Friday, 23 February 2018

सोनू के टीटू की स्वीटी: ब्रोमांस का 'पंचर'नामा! [1/5]

दोस्त चू**या हो गया है. शादी करने जा रहा है. होने वाली बीवी ने खुद कबूल किया है कि वो 'चालू' है. हालाँकि उसके 'चालू' होने की शर्त और हदें कितनी दूर तक पसरी हैं, फिल्म के निर्देशक और लेखक बताने की जेहमत तक नहीं उठाते. फिर भी वो 'चालू' है, और शायद इसलिए भी क्यूंकि बदकिस्मती से वो लव रंजन के फिल्म की नायिका है. अब दूसरे दोस्त का फ़र्ज़ तो बनता है कि वो अपने दोस्त को उस 'चालू' लड़की के चंगुल में जाने से बचाए. प्यार के पंचनामा में महारत हासिल करने के बाद, लव रंजन 'सोनू के टीटू की स्वीटी' में इस बार 'ब्रोमांस' का पंचनामा करने उतरे हैं. सूरत और सीरत में, लड़की और दोस्त के बीच की ये लड़ाई बड़े परदे पर सास-बहू के झगड़ों और एक-दूसरे को नीचा दिखाने की साजिशों जितनी ही बेकार, वाहियात और बासी लगती है. कहने में कोई हर्ज़ नहीं कि आम लोगों के आम मनोरंजन का स्वाद समझ लेने की इस कमअक्ल अकड़ और दकियानूसी धर-पकड़ के चलते, लव रंजन बड़ी जल्दी फ़िल्मी परदे के एकता कपूर बन चुके हैं.  

सोनू (कार्तिक आर्यन) अपने बचपन के दोस्त टीटू (सनी सिंह) को गलत लड़कियों के चक्कर में फंसने से हमेशा बचाता आया है. अब जब टीटू कुछ ज्यादा ही अच्छी लगने-दिखने-बनने वाली स्वीटी (नुसरत भरुचा) से शादी करने की ठान चुका है, सोनू को शुरू से ही कुछ गलत होने का अंदेशा लगने लगा है. दोस्त को बचाने की जुगत जल्द ही मर्द और औरत के बीच की लड़ाई में बदल जाती है, और धीरे-धीरे इस लड़ाई में भारतीय टेलीविज़न के मशहूर सास-बहू धारावाहिकों जैसे पैंतरे आजमाए जाने लगते हैं. दोनों एक-दूसरे को खूब टक्कर दे रहे हैं. सोनू ने टीटू को उसकी पुरानी गर्लफ्रेंड के साथ बाहर घूमने भेज दिया है. सोनू जीत की तरफ बढ़ रहा है. टीटू से स्वीटी को उसकी फेवरेट पेस्ट्री मंगवानी थी, सोनू ने टीटू को बताया ही नहीं. सोनू पक्का बाजी मार ले जाएगा, पर ये क्या? टीटू तो बिना कहे ही पेस्ट्री ले आया. अब स्वीटी स्लो-मोशन में चेहरे पर विजयी मुस्कान लिए फ्रेम से बाहर जा रही है. 

अपनी 'पंचनामा' सीरीज से लेखक-निर्देशक लव रंजन युवाओं में वो पैठ बना चुके हैं, जहां लड़कियों को बेवकूफ़ और उनके साथ प्यार में पड़ने को 'चू**यापा' बोल कर बड़ी आसानी से हंसा जा सकता है. एक पैसे का दिमाग खर्च करने की जरूरत नहीं, और लड़कियों के प्रति अपनी घिसी-पिटी नफरत को बार-बार एक ही तरीके से परोस कर पैसे बनाने का फार्मूला भी तैयार. जाने-अनजाने लव अपनी फिल्म में इस 'टाट में पैबंद' वाले नुस्खे को ज़ाहिर भी कर देते हैं, जब करोड़ों के फ़र्नीचर से सजे-धजे बंगले के छत वाले कमरे में चारपाइयां पड़ी दिखाई देती हैं. कहने को तो इसे अपनी संस्कृति से बचे-खुचे लगाव की तरह भी देखा जा सकता है, पर मैं उसे मर्दों की दकियानूसी मानसिकता का प्रतीक मानता हूँ, जो फिल्म के मूल में बड़े गहरे तक धंस के बैठा है. यही वजह है, जो फिल्म के अंत को भी अर्थ देने से लव रंजन को रोक देती है. हर 'ब्रोमांस' का अंत 'होमोसेक्सुअलिटी' से जुड़ा नहीं हो सकता, पर जब आप खुद प्रयोग करने को आतुर हैं, तो इस झिझक को तोड़ने से परहेज कैसा? (फिल्म का अंत देख कर इस विषय पर बात करना ज्यादा जायज़ रहेगा).

अदाकारी में, कार्तिक आर्यन अपने करिश्माई व्यक्तित्व से पूरी फिल्म में छाये रहते हैं. शुरू के एक दृश्य में आप उन्हें 'पंचनामा' वाला कार्तिक समझने की भूल जरूर कर बैठते हैं, पर धीरे-धीरे फिल्म ज्यादा उस ढर्रे पर सरकने लगती है, जबकि कार्तिक वहीँ ठहर कर अपने आप को संभाल लेते हैं. सनी और नुसरत से कोई ख़ास शिकायत नहीं रहती. हाँ, आलोकनाथ को अपने 'संस्कारी' चोले से बाहर निकल कर परदे पर फैलते देखना मजेदार लगता है. ब्रोमांस का चेहरा जिस संजीदगी से 'दिल चाहता है' में उकेरा गया था, 17 साल बाद 'सोनू के टीटू की स्वीटी' तक आते-आते भोथरा हो गया है. अच्छा होता, फिल्म एक वेब-सीरीज के तौर पर सामने आती. कम से कम 'स्किप' कर जाने का अधिकार तो अपने ही हाथ रहता! पर शायद, तब पुराने गानों को रीमिक्स करके बड़े परदे पर धमाल मचाने का सुख निर्माता-निर्देशकों से जरूर छिन जाता. [1/5] 

