोनों को एक दूसरे से बांधे रखती है. 

प्रोफ़ेसर शिव धीर-गंभीर और शांत हैं, जबकि तारा अपनी झुंझलाहट-अपना गुस्सा दिखाने में कोई शर्म-लिहाज़ नहीं रखती. तारा को मलाल है कि ट्विटर पर उसके पांच हज़ार फ़ॉलोवर्स में से आज उसके पास-उसके साथ कोई भी नहीं, जबकि प्रोफ़ेसर को अंदाज़ा ही नहीं ट्विटर क्या बला है? इसके बावज़ूद, अपने अपनों को खो देने का डर कहिये या फिर वापस पा लेने की उम्मीद, दोनों एक-दूसरे से न सिर्फ जुड़े रहते हैं, अपना असर भी एक-दूसरे पर छोड़ने लगे हैं.







एक सच की दुनिया है जो हमारे आस-पास चारों तरफ पसरी है, और एक दुनिया है जैसी हम अपने लिये तलाशते हैं, जिसके होने में हम यकीन करना चाहते हैं. अपने देश के साथ भी ऐसा ही कुछ कनेक्शन है हमारा. एक, जैसी हम देखना चाहते हैं, मानना चाहते हैं और दूसरा जो वाकई में है. 

नागेश कुकूनूर की ‘धनक’ हमारी परिकल्पना और सच्चाई की इन्हीं दो दुनियाओं के बीचोंबीच कहीं बसी है. अगर आप अच्छे हैं, दिल के सच्चे हैं तो आपके साथ बुरा कैसे हो सकता है? परीकथाओं में अक्सर इस तरह के मनोबल बढ़ाने और नेकी की राह पर चलते रहने के लिए हिम्मत बंधाने वाली उक्तियाँ आपने भी पढ़ी या सुनी होंगी. ‘धनक’ किसी एक प्यारी और मजेदार परी-कथा जैसी ही है, जिसमें बहुत सारे अच्छे लोग हैं और जो बुरे भी हैं वो सदियों पुराने, जाने-पहचाने जैसे हमेशा कोसते रहने वाली ‘डायन’ चाची और बच्चे उठाने वाला दुष्ट गिरोह.





हाव-भाव और ताव में लीना यादव की ‘पार्च्ड’ पिछले साल रिलीज़ हुई पैन नलिन की ‘एंग्री इंडियन गॉडेसेज’ से बहुत कुछ मिलती-जुलती है, और अपने रंग-रूप में केतन मेहता की ‘मिर्च मसाला’ जैसी तमाम भारतीय सिनेमा के मील के पत्थरों से भी. जाहिर है, इस तरह का ‘पहले बहुत कुछ देख लेने’ की ऐंठ आप में भी उठेगी, पर जिस तरह की बेबाकी, दिलेरी और दबंगई ‘पार्च्ड’ दिखाने की हिमाकत करती है, वो कुछ अलग ही है. 

यहाँ ‘आय ऍम व्हाट आय ऍमका जुमला बेडरूम के झगड़ों और कॉफ़ी-टेबल पर होने वाली अनबन में सिर्फ जीत भर जाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता. ‘पार्च्ड’ अपने किरदारों को उनके तय मुकाम तक छोड़ आने तक की पूरी लड़ाई का हिस्सा बन कर एक ऐसा सफ़रनामा पेश करती है, जो हमारी ‘घर-ऑफिस, ऑफिस-घर’ की रट्टामार जिन्दगी से अलग तो है, पर बहुत दूर और अनछुई नहीं.






जातिगत विसंगतियों के दुष्प्रभाव, छूत-अछूत के लाग-लपेट और धर्म के नाम पर विकलांग मानसिकता का परिचय देते भारतीय समाज को हमने पहले भी श्याम बेनेगल और गोविन्द निहलाणी के सिनेमा में तार-तार होते देखा है. ‘चौरंगा’ भी काफी हद तक इसी दायरे में फैलती-सिमटती दिखाई देती है, इसीलिए एक मूल प्रश्न बार-बार दिमाग में कौंधता रहता है. ‘क्या कुछ भी नहीं बदला है?’ 

उत्तर फिल्म ख़तम होने के तुरंत बाद कुछ सरकारी तथ्यों के परदे पर उभरने के साथ ही मिलने शुरू हो जाते हैं. सच में, कुछ भी नहीं बदला है. और अगर नहीं बदला है तो सिर्फ सिनेमा में बदलाव दिखा देने भर से क्या सचमुच बदलाव आ जायेगा? ‘चौरंगा’ की पृष्ठभूमि, ‘चौरंगा’ के कथानक और ‘चौरंगा’ के पात्रों से पुराने होने की गंध भले ही आती हो, पर ‘चौरंगा’ के प्रासंगिकता की चमक पर कहीं कोई धूल जमी दिखाई नहीं देती. ‘चौरंगा’ एक सार्थक कोशिश है भारतीय समाज के उस एक वर्ग को टटोलने में, जिसे हम शहरी चकाचौंध के लिए कहीं अँधेरे में छोड़ आये हैं.  


