Friday, 17 June 2016

उड़ता पंजाब (A): चुभती सच्चाई. चुभती फिल्म. [4/5]

गुलज़ार साब की ‘माचिस’ जैसी कुछेक को अलग रख कर देखें तो पंजाब को हिंदी फिल्मों ने हमेशा मीठी चाशनी में ही लपेट कर परोसा है. मुंबई का कैमरा जब भी अमृतसर, भटिंडे या पटियाले में लेंस से कैप हटाता है, हरे-पीले सरसों के खेतों में लाल-नीली चुन्नियाँ लहराती मुटियारें रोटी लेकर दौड़ लगा रही होती हैं. दिन में बैसाखी के मेले और रात में लोहड़ी का जश्न, इससे आगे बढ़ने की हिम्मत पंजाबी सिनेमा ने तो कभी-कभी दिखाई भी है पर बॉलीवुड कमोबेश बचता ही रहा है. अब तक. ‘उड़ता पंजाब’ के आने तक. पंजाब की जो सपनीली तस्वीर आपने ‘यशराज फिल्म्स’ के चश्मे से देखी थी और आज तक अपने जेहन में बसाये घूम रहे थे, अभिषेक चौबे की ‘उड़ता पंजाब’ पहले फ्रेम से ही उस तस्वीर पे चिपके ‘एनआरआई कम्पेटिबल’ चमक को खरोंचने में लग जाती है. सीने पर आतंकवाद का बोझ और पीठ पर ’84 के ज़ख्म उठाये पंजाब को अब हेरोइन, स्मैक और कोकीन की परतों ने ढक लिया है. खुरदुरी, किरकिराती, पपड़ी जमी परतों ने!  

सरसों के खेतों की जगह अब फिल्म बेरंग सफेदे [यूकेलिप्टस] के पेड़ों से शुरू होती है, वो भी रात के अँधेरे में. बॉर्डर पार से पाकिस्तान की जर्सी पहने एक खिलाड़ी हेरोइन का एक पैकेट ऐसे फ़ेंक रहा है, जैसे ओलिंपिक में मेडल जीत लेने का ये उसका आख़िरी चांस हो. नेताओं और पुलिस की मिली-भगत से चल रहे ड्रग्स के इस काले कारोबार का शिकार सब हैं, स्कूल-कॉलेज जाने वाले लड़कों से लेकर उनके पसंदीदा रॉकस्टार टॉमी सिंह [शाहिद कपूर] तक. अपनी मर्ज़ी और खुदगर्जी भरे गानों में गालियाँ बकने वाला ये रॉकस्टार हमेशा नशे में धुत्त, सनकी और गुस्सैल किस्म का आम नशेड़ी है, जिसका अपने ऊपर कोई जोर नहीं. सरताज सिंह [दिलजीत दोसंझ] एक आम पुलिसवाला है जिसे सच्चाई मानने में कोई ख़ास तकलीफ़ नहीं है तब तक, जब तक उसका छोटा भाई खुद नशे में गिरफ्त में नहीं आ जाता. डॉ. प्रीत [करीना कपूर खान] के साथ मिलकर अब सरताज इस पूरे रैकेट की जड़ तक पहुंचना चाहता है. इन सब के बीच एक बिहारन [आलिया भट्ट] भी हर पल पिस रही है. अच्छी ज़िन्दगी की तलाश ने उसे इस गर्त में ला फेंका है, अब जाने कब और कैसे इस कैद से उसकी रिहाई मुमकिन होगी?

फिल्म शुरू ही हुई है, जब थाने की कोठरी में बंद टॉमी अपने रसूख की धौंस में हो-हल्ला मचा रहा है और अपने छोटे भाई की हालत से हिला हुआ सरताज बाहर बैठा नशे को कोस रहा है. थोड़ी ही देर में आप देखते हैं, सरताज टॉमी की थप्पड़ों और घूंसों से जम कर धुलाई कर रहा है. ये बॉलीवुड के लिए नया है. इस एक वाकये से अभिषेक चौबे तय कर देते हैं कि फिल्म किरदारों को तवज्जो देती है न कि उन्हें निभाने वाले अभिनेताओं के कद को. वरना ये वही बॉलीवुड है जो परदे पर किस बड़े स्टार का नाम पहले आएगा, जैसे फ़िज़ूल के हाय-तौब्बा से निर्माताओं की जान सुखा देता था. ‘उड़ता पंजाब’ जमीनी हकीकत को इतनी बेरूखी और बेदर्दी से आपके सामने रखती है कि इसके कुछ दृश्य आपको फिल्म ख़त्म होने के काफी बाद तक परेशान करते रहते हैं. ‘एनएच 10’ के आख़िरी सीन में अनुष्का का किरदार किस बेखौफ़ियत से सिगरेट जलाती है और फिर लोहे की सरिया जमीन पर खरोंचते हुए विलेन की ओर बढती है. आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं. ‘उड़ता पंजाब’ उसी धारदार कलम [सुदीप शर्मा] से निकली है.