Friday, 16 February 2018

अय्यारी: लम्बी, उबाऊ, नीरस! [2/5]

गनीमत है कि हिंदी फिल्मों के सीक्रेट सर्विस एजेंट्स अपने 'टारगेट' पर नज़र बनाये रखने की गरज से, आजकल सड़कों पर गाना गाते हुए दिखाई नहीं देते. रामानंद सागर की 'आँखें' याद हैं ना? हालाँकि भिखारियों का गेटअप अभी भी उनका पसंदीदा है. नीरज पांडे ने पिछले कुछ सालों में राष्ट्रीय सुरक्षा और देशप्रेम के सवालों से सीधे-सीधे तौर पर जुड़ी कहानियों के ज़रिये इतना तो किया ही है. इंटेलिजेंस के लोग अब लाल, पीले, हरे बल्बों से सजी दीवारों और पैनलों के आगे बैठे, रेडियो पर जोर जोर से 'ओवर एंड आउट' नहीं बोलते, बल्कि हफ़्तों तक बिना किसी हलचल एक कमरे में कैद रहते हैं, भीड़ भरी गलियों में, मौके की तलाश में 'टारगेट' के पीछे-पीछे चुपचाप चलते रहते हैं और काम निपटा कर वापस भीड़ में खो जाते हैं. 'अय्यारी' करीब करीब इतनी ही लम्बी, उबाऊ और नीरस फिल्म है. 

मोटी दलाली की लालच में, सेना का रिटायर्ड अधिकारी गुरिंदर सिंह (कुमुद मिश्रा) चौगुनी कीमतों पर सेना को अपने खास लोगों से ही हथियार खरीदने की पेशकश करता है. मना करने पर सेना के एक गुप्त गैरकानूनी संगठन का मीडिया में भंडाफोड़ करने की उसकी धमकी के बाद अब सेना की साख दांव पर है. खुफिया जानकारी मुहैया कराने वाला गद्दार उसी संगठन से है, मेजर जय बक्शी (सिद्दार्थ मल्होत्रा). और उसे रोकने की जिम्मेदारी है, संगठन के सबसे काबिल अफसर और मुखिया कर्नल अभय सिंह (मनोज बाजपेयी) पर. गुरु-शिष्य आमने-सामने हैं. दोनों की अपनी जायज़ वजहें हैं. दोनों के अपने-अपने दांव-पेंच. हालाँकि कहानी में ना ही जय की बग़ावत का कोई ठोस इरादा पता चलता है, ना ही अभय की कथातथित 'अय्यारी' का कोई बहुत दिलचस्प नमूना देखने को मिलता है.      

सेना का मनोबल न घटे, अक्सर इस वजह से सेना में भ्रष्टाचार की सुगबुगाहट को सिरे से नकारा जाता रहा है. नीरज पांडे जब 'अय्यारी' में सैनिक हथियारों की खरीद-फरोख्त में भ्रष्टाचार के मामले के इर्द-गिर्द अपनी कहानी बुनना शुरू करते हैं, तो लगता है कि उनके जरिये परदे पर कुछ हिम्मत दिखेगी, पर जल्द ही वो भी सेना के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करने की कवायद में कहानी के साथ जबरदस्त छेड़छाड़ करने लगते हैं. नतीजा, कहानी के सिरे इतने कटे-फटे और बेमतलब हो जाते हैं कि कहने को कोई मुद्दा बचता ही नहीं. तभी तो जहां सेना पर मीडिया द्वारा उनके गुप्त संगठन का खुलासा कर दिये जाने की तलवार लटक रही होती है, 'आदर्श हाउसिंग सोसाइटी' से मिलते-जुलते एक घोटाले की खबर के साथ उसे बदल देने में ही कर्नल अभय सिंह अपनी जीत मनवा लेता है. जय का रुख और रवैया भ्रष्टाचार को लेकर बहुत ही बचकाना लगता है, खास तौर पर तब जब वो भी उन्ही लोगों के साथ सौदेबाजी में जुट जाता है. यकीन मानिए, इसमें उसकी कोई सोची-समझी रणनीति भी नहीं है, जो फिल्म के आखिर में जाकर आपको चौंका दे. 

नीरज को एक बात की दाद तो मिलनी ही चाहिए. अपने लम्बे-लम्बे दृश्यों में जिस ठहराव के साथ वो आपको लिप्त कर लेते हैं, परदे पर सस्पेंस थ्रिलर का पूरा पूरा माहौल बन जाता है. दिक्कत तब पेश आती है, जब इन लम्बे-लम्बे दृश्यों का अंत और उद्देश्य फिल्म की कहानी में कोई बहुत बड़ा योगदान नहीं दे पाता. 'अय्यारी' कुछ बेहद जाने-पहचाने चेहरों (कुमुद मिश्रा, निवेदिता भट्टाचार्या, जूही बब्बर, राजेश तैलंग और आदिल हुसैन) और गिनती के बेहतरीन अभिनय (मनोज बाजपेयी, नसीर साब) से ही थोड़ी बहुत उम्मीद बचा पाती है. मनोज जहाँ अपनी ईमानदारी से पूरी फिल्म में छाए रखते हैं, नसीर साब मेहमान भूमिका में भी कमाल कर जाते हैं. सिद्धार्थ अभिनय में बहुत संयमित हैं, पर नीरज उन्हें फिल्म में 'स्टाइल' का पुट लाने के लिए ही ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. रकूल प्रीत बस फिल्म में होने के लिए ही हैं. 