Friday, 23 December 2016

दंगल: साल की सबसे ‘धाकड़’ फिल्म! [5/5]

अपने अधूरे सपनों का बोझ अपने बच्चों के नरम-नाज़ुक कन्धों पे डाल देना; हमारे माँ-बाप के लिए कोई नया नहीं है, और ज्यादातर मामलों और मायनों में वाज़िब भी नहीं. सख्ती कब ज्यादती बन जाती है, कोई नहीं बता सकता. धागे भर का ही फर्क है दोनों में. लकीर के इस पार का पिता अक्सर उस पार खड़ा ‘हानिकारक खलनायक’ दिखने लगता है, पर तभी तक, जब तक बच्चों को अपने पिता के सपनों में अपना भविष्य देख पाने की नज़र और समझ पैदा नहीं हो जाती. नितेश तिवारी की ‘दंगल’ बड़ी समझदारी से इस टकराव का सामना करती है और इस पेशोपेश से जुड़े हर ज़ज्बात को परदे पर पूरी ईमानदारी से पेश करती है. एक ऐसी फिल्म जो खुद को ही सवालों के घेरे में खड़ा करने से न डरती है, न ही पीछे हटती है. इससे पहले कि आप के ज़ेहन में कुलबुलाहट हो, कोई न कोई किरदार आपके सवालों को अपने अल्फाज़ दे देता है.

महावीर सिंह फोगाट (आमिर खान) किसी अलग सांचे में ढला पिता नहीं है. ऐसे पिता, जिनके मुंह से ‘शाब्बास’ सुनने के लिए बच्चों के कान तरस जाएँ, हमारे आस-पास बहुतेरे हैं. ऐसे पिता, जिनके भारी-भरकम सपनों को पीठ पर लादे बच्चे अंधाधुंध भाग रहे हों, हम सबने देखे हैं. कभी अपने पिता में, तो कभी बगल वाले शर्मा जी में. महावीर सिंह फोगाट को अगर कुछ अलग करता है, तो वो है उसकी जिद, उसका जूनून और परिस्थितियों से सीखने, सीख कर समझने और समझ कर संभलने का लचीलापन, जो उसके हठी किरदार में एक रोचक और रोमांचक विरोधाभास पैदा करता है. कुश्ती में मेडल लाने का सपना सिर्फ एक बेटा ही पूरा कर सकता है, फोगाट इस चाह में चार बेटियों का पिता बन चुका है. ऐसे में, एक दिन जब उसे एहसास होता है कि मेडल बेटियाँ भी ला सकती हैं, तो अपनी बच्चियों गीता (ज़ायरा वसीम) और बबिता (सुहानी भटनागर) को अखाड़े तक लाने में कोई ढील नहीं बरतता.       

फिल्म के दूसरे हिस्से में ‘दंगल’ कई परतों में खुलती है. गीता (फ़ातिमा सना शेख) को राष्ट्रीय खेल अकादमी में एक उजड्ड कोच (गिरीश कुलकर्णी) के भरोसे छोड़कर लौटते बाप की उलझन हो, शाहरुख़ की फिल्म और गोलगप्पों के बीच कुश्ती के नए तौर-तरीकों से पनपा गीता का नया आत्म-विश्वास हो या बबिता (सान्या मल्होत्रा) के साथ उसके वैचारिक मतभेद; बाप-बेटियों के इस ज़ज्बाती गुत्थम-गुत्थी से अलग हटकर देखें, तो कुश्ती को एक खेल के रूप में परदे पर प्रस्तुत करने वाली बेशक ‘दंगल’ सबसे भरोसेमंद फिल्म है. कुश्ती के गूढ़ दांव-पेंच यहाँ जिस रोमांचक तरीके से दिखाए और समझाए जाते हैं, उनका मकसद किरदारों या उन्हें निभाने वाले कलाकारों को परदे पर बढ़ा-चढ़ा कर ‘नायक’ की तरह पेश करना कतई नहीं रहता, बल्कि उन खालिस पलों में सिर्फ कुश्ती ही निखर कर सामने आती है. फिल्म का टाइटल सीक्वेंस भी इसी सोच की बुनियाद पुख्ता करता है, जहां असली दुनिया के असली पहलवान कैमरे के सामने खड़े आपकी आँखों में एकटक झांकते दिखाई देते हैं.

दंगल’ एक कलाकार के तौर पर आमिर खान की सबसे अच्छी फिल्म है. अपने स्टारडम को हाशिये पर रखकर किरदार तक ही सीमित रहने का हुनर उनसे अच्छा शायद ही किसी और ‘स्टार’ को आता हो. बात सिर्फ वजन घटा-बढ़ा कर प्रयोग करने की नहीं है, फिल्म के तमाम जरूरी हिस्सों और दृश्यों में केंद्र-बिंदु बने रहने का लोभ-संवरण कर पाना, हर किसी के बस की बात नहीं. अपनी पहली ही फिल्म में गीता और बबिता के किरदारों में ज़ायरा, सुहानी, फ़ातिमा और सान्या चारों ही आपको लुभाने, हंसाने, रुलाने और इमोशनली जोड़े रखने में कामयाब रहती हैं. फिल्म में अगर किसी का होना बहुत चौंकाता है, तो वो हैं साक्षी तंवर. साक्षी भले ही फिल्म में कैमरे का पसंदीदा चेहरा न रही हों, (आप उन्हें अक्सर बैकग्राउंड में ही देखते हैं) पर फिल्म की रंगीनियत में उनसे ज्यादा घुला-मिला, रचा-बसा शायद ही कोई और दिखता है. अपारशक्ति खुराना प्रभावित करते हैं, इस हद तक कि जैसे इसी रोल के लिए बने हों.