अभिनय में शाहिद अपने ‘कमीने’ वाले पागलपन में पूरे जोश-ओ-खरोश से वापस लौट आये हैं. ठहराव में तो अभी भी गुंजाईश बहुत है पर जिस उतावलेपन और बेचैनी से वो ड्रग एडिक्ट की भूमिका निभाते हैं, कहीं कहीं अपने पिता पंकज कपूर जी की झलक छोड़ जाते हैं. करीना ठीक ही लगती हैं. दिलजीत वाकई में दिल जीत लेते हैं. एक ख़ास किस्म की सादगी तो है ही उनमें, अभिनय में भी कहीं कोई कमी नहीं दिखती. देखना होगा कि बॉलीवुड उन्हें आगे किस तरह ट्रीट करता है. और अब बात आलिया की. आलिया फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी हैं. उनकी बिहारी बोली में थोड़ी घालमेल जरूरी दिखती है, पर जिस दर्द को वो बिना बोले फिल्म में जीते नज़र आती हैं, वो आलिया को आज के दौर के नामचीन अभिनेताओं की श्रेणी में ला खड़ा करने के लिए काफी है.

अंत में, ‘उड़ता पंजाब’ आसान फिल्म नहीं है और एकदम से परफेक्ट भी नहीं. पर फिल्म में कुछ ऐसा भी नहीं, जो नहीं कहा जाना चाहिए या जिसे बेहतर तरीके से कहा जा सकता था. गालियों की थोड़ी अति ज़रूर है पर उनसे कहीं ज्यादा चुभती है सच्चाई. फिल्म के एक हिस्से में टॉमी अपने चाहनेवालों के सामने स्टेज में बेबाकी से कह जाता है, “मुझे सिर्फ ड्रग्स पता था. अपने गाने में मैंने वही डाल दिया. मुझसे गये-गुजरे तुम लोग हो, जिन्होंने उसमें फिलोसोफी ढूंढ ली और मुझ 22 साल के लौंडे को रॉकस्टार बना दिया”. ‘उड़ता पंजाब’ देखने से ज्यादा, सोचने की फिल्म है! देखिये, सोचिये और प्लीज शुतुरमुर्ग मत बने रहिये. [4/5]      

Friday, 10 June 2016

तीन: कहानी रिटर्न्स! [3/5]


फिल्मों के नाम इन दिनों काफी चर्चा में हैं. तो शुरुआत नाम से ही करते हैं. रिभु दासगुप्ता की ‘तीन’ का नाम ‘तीन’ ही क्यूँ रखा गया, ‘कहानी-2’ क्यूँ नहीं; फिल्म देखने के बाद भी मेरी समझ से परे है. कहीं ‘तीन’ सुजॉय घोष की ‘कहानी’ श्रृंखला की वो तीसरी पेशकश तो नहीं, जो ‘कहानी-2’ से पहले आ गयी? खैर, नाम के पीछे का रहस्य जो भी हो, एक बात तो तय है कोरियाई क्राइम थ्रिलर ‘मोंटाज़’ की ऑफिशिअल रीमेक ‘तीन’ पर सुजॉय घोष की ‘कहानी’ का असर साफ़-साफ़, सुन्दर-सुन्दर और सही मायनों में दिखता है. सुजॉय फिल्म के निर्माताओं में सबसे प्रमुख हैं तो ये गैर-इरादतन, नाजायज़ या हैरतंगेज़ भी नहीं लगता. बहरहाल, ‘तीन’ एक बहुत ही करीने से बनाई गयी थोड़ी अलग किस्म की थ्रिलर है, जो आपको हर पल नए-नए रहस्यमयी खुलासों की बौछार से असहज भले ही महसूस न कराये, एक जानलेवा ठहराव के साथ आपको अंत तक कुरेदती ज़रूर रहती है.

जॉन बिश्वास [अमिताभ बच्चन] पिछले आठ साल से पुलिस स्टेशन के चक्कर लगा रहे हैं. किडनैपिंग के बाद उनकी नातिन की मौत एक एक्सीडेंट में हो गयी थी, जिसके बाद अब तक किडनैपर का कोई सुराग पुलिस के हाथ नहीं लगा है. केस लगभग बंद हो चुका है. उस वक़्त के इंस्पेक्टर मार्टिन दास [नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी] नाकामी का बोझ सीने पर लिये अब चर्च में फ़ादर बनकर सुकून तलाश रहे हैं. नई पुलिस ऑफिसर सरिता सरकार [विद्या बालन] को भी जॉन से पूरी हमदर्दी है पर कहीं से कोई उम्मीद दिखाई नहीं देती. ऐसे में एक दिन, एक और बच्चे की किडनैपिंग का मामला सामने आता है. सब कुछ दोबारा ठीक वैसे ही घट रहा है जैसे आठ साल पहले जॉन के साथ हुआ था.