आखिर में; 'अय्यारी' अपने विषय-वस्तु की वजह से रोचक तो लगती है, मगर नीरज पांडे की दूसरी फिल्मों (स्पेशल 26, बेबी) की तरह तनिक भी रोमांचक नहीं है. अभिनय में मनोज बाजपेयी की आसानी देखनी हो, तो भी उनकी अच्छी फिल्मों की लिस्ट बहुत बड़ी है. यहाँ तो मनोज सिर्फ आपको उकताहट से बचाने के लिए मौजूद रहते हैं. कहानी में धार न होने के बावजूद, अगर 'जय हिन्द', 'गद्दार' और 'देश', जैसे शब्द कहीं न कहीं आपमें बेमतलब की ऊर्जा भर देते हैं, तभी देखने जाईये. [2/5] 

Thursday, 8 February 2018

पैडमैन: सामाजिक झिझक 'सोखने' वाली एक सुपर-हीरो फिल्म! [3.5/5]

तमिलनाडु के अरुणाचलम मुरुगनान्थम भारत के उन चंद 'सुपरहीरोज' में से हैं, जिन्होंने सस्ते सेनेटरी पैड बनाने और उन्हें गाँव-गाँव में महिलाओं तक पहुंचाने के अपने लगातार प्रयासों के जरिये, टेड-टॉक्स जैसे वर्चुअल प्लेटफार्म से लेकर यूनाइटेड नेशन्स जैसे विश्वस्तरीय मंच पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है. उनकी सादगी, उनके बोलने के अंदाज़, उनके खुशमिजाज़ व्यक्तित्व और समाज में बदलाव लाने की उनकी ललक, उनकी जिद, उनके संघर्षों को, आर. बाल्की की फिल्म 'पैडमैन' एक फ़िल्मी जामा पहनाकर ही सही, परदे पर बड़ी कामयाबी से सामने रखती है. ये अरुणाचलम मुरुगनान्थम की ईमानदार कहानी और उनकी मजेदार शख्सियत ही है, जो थोड़ी-बहुत कमियों के बावजूद, फिल्म और फिल्म के साथ-साथ परदे पर मुरुगनान्थम का किरदार निभा रहे अक्षय कुमार को बहुत सारी इज्ज़त उधार में दे देती है. और जिसके वो हक़दार हैं भी, आखिर हिंदी फिल्मों में कितनी बार आपने एक मुख्यधारा के बड़े नायक को कुछ मतलब की बात करते सुना है, जो उसके सिनेमाई अवतार से अलग हो, जो सामाजिक ढ़ांचे में 'अशुद्ध, अपवित्र और अछूत' माना जाता रहा हो. 

'पैडमैन' महिलाओं की जिंदगी में हर महीने आने वाले उन 5 दिनों के बारे में बात करती है, जिसे अक्सर हम घरों में देख कर भी अनदेखा कर देते हैं. महीने भर की शॉपिंग-लिस्ट तैयार करते हुए कितनी बार आपने सेनेटरी पैड्स का जिक्र किया होगा? वो काली थैली या अखबार में लपेटे हुए पैकेट्स कैसे सबकी नज़रों से नज़र चुराते हुए किसी आलमारी में ऐसे दुबक जाते हैं, जैसे सामने खुल जाएँ तो क्या क़यामत आ जाये? मध्यप्रदेश का लक्ष्मीकांत चौहान (अक्षय कुमार) अपनी पत्नी गायत्री (राधिका आप्टे) को गन्दा कपड़ा इस्तेमाल करते देखता है, तो चौंक जाता है, "मैं तो अपनी साइकिल न साफ़ करूं इससे", और पत्नी 'ये हम औरतें की दिक्कत है, आप इसमें मत पड़िये' बोल के 5 दिन के लिए बालकनी में बिस्तर लगा लेती है. गली में क्रिकेट खेल रहे लौंडे भी खूब जानते हैं, "गायत्री भाभी का (5 दिन का) टेस्ट मैच चल रहा है". 

ये भारत के उस हिस्से की बात है, जहां पहली बार 'महीना' शुरू होने पर लड़की से औरत बनने का उत्सव मनाया जाता है. रस्में होती हैं, पूजा होती है, भोज होता है, पर सोना लड़की को बरामदे में ही पड़ता है. लक्ष्मी की समझ से परे है कि थोड़ी सी रुई और जरा से कपड़े से बनी इस हलकी सी चीज का दाम 55 रूपये जितना महंगा कैसे हो सकता है? और इसी गुत्थी को सुलझा कर सस्ते सेनेटरी पैड्स बनाने की जुगत में लक्ष्मी बार-बार नाकामयाबी, डांट-फटकार, सामाजिक बहिष्कार और पारिवारिक उथल-पुथल से जूझता रहता है. तब तक, जब तक परी (सोनम कपूर) के रूप में उसे उसकी पहली ग्राहक और एक मददगार साथी नहीं मिल जाता है. 

'पैडमैन' अपने पहले हिस्से में जरूर कई बार खुद को दोहराने में फँसी रहती है. लक्ष्मी का सेनेटरी पैड को लेकर उत्साह और उसे मुकम्मल तरीके से बना पाने की जिद खिंची-खिंची सी लगने लगती है. हालाँकि इस हिस्से में अक्षय से कहीं ज्यादा आपकी नज़रें राधिका आप्टे पर टिकी रहती हैं, जो एक बहुत ही घरेलू, सामान्य सी दिखने वाली और सामजिक बन्धनों के आगे बड़ी आसानी से हार मान कर बैठ जाने वाली औरत और पत्नी के किरदार में जान फूँक देती हैं. उनके लहजे, उनकी झिझक, उनके आवेश, सब में एक तरह की ईमानदारी दिखती है, जिससे आपको जुड़े रहने में कभी कोई तकलीफ महसूस नहीं होती. अक्षय जरूर शुरू शुरू में आपको 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा' के जाल में फंसते हुए दिखाई देते हैं, पर फिल्म के दूसरे भाग में वो भी बड़ी ऊर्जा से अपने आप को संभाल लेते हैं. एक्सिबिशन में अपनी मिनी-मशीन को समझाने वाले दृश्य और यूनाइटेड नेशन्स के मंच पर अपनी टूटी-फूटी अंग्रेजी की स्पीच के साथ, अक्षय अपनी पिछली कुछ फिल्मों की तुलना में बेहतर अभिनय करते दिखाई देते हैं. ये शायद इस वजह से भी हो, कि 'पैडमैन' कहीं भी उनके 'देशभक्त' होने और परदे पे दिखने-दिखाने के पूर्वनियोजित एजेंडे पर चलने से बचती है. 