आखिर में, ‘दंगल’ कमियों से परे न होते हुए भी (फिल्म का सोचा-समझा अंत थोड़ा असहज करता है) एक ऐसी मुकम्मल फिल्म है, जो मनोरंजन का दामन छोड़े बगैर अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों की बागडोर पूरी मुस्तैदी से अपने हाथ रखती है. सच्चे किरदारों की सच्ची कहानियाँ परदे पर कहनी हों, तो ‘दंगल’ बॉलीवुड के लिए बाइबिल से कम नहीं. साल की सबसे ‘धाकड़’ फिल्म! देखने जाईये, अभी जाईये, पूरे खानदान के साथ जाईये! [5/5]                  

Friday, 9 December 2016

बेफिक्रे: आदित्य चोपड़ा की ‘हमशकल्स’! [1/5]

21 साल, 1 महीना और 20 दिन लग गये आदित्य चोपड़ा साब को, दर्शकों और मुझ जैसे पागल प्रशंसकों के दिल-ओ-दिमाग में ये शक़ पैदा करने में कि ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ उन्होंने बनाई थी या उनसे बस बन गयी थी. एक ‘खराब, बेहद खराब’ फिल्म से किसी को सूली पे चढ़ा देना ग़लत है, पर कसौटी पर कसे जाने की बारी आती है तो रहम की उम्मीद कम से कम इसलिये तो मत ही कीजिये क्यूँकि इंडस्ट्री में आपकी साख काफ़ी मज़बूत है. ‘बेफिक्रे’ हालाँकि एक रोमांटिक-कॉमेडी होने के दावे तो बड़े ज़ोर-शोर से करती है, मगर इसमें रोमांस और कॉमेडी का तड़का बस नाम भर का ही है. असलियत में ‘बेफिक्रे’ अपने-आप में ही हैरान-परेशान एक ऐसी फिल्म है, जो जाना कहीं और चाहती है, पर पहुँचती कहीं और.

फिल्म पेरिस में रची-बसी है, पर फ्रांस के नाम पर ‘फ्रेंच किस’ और वहाँ के लोगों में ‘सेक्स’ के प्रति खुलापन का भरपूर शोषण करती है, और कई मायनों में उसका माखौल भी उड़ाती है. माँ-बाप इंडियन हैं, पर शाईरा (वाणी कपूर) फ्रेंच. कैलेंडर के पन्नों की तरह बॉयफ्रेंड बदलती है. धरम (रनवीर सिंह) दिल्ली से आया है, पेरिस के एक क्लब में स्टैंड-अप कॉमेडियन बनने. मुलाक़ात के चंद ‘रातों’ बाद ही, दोनों तय कर लेते हैं कि कभी एक-दूसरे को ‘आय लव यू’ नहीं बोलेंगे. और फिर वही हिंदी सिनेमा की उठा-पटक, जो अंत तक पहुँचते-पहुँचते दोनों को ‘आय लव यू’ बोलना सिखा ही देती है. इस पूरे वक़्त में वो सब बातें होती हैं, जो परदे पर आप पहले भी हज़ारों बार देख और झेल चुके हैं. लिव-इन के बाद ब्रेक-अप, ब्रेक-अप के बाद पैच-अप इस शर्त के साथ कि अब हम सिर्फ दोस्त रहेंगे, फिर एक नए किरदार का आना, माँ के पराठों के साथ ‘असली प्यार’ की घुट्टी और अंत में, साजिद खान की फिल्मों की तरह चर्च में शादी के मौके पर सारे किरदारों का पागलों की तरह एक-दूसरे पर टूट पड़ना.

बेफिक्रे’ का हर एक पल फिल्ममेकर के तौर पर आदित्य चोपड़ा के दिमागी दिवालियेपन से आपको रूबरू कराता है. कुछ नया पेश करने की भागादौड़ी में कभी तो चोपड़ा साब अपनी खुद की ही मास्टरपीस ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ के दृश्यों के साथ छेड़छाड़ करते दिखाई देते हैं, तो कभी फिल्म के तयशुदा मुकाम तक पहुँचने के लिए अपने समकालीन फिल्मकारों के हथकंडे अपनाने से भी परहेज नहीं करते. एक वक़्त था, जब परदे पे कलाकार ‘किस’ करने के लिये एक दूसरे की ओर बढ़ते थे तो फूलों वाली ‘स्लाइड’ आगे आ जाती थी, ‘बेफिक्रे’ में बेवजह के गाने उस ‘स्लाइड’ की जगह ले लेते हैं.

फिल्म में रनवीर एक स्टैंड-अप कॉमेडियन बने हैं, मगर जिस तरह का थकाऊ ‘कॉमिक सेट’ वो परदे पर पेश कर रहे होते हैं, मुझे ताज्जुब होता है कि क्या फिल्म से जुड़े किसी भी भलेमानस ने यूट्यूब पर ही सही, डैनियल फर्नांडिस, सौरभ पन्त, केनी सेबेस्टियन जैसों को कभी देखा या सुना नहीं होगा? अपने भटके हुए किरदारों के साथ, फिल्म कई बार ‘घर के ना घाट के’ जैसे मुहावरों की भेंट चढ़ जाती है. शाईरा नए ज़माने की लड़की है. 40 से ज्यादा बॉयफ्रेंड्स बना चुकी है. ‘लिव-इन’ में जाने से पहले अपने माँ-बाप को ‘बताती’ है, पूछती नहीं, पर जब सच्चे प्यार की बात हो तो माँ के पराठों की ओर भागती है. धरम खुद तो अपनी रातें रंगीन करने में कोई झिझक नहीं दिखाता, पर जब सामने बैठी लड़की कहती है, “मैं अपने बॉयफ्रेंड को जलाने के लिए तुम्हारे रात बिताना चाहती हूँ’, तो उसकी आँखें चौड़ी होने लगती हैं. पेरिस में जा के ‘समलैंगिकता’ का मज़ाक उड़ाने वाले नौजवान आजकल के कैसे हो सकते हैं, खास कर वो जो ‘सेक्स’ को ही अपनी आज़ादी का पैमाना बना चुके हों?