घटनाओं का पहले तो बड़ी बेदर्दी से इधर-उधर घाल-मेल कर देना और फिर धीरे-धीरे उन्हें उनके क्रम में पिरोकर आईने जैसी एक साफ़ तस्वीर सामने रख देना, किसी भी थ्रिलर के लिए ये सबसे अहम् चुनौती होती है. रिभु दासगुप्ता इन दोनों पहलुओं को बराबर तवज्जो देने में थोड़े ढीले नज़र आते हैं. जहां फिल्म के दूसरे भाग में रिभु बेतरतीब सिरों को जोड़ने में जल्दबाजी दिखाने लगते हैं, वहीँ पहले भाग में किरदारों के भीतर के सूनेपन, खालीपन और उदासी में सोख लेने वाली धीमी गति आपको परेशान भी करती रहती है. हालाँकि कोलकाता शहर के किरदार की रंगीनियत को बखूबी स्क्रीन पर उतार देने में रिभु कहीं कमज़ोर नहीं पड़ते. सरकारी दफ़्तरों में धूल चाटती फाइलों के अम्बार के बीच बैठे रूखे चेहरे हों या घरों-दीवारों पर लटकती बाबा आदम के ज़माने की तस्वीरें और तश्तरियां; फिल्म का आर्ट डायरेक्शन काबिल-ए-तारीफ है.

अमिताभ बच्चन जिस कद के अभिनेता हैं, उन्हें अब कुछ भी साबित करने की जरूरत नहीं है. सिनेमा और अभिनय के प्रति उनकी ललक भी बढ़ती उम्र के साथ बढ़ती ही रही है, पर ‘तीन’ में उनका अभिनय कोई नई ऊँचाईयाँ हासिल नहीं करता, बल्कि एकरसता ही दिखाई देती है. हाँ, उन्हें अपनी ही उम्र को परदे पर जीते देखना कोई कम अनुभव नहीं है. नवाज़ुद्दीन अच्छे हैं, पर उनके किरदार में थोड़ी उलझन है. कहीं वो फिल्म में हंसी की कमी पूरी करने में लगा दिए जाते हैं (चर्च वाले दृश्यों में खासकर) तो कहीं एक बड़े संजीदा पुलिस वाले की भूमिका जीने में मशगूल हो जाते हैं. विद्या बालन और सब्यसाची चक्रबर्ती छोटी भूमिकाओं में भी स्क्रीन पर चमक बिखेरने में कामयाब रहते हैं.

कोरियाई फिल्म ‘मोंटाज़’ अगर आपने देखी हो, तो ‘तीन’ दूसरे रीमेक की तरह बेशर्मी से दृश्यों की नक़ल करने की होड़ नहीं दिखाती, बल्कि एक बेहतरीन आर्ट डायरेक्शन और सधे हुए अभिनय के साथ आपको कुछ अलग परोसने की कोशिश करती है. ‘मोंटाज़’ में जहां क्राइम और उससे जुड़े घटनाक्रम को रोमांचक बना कर पेश किया गया है, ‘तीन’ किरदारों के भीतर और बाहर दोनों की दुनिया को तसल्ली से देखने और दिखाने में अपना वक़्त ज्यादा लगाती है. हर कहानी ‘कहानी’ नहीं हो सकती, पर इसमें बहुत कुछ है जो आपको ‘कहानी’ की याद दिलाता रहेगा...और अच्छी यादें किसे पसंद नहीं? [3/5]                

Friday, 3 June 2016

तिथि [कन्नड़]: ...ये जो है ज़िन्दगी! [4.5/5]

जिन्दगी की कठोर, निर्मम, धीर-गंभीर सच्चाईयां जो हास्य उत्पन्न करती हैं, उनका कोई सानी नहीं. करीने से सजे-सजाये, चटख रंगों में रंगे-पुते, ठंडे-हवादार कमरों में बैठकर गढ़े गए चुटकुलों की शेल्फ़-लाइफ़ कुछ घंटों, कुछ दिनों से ज्यादा की कतई नहीं होती, पर असल जिन्दगी के दांव-पेंच कुछ अलग ही मिज़ाज के होते हैं. आपकी व्यथा, आपकी पीड़ा, आपका दुःख कब किसी दूसरे के लिए हास्य का सबब बन जाता है, आपको अंदाज़ा भी नहीं रहता. कुल मिला के 26 साल के हैं फ़िल्मकार राम रेड्डी, पर अपनी पहली ही कन्नड़ फिल्म ‘तिथि’ में जिस सफाई से ज़िन्दगी को उधेड़-उधेड़ कर आपके सामने फैलाते हैं और फिर उतनी ही बारीकी से उसे किरदारों के इर्द-गिर्द बुनते भी हैं, उसे देखकर अगर आप बड़े हैं तो हैरत और अगर बराबर उम्र के हैं तो जलन होना लाज़मी है.