'पैडमैन' अपने विषय की वजह से पहले फ्रेम से ही एक जरूरी फिल्म का एहसास दिलाने लगती है. बाल्की 'माहवारी' के मुद्दे पर पहुँचने में तनिक देर नहीं लगाते, न ही कभी झिझकते हैं. फिल्म अपने कुछ हिस्सों में डॉक्यूमेंटरी जैसी दिखाई देने लगती है, तो वहीँ सोनम के किरदार के साथ लक्ष्मी का अधूरा प्रेम-प्रसंग जैसे हिंदी फिल्म होने की सिर्फ कोई शर्त पूरी करने के लिए रखा गया हो, लगता है. दो-एक गानों, अमिताभ बच्चन के एक लम्बे भाषण और फिल्म के मुख्य किरदार का नाम बदल कर अरुणाचलम मुरुगनान्थम से उनकी उपलब्धियों, उनके व्यक्तित्व का एक छोटा हिस्सा चुरा लेने के एक बड़े अपराध को नज़रंदाज़ कर दिया जाये, तो 'पैडमैन' एक मनोरंजक फिल्म होने के साथ साथ एक बेहद जरूरी फिल्म भी है. परिवार के साथ बैठ के देखेंगे, तो सेनेटरी पैड को लेकर आपस की झिझक तोड़ेगी भी, सोखेगी भी. [3.5/5]     

Wednesday, 24 January 2018

पद्मावत: दकियानूसी पुरुष मानसिकता का 'पैम्फलेट'! [2.5/5]

ऐसे मुश्किल वक़्त में, जब हमारा समाज महिलाओं के सम्मान, उनके अधिकारों और उनके साथ होने वाले अपराधों के प्रति संवेदनशील होने की हर शर्त नज़रंदाज़ करता जा रहा है; मुझे समझ नहीं आता, संजय लीला भंसाली जैसे जज़्बाती और काबिल फ़िल्मकार को परदे पर 'पद्मावत' कहने की क्या सूझी? हालाँकि मैं देश की संस्कृति और इतिहास से जुड़े महाकाव्यों और लोकगाथाओं को सिनेमाई चोगा पहनाने के खिलाफ नहीं हूँ, और विषय चुनने की स्वतंत्रता को भी फ़िल्मकार का कलात्मक अधिकार समझता हूँ, मानता हूँ; फिर भी भंसाली जैसे फ़िल्मकार से इतनी तो उम्मीद की ही जा सकती थी. 'पद्मावत' राजपूतों की आन-बान और शान के भव्य कशीदों के बीच फँसी एक ऐसी दकियानूसी, गर्वीली और ठेठ पुरुष मानसिकता का 'पैम्फलेट' है, जिसे कोरा इतिहास मान कर देखना, सराहना और उसका जश्न मनाना किसी दुरुस्त दिमाग या दिल के लिए आसान नहीं होगा. राजपूताना शौर्य की नायिका को जौहर के लिए पति से अनुमति मांगते देखना ह्रदय-विदारक नहीं है, तो क्या है? 

भंसाली की 'पद्मावत', मलिक मोहम्मद जायसी के इसी नाम वाले महाकाव्य को अपनी बुनियाद बनाकर इतनी भव्यता से परदे पर परोसती है, कि लोकगाथा जैसी लगने वाली कमज़ोर कहानी उसके नीचे कई बार दम तोड़ती नज़र आती है. मेवाड़ के राजपूत राजा रतन सिंह (शाहिद कपूर) अपनी पहली पत्नी की जिद पूरी करने के लिए, अनूठे मोतियों की खोज में सिंहल (अब श्रीलंका) तक चले आये हैं. वापस लौट रहे हैं, तो साथ हैं सिंहल की राजकुमारी पद्मावती (दीपिका पादुकोण). पद्मावती का रूप इतना बाकमाल कि दिल्ली सल्तनत का खूंखार सुल्तान खिलजी (रणवीर सिंह) उन्हें देखने की गरज से, महीनों तक अपने सैनिकों के साथ मेवाड़ के किले के सामने डेरा जमाये बैठा रहा. दिवाली मनाई, होली मनाई और पता नहीं क्या-क्या! युद्ध टालने के लिए रानी की झलक आईने में दिखा दी गयी है. खिलजी की भूख बढ़ती जा रही है. और कहानी धीरे-धीरे ही सही, खिलजी के षडयंत्रों और राजा रतन सिंह के तेवरों से होते हुए रानी पद्मावती के जौहर की तरफ.