बेफिक्रे’ में ऐसे मौके बार-बार आते हैं, जब मेरा परदे से मुंह मोड़ लेने को जी करने लगता है. मैं सर झुका कर अँधेरे में इधर-उधर देखने लगता हूँ, पर ऐसा उन बेधड़क ‘किस सीन्स’ के वजह से नहीं होता, बल्कि परदे पर वाहियात के दृश्यों, नीरस डायलॉग्स और ‘नेचुरल एक्टिंग’ के नाम पर चल रही बेवकूफियों से ऊब कर होता है. कभी-कभी रनवीर के पीले दांतों से भी. अच्छे डांस मूव्स और खूबसूरत सिनेमेटोग्राफी के अलावा, अनय का किरदार निभा रहे अभिनेता का काम ही थोड़ा बहुत सुकून भरा है. वरना तो, ‘बेफिक्रे’ आदित्य चोपड़ा की ‘हमशकल्स’ या ‘वेलकम’ कहे जाने लायक ही है. मुझे डर है, कहीं मेरी इस बात से साजिद खान या अनीस बज्मी बुरा न मान जाएं! [1/5]

Friday, 2 December 2016

कहानी 2- दुर्गा रानी सिंह : तैयार रहिये, ‘नहीं’ चौंकने के लिए! [2/5]

बिद्या’ लौट आई है. ‘बागची’ नहीं, इस बार ‘सिन्हा’ बन कर. बाकी का सारा सेट-अप तकरीबन वैसा ही है. हाँ, दर्शक के तौर पर आप और हम कुछ ज्यादा ही सजग और सचेत हो गए हैं. ‘कहानी’ में मिस बागची की छलावे वाली कहानी से पहले ही ठगे जा चुके हैं, तो इस बार खुद को तैयार रखे बैठे हैं कि कुछ न कुछ तो होगा ही. परदे पर जो कुछ बड़ी आसानी से शरबत कहकर पिलाया जा रहा है, ज़रूर उसमें कोई कड़वी दवाई मिलाई गयी होगी. चौकाने से पहले चौकन्ना कर देना; सुजॉय घोष की ‘कहानी 2: दुर्गा रानी सिंह’ कम से कम इस मामले में तो पूरे नंबर हासिल कर ही लेती है. पर कहानी यहाँ ख़त्म नहीं होती, लेखक-निर्देशक घोष बाबू के लिए चुनौती अब और कड़ी हो चली है. ठगे जाने के लिए जो पहले से ही तैयार बैठे हैं, उन्हें एक जबरदस्त झटका देने का दो ही तरीका हो सकता था, पहले वाले से अबकी बार कुछ बहुत बड़ा किया जाये या फिर कुछ भी न किया जाये! अफ़सोस, सुजॉय घोष सबसे आसान तरीके के साथ समझौता करना मंज़ूर कर लेते हैं. हालांकि, इसे समझते-समझते आपका काफी वक़्त गुज़र जाता है.  

रात का सन्नाटा खाली सड़कों से होता हुआ सोती संकरी गलियों तक फैला है. रेडियो पर गाना चल रहा है. पीले बल्बों की रौशनी पुराने मकानों को और पुराना बना रही है, और रहस्यमयी भी. ये कोलकाता नहीं है, पर ये भी बंगाल ही है. बिद्या सिन्हा (विद्या बालन) अपनी 14 साल की बेटी मिनी (तुनिषा शर्मा) को इलाज़ के लिए अमेरिका ले जाना चाहती है. मिनी व्हीलचेयर पर है और चल नहीं सकती. रोजाना की ही तरह, एक शाम जब बिद्या ऑफिस से घर लौटती है, मिनी को किसी ने अगवा कर लिया है. मिनी को बचाने के लिए बिद्या को कोलकाता जाना होगा, पर उससे पहले ही उसका एक्सीडेंट हो जाता है और अब वो कोमा में है. तफ्सीस में इंस्पेक्टर इन्द्रजीत सिंह (अर्जुन रामपाल) के हाथ एक डायरी लगती है. फिल्म अब फ्लैशबैक में है और डायरी के जरिये आपको कहानी सुना रही हैं, दुर्गा रानी सिंह (विद्या बालन), जो खुद हत्या और किडनैपिंग की आरोपी है.  