कर्नाटक के दूर किसी एक छोटे से गाँव में, कच्चे रास्ते के उस पार बैठा एक बूढा आदमी [सिंगरी गौड़ा] आने-जाने वालों पर तीखी फब्तियां कस रहा है. बच्चे हंस रहे हैं. औरतें बिना कोई तवज्जो दिए आगे बढ़ जाती हैं. थोड़ी ही देर बाद गली के अगले मोड़ पर बूढ़ा आदमी लुढ़का हुआ मिलता है. शोर मच गया है, “सेंचुरी गौड़ा मर गए”. सेंचुरी नाम उन्हें सौ साल पूरे कर लेने पर मिला था. अंतिम-क्रिया के लिए जोह भेजा जा रहा है, पर बड़ा बेटा गडप्पा [चन्नेगौड़ा] निरा औघड़ है. एक नंबर का घुमक्कड़ और टाइगर ब्रांड लोकल व्हिस्की का पियक्कड़. 11 दिन बाद की ‘तिथि’ निकली है. आस-पास के गाँवों से कम से कम 500 लोगों को मांसाहारी भोज कराना होगा. सारे का सारा दारोमदार अब गडप्पा के बेटे तमना [थम्मेगौड़ा] के माथे है. जरूरी पैसों के लिए जमीन बेचना होगा, पर उस से पहले ज़मीन गडप्पा से अपने नाम लिखवानी पड़ेगी. गडप्पा माने तब ना?

फिल्म में बहुत कम मौके ऐसे आते हैं, जब आपको ‘तिथि’ के एक फिल्म होने का एहसास होता है, वरना तो लगता है जैसे आपको उठा कर कर्नाटक के उसी गाँव में रख दिया गया हो. रिश्तों में रस्साकशी हो, दुनियादारी का जंजाल हो, किरदारों का ठेठपन हो या फिर ज़िन्दगी जीने का पूरे का पूरा लहजा, फिल्म अपनी ईमानदारी से आपको भौंचक्का कर देती है. इतना वास्तविक, इतना कठोर होते हुए भी फिल्म आपको कभी भी उदासी के अंधेरों की ओर नहीं धकेलती, बल्कि एक हँसी की चमकार हमेशा आपके चेहरे पर बिखेरती रहती है. एक बानगी देखिये. चिता की आग ठंडी हो गयी है. राख में से अस्थियाँ खंगाली जा रही हैं. बातचीत सुनिए. “ये पसली है पसली...रख लो” “ये पैर की हड्डी है” “पैर? इतना छोटा??”.

राम रेड्डी की ‘तिथि’ कहानी कहने के लिए सांचे में कैद अभिनेताओं का सहारा नहीं लेती. फिल्म के सभी प्रमुख किरदार गाँव के आम लोग हैं, नॉन-एक्टर्स जिन्हें कैमरा की भाषा पढ़ने में भले ही दिक्कत आती हो, पर हर सीन को परदे पर जिंदा कर देने का हुनर खूब आता है. इनकी झिझक, इनका अनगढ़ रवैया ही फिल्म की जान बन जाता है. फिल्म कहीं कहीं बहुत क्रूर होने की भी कोशिश करती है, ख़ास कर उस एक दृश्य में जहां गडप्पा अपनी ज़िन्दगी की कहानी के कुछ पुराने पन्ने पलटने लगते हैं. हालाँकि फिल्म 2 घंटे 14 मिनट की अपनी पूरी अवधि में अक्सर छोटे-छोटे पलों में जीती और कुछ बहुत ही खूबसूरत चित्रों में सिमटती दिखाई देती है, पर अंततः इसके रसीले, मीठे, थोड़े मतलबी पर सच्चे किरदार ही है जो इसे एक जिंदा फिल्म बनाये रखने में कामयाब होते हैं.

‘तिथि’ देखना, न देखना सिर्फ इसी एक एहसास से जुड़ा है कि आप कितनी बेसब्री, कितनी चाहत से अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहते हैं. मोटरसाइकिल पर तीन पहले से ही विराजमान है, पर चौथे के हाथ दे देने पर जगह बन ही जाती है. अब इतने थोक में ईमानदारी कहाँ मिलती है आजकल की बड़ी-बड़ी फिल्मों में? [4.5/5]        

हाउसफुल 3: कॉमेडी कोमा में है..! [1/5]

‘कॉमेडी’ कोमा में चली गयी है. अब उसका हॉस्पिटल के बिस्तर से उठना और आपको जी भर के गुदगुदाना न जाने कब होगा? बॉलीवुड की ज़बान में कहें तो, “अब दवा की नहीं, दुआ की जरूरत है”. हँसी के नाम पर रंग, लिंग और नस्ल-भेद को कोंचती टीका-टिप्पणी के बाद, इस बार ‘कॉमेडी’ को शारीरिक अपंगता पर गढ़े गए भौंडे और भद्दे प्रहार झेलने पड़े हैं. घाव गहरे हैं, पर ऐसा नहीं कि सिर्फ ‘कॉमेडी’ को ही मिले हैं. फ़रहाद-साज़िद की ‘हाउसफुल 3’ आपकी सोच, समझ और संवेदनाओं का भी बड़ी बेशर्मी से मज़ाक उड़ाती है, वरना कौन भलामानस होगा जिसे व्हील चेयर पर बैठे ‘दिव्यांग’ की सच्चाई का पता लगाने के लिए उसकी पैंट में चीटियाँ छोड़े जाने पर हँसी आती हो? शादी न हो इसके लिए बेटियों के पेट से थैली (ovary) निकलवा देने के सुझाव के बाद ‘आय एम जोकिंग’ बोल भर देने से क्या सब सिर्फ मज़ाक की हद तक ही रह जाता है?