फिल्म का लुक हो, लोकेशन, बड़े-बड़े सेट या किरदारों का पहनावा; भंसाली अपनी पैनी नज़र से दृश्यों की सजावट का ख़ासा ध्यान रखते हैं. 'पद्मावत' जैसी पीरियड फिल्म को इसकी दरकार भी थी, और फिल्म को भंसाली अपने इस पागलपन से नवाजते भी खूब हैं, पर कहीं न कहीं दृश्यों की बनावट, किरदारों के तेवर और फिल्म में इस्तेमाल गानों का फिल्मांकन भंसाली की पिछली फिल्म 'बाजीराव मस्तानी' से इस हद तक मेल खाता है कि भंसाली साब की रचनात्मकता को सराहने की ललक जाती रहती है. फिल्म में रानी पद्मावती का जौहर को जायज़ ठहराने और वीरता का प्रतीक बताने वाले दृश्य के बाद, संजय लीला भंसाली का अपने ही बनाये उम्मीदों के सिनेमा के खंडहर में खुद को दोहराते, ढहते, ढमिलाते देखना दूसरा सबसे दिल बैठा देने वाला वाकया है. और परेशान करने वाला भी. 

अभिनय में 'पद्मावत' रणवीर सिंह के जुनूनी अदाकारी का जीता-जागता नमूना है. मांस के लोथड़े पर दांत गड़ाये, आँखों में धूर्तता और चालाकी की चमक जगाये और हाव-भाव में जिस तरह का पागलपन रणवीर लेकर आते हैं, बहुत अरसे बाद किसी हिंदी फिल्म के खलनायक में दिखे हैं. शाहिद थोड़े मिसफिट जरूर दिखते हैं, अपनी कद काठी की वजह से, पर अभिनय में कम ही निराश करते हैं. दीपिका परदे पर आग की तरह धधकती रहती हैं, और फिल्म के ज्यादातर दृश्यों को खूबसूरत बनाने में पूरा योगदान देती हैं. खिलजी के पुरुष-प्रेमी की भूमिका में जिम सरभ बोल-चाल के लहजे में कमज़ोर होने के बावजूद अच्छे लगते हैं. छोटी भूमिका में ही, अदिति राव हैदरी कहीं-कहीं दीपिका को भी पीछे छोड़ देती हैं.  

आखिर में; 'पद्मावत' एक राजपूताना मोम के पुतलों के अजायबघर जैसा है. देखने में भव्य, सुन्दर और शानदार, पर उन्हें बिना हिलते-डुलते पौने तीन घंटे तक एकटक देखते रहने का दुस्साहस कौन कर पायेगा भला? वैसे भी, तमाम उल-जलूल के विवादों के बीच 'पद्मावत' अब एक फिल्म से कहीं ज्यादा संवैधानिक, राजनीतिक और सामाजिक सतहों पर चल रही गुंडई के प्रति अपना विरोध दर्ज का आन्दोलन बन गई है, तो विरोध का स्वर मुखर करने के लिए ही सही, एक बार देखी जा सकती है. राजपूत कहलाने में सीना चौड़ा होता हो, तब तो जरूर...! [2.5/5] 

Friday, 12 January 2018

मुक्काबाज़: कश्यप की सबसे जिम्मेदार फिल्म! शायद साल की भी! [4/5]

मवेशी ले जा रहे कुछ लोगों पर 'गौरक्षकों' ने हमला कर दिया है. 'भारत माता की जय' के जोशीले नारों के बीच मोबाइल पर हिंसा के वीडियो बनाए जा रहे हैं. कोच साब के घर का गेंहू पिसवाने आया बॉक्सर श्रवण कुमार सिंह (विनीत सिंह) विडियो में मुंह बांधे एक तथाकथित गौरक्षक को तुरंत पहचान जाता है. वो उस जैसे तमाम कोच साब के बेरोजगार चेलों में से ही एक है. पूछने पर साफ़ मुकर जाता है, और श्रवण के लिए भी यह कोई हिला देने वाली बात नहीं है. इस एक वाकिये में ही देश की लगातार विकृत होती राजनीतिक प्रवृत्ति और गर्त में धकेली जा रही नयी पीढ़ी के सपनों का क्रूर मर्दन ज़ोरदार तरीके से सामने आता है. इस लिहाज़ से अनुराग कश्यप की 'मुक्काबाज़' शायद उनकी सबसे जिम्मेदार फिल्म मानी जा सकती है, जहाँ कुछ भी महज़ मनोरंजन के लिए नहीं है, बल्कि सब कुछ सिनेमा के जरिये कुछ कहने की एक सशक्त कोशिश.  

...और फिर ये तो सिर्फ शुरुआत है, 'मुक्काबाज़' वास्तव में एक ही फिल्म में कई फिल्में एक साथ हैं. अगर उत्तर प्रदेश की संस्कृति में भी राजस्थानी थाली जैसी कोई परिकल्पना प्रचलित होती तो मैं कहता कि 'मुक्काबाज़' उत्तर प्रदेश की एक बड़ी सी सामाजिक, राजनीतिक और जातीय जायकों से लबरेज एक मनोरंजक थाली है. कुछ स्वाद अगर ज़बान मीठा कर जाते हैं, तो कुछ ऐसे भी हैं जो दिल खट्टा, मन कड़वा और आँखें नम. हो सकता है कि पहली नज़र में 'मुक्काबाज़' उत्तर प्रदेश की धमनियों में रचे-बसे, जाति के सामाजिक खेल और खेलों में जाति की राजनीति के उलझाव में फँसी एक सुलझी हुई प्रेम-कहानी ही लगे, जहां नायिका नायक को लड़ता देख मुग्ध हो जाती है, सामाजिक दुराव और जातिगत भेद के बावजूद दोनों में प्रेम पनपता है और फिर खलनायक की साज़िशों और जिंदगी की कठोर सच्चाईयों से हाथापाई करते दोनों आखिर में एक सुखद अंत की ओर बढ़ निकलते हैं. ऐसा है भी, पर इस बार कहानी के तेवर सीधे सीधे मुद्दों को निशाना बनाने से परहेज़ नहीं करते. 