कहानी’ और ‘कहानी 2’ के बीच इसी साल सुजॉय घोष की ‘तीन’ भी आ चुकी है. हास्यास्पद है कि अपने क्राइम-थ्रिलर होने की फितरत और कोलकाता में बसे होने आदत दोनों की वजह से, कोरियाई फिल्म का रीमेक होने के बावजूद, ‘तीन’ पूरी तरह ‘कहानी’ श्रृंखला की ही फिल्म लगी थी. जबकि ‘कहानी 2’ अपने डार्क सब्जेक्ट (बाल यौन शोषण) और कहानी में कुछेक बहुत ठेठ घुमावदार मोड़ों की वजह से एक कोरियाई फिल्म ज्यादा लगती है. फिल्म का पहला हिस्सा जिस तरह परत-दर-परत आपको दुर्गा रानी सिंह की पिछली ज़िन्दगी और 6 साल की मिनी के यौन-शोषण से जुड़े राज़ का खुलासा करती है, वो न ही बहुत गूढ़ रहस्य लगते हैं और न ही किसी दूसरे बड़े राज़ के छुपे होने का अंदेशा कराते हैं. हाँ, फिल्म में जिस संजीदगी और सफाई से बाल यौन शोषण की बात की गयी है, वो बेहद जरूरी और काबिल-ऐ-तारीफ़ है. 6 साल की मिनी को उसके ‘चाचू’ (जुगल हंसराज) ही इधर-उधर छूते हैं, पर किसी बड़े से वो ये बात करने में कैसे सहज हो? वो भी जब दुर्गा उसके स्कूल में काम करने वाली एक औरत हो, कोई अपनी सगी नहीं.

सुजॉय घोष पूरी कोशिश करते हैं कि ‘कहानी 2’ आपको ‘कहानी’ जैसी ही लगे, इसीलिए यहाँ भी एक नौजवान पुलिसवाला है, बॉब बिस्वास की तर्ज़ पर एक मजेदार सुपारी-किलर (इस बार एक लड़की) है, विद्या बालन हैं, और कहने को ही सही, पर एक ऐसा क्लाइमेक्स है जो फिल्म के बारे में आपकी अब तक की समझ को झुठला दे. हालाँकि, ये अंत वो आसान अंत है, जो आप चाहते तो काफी पहले से देख पाते, पर आप इतना आसान कुछ देखना ही नहीं चाहते थे. ‘कहानी’ का अंत आप चाह कर भी नहीं देख पाते. विद्या अपने ‘डी-ग्लैम’ अवतार को बखूबी अपने अभिनय का सबसे मज़बूत पक्ष बना लेती हैं. अरुण (तोता रॉय चौधरी) के साथ उनके दृश्य उनके अभिनय की एकरसता को तोड़ने में कामयाब दिखते हैं. अर्जुन रामपाल से कोई ख़ास शिकायत नहीं होती, हालांकि ‘कहानी’ के परम्ब्रता चटर्जी जैसे चेहरे अर्जुन की जगह ज्यादा सटीक कास्टिंग होते. जुगल हंसराज ने काफी दिनों बाद निराश किया.

आखिर में; ‘कहानी 2’ एक अच्छी फिल्म हो सकती थी, और कई मायनों में है भी...जहां तक इसके विषय-वस्तु (चाइल्ड एब्यूज) की संजीदगी और अहमियत का सवाल है, पर इसे ‘कहानी’ जैसा जामा पहना कर क्राइम-सस्पेंस थ्रिलर के तौर पर पेश करने की कोशिश और कवायद एक अलग तरह की उम्मीद जगा देते हैं, जिसे छू पाना इस फिल्म के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है. देखिये, पर तैयार रहिये...‘नहीं’ चौंकने के लिए! [2/5]               

Wednesday, 30 November 2016

डियर जिंदगी: Rx, एक सुकून भरा ‘सेशन’! [3.5/5]

गौरी शिंदे की ‘डियर जिंदगी’ देखने के लिए आपको एक ख़ास तरह का चश्मा चाहिए होगा. वो चश्मा जिसके भीतर से आप देख पाएं कि कैसे एक सुपरस्टार अपने स्टारडम का बोझ धीरे-धीरे ही सही, अपने मज़बूत कन्धों से उतारने की कोशिश तो कर रहा है. हालाँकि कई बार आपको ये कोशिश जबरदस्ती की लगेगी, और कई बार बहुत बनावटी, फिर भी. तकरीबन तीन दशकों के अपने पूरे फ़िल्मी कैरियर में शाहरुख़ इस तरह की बेहद जरूरी कोशिश सिर्फ गिनती के कुछ वक़्त ही (स्वदेश और चक दे! इंडिया) करते नज़र आते हैं, इसीलिए इसके मायने और भी बढ़ जाते हैं. फिल्म में उनका किरदार एक जगह कहता भी है, “ज़िन्दगी में जब भी पैटर्न और आदतें बनती दिखाई दें, जीनियस वही है जिसे पता हो कि कब और कहाँ रुकना है?” इस फिल्म से शायद शाहरुख़ भी यही सीख रहे हैं.  

...और इसी करामाती चश्मे से शायद आप ये भी देख पाएं कि एक ‘मेनस्ट्रीम’ हिंदी फिल्म होते हुए भी, अपनी कहानी और कहानी कहने की शैली की वजह से कैसे ‘डियर जिंदगी’ कमोबेश एक प्रयोगधर्मी ‘इंडी’ फिल्म का चोला ओढ़ने में कहीं कोई शर्मिंदगी नहीं दिखाती. ज़िन्दगी की मुश्किलों को आसान बनाने के रास्ते सुझाती, ये फिल्म भले ही किसी बड़ी सर्जरी की तरह हिंदी सिनेमा की सारी तकलीफें एक झटके में दूर न कर पाती हो, पर एक सुकून भरा ‘सेशन’ तो है ही, जिसका असर आने वाले वक़्त में बिलकुल दिखाई देगा.