लन्दन में कहीं एक बहुत पैसे वाला बाप है बटुक पटेल [बोमन ईरानी] जिनका मानना है, “आदमी को सीधा होना चाहिए, उल्टा तो तारक मेहता का चश्मा भी है”. उसकी तीनों बेटियाँ [जैकलीन फर्नान्डीज़, नरगिस फाखरी, लीज़ा हेडन] भी कम नहीं. एक कहती है, “पापा, मैं बच्चा नहीं कर रही.” आपको लग रहा होगा, लड़की प्रेगनेंसी के खिलाफ है? जी नहीं, उसका मतलब है, “आय एम नॉट किडिंग”. बिहार बोर्ड की टॉपर रूबी राय का विडियो खासा वायरल हुआ है आजकल. फिल्म की पृष्ठभूमि लन्दन न होकर बिहार होती तो ये तीनों बड़ी आसानी से खप जातीं. बहरहाल, तीनों के बॉयफ्रेंड्स भी हैं [अक्षय कुमार, अभिषेक बच्चन, रितेश देशमुख] जो लड़कियों से कम, उनकी दौलत से ज्यादा प्यार करते हैं. हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि तीनों को अँधा, गूंगा और अपाहिज़ बनने का नाटक करना पड़ता है. और फिर जो एक बार नाटक शुरू होता है, वो नाटक कम आपके दिल-ओ-दिमाग के साथ खिलवाड़ ज्यादा लगता है.

विकलांगों के प्रति बॉलीवुड पहले भी इस तरह की असंवेदनशीलता दिखा चुका है. दीपक तिजोरी की ‘टॉम, डिक एंड हैरी’ और इंदर कुमार की ‘प्यारे मोहन’ भूलने लायक ही फिल्में थीं. पर ‘हाउसफुल 3’ में फ़रहाद-साजिद सारी हदें लांघ जाते हैं. सस्ते मज़ाक के लिए घिसे-पिटे जोक्स का पूरा बोरा उड़ेल दिया है दोनों ने. हर किरदार जैसे कॉमनसेंस की स्पेल्लिंग भूल कर उल-जलूल हरकतें करने में लगा रहता है. अक्षय का किरदार स्प्लिट पर्सनालिटी डिसऑर्डर का शिकार है. ‘इंडियन’ शब्द सुनते ही उसके भीतर से एक और किरदार बाहर आने लगता है, पहले वाले से ज्यादा खूंखार. देश का जैसा माहौल है, ये एकदम फिट बैठता है. ‘भारत माता’ ‘गाय’ या ‘लता मंगेशकर और सचिन’ सुनते ही अकसर देश के लोगों में इस तरह के बदलाव आजकल खूब देखे जा रहे हैं. रितेश का किरदार शब्दों के चयन में हमेशा मात खा जाता है. ‘विरोध’ की जगह ‘निरोध’, ‘वाइफ’ की जगह ‘तवायफ़’, ‘खिलाड़ी’ की जगह ‘कबाड़ी’; इसलिए कोई हैरत नहीं अगर उसकी ‘कॉमेडी’ आपको ‘ट्रेजेडी’ लगे तो. अभिषेक का किरदार ‘बच्चन-परिवार’ के इर्द-गिर्द ही घूमता है. कभी बड़े बच्चन साब के पुतले के साथ सेल्फी, तो कभी बहू बच्चन [ऐश्वर्या] के पुतले के साथ रोमान्स!

फिल्म में अगर कुछ भी झेल जाने लायक है, तो वो है अक्षय का सब पर हावी हो जाने का अंदाज़. स्क्रिप्ट से बढ़कर सीन में कुछ न कुछ करते रहने का दुस्साहस ही उन्हें इस तरह की फिल्मों में कामयाब बनाता है. और दूसरा, फिल्म का ‘फ़ेक इश्क़’ गाना जिसमें तीनों नायकों को पैसे के पीछे भागना खलने लगता है और सच्चे प्यार का इमोशन हलके-हलके छू रहा होता है. एक यही वक़्त है फिल्म में जब हँसी हलकी-फुलकी ही सही, साफ़-सुथरी, उजली-उजली दिखती है. अंत में, अगर जैकलीन के किरदार के अंदाज़ में कहूं तो, “फ़रहाद-साजिद, जल्दी कुएं में जाओ (गेट वेल सून)!” और आप के लिए, “ठंडी दवाई लो (टेक अ चिल पिल)!...नहीं तो सरदर्द की गोली तो लेनी ही पड़ेगी! [1/5]    

Monday, 30 May 2016

वीरप्पन (A): बोर-प्पन, शोर-प्पन! [1.5/5]

(वीरप्पन देख चुके और देखने जाने वाले दो दर्शकों के बीच की बातचीत का एक अंश)

“सुना है, राम गोपाल वर्मा लौट आये हैं?”
“हाँ, भाई! लौट आये हैं.”
“सत्या वाले?”
“कहाँ तुम भी...”
“...तो? कंपनी वाले?”
“मज़ाक न करो”
“ भूत वाले तो होंगे?”
“....(चुप)”
“ सरकार?....सरकार राज?”
“(झुंझला कर) अज्ञात वाले हैं. रक्त-चरित्र वाले हैं. आया समझ?”
“(आह भरते हुए)...चलो, आग वाले तो नहीं हैं ना!”