स्टेट बॉक्सिंग फेडरेशन के शीर्ष पर काबिज़ कोच भगवान दास मिश्रा (जिम्मी शेरगिल) अपने ही साथी कोच से उसकी जाति पूछने का सिर्फ दुस्साहस ही नहीं करता, उसके हरिजन होने पर वेटर को अलग बर्तन में पानी पेश करने का आदेश भी पूरे गर्व से देता है. अपनी भतीजी से प्यार करने के खामियाज़े में अपने ही सबसे अच्छे बॉक्सर श्रवण को बॉक्सिंग रिंग से दूर रखने में पूरा दम ख़म झोंक देता है. उधर देश के लिए खेलने की आशायें पाले प्रतिभावान खिलाड़ी कोच साब की मालिश करने, उनके घर का राशन लाने और अपने अधिकारियों की बीवियों को 'मार्केटिंग' पर ले जाने में जाया हो रहे हैं.

'मुक्काबाज़' के ज़रिये, परदे पर अनुराग दो बेहद सशक्त किरदार परोसते हैं. वो भी एक-दूसरे के आमने-सामने. सुनयना (ज़ोया हुसैन) बोल नहीं सकती, पर उसे सुनने-समझने में आपको ज्यादा मुश्किल नहीं होगी. सुनयना का छिटकना, उसका गुस्सा, उसकी झुंझलाहट, उसकी दिलेरी, उसके ताव, उसके तेवर सब बेआवाज़ हैं, पर बेख़ौफ़ और बेरोक-टोक बोलते हैं. सुनयना के किरदार में ज़ोया कहीं भी कमतर नहीं दिखाई पड़तीं. ठीक वैसे ही, जैसे श्रवण के किरदार में विनीत. निराश, हताश और गुस्सैल श्रवण जैसे परदे पर हर वक़्त पटाखे की तरह फटता रहता है, और हर बार धमाका उतना ही बड़ा होता है, उतना ही जोरदार. 

विनीत का एक बॉक्सर के तौर पर, अपने किरदार श्रवण में ढल जाना बॉलीवुड के अभिनेताओं के लिए एक चुनौती बनकर उभरता है. सिर्फ कद-काठी तक ही नहीं, विनीत अपने अदाकारी में भी वो धार-वो चमक लेकर आते हैं, जिसे भुलाना आसान नहीं होगा. अपने पिता के साथ उनकी खीज़ भरी बहस का दृश्य हो, सुनयना के साथ 'साईन लैंग्वेज' में बात करने वाले दृश्य या फिर बॉक्सिंग रिंग में उनकी शानदार मौजूदगी; विनीत इस फिल्म को अपना सब कुछ बक्श देते हैं. फ़िल्मकार के तौर पर अनुराग कश्यप को तो सीमाएं लांघते आपने दसियों बार सराहा होगा, पर इस बार विनीत कुमार सिंह के अभिनय में वो लोहा दिखेगा कि तमाम खान, कपूर जैसे बॉलीवुड के दिग्गज़ धूल चाटते नज़र आयेंगे. मेरी लिए, साल की सबसे दमदार परफॉरमेंस.

'मुक्काबाज़' कोई 'स्पोर्ट्स' फिल्म नहीं है, जो खिलाड़ियों की जीत का रोमांच बेचने में यकीन रखती हो, पर जितनी देर भी परदे पर खेलों-खिलाड़ियों और उनके इर्द-गिर्द जाल की तरह फैले राजनीति के बारे में बोलती है, असल स्पोर्ट्स फिल्म ही लगती है. यूँ तो फिल्म में बॉक्सर श्रवण हैं, 'मुक्काबाज़' में सबसे जोरदार घूंसे और मुक्के अनुराग कश्यप की तरफ से ही आते हैं. कभी तीख़े व्यंग्य की शक्ल में, तो कभी मज़ेदार संवादों के ज़रिये. हालाँकि ढाई घंटे की इस लम्बी फिल्म पर दूसरे हिस्से में कई बार अपने आप को दोहराने का आरोप भी जड़ा जा सकता है, पर दिलचस्प संगीत, जबरदस्त अभिनय, मनोरंजक संवादों और कहानी में बखूबी पिरोये गए मुद्दों की अहमियत फिल्म को अलग ही मुकाम तक ले जा छोडती है. [4/5]     

Friday, 29 December 2017

ज़बां गुनगुनाती है...(2017's 15 Best Hindi Movie Songs)


# kidre javaan- Haraamkhor
Singer: Jasleen Royal
Lyrics: Aditya Sharma
Composed by: Jasleen Royal

# saahiba- Phillauri
Singers: Pawni Pandey, Romy
Lyrics: Anvita Dutt
Composed by: Shashwat Sachdev

# ye ishq hai- Rangoon
Singer: Arijit Singh
Lyrics: Gulzar
Composed by: Vishal Bhardwaj

# mann beqaid hua- Anaarkali of Aarah
Singer: Sonu Nigam
Lyrics: Prashant Ingole
Composed by: Rohit Sharma

# maana ke hum yaar nahin (female)- Meri Pyaari Bindu
Singer: Parineeti Chopra
Lyrics: Kausar Munir
Composed by: Sachin-Jigar

# o sona tere liye- Mom
Singers: AR Rahman, Shashaa Tirupati
Lyrics: Irshad Kamil
Composed by: AR Rahman

# phir wahi- Jagga Jasoos
Singer: Arijit Singh
Lyrics: Amitabh Bhattacharya
Composed by: Pritam

# tujhe namami ho- Raag Desh
Singers: Shreya, Sunidhi, KK, Rana Mazumder
Lyrics: Sandeep Nath
Composed by: Rana Majumder

# ghar- Jab Harry Met Sejal
Singers: Nikita Gandhi, Mohit Chauhan
Lyrics: Irshad Kamil
Composed by: Pritam

# barfani (female)- Babumoshai Bandookbaaz
Singer: Orunima Bhattacharya 
Lyrics: Ghalib Asad Bhopali
Composed by: Gaurav Dagaonkar