रिश्ते बनाने-निभाने में काईरा (आलिया भट्ट) थोड़ी कच्ची है. ‘बाय’ बोलने की जैसे उसको जल्दी रहती है. दूसरा कोई बोले, दर्द हो, दुःख पहुंचे, इससे पहले खुद ही बोल दो. जाने कैसे-कैसे डर पाले बैठी रहती है, बिलकुल हम सबकी तरह. रोने का मन हो तो हरी मिर्ची चबा कर कहती है, “मिर्ची की वजह से हो रहा है ये”. सिड (अंगद बेदी) के बाद रघुवेंद्र (कुनाल कपूर) भी उसकी जिंदगी से जाता दिख रहा है. डिप्रेशन का दौर है ये. गोलियां खाने के बाद भी काईरा को नींद नहीं आती. दिमाग के डॉक्टर, जहांगीर खान (शाहरुख खान) के सामने बैठी है, पर अपनी तकलीफ़, अपना डर सब कुछ अपना न कह कर, अपनी दोस्त के नाम पर धड़ल्ले से बताती जा रही है. आखिर, ऐसे डॉक्टर के पास जाने वाले को ‘लोग’ पागल जो समझते हैं.

खैर, डॉक्टर खान को मर्ज़ जानने में कोई मुश्किल नहीं होती. उन्हें बस उस ज्वालामुखी को कुरेदना है, जहां सब कुछ धधकते लावे की शक्ल में जमा होता जा रहा है. हालाँकि वो खुद डाइवोर्स जैसे अँधेरे रास्ते से गुजर चुके हैं, और कहते हुए झिझकते नहीं कि वो अपने बेटे को अच्छी यादें देना चाहते हैं, ताकि उसके पास अपने ‘थेरेपिस्ट’ को बताने के लिए कुछ तो हो. सच कहिये तो ऐसे ‘थेरेपिस्ट’ के पास जाने की जरूरत हम सबको है, जिनके फ़ोन कॉल्स अपने माँ-बाप के लिए कभी दो-चार मिनट से ज्यादा लम्बे नहीं होते.

डियर ज़िन्दगी’ अपने छोटे-छोटे, हलके-फुल्के पलों में बड़े-बड़े फलसफों वाली बातें कहने का जोखिम बखूबी और बेख़ौफ़ उठाती है. डॉक्टर खान जब भी रिश्तों को लेकर ज़िन्दगी का एक नया पहलू काईरा को समझा रहे होते हैं, उनकी इस भूमिका में शाहरुख़ जैसे बड़े कलाकार का होना अपनी अहमियत साफ़ जता जाता है. ये चेहरा जाना-पहचाना है. बीसियों साल से परदे पर प्यार, दोस्ती और ज़िन्दगी की बातें करता आ रहा है, पर इस बार उसकी बातों की दलील पहले से कहीं ज्यादा गहरी है, मजबूत है, कारगर है. आलिया जिस तरह भरभरा कर टूटती हैं परदे पर, हिंदी सिनेमा में अपने साथ के तमाम कलाकारों को धकियाते हुए एकदम आगे निकल जाती हैं. फिल्म की खासियतों में से एक ये भी है कि शाहरुख़ जैसा दमदार स्टार होते हुए भी कैमरा और कहानी दोनों आलिया के किरदार से कभी दूर हटते दिखाई नहीं देते.

गिनती के दो-चार बेहद आम दृश्यों को छोड़ दें, खासकर काईरा का ‘फॅमिली अफेयर’ जहां फिल्म की कहानी दूसरे हिस्सों के मुकाबले काफी बेअसर और लचर दिखाई पड़ती है, तो ‘डियर जिंदगी’ एक बहुत ही सुलझी हुई फिल्म है. जितना बोलती है, उतना ही कहती भी है, पूरी तरह नाप-तौल कर, पूरी तरह सोच-समझ कर! [3.5/5]         

Friday, 18 November 2016

फ़ोर्स 2: बुरा भला है. नायक से खलनायक अच्छा! [2/5]

अपने तमाम समकालीन फिल्मों की तरह ही, ‘फ़ोर्स 2’ भी सीक्वल होने का कोई भी धर्म निभाने में दिलचस्पी नहीं दिखाती; सिवाय गिनती के दो-चार दृश्यों में जहां एसीपी यशवर्धन (जॉन अब्राहम) अपनी स्वर्गीया पत्नी माया (जेनेलिया देशमुख, मेहमान भूमिका में) से यादों में रू-ब-रू होते हैं. वरना तो इस फिल्म को आप ‘रॉकी हैण्डसम 2’ या ‘ढिशूम 2’ ही क्यूँ न कह लें, किसी की क्या मजाल, जो अंतर बता भी सके. हाँ, दो बातें अहम् हैं, जो इस फिल्म की बड़ी खासियत कही जा सकती हैं. एक तो ये ‘आजकल’ की फिल्म है. मामले की गंभीरता को समझाने के लिए ‘ये देश की सुरक्षा का मामला है’ जैसे जुमले यहाँ दिल खोल कर बोले जाते हैं. पाकिस्तान को डायलाग बोल-बोल कर तबाह कर देना, बॉलीवुड के लिए अब जैसे पुराना हो चला है. चीन है अब हमारा अगला निशाना. हीरो पहले भी अंडरकवर मिशन पर जाता था, विदेशी धरती पर खलनायकों का कीमा बना के लौट आता था, पर इस बार उसके इरादे और लोहा हो गए हैं. उसकी बुलंद आवाज़ में जैसे कोई और भी दहाड़ रहा है, “देश बदल रहा है, सर! अब हम घर में घुस के मारते हैं!”