अगर आप भी सिर्फ इसी बात से तसल्ली कर लेने के लिए तैयार बैठे हैं कि चलो, राम गोपाल वर्मा वापस तो आ गए, ऐसे हाल में उनकी नयी फिल्म ‘वीरप्पन’ आपको ज्यादा निराश नहीं करेगी. आख़िरकार इसमें ऐसा कुछ अलग या अनोखा तो है नहीं, जो आपको झटका दे दे, चौंका दे. वही सब तो है जिसके लिए राम गोपाल वर्मा जाने जाते हैं और जिसके लिए आप उनके, उनकी फिल्मों के मुरीद हैं. किसी एक के कंधे से होते हुए दूसरे के चेहरे पे चढ़ता कैमरा, जिन्हें हम OTS (over the shoulder) शॉट पुकारते हैं, कानफाड़ू बैकग्राउंड म्यूजिक, एक्टिंग के नाम पर आड़े-तिरछे चेहरे बनाना और डायलॉग्स एकदम सतही-सपाट; रामू एक बार फिर अपने (उस) आप को दोहराने में सफल साबित होते हैं, जिसे हममें से कोई भी अब और बर्दाश्त करने के मूड में नहीं दिखता.

राम गोपाल वर्मा जिस शिद्दत से जुर्म की कालिख में लिपे-पुते चेहरों में अपने नायक ढूंढते रहते हैं, कुख्यात चन्दन तस्कर वीरप्पन ऐसा लगता है जैसे उन्हीं के लिए गढ़ा गया हो. एक ऐसा जीवंत किरदार जो खूंखार हो, वहशी हो, निर्मम हो और जिसका हिंसा के साथ एक पागलपन वाला रिश्ता हो, राम गोपाल वर्मा के लिए कोई और दूसरा इससे बेहतर ढूंढ पाना मुश्किल था. बेहतर होता, रामू इसे महज़ अपना ‘कमबैक’ न मान कर थोड़ा और महत्वाकांक्षी हो पाते. वीरप्पन की रोबदार मूंछों वाली छवि को परदे पर उतार भर लेने की कामयाबी से ही रामू इतने उत्साहित लगने लगते हैं कि उसके किरदार की बर्बरता को उकेरना भूल ही जाते हैं. एक-दो दृश्यों को छोड़ दें, तो पूरी फिल्म में वीरप्पन के खौफ से ज्यादा गोलियों का शोर आपको अधिक विचलित करता है. अपने आपराधिक जीवनकाल में वीरप्पन ने तकरीबन सौ पुलिसवालों की हत्या की थी, राम गोपाल वर्मा फिल्म में इस गिनती का पीछा करते थकते नहीं, मानो वीरप्पन के वीरप्पन बनने में इसी एक अदद गिनती का हाथ रहा हो.

अभिनेता संदीप भारद्वाज का हूबहू वीरप्पन की तरह दिखना और लगना अगर वीरप्पन फिल्म का सबसे कामयाब पहलू है, तो सचिन जोशी [पुलिस वाले की भूमिका में] का ठंडा अभिनय सबसे कमज़ोर. उसके ऊपर पूरी फिल्म में उन्हीं की आवाज़ के साथ कहानी का आगे बढ़ना; आप को पता चल गया होगा असली मुजरिम कौन है? वैसे फिल्म अगर कहीं आपको सचमुच बाँधने की कोशिश करती है तो वो है वीरप्पन की पत्नी लक्ष्मी का ट्रैक. स्पेशल टास्क फ़ोर्स अपने ही एक अधिकारी की विधवा पत्नी [लीज़ा रे] को लक्ष्मी [उषा जाधव] के करीब ले जाती है, जहां पूरी कहानी दोनों के इर्द-गिर्द घूमने लगती है. यहाँ भी उषा जाधव तो अपने अभिनय में सधी और संपन्न नज़र आती हैं, पर लीज़ा के लिए अभी भी अभिनय उतना ही मुश्किल लगता है जितना उनका साफ़ तरह से हिंदी बोल पाना. वो नर्गिस फाखरी की याद दिलाती हैं, अजीब अजीब तरह के चेहरे बनाती हैं, जैसे वो किसी फिल्म का नहीं, बालाजी टेलीफिल्म्स के सास-बहू सीरियल्स का एक ऐसा किरदार हों जो बैकग्राउंड में बोलना ज्यादा पसंद करता हो और बात-बात पर गर्दन टेढ़ी करके आँखें छोटी-बड़ी करता रहता हो.