# chal tu apna kaam kar- Newton
Singer: Raghubir Yadav
Lyrics: Irshad Kamil
Composed by: Rachita Arora

# title track- Tu Hai Mera Sunday
Singer: Shalmali Kholgade
Lyrics: Milind Dhaimade
Composed by: Amartya Rahut (Bobo)

# rafu- Tumhari Sulu
Singer: Ronkini Gupta
Lyrics: Santanu Ghatak
Composed by: Santanu Ghatak

# dil diyaan gallan (unplugged)- Tiger Zinda Hai
Singer: Neha Bhasin
Lyrics: Irshad Kamil
Composed by: Vishal and Shekhar

# rozaana- Naam Shabana
Singer: Shreya Ghoshal
Lyrics: Manoj Muntazir
Composed by: Rochak Kohli

Wednesday, 27 December 2017

सिनेमा के 'दाग'...(2017's 10 Worst Hindi Films)


बादशाहो
जिस फिल्म का टाइटल ही बेमतलब, बकवास और सिर्फ बोलते वक़्त वजनी लगने की गैरत से रख दिया गया हो, फिल्म की कहानी से कुछ लेना-देना न हो, उस फिल्म से बनावटीपन और थकाऊ मनोरंजन के सिवा आप चाहते भी क्या थे? तकलीफ ये है कि लाखों (उस वक़्त के हिसाब से) के सोने की कीमत और अहमियत बार-बार बताने वाली 'बादशाहो', अपनी चीख-पुकार, चिल्लाहट से सोने के असली सुख से भी आपको वंचित रखती है. वरना सवा दो घंटे की नींद भी कम फायदे का सौदा नहीं होती!

गोलमाल अगेन
हिंदी फिल्मों में कॉमेडी का स्तर कुछ इस तलहटी तक जा पहुंचा है, कि रोहित शेट्टी की नयी फिल्म 'गोलमाल अगेन' देख कर सिनेमाहॉल से निकलते हुए ज्यादातर सिनेमा-प्रेमी एक बात की दुहाई तो ज़रूर देंगे, "कम से कम फिल्म में फूहड़ता तो कम है, हंसाने के लिए द्विअर्थी संवादों का इस्तेमाल भी तकरीबन ना के बराबर ही है". हालाँकि जो मिलता है, उसी से समझौता कर लेने और संतुष्ट हो जाने की, हम दर्शकों की यही प्रवृत्ति ही 'गोलमाल' की गिरती साख (जो पहली फिल्म से शर्तिया तौर पर बनी थी) और हंसी के लगातार बिगड़ते ज़ायके के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है. सिर्फ अश्लीलता न होने भर की वजह से 'गोलमाल अगेन' को 'पारिवारिक' और 'मनोरंजक' कह देना महज़ एक बचकानी टिप्पणी नहीं होगी, बल्कि हमारी कमअक्ली का एक बेहतरीन नमूना भी. 

राब्ता
'राब्ता' देखते हुए एक ख्याल बार-बार दिमाग में हथौड़े की तरह बजता है कि आखिर कोई भी समझदार इस तरह की बेवकूफ़ी भरी, घिसी-पिटी, वाहियात कहानी पर फिल्म बनाने और उसमें काम करने के लिए राजी क्यूँ, और क्यूँ होगा? फिर याद आये इस फिल्म से निर्देशन में कदम रख रहे दिनेश विजान साब, जो खुद 'बीइंग सायरस', 'लव आज कल', 'कॉकटेल', 'बदलापुर' और 'हिंदी मीडियम' के प्रोड्यूसर रह चुके हैं, और फिर अचानक ही मन की सारी शंकायें, दुविधाएं झट काफ़ूर हो गयीं. 'बॉस हमेशा सही होता है' की तर्ज़ पर एक कहावत फिल्म इंडस्ट्री में भी बहुत मशहूर है, 'मेरा पैसा, मेरा तमाशा'. पैसों की गड्डियों के नीचे दबी डेढ़ सौ पेज की स्क्रिप्ट में खामियां किसे दिखतीं भला. 

फुकरे रिटर्न्स
2013 में मृगदीप सिंह लाम्बा की 'फुकरे' ने दिल्ली के ख़ालिस लापरवाह लौंडों, उनकी छोटी-छोटी तिकड़मों और उनके बेबाक 'दिल्ली-पने' से आपको खूब गुदगुदाया होगा, तब उंगलियाँ नर्म थीं उनकी, चेहरे मासूम और कोशिशें ईमानदार. 4 साल बाद, 'फुकरे रिटर्न्स' में गुदगुदाने की कोशिश करने वाली वही उंगलियाँ अब चुभने लगी हैं. कोशिशें औंधें मुंह गिर पड़ती हैं और फिल्म में मासूमियत की जगह अब भौंडेपन ने ले ली है. नंगे पिछवाड़ों पर सांप डंस रहे हैं, और किरदार चूस-चूस कर उनका ज़हर निकाल रहे हैं. ऐसे दृश्य 'ग्रेट ग्रैंड मस्ती' जैसों में तो बड़ी बेशर्मी से फिट हो ही जाते हैं, यहाँ क्या कर रहे हैं? समझ से परे है.