दूसरी खासियत है, फिल्म का दकियानूसी विवादों से बचे रहने की लगातार कोशिश. यहाँ देश से गद्दारी करने वाला कोई ‘अब्दुल’ या ‘सलीम’ नहीं है, बल्कि शिव शर्मा (ताहिर राज भसीन) है, जिसकी वजहें भले ही निजी और ज़ज्बाती हों, गुनाह तनिक भी हलके नहीं हैं. उसके तेवरों में भी धार और चमक आजकल वाली ही है, “देशभक्त और देशद्रोही की बहस तो आप मुझसे कीजियेगा ही मत, हार जायेंगे!”. पर इन सब के और अपनी सांसें रोक देने वाली तेज़ रफ़्तार के बावजूद, अभिनय देव की ‘फ़ोर्स 2’ एक आम एक्शन फिल्म है, जहां लॉजिक और इमोशन्स दोनों ही स्टाइल की भेंट चढ़ जाते हैं. ‘फ़ोर्स’ सुपरहिट तमिल फिल्म ‘काखा काखा’ की रीमेक थी, इसलिए साउथ इंडियन फिल्मों का सबसे कामयाब और स्पेशल ‘इमोशनल’ एंगल फिल्म में भरपूर मात्रा में था. ‘फ़ोर्स 2’ सिर्फ और सिर्फ आपकी आँखों तक पहुँचता है, न दिल तक, न दिमाग तक!

हंगरी में भारत के रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) एजेंट्स को कोई एक-एक करके मार रहा है. इन्वेस्टीगेशन मिशन पर जा रहे हैं दो लोग. मुंबई क्राइम ब्रान्च के एसीपी यशवर्धन (जॉन अब्राहम), जिनका जासूस दोस्त पहले ही शहीद हो गया है और क्यूंकि रॉ चीफ के अनुसार, ‘पहला क्लू यश को ही मिला था”. दूसरी हैं रॉ की सबसे काबिल ऑफिसर कमलजीत कौर उर्फ़ के.के. (सोनाक्षी सिन्हा). के.के. गोली नहीं चला सकतीं. उसके पीछे उनके अपनी वजहें हैं. और मुझे नहीं पता, ये राज़ उनके डिपार्टमेंट में किस किस को पता था? और फिर वो दूसरी क्या खूबियाँ थीं उनमें, जिसकी वजह से उन्हें इस मिशन के लिए चुना गया? स्मार्ट होंगी शायद, पर जब एक जगह फिल्म के खलनायक शिव (ताहिर राज़ भसीन) उन्हें टिप देते हैं, रॉ का एक और एजेंट अगले आधे घंटे में मारा जाने वाला है और सिर्फ वो ही उसे बचा सकती हैं; के.के. का दिमाग सिग्नल भेजता है, “इसका मतलब वो एजेंट कहीं आस-पास ही है” इसके तुरंत बाद आपका दिमाग के.के. से आपका ध्यान हटा कर फिल्म के निर्देशक की ओर ले जाता है, जो अगले बीस मिनट तक लम्बे-लम्बे शूटआउट्स के साथ, दिन से रात होने के बाद भी ‘जल्दी करो, सिर्फ 10 मिनट और बचे हैं’ की घुट्टी दर्शकों को बड़ी बेशर्मी से पिलाते रहते हैं.

फ़ोर्स 2’ उन तमाम फिल्मों की अगली कड़ी है, जिनमें सिनेमेटोग्राफी और एक्शन को कहानी से ज्यादा तवज्जो मिलती है. ऐसे फिल्मों में अभिनय की बारीकियां ढूँढने की गलती न मैं करता हूँ, न ही आपको करनी चाहिए. फिर भी. जॉन अब्राहम जिस्मानी दर्द को परदे पर परोसने में ज्यादा मेहनत दिखाते हैं, चाहे वो चलती कार को हाथों से उठाने का स्टंट हो या मार-पीट के दौरान बदन में घुसी कील को निकालने की जद्दोजेहद. सोनाक्षी रॉ एजेंट दिखने में सारा वक़्त और सारी मेहनत बर्बाद कर देती हैं. काश, उनके किरदार को थोड़ी सूझबूझ भी, खैरात में ही सही, फिल्म के लेखकों ने दे दी होती. ये वो काबिल ऑफिसर है, जो ‘मिशन कौन लीड करेगा?’’ जैसे सवालों में ही खुश रहती है. ‘फ़ोर्स 2’ टाइटल को अगर जायज़ ठहराना हो तो, ‘2’ इशारा करेगा जॉन और सोनाक्षी की जोड़ी को, और पूरा का पूरा फ़ोर्स जायेगा ताहिर के नाम. ताहिर अपनी खलनायकी में हर वो रंग परोसते हैं, जो मजेदार भी है, रोमांचक भी है और थोड़ा ही सही पर इमोशनल भी. आम तौर पर ये सारा कुछ हीरो के जिम्मे होता है. इस बार नहीं.