आखिर में सिर्फ इतना ही, राम गोपाल वर्मा की वीरप्पन शोर बहुत करती है, कहती बहुत कम. रामू अगर बॉलीवुड में इसे अपनी वापसी का जरिया मान रहे हों, तो मैं कहूँगा आपको अभी भी कुछ दिन और एकांतवास में रहना चाहिए. मेरा इंतज़ार अभी ख़तम नहीं हुआ. “मेरे राम गोपाल वर्मा आयेंगे! ज़रूर आयेंगे!!” कब? पूछिए मत! [1.5/5] 

Friday, 27 May 2016

वेटिंग (A): नसीर-कल्कि का अभिनय ही काफी है! [3/5]

अस्पताल के ‘वेटिंग रूम’ में खाली कैनवस जैसी बेदाग़-बेरंग दीवार पे टंगी घड़ी में सिर्फ छोटी-बड़ी दो सुईयां ही नज़र आ रही हैं. सही, सटीक और तय वक़्त जानने के लिए घंटों की गिनती और उनके बीच के मिनटों के फ़ासले जैसे किसी ने रबर से मिटा दिए हों. यहाँ इनकी कोई ख़ास जरूरत भी नहीं है. जब इंतज़ार का रास्ता लम्बा हो तो घंटे-मिनट-सेकंड वाले छोटे-छोटे मील के पत्थरों को नज़रअंदाज़ करना ही पड़ता है. कुछ ने इस फ़लसफ़े को अच्छी तरह समझ लिया है, जैसे प्रोफेसर शिव नटराज [नसीर साब] जिनकी पत्नी पिछले आठ महीनों से कोमा में हैं. तारा देशपांडे [कल्की] के लिए अभी थोड़ा मुश्किल है. शादी को अभी 6 महीने ही हुए थे और आज तारा का पति [अर्जुन माथुर] एक रोड-एक्सीडेंट के चलते आईसीयू में भर्ती है. दुःख को झेलने-सहने और समझने के अलग-अलग पड़ाव होते हैं, प्रोफेसर अगर आख़िरी पड़ाव पर हैं तो तारा के लिए अभी शुरुआत ही है.

अनु मेनन की ‘वेटिंग’ ज़िन्दगी और मौत के बीच के खालीपन से जूझते दो ऐसे अनजान लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है जिनमें कहने-सुनने-देखने में कुछ भी एक जैसा नहीं है, पर एक पीड़ा, एक व्यथा, एक दुविधा है जो दोनों को एक दूसरे से बांधे रखती है. प्रोफ़ेसर शिव धीर-गंभीर और शांत हैं, जबकि तारा अपनी झुंझलाहट-अपना गुस्सा दिखाने में कोई शर्म-लिहाज़ नहीं रखती. तारा को मलाल है कि ट्विटर पर उसके पांच हज़ार फ़ॉलोवर्स में से आज उसके पास-उसके साथ कोई भी नहीं, जबकि प्रोफ़ेसर को अंदाज़ा ही नहीं ट्विटर क्या बला है? इसके बावज़ूद, अपने अपनों को खो देने का डर कहिये या फिर वापस पा लेने की उम्मीद, दोनों एक-दूसरे से न सिर्फ जुड़े रहते हैं, अपना असर भी एक-दूसरे पर छोड़ने लगे हैं. ‘नम्यो हो रेंगे क्यों’ का जाप करने वाली तारा कभी खुद को नास्तिक कहलाना पसंद करती थी, कौन मानेगा? वहीँ प्रोफ़ेसर को आज ‘एफ़-वर्ड’ कहने में भी कोई दिक्कत पेश नहीं आती.

‘वेटिंग’ बड़ी ईमानदारी से और बहुत ही इमोशनल तरीके से इन दो किरदारों के साथ आपको ज़िन्दगी के बहुत करीब लेकर जाती है. हालाँकि अस्पताल जैसा नीरस-उदास और बेबस माहौल हो तो फिल्म के भी उसी सांचे में ढल जाने का डर हमेशा बना रहता है, पर अतिका चौहान के मजेदार संवाद हमेशा इस नीरसता को तोड़ने में कामयाब रहते हैं. फिल्म जहां एक तरफ बड़ी संजीदगी से आपको लगातार ज़िन्दगी और मौत से जुड़े कुछ अहम् सवालों के आस-पास खींचती रहती है, दूसरी ओर वो इस कोशिश में भी लगी रहती है कि आपका दिल नम रहे, चेहरे पर मुस्कराहट बराबर बनी रहे और आप बड़ी तसल्ली से तकरीबन सौ मिनट की इस फिल्म का पूरा लुत्फ़ लें.

अभिनय में नसीर साब और कल्कि एक दूसरे को पूरी तरह कम्पलीट और कॉम्प्लीमेंट करते नज़र आते हैं. नसीर साब के साथ एक ख़ास सीन में, जहां दोनों एक-दूसरे पर बरबस बरस रहे होते हैं, कल्कि अपनी एक  अलग छाप छोड़ने में सफल रहती हैं. नसीर साब के तो कहने ही क्या! मतलबी से दिखने वाले डॉक्टर की भूमिका में रजत कपूर, बनावटी दोस्त की भूमिका में रत्नाबली भट्टाचार्जी और बेबाक, दो-टूक सहकर्मी बने राजीव रविन्द्रनाथन जंचते हैं.