सरकार 3 
‘फैक्ट्री’ बंद हो चुकी है. ‘कम्पनी’ खुल गयी है. बाकी का सब कुछ वैसे का वैसा ही है. पुराने माल को उसी पुराने बदरंग पैकेजिंग में डाल कर वापस आपको बेचने की कोशिश की जा रही है. अपनी ही फिल्म के एक संवाद ‘मुझे जो सही लगता है, मैं करता हूँ’ को फिल्ममेकर राम गोपाल वर्मा ने अपनी जिद बना ली है. ‘सरकार 3’ जैसी सुस्त, थकाऊ और नाउम्मीदी से भरी तमाम फिल्में, एक के बाद एक लगातार अपने ज़माने के इस प्रतिभाशाली निर्देशक को उसके खात्मे तक पहुंचाने में मदद कर रही हैं. तकनीकी रूप से फिल्म-मेकिंग में जिन-जिन नये, नायाब तजुर्बों कोरामगोपाल वर्मा की खोज मान कर हम अब तक सराहते आये थे, वही आज इस कदर दकियानूसी, वाहियात और बेवजह दिखाई देने लगे हैं कि दिल, दिमाग और आँखें परदे से बार-बार भटकती हुई अंधेरों में सुकून तलाशने लगती है. और ऐसा होता है, क्यूंकि रामगोपाल वर्मा के सिनेमा की भाषा अब बासी हो चली है. पानी ठहरा हुआ हो, तो सड़न पैदा होती ही है. अपने दो सफल प्रयासों (सरकार और सरकार राज) के बावजूद, ‘सरकार 3’ से उसी सड़न की बू आती है.

मशीन
Machine retreads formula tropes that, by all reckoning, went out of vogue in the last millennium. They look completely out of place in a film that aspires to give Bollywood a male star of the future. Mustafa plays an anti-hero who is accused by the heroine of being a machine - heartless. This charge is levelled against him in the dying minutes of the film. But it doesn't take the audience that long to figure out that Machine is pure drivel - mindless and pointless. (Saibal Chatterjee, Noted Film Critic)

जुड़वाँ 2
बॉलीवुड का एक ख़ास हिस्सा बार-बार बड़ा होने से और समझदार होने से इनकार करता आ रहा है. डेविड धवन भी उनमें शामिल हो चले हैं. डेविड के लिए मनोरंजन के मायने और तौर-तरीके अभी भी वही हैं, जो 20-25 साल पहले थे. हंसी के लिए ऐसी फिल्में मज़ाक करने से ज्यादा, किसी का भी मज़ाक बनाने और उड़ाने में ख़ासा यकीन रखती हैं. तुतलाने वाला एक दोस्त, 'तोतला-तोतला' कहकर जिस पे कभी भी हंसा जा सके. 'पप्पू पासपोर्ट' जैसे नाम वाले किरदार जो अपने रंगभेदी, नस्लभेदी टिप्पणी को ही हंसी का हथियार बना लेते हैं. लड़कियों को जबरदस्ती चूमने, छेड़ने और इधर-उधर हाथ मारने को ही जहां नायक की खूबी समझ कर अपना लिया जाता हो, अधेड़ उम्र की महिलाओं को 'बुढ़िया' और 'खटारा गाड़ी' कह के बुलाया जाता हो. मनोरंजन का इतना बिगड़ा हुआ और भयावह चेहरा आज के दौर में भी अगर 'चलता है', तो मुझे हिंदी सिनेमा के इस हिस्से पर बेहद अफ़सोस है.

हसीना पारकर 
The most interesting part of the film comes right in the end when, accompanying the closing credits, we get a sepia-tinted series of photographs of the real people depicted in this story. Those pictures would have held far more meaning for us though if Haseena Parkar had breathed life into its characters. Sadly, we don't learn much more about them from watching the film in its entirety, than if we had spent about two hours scouring newspaper archives or just staring at those pics. (Anna MM Vetticad, Noted Film Critic)

ट्यूबलाइट 
'ट्यूबलाइट' के होने की वजह मेरे हिसाब से 'बजरंगी भाईजान' की कामयाबी में ही तलाशी गयी होगी. चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने कबीर खान के हाथ अब एक ऐसा अमोघ फार्मूला लग गया था, जिसमें बॉक्स-ऑफिस पर सिक्कों की खनक पैदा करने की हैसियत तो थी ही, आलोचकों और समीक्षकों का मुंह बंद कराने की ताकत और जुड़ गयी. एक सीधी-सादी दिल छू लेने वाली कहानी, थोड़ा सा 'बॉर्डर-प्रेम' का पॉलिटिकल तड़का, चुटकी भर 'बीइंग ह्यूमन' का वैश्विक सन्देश और साफ़ दिल रखने की तख्ती हाथों में लेकर घूमते एक बेपरवाह 'भाईजान'. 'ट्यूबलाइट' बड़े अच्छे तरीके और आसानी से इसी ढर्रे, इसी तैयार सांचे में फिट हो जाती है, पर जब आग में तप कर बाहर आती है तो नतीज़ा कुछ और ही होता है. मिट्टी ही सही नहीं हो, तो ईटें भी कमज़ोर ही निकलती हैं. 

हाफ गर्लफ्रेंड 
कुछ लोगों को साहित्य और सिनेमा के नाम पर कुछ भी परोसने की लत लग चुकी है. ‘हाफ गर्लफ्रेंड’ बनाने के पीछेमोहित सूरी की वजह थी, इसी नाम से चेतन भगत की ‘बेस्टसेलिंग’ किताब; पर चेतन भगत के लिए ‘हाफ़ गर्लफ्रेंड’लिखने की क्या माकूल वजह थी, मुझे नहीं समझ आता. एक ऐसी किताब, जिसके किरदारों में न रीढ़ की हड्डी हो, न दिमाग़ की नसें, न कायदे के कुछ ठीक-ठाक ज़ज्बात, आखिर क्यूँ कर कोई पढ़ेगा और फिर परदे पर देखेगा भी? तमाम प्रेम-कहानियों में दो आधे-अधूरे मिल कर एक हो ही जाते हैं, ‘हाफ़ गर्लफ्रेंड’ इतनी वाहियात है कि आधा और आधा मिल के भी आधे-अधूरे ही रहते हैं.