अंत में, ‘फ़ोर्स 2’ इतनी तेज़ रफ़्तार से आपकी आँखों के सामने चलता रहता है, कि ज्यादातर वक़्त आपको सोचने का वक़्त भी नहीं मिलता. अब यही खासियत भी है, और यही नाकामी भी. जितनी तेज़ी से चीजें चलती रहती हैं, उतनी ही तेज़ी से चली भी जाती हैं. आखिर बुरा वक़्त जितनी जल्दी गुज़र जाए, अच्छा ही होता है! [2/5]    

Friday, 11 November 2016

रॉक ऑन 2: बैंड बज गया! [2/5]

अभिषेक कपूर की ‘रॉक ऑन’ कुछ आठ साल पहले आई थी. यारी, दोस्ती, मस्ती और म्यूजिक के बीच रिश्तों में उतार-चढ़ाव और हाथ-धो कर सपनों के पीछे पड़ जाने की जिद लिए कुछ मनमौजी दोस्तों की कहानी, जहां कभी खुदगर्ज़ी और खुद्दारी दूरियाँ बढ़ा देती थी तो म्यूजिक के लिए उनका साझा ज़ज्बा नाराज दोस्तों के हाथ खींच कर गले भी मिला देती थी. शुजात सौदागर की ‘रॉक ऑन 2’ ने आने में थोड़ी देर ज़रूर लगायी है, पर ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ के साथ इन्साफ बिलकुल नहीं करती. ‘रॉक ऑन’ अगर पुराने लव लैटर की तरह है, जिसके गुलाबी पन्ने अभी भी उनको छूने वाली नरम मुलायम उँगलियों का एहसास कराते हैं, जिसकी सियाही अब भी बंद लिफाफे से ही एक जानी-पहचानी खुशबू बिखेरती रहती है, तो ‘रॉक ऑन 2’ उसी पुराने लव लैटर की एक ज़ेरॉक्स कॉपी भर है. देखने में कमोबेश वैसा ही, पर रंग बासी और खुशबू बेअसर.

सालों बीत गए हैं. इतने कि आपको फ्लैशबैक में बार-बार ले जाया जा सके. केडी (पूरब कोहली) क्लाइंट्स के इशारों पर म्यूजिक बनाते-बनाते थक गया है. जो (अर्जुन रामपाल) एक रेस्टो-बार चलाता है और साथ ही, म्यूजिक रियलिटी शोज़ में टीआरपी दिलाने वाले बेहूदा कलाकारों को जज करता है. आदी (फरहान अख्तर) अब मेघालय के किसी गाँव में लोगों की सेवा में लगा रहता है. ‘मैजिक’ का कहीं कोई अता-पता नहीं. मैजिक की जगह अब ‘ट्रैजिक’ ने ले ली है. कहने को तो सारे दोस्त (बीवियों को गिनते हुए) आपस में मिलते-जुलते हैं, पर अन्दर ही अन्दर म्यूजिक छूट जाने का ग़म पाले बैठे हैं. तीनों के लिए उम्मीद की थोड़ी बहुत रौशनी लेकर आते हैं उदय (शशांक अरोरा, तितली वाले) और जिया (श्रद्धा कपूर), पर अभी बहुत कुछ कहानी फ्लैशबैक के काले दरवाजे के पीछे आपका इंतज़ार कर रही है.

रॉक ऑन 2’ एक बेहद उदास फिल्म लगती है, अपने किरदारों की उदासियों, मुश्किलों और परेशानियों की वजह से नहीं, बल्कि अपने थकाऊ गीतों, कहानी और परफॉरमेंस में उस ‘जादू’ के न होने से, जो ‘रॉक ऑन’ में हम पहले ही जी चुके हैं. ‘रॉक संगीत’ को पूरी तरह अपनाने वाले ‘मेरी लांड्री का एक बिल’ जैसे गानों की ताजगी को अब ज़िन्दगी के भारी-भरकम फलसफों वाली लाइनों ने कब्ज़े में ले लिया है. सहज, स्वाभाविक और कुदरती अभिनय को छोड़कर अब ड्रामेबाजी पर ज्यादा भरोसा दिखाया जाने लगा है. आठ साल पहले, दोस्ती के जिन मजेदार और निजी पलों को आप परदे पर महसूस करने में कामयाब रहे थे, अब वैसे पल फिल्म में न के बराबर हैं. उनकी जगह नए किरदारों की पेशोपेश अब आपको ज्यादा तंग करती है. फिल्म में संवाद, खासकर उन हिस्सों में जहां बार-बार केडी दर्शकों को कहानी सुनाने-समझाने की जिम्मेदारी ले लेता है, बेहद नाटकीय और फीके लगते हैं.

कहते हैं, संगीत सब दर्द भुला देता है. फिल्म में ऐसा सिर्फ एक या दो ही बार होता है. श्रद्धा की आवाज़ में गाये गीत और फिल्म के अंतिम क्षणों में म्यूजिक कॉन्सर्ट का पूरा हिस्सा (ऊषा उत्थुप  वाला गीत) ऐसे ही कुछ गिने-चुने पल हैं, जब फिल्म का संगीत आपको पूरी तरह बांधे रखने में कामयाब रहता है. अभिनय की दृष्टि से लगभग सभी मुख्य कलाकार एकदम से निराश तो नहीं करते, पर अपने आपको बेहिचक दोहरा रहते हैं. पूरब और अर्जुन अच्छे हैं. फरहान औसत हैं. श्रद्धा अपनी दूसरी फिल्मों से काफी बेहतर हैं. फिल्म में श्रद्धा के भाई और कुमुद मिश्रा के बेटे की भूमिका में प्रियांशु पैन्यूली काफी उम्मीद जगाते हैं.

आखिर में, ‘रॉक ऑन 2’ एक ऐसा सीक्वल है, जिसके न होने की वजहें बहुत सारी हो सकती थीं, और होने के बहाने बहुत कम. इसे देखना या झेलना किसी ऐसे कॉन्सर्ट से कम नहीं, जिसमें आपके पसंदीदा कलाकार तो हैं, पर उन्हें गाते हुए सुनने से ज्यादा आप उन्हें उदास चेहरे लिए घूमते देख रहे हैं. [2/5]