सिनेमा बदल रहा है. सिनेमा से ‘अति’ विलुप्त होता जा रहा है. अनु मेनन की ‘वेटिंग’ भी इसी अहम् बदलाव का एक हिस्सा है. (इस तरह की) फिल्मों में नाटकीयता के लिए अब शायद ही कहीं कोई जगह बची है. कथानक से अब बेमतलब के ज़ज्बाती रंग हटने लगे हैं. जिसे जो कहना है, उसी लहजे से कह रहा है जिसमें उस किरदार की पैठ हो. तैयार रहिये, कई बार ये आपको विचलित भी कर सकता है. [3/5]

Friday, 20 May 2016

सरबजीत: बहना, ओ बहना! [2/5]

मुख्य भूमिकायें सितारों की किस्मत होती हैं, चमचमाती थाली में रख कर ड्राइंग रूम में परोस दी जाती हैं. सहायक भूमिकायें अक्सर अभिनेताओं की झोली में उनकी मेहनत का नजराना समझकर डाल दी जाती हैं. कम से कम बॉलीवुड में बॉक्स-ऑफिस के इर्द-गिर्द मंडराती रहने वाली ‘बड़ी’ फिल्मों का तो यही लब्बो-लुबाब है. ओमंग कुमार की ‘सरबजीत’ उन्ही चंद फिल्मों में से एक है.

सरबजीत [रणदीप हुडा] सालों से पाकिस्तानी जेल में हिन्दुस्तानी जासूस होने के शक़ में कैद है. बहन दलबीर कौर [ऐश्वर्या राय बच्चन] की लगातार कोशिशों का दम-ख़म देखिये कि आज सरबजीत का पूरा परिवार उस से मिलने पाकिस्तान की जेल में आया है. बीवी [रिचा चड्ढा] भर्राए गले से पूछ बैठती है, “ठीक हो?” सरबजीत [हुडा] अपनी सारी टूटती सांसें बटोर कर कहता है, “अब हूँ!” मेरे ख़याल से पूरी फिल्म का ये सबसे कामयाब, सबसे कारगर सीन है. यहाँ आपको फिल्म से शिकायतें कम रहती हैं, पर कुछ है जो अचानक आपके जेहन में बिजली की तरह कौंध गया है. सीन में मौजूद सितारे [राय बच्चन] की चकाचौंध धीमी पड़ गयी है. दोनों अभिनेताओं को [चड्ढा और हुडा] बहुत थोड़ा ही सही, फैलने का एक मौका मिल गया है और वे उसमें इस कदर कामयाब रहते हैं कि आप सोच में पड़ जाते हैं, आखिर क्यूँ हर ‘मैरी कॉम’ को जरूरत होती है ‘प्रियंका चोपड़ा’ की?

जब ऐश्वर्या अपने चीखने-चिल्लाने के प्रतिभा-प्रदर्शन में कैमरे को लताड़ने में मशगूल रहतीं हैं, अक्सर बैकग्राउंड में रिचा चड्ढा या तो भैसें नहलाने या ढहती दीवाल की ईंटें हटाने में चुपचाप लगी रहती हैं. उन्हें पता है, उन्हें सिर्फ फिल्म चलाने के लिए शामिल नहीं किया गया है. हालाँकि ओमंग कुमार उनका भी इस्तेमाल अरिजीत सिंह के गाने पर बखूबी करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे वो रणदीप को फिल्म के शुरुआत में ही ‘बैंड बाजा बारात’ का रणवीर सिंह बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते. सरबजीत की बहन के रोल में ऐश्वर्या को एक माकूल ज़मीन देने में ओमंग इतनी शिद्दत दिखाते हैं कि फिल्म में हर बूढा-बच्चा-जवान ऐश्वर्या को ‘बहनजी’ ही कह के बुलाता है. उस पर डॉयलागबाजी का आलम कुछ यूँ कि ‘ग़दर’ का सनी देओल भी तौबा कर ले!

ग़ालिब अपने एक शे’र में कहते हैं, “मुश्किलें पड़ीं मुझपे इतनी कि आसां हो गयीं”. ओमंग कुमार भी ‘सरबजीत’ की कहानी में मुश्किलों को पहले तो यूँ सामने ला पटकते हैं मानो अब कुछ भी हल मुमकिन नहीं, फिर अगले ही पल उन्हें कुछ इस अंदाज़ से दुरुस्त कर देते हैं, जैसे पहले उनका कोई नाम-ओ-निशाँ ही न रहा हो. फिल्म अपने इसी लचर रवैये की वजह से अक्सर सच्चाई से परे झाँकने लगती है. सरबजीत का पाकिस्तानी जेल में लगातार अपने परिवार के साथ चिट्ठियों से जुड़े रहना, दलबीर कौर का बार-बार पाकिस्तान आना-जाना, वहाँ के लोगों को मुंहतोड़ जवाब देना; सब कुछ एक बॉलीवुड फिल्म के दायरे में बड़ी आसानी से समा जाता है.   

आखिर में, ओमंग कुमार की ‘सरबजीत’ रणदीप हुडा, रिचा चड्ढा और अपने छोटे से मजेदार रोल में दर्शन कुमार [मैरी कॉम, एनएच 10 वाले] के अच्छे अभिनय के बावजूद, ऐश्वर्या के उकता देने वाले अभिनय [???], धीमी गति और कहानी में बनावटीपन के पुट की वजह से आपके दिल तक शायद ही पहुँच पाए. [2/